Wednesday, April 22, 2026
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कुम्भ में भगदड़ और प्रशासन

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कुम्भ में भगदड़ और प्रशासन

बीबीसी संवाददाता विकास पांडेय ने बताया कि ‘‘मैं मेले के मुख्य एंट्री गेट पर हूँ जहां से अब भी लाखों लोगों का कुंभ मेले में जाना जारी है। इसी दौरान कुंभ क्षेत्र से एम्बुलेंस का जाना जारी है। प्रशासन ने घायलों और मृतकों का कोई आंकड़ा जारी नहीं किया है।’ सुमेधा पाल से बातचीत में एक पीड़ित महिला ने बताया कि भगदड़ में वह गिर गई थीं और उनके नीचे तीन लोग दबे थे जिनकी मौत हुई है। एक श्रद्धालु ने विकास पांडे से बात की जिन्होंने बताया कि सुबह 8 बजे से वो चले जा रहे हैं और उनको पुलिसकर्मी सही पता नहीं बता रहे हैं। स्टेशन से लेकर अब तक ग़लत रास्ते बताए जा रहे हैं। बीबीसी से आएशा मिश्रा नामक एक श्रद्धालु ने बुधवार तड़के गंगा घाट का हाल बताते हुए कहा कि ’एक ही रास्ते से लोग आ और जा रहे हैं, इस दौरान धक्का-मुक्की की वजह से लोग गिर जा रहे हैं। पुलिस या तो घाट पर है या द्वार पर है। बीच में कहीं पुलिस नहीं है। वैभव कृष्ण (डीआईजी महाकुंभ नगर मेला क्षेत्र) ने बुधवार शाम को पत्रकारों को बताया कि संगम नोज घाट पर मची भगदड़ में 30 लोगों की मौत हुई है जिसमें से 25 की शिनाख्त कर ली गई है। उन्होंने बताया कि 60 लोग घायल हुए हैं जिनका अस्पतालों में उपचार किया जा रहा है। बीबीसी ने लिखा है कि चश्मदीदों की मानें तो और दो जगहों पर ऐसे हालात बने। इसमें लोगों की जान भी गई। प्रशासन का कहना है कि 29 जनवरी मौनी अमावस्या के दिन संगम नोज़ के अलावा जिन दूसरी जगहों पर हादसे और मौतें होने के दावे किये जा रहे हैं, उनकी पुष्टि और जाँच की जा रही है।
अर्पित महाराज बताते हैं, “लोग प्यास के मारे तड़प रहे थे। पानी पिला दो, एक घूँट पानी दे दो। चारों तरफ़ से लोग आ गए। इधर झूँसी से रास्ता उतर रहा है, वहाँ से लोग आ गए। उधर शास्त्री पुल से उतर कर लोग आ गये, इधर पीछे से यहाँ लोग आ गए, एकदम कसाकसी हो गई“। दास धर्म शिविर को जब बेहाल भीड़ के लिए खोला गया तो कुछ मिनट में ही कई हज़ार लोग इसमें घुस गए। अर्पित महाराज कहते हैं, “एक महिला ने अपना बच्चा फेंकते हुए कहा- गुरु जी, मेरे बच्चे को बचा लीजिए। उन मुश्किल हालात में हमने सैकड़ों लोगों की मदद की“। दास शिविर में सेवा कर रहे अशोक त्यागी कहते हैं, “खुले आसमान के नीचे साँस न ले पाएँ, यह पहली बार देखा। लोगों ने जूते, चप्पल, बैग, जिसका जो सामान था, छोड़ गए। जान बचाना मुश्किल हो रहा था, लोग पानी के लिए तड़प रहे थे।“ सेक्टर-21 का कचरा ट्रांसफ़र स्टेशन है, यहां अभी कचरे में आए जूते-चप्पलों, कपड़ों से भरा-पड़ा है। शिवनाथ कचरा ले जाने वाला ट्रक चलाते हैं।
29 जनवरी की सुबह का मंज़र याद करते हुए शिवनाथ बताते हैं, “हालात बहुत ख़राब थे, ऐसा लगा था कि जो लेटे हुए थे, वे पूरी तरह से ख़त्म हो गए हैं। जो परिवार यहाँ थे, वह बिलख-बिलख कर रो रहे थे। कोई कह रहा था, यहाँ मेरा चाचा था, यहाँ मेरे माँ-बाप थे, यहाँ मेरी औरत थी। यहाँ मेरा भाई था, कोई नहीं मिला सर’’। कचरा गाड़ी चलाने वाले चंद्रभान ने कचरे में एक शव ख़ुद देखने का दावा करते हुए बीबीसी हिंदी से कहा, “बॉडी… मैं इस चौराहे (उल्टा किला चौक) पर देखा, बारह बजे, वहाँ पर एक बहुत बुज़ुर्ग का शव देखा था“।
चंद्रभान बताते हैं कि वे अगले तीन दिनों तक सिर्फ़ भीड़ में लोगों का छूट गया सामान ही कचरे में ढोते रहे। आशुतोष अपनी ताई का शव उठाने अपने दोस्तों के साथ वहाँ पहुँचे थे। उन्होंने बताया, “वहाँ कोई सरकारी मदद नहीं पहुँची। न कोई एंबुलेंस न और कुछ।’’ उनका सवाल है कि अगर मेडिकल की इतनी सुविधा थी तो वह पहुँची क्यों नहीं? गणेश मिश्र दावा करते हैं कि एक महिला पुलिसकर्मी बार-बार उच्च अधिकारियों और कंट्रोल रूम को फ़ोन करके बता रही थी कि यहाँ स्थिति विकट हो रही है। उधर से न कोई जवाब आया और न कोई मदद।
15 फरवरी की रात नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर भगदड़ में 18 लोगों की मौत हो गई। इनमें से कई लोगों का रात में ही पोस्टमार्टम करा दिया गया और अस्पतालों में जाना मीडियाकर्मी को वर्जित कर दिया गया। गिरधारी का कहना है, “हम दोनों पटना से पहले आनंद विहार ट्रेन से आए फिर पानीपत जाने के लिए नई दिल्ली से ट्रेन पकड़ रहे थे लेकिन प्लेटफ़ॉर्म 14 पर भगदड़ मचने से मामी की मौत हो गई। “गिरधारी ने बताया, “प्लेटफॉर्म में जाने के लिए जैसे ही स्टेशन में आए त़ो वहाँ भारी भीड़ देखी। सीढ़ी में धक्का-मुक्की की वजह से हम अलग हो गए। मैं थोड़ी देर बाद उनको देखने गया तो उधर दो, तीन लोगों के बचाओ-बचाओ की आवाज आ रही थी। मैंने चादर से मामी को पहचाना, जैसे ही चादर हटाई तो हल्की सांस चल रही थी।“
उमेश अपनी आंखों-देखी बताते हैं, “मेरे सामने पहले से कई लोगों की बॉडी गिरी हुई थी। उसके बाद वो लोग टकराए हैं, उनके ऊपर से लोग जाने लगे हैं।“ उन्होंने बताया, “उस समय लोगों (बॉडी) को जीने के सामने ही लगा रखा था. उस समय वहां पर न कोई मीडिया थी और न कोई प्रशासन था।“
मदद को लेकर उमेश कहते हैं, “मदद तो कुछ नहीं मिली। बाद में बहुत देर हो गई थी। मैंने कई पुलिस वाले, आरपीएफ़ वालों को कहा लेकिन कोई सुनने को तैयार नहीं था।“ मैं साल 1981 से कुली का काम कर रहा हूं, मैंने इतनी भीड़ कभी नहीं देखी।“ दूसरे कुली का कहना है कि “हमने 14 और 15 नंबर प्लेटफॉर्म से खुद लाशों को उठा-उठाकर एंबुलेंस में भरा, उन्हें अस्पताल लेकर गए। बच्चे, महिलाएं आदमी, सब भीड़ में दब गये, घायल हो गये। सांस लेने की जगह नहीं मिली।“
एक अन्य कुली ने हादसे के बारे में बताया कि “हम लोग स्टेशन के बाहर काम कर रहे थे, स्टेशन के भीतर से तेज़ आवाज़ें आने लगीं।“ “हम लोग भागकर भीतर गए तो देखा कि लोग इधर-उधर भाग रहे थे। हमने कई बच्चों को देखा जो दबे हुए थे। हमने बच्चों को उठा-उठाकर बाहर निकाला। कई लोग बेहोश हो गए थे।’’ “हमारे पास हाथ गाड़ी होती है, उसी में लोगों को लाद-लादकर हम बाहर लेकर आ रहे थे और एंबुलेंस तक पहुंचा रहे थे।“
रेल मंत्रालय ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (टिवट्र) को पत्र लिखा है। इस पत्र में रेल मंत्रालय ने एक्स से 15 फरवरी को दिल्ली रेलवे स्टेशन पर हुई भगदड़ से जुड़े सभी वीडियो और फोटो को अपने प्लेटफॉर्म से हटाने के लिए कहा है। इसके पीछे मंत्रालय ने “एथिकल नॉर्म्स“ का हवाला दिया है!

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