जोन स्तरीय निरंकारी बाल का हुआ समागम
तेजस टूडे सं.
अवधेश मौर्य
जौनपुर। बच्चों को बचपन से ही बाल संगत से जोड़ना आवश्यक है। बाल संगत में आने से बच्चों का सार्वभौमिक व आध्यात्मिक विकास होता है तथा वे प्यार, नम्रता व सहनशीलता जैसे दैवीय गुण ग्रहण करते हैं। यही गुण उनके अपने कैरियर और मिशन में आगे बढ़ने का मार्ग प्रशस्त करता है। बच्चे मन के सच्चे होते हैं, उनमें बैर, इर्ष्या, द्वेष आदि बुराइयां नहीं होतीं। आज के बच्चे आने वाले अच्छे समाज की नींव के पत्थर हैं जो आगे चलकर सुदृढ़ तथा ऊंच-नीच की भावना से उठकर स्वच्छ समाज का निर्माण करने में सक्षम होंगे। आप चाहे तो उन्हें प्यार, मिल वर्तन, भाईचारा आदि अच्छी भावनाएं सीखा करके एक अच्छा नागरिक और इंसान बना सकते हैं। संस्कारवान बच्चे ही देश व समाज का भविष्य उज्जवल बनाते हैं।
उक्त उद्गार नगर के मड़ियाहूं पड़ाव स्थित संत निरंकारी सत्संग भवन जौनपुर के प्रांगण में जोन स्तरीय निरंकारी बाल समागम पर उपस्थित विशाल सन्त समूह को सम्बोधित करते हुये लखनऊ से आये विद्वान संत जीएस तिवारी केन्द्रीय ज्ञान प्रचारक ने व्यक्त किया।
इस दौरान बच्चों और युवाओं ने गीत, भजन, कविताएं और लघु नाटक के साथ प्रेरक विचार व्यक्त करते हुये निरंकार प्रभु और सत्संग से जुड़े रहने की सीख दिया। वहीं अमरनाथ विश्वकर्मा जोनल इंचार्ज ने निरंकारी बाल समागम के सफल आयोजन पर बच्चों, अभिभावकों, सेवादल अधिकारियों, सदस्यों, खेल मंत्री युवा कल्याण विभाग एवं साध संगत का स्वागत करते हुये आभार भी व्यक्त किया।
इस अवसर पर तमाम ब्रांचों के मुखी महात्मा, संयोजक, क्षेत्रीय संचालक, संचालक, शिक्षक आदि उपस्थित रहे। इस बाल समागम में निरंकारी बाल प्रदर्शनी भी लगायी गयी जिसमें बहुत ही सुंदर ढंग से मिशन के संदेशों को उजागर किया गया।































अजय कुमार
स्वदेश कुमार







त्योहारी उत्साह की शुरुआत जल्दी: ग्रैंड शॉप्सी मेला 2025 ने छोटे शहरों में खरीदारी की लहर बढ़ाई
हाल के वर्षों में जिस तरह से बीजेपी ने नई पीढ़ी में अपनी पकड़ मजबूत की है, यह नतीजे उसी अभियान के विस्तार की तरह माने जा रहे हैं।







भारत और पाकिस्तान के बीच कई बार उस समय हॉकी से लेकर क्रिकेट तक के अंतरराष्ट्रीय स्तर के मुकाबले होते रहे थे, जब दोनों देशों की सीमाओं पर तनाव या जंग जैसे हालात रहे थे। पूर्व में चाहे कांग्रेस की सरकार रही हो या फिर आज मोदी की सरकार, कोई इन अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों से किनारा नहीं कर सकती है। यह बात सब जानते और समझते हैं, लेकिन कुछ कथित बुद्धिजीवी और विपक्ष के नेता एशिया कप में भारत-पाक के बीच के मुकाबले ही आड़ लेकर मोदी सरकार को देश विरोधी साबित करने में लगे हैं। इसके लिए जनता को भड़काया जा रहा है। जबकि हकीकत यह है कि भारत एशिया कप में पाकिस्तान के खिलाफ खेलने के लिए बाध्य था, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंटों में भाग लेना किसी भी क्रिकेट बोर्ड की जिम्मेदारी और समझौते का हिस्सा है। यदि भारत खेलने से इंकार करता तो कई स्तरों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता जिसमें आर्थिक, राजनैतिक और खेल जगत की प्रतिष्ठा प्रभावित होती। इस मुद्दे पर भारत में विरोध मुख्यतः राजनीतिक है, पर इसके पीछे आर्थिक, कूटनीतिक और खेल प्रबंधन की मजबूरियां भी हैं।













14 सितम्बर को दुबई इण्टरनेशनल क्रिकेट स्टेडियम में होने वाला एशिया कप 2025 का भारत-पाकिस्तान मुकाबला खेल से कहीं अधिक एक भावनात्मक और राजनीतिक बहस बन चुका है। आम तौर पर इस मैच का ऐलान होते ही पूरे देश में उत्साह और रोमांच का माहौल बनता है। टिकट कुछ ही घंटों में बिक जाते हैं, पब और रेस्टोरेंट्स बड़ी स्क्रीन पर लाइव प्रसारण दिखाने के लिए बुकिंग शुरू कर देते हैं और लोग इसे क्रिकेट का महाकुंभ मानते हैं लेकिन इस बार नज़ारा बिल्कुल उलट है। पहलगाम हमले और ऑपरेशन सिंदूर की टीस अब भी ताज़ा है और देश का जनमानस पूछ रहा है कि जब हमारे जवानों और नागरिकों का खून अभी सूखा भी नहीं तो दुश्मन देश के साथ क्रिकेट खेलने का क्या औचित्य है?

















पार्टी सभी 243 सीटों पर अपने दम पर चुनाव लड़ेगी। यह ऐलान इसलिए भी अहम है, क्योंकि बिहार की राजनीति जातीय समीकरणों और गठबंधन की मजबूरियों पर टिकी रहती है और ऐसे में किसी बड़े दल का अकेले मैदान में उतरना कई समीकरणों को बदल सकता है। बसपा की जड़ें उत्तर प्रदेश की राजनीति में गहरी हैं जहाँ दलितों के सहारे मायावती 4 बार मुख्यमंत्री बनीं। पार्टी ने हमेशा बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर और कांशीराम के विचारों को आधार बनाया लेकिन यूपी से बाहर बसपा का असर सीमित ही रहा। बिहार में 1990 के दशक और 2000 के शुरुआती वर्षों में बसपा ने जरूर कई सीटों पर ठीक-ठाक वोट बटोरे थे। 2010 के विधानसभा चुनाव में बसपा को 3% वोट मिले थे जो बाद में गिरते-गिरते 2020 में 0.38% पर आ गए। सीटों की बात करें तो बसपा अब तक बिहार विधानसभा में एक भी सीट नहीं जीत पाई है। 2020 में गोपालगंज जैसी कुछ सीटों पर बसपा ने मजबूत मुकाबला जरूर किया लेकिन जीत हाथ नहीं लगी। यह इतिहास बताता है कि बिहार में बसपा की मौजूदगी तो है लेकिन उसे वोटों को सीटों में बदलने की चुनौती हमेशा से रही है।


गाज़ीपुर और पूर्वांचल में बड़ी संख्या में हिंदू मतदाता हैं। इस बयान से वे उन्हें भी संदेश देना चाहते हैं। यह भी संकेत हो सकता है कि अंसारी आने वाले चुनावी समीकरणों और गठबंधनों को ध्यान में रखकर अपनी पोज़िशनिंग बदल रहे हैं। कुल मिलाकर अफ़ज़ाल अंसारी की तारीफ़ें सिर्फ़ औपचारिक नहीं, बल्कि संतुलन साधने और भविष्य की राजनीति को ध्यान में रखकर दी गईं रणनीतिक टिप्पणियां मानी जा रही हैं।




















वह सिर्फ 12.3 किलोमीटर तक गई जहां तापमान 180 डिग्री सेल्सियस हो गया। इससे ज्यादा गहराई में जाना अभी मुमकिन नहीं, क्योंकि वहां गर्मी और दबाव बर्दाश्त से बाहर है।

उन्होंने दावा किया कि उनके पास ऐसी बड़ी चीजें हैं जिनके खुलासे से भारत का चुनाव आयोग कठघरे में खड़ा हो सकता है। यह बयान न केवल उनकी पिछली टिप्पणियों की निरंतरता है, बल्कि भारतीय लोकतंत्र और इसकी चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल उठाता है। राहुल गांधी ने संसद परिसर में मीडिया से रूबरू होते हुए दावा किया कि उनके पास मतदाता सूची में गड़बड़ी को लेकर ठोस सबूत हैं जो चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हैं। उन्होंने संकेत दिया कि ये सबूत इतने विस्फोटक हैं कि इनके सार्वजनिक होने पर चुनाव आयोग की साख खतरे में पड़ सकती है। हालांकि उन्होंने विशिष्ट विवरण या सबूतों को तत्काल सार्वजनिक नहीं किया जिससे उनके बयान पर सवाल उठ रहे हैं। यह बयान ऐसे समय में आया है जब बिहार में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया और महाराष्ट्र व कर्नाटक के हाल के चुनावों में मतदाता सूची को लेकर पहले से ही विवाद चल रहा है।
















जिस राज्य में पत्रकारों ने आजादी से लेकर आज तक सबसे सशक्त भूमिका निभाई, वहीं वे सम्मान और सुरक्षा के मोर्चे पर उपेक्षित क्यों रहें? अब वक्त है कि काशी से लखनऊ तक कलम के सिपाही भी सामाजिक सुरक्षा के हकदार बने।

















यह गाड़ी आम आदमी के सपनों से कहीं दूर है और इसीलिए यह चर्चा का विषय बन गई है। भारत में जहां कारों की औसत कीमत 11.5 लाख है, वहीं टेस्ला की शुरुआती कीमत छह गुना अधिक है। सवाल यह नहीं कि टेस्ला महंगी क्यों है, सवाल यह है कि भारत जैसे मूल्य-संवेदनशील बाजार में क्या वह टिक पाएगी?







शिवलिंग पंचमहाभूत—पृथ्वी,जल,अग्नि,वायु और आकाश का प्रतीक है। लिंग पुराण में शिवलिंग को “परं ज्योतिः” कहा गया है जो सृष्टि के मूल और पंचमहाभूतों के संनादन को दर्शाता है। शिवलिंग का अंडाकार आकार ब्रह्मांड की संरचना से मेल खाता है। जैसा कि वैज्ञानिक अध्ययनों में “कॉस्मिक एग” के रूप में वर्णित है। शिवलिंग की ज्योति और निराकार प्रकृति ब्रह्मांडीय ऊर्जा (डार्क एनर्जी) से मेल खाती है। यह क्वांटम स्तर पर ऊर्जा के संनादन को दर्शाता है।आइंस्टीन का सिद्धांत और प्लांक की क्वांटम थ्योरी शिवलिंग को ऊर्जा और पदार्थ के संनादन के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत करते हैं। शिवलिंग का शीर्ष ऊर्जा (तरंग) और आधार, पदार्थ (कण) को दर्शाता है जो क्वांटम भौतिकी की “वेव-पार्टिकल ड्यूएलिटी” (हाइजेनबर्ग) से मेल खाता है। शिवलिंग अद्वैत वेदांत में शिव (चेतना) और शक्ति (प्रकृति) के अभेद को दर्शाता है।यह ध्यान और कुंडलिनी जागरण का माध्यम है जो मन को समाधि की ओर ले जाता है।शिव पुराण (विद्येश्वर संहिता) में इसे “सर्वं विश्वं समाहितम्” कहा गया है। आदि शंकराचार्य के अद्वैत वेदांत में शिवलिंग ब्रह्म का प्रतीक है जो निर्गुण और सगुण दोनों रूपों में मौजूद है।सांख्य दर्शन में यह पुरुष (शिव) और प्रकृति के संतुलन को दर्शाता है।



राउत ने यह भी उल्लेख किया कि मोदी ने स्वयं इस आयु सीमा के नियम को लागू किया था और अब यह देखना बाकी है कि क्या वह इसे स्वयं पर लागू करेंगे। आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल ने भी पिछले साल इस मुद्दे को उठाया था, जब उन्होंने भागवत को पत्र लिखकर पूछा था कि क्या वह बीजेपी के इस नियम से सहमत हैं, जिसके तहत 75 वर्ष से अधिक आयु के नेताओं को सेवानिवृत्त किया जाता है। विपक्ष की यह रणनीति स्पष्ट रूप से बीजेपी और आरएसएस के बीच संभावित मतभेदों को उजागर करने की कोशिश है, ताकि सत्तारूढ़ गठबंधन में दरार पैदा की जा सके।








यह यात्रा एक लोक-तीर्थ है, यह तीर्थ वह है जो स्वयं बनता है जिसमें श्रद्धालु ही पुरोहित हैं और श्रद्धा ही विधान है। कांवड़ शिव का निमंत्रण नहीं, बल्कि शिव से मिलने का संकल्प है। यह यात्रा जल के सहारे आत्मा की अग्नि को शान्त करने की आराधना है। यह यात्रा हर कदम पर ‘हर हर महादेव’ को स्वयं में धारण करने की प्रक्रिया है। श्रावण मास में शिवभक्तों का उत्साह देखते ही बनता है। छोटे-बड़े, युवा-वृद्ध, नर-नारी, सब एक समान केसरिया परिधान में “बोल बम” के नारे लगाते हुए कांवड़ यात्रा पर निकल पड़ते हैं। यह धार्मिक अनुष्ठान केवल जलाभिषेक नहीं, बल्कि आत्मनियंत्रण, त्याग और परंपरा का अनूठा संगम बन जाता है। सावन में शिवभक्तों की यह यात्रा हमें सिखाती है कि श्रद्धा में शक्ति है, संकल्प में सामर्थ्य है और भक्ति में वह ऊर्जा है जो असंभव को भी संभव बना देती है। कांवड़ यात्रा हर वर्ष न केवल सड़कों को गुलजार करती है, बल्कि हृदयों को शिव-भाव से सराबोर कर देती है।






कबीर दास जी कहते हैं—— गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लागूं पांय, बलिहारी गुरु आपनो गोविंद दिए बताय।








अब मराठी, बंगाली, तमिल, भोजपुरी, पंजाबी में ओरिजिनल वेब सीरीज़ बन रही हैं जो पहले केवल फिल्मों तक सीमित थी। ओटीटी ने उन विषयों को मंच दिया है जिन्हें मुख्य धारा के टीवी चैनल या सिनेमा हिचकिचाहट से दिखाते थे। जैसेः लैंगिक असमानता, एलजीबीटीक्यू $ मुद्दे, ग्रामीण जीवन, राजनीतिक व्यंग्य, जातीय विषमता आदि। ओटीटी कंटेंट में संवाद अधिक स्वाभाविक, बोलचाल की भाषा, स्थानीय मुहावरे और देसी शब्दों का प्रयोग करते हैं। यहाँ पारंपरिक ’शुद्ध हिंदी’ या ’सांस्कृतिक मर्यादा’ का दबाव कम होता है। इससे मीडिया की भाषा आम आदमी के और करीब आ गई है। आज ओटीटी केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं है।
कई समाचार एजेंसियां और डॉक्यूमेंट्री निर्माता भी ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर अपनी जगह बना रहे हैं। जैसे बीबीसी, वायस और एआई जाजीरा के समाचार आधारित डॉक्यूमेंट्री ओटीटी पर खूब देखे जा रहे हैं। टीवी और सिनेमा की तरह ओटीटी पर कठोर सेंसरशिप लागू नहीं है। इसने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को तो बढ़ाया है लेकिन इसके साथ भाषाई मर्यादा, अश्लीलता और अभद्र भाषा के प्रयोग पर बहस भी खड़ी कर दी है। खास यह है कि ओटीटी प्लेटफॉर्म का भाषा पर खासा प्रभाव पड़ा है: आंचलिक शब्दों और मुहावरों का तेजी से प्रयोग, हिंग्लिश और मिश्रित भाषा का वर्चस्व, स्थानीय स्लैंग का सामान्यीकरण, अभद्र भाषा के प्रयोग की बढ़ती स्वीकृति (जिस पर समाज में मतभेद भी हैं), क्षेत्रीय भाषाओं का ग्लोबलाइजेशन आदि प्रमुख है। कहा जा सकता हे ओटीटी प्लेटफॉर्म्स ने मीडिया के स्वरूप को पूरी तरह से लोकतांत्रिक बना दिया है। अब कंटेंट निर्माता के पास ज्यादा रचनात्मक आजादी है और दर्शक के पास भाषा व विषय का विस्तृत चयन। यह माध्यम भारतीय भाषाओं और विविध समाजों को वैश्विक मंच पर लाने में सबसे प्रभावी साबित हो रहा है।
से आषाढ़ पूर्णिमा की महर्षि वेद व्यास जी की जयंती के रूप में मनाया जाता है। इस दिन शिष्य अपने गुरु के प्रति सम्मान पूजन और आभार प्रकट कर आध्यात्मिक जीवन में मार्गदर्शन का स्मरण किया जाता है। हिंदू धर्म में गुरु पूर्णिमा को बेहद पवित्र और आध्यात्मिक महत्व का दिन माना जाता है, क्योंकि इसी दिन महर्षि वेदव्यास जी का जन्म हुआ था। उन्होंने न केवल महाभारत, बल्कि श्रीमद्भागवत, अट्ठारह पुराण, ब्रह्म सूत्र जैसे ग्रंथों की रचना करके सनातन धर्म को अमूल्य धरोहर दी। गुरु पूर्णिमा को गुरु-शिष्य परंपरा का महोत्सव के रूप में मनाया जाता है। इस दिन लोग अपने आध्यात्मिक, सामाजिक या शैक्षिक गुरु का सम्मान करते हैं। उनका आशीर्वाद लेते हैं और उनके मार्गदर्शन के लिए कृतज्ञता प्रकट करते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन पवित्र नदियों में स्नान करना, दान-पुण्य करना और गुरु का पूजन करना अत्यंत शुभ माना जाता है।

ब्राह्मणों की यह नाराजगी सपा को 2027 के चुनाव में भारी पड़ सकती है, यूपी में करीब 10 प्रतिशत ब्राह्मण हैं।
इस प्रतिनिधिमंडल में कांग्रेस के अभिषेक मनु सिंघवी, राजद के मनोज झा और सीपीआई (एमएल) के दीपांकर भट्टाचार्य जैसे प्रमुख नेता शामिल थे। इसी क्रम में ओवैसी ने भी अलग से चुनाव आयोग पहुंच कर अपना पक्ष रखा। विपक्ष का कहना है कि यह प्रक्रिया जल्दबाजी में शुरू की गई है और यह गरीब, ग्रामीण, और हाशिए पर रहने वाले समुदायों को मतदाता सूची से हटाने की साजिश है।
क्या यह गरीब और वंचित वोटरों को बाहर करने की साजिश नहीं है?





ऐसे मौके पर अक्सर राजनीति को धर्म से दूर रखा जाता है लेकिन हाल ही में उत्तर प्रदेश के उन्नाव, लखनऊ सहित देश के कई राज्यों में मोहर्रम के दौरान ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई के बैनर-पोस्टर लगाए गये जिसको लेकर विवाद खड़ा हो गया है। सवाल पूछा जा रहा है कि जब इजरायल और ईरान के बीच संबंध बेहद तनावपूर्ण हैं और भारत दोनों देश के नेताओं को समझा-बूझा रहा है तब समाज का एक वर्ग किसी एक देश की सरकार के पक्ष में क्यों खड़ा दिखाई देता है। वह भी ऐसे मौके पर जब शिया मुलसमान इमाम हुसैन की शहादत को याद करके मातम बना रहे है। यह तर्क दिया जा सकता है कि खामेनेई एक धार्मिक शख्सियत हैं लेकिन इसके साथ सच्चाई यह भी है के वह इस समय सियासी रूप में नजर आ रहे हैं।
यह चिंताजनक एवं चुनौतीपूर्ण है। यह बच्चों को समय के प्रति, परिवार एव सामाजिक कौशल के प्रति और मानसिक स्वास्थ्य के प्रति नकारात्मक रूप से प्रभावित कर सकता है। सोशल मीडिया ने बच्चों से बाल-सुलभ क्रीड़ाएं ही नहीं छीनी, बल्कि दादी-नानी की कहानियों से भी वंचित कर दिया है। कुछ विशेषज्ञ इस बात से चिंतित हैं कि सोशल मीडिया के अत्यधिक उपयोग से बच्चे अनैतिक, उग्र, जिद्दी एवं आक्रामक भी हो रहे हैं जो उन्हें चिंता और अवसाद में धकेल रहे हैं। बच्चें सोशल मीडिया पर वक्त ज्यादा गुजार रहे हैं, ऑनलाइन गेम्स ने बच्चों की दुनिया ही बदल दी है। अब यह आवाज उठने लगी है कि क्यों न बच्चों के लिए सोशल मीडिया के उपयोग को प्रतिबंधित कर देना चाहिए? टेन के हार्परकॉलिन्स और नीलसन आईक्यू की एक अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट में ऐसे ही चिन्ताजक तथ्य सामने आये हैं कि बड़ी संख्या में युवा माता-पिता कहानियों की बजाय डिजिटल मनोरंजन को प्राथमिकता दे रहे हैं। पंचतंत्र से लेकर स्नो व्हाइट पिनोकियो जैसी कहानियां अब शेल्फ पर धूल फांक रही हैं। नये बन रहे समाज एवं परिवार में सोशल मीडिया जहर घोल रहा है।
व्हाट्सएप, फेसबुक, गेम्स सब कुछ स्मार्टफोन पर होने की वजह से बच्चों और युवाओं में इसकी आदत अब धीरे-धीरे लत में तब्दील होती जा रही है। सोने के समय बच्चों को कहानियां सुनाना या उनके लिए लोरियां गाना कभी पारिवारिक संस्कृति का अहम हिस्सा हुआ करता था। दादी-नानी हों या माता-पिता की सुनाई गई परीकथाएं बच्चों के लिए नींद से पहले की सबसे प्यारी यादें होती थीं। लेकिन अब सोशल मीडिया के आने से इसके बिना बचपन सूना हो रहा है। बच्चे किताबों और खेलकूद के मैदानों से दूर हो रहे हैं। स्क्रीन की नीली रोशनी उनकी आंखों के साथ दिमागी सेहत पर भी बुरा असर डाल रही है। इसके अलावा शारीरिक श्रम एवं रचनात्मकता भी कम हो गई है। यह केवल पश्चिमी देशों की ही नहीं, बल्कि भारत की भी सच्चाई बन चुकी है। जेन जेड यानी 1996 से 2010 के बीच जन्मे युवा माता-पिता अब इस प्यारी परंपरा से मुंह मोड़ रहे हैं। हालिया शोधों से पता चला है कि अब कहानियां पढ़ना-सुनाना जेन जेड माता-पिता के लिए जिम्मेदारी एवं मनोरंजन नहीं, बल्कि एक थकाऊ काम बन गया है। मोबाइल अब केवल बच्चों के लिए ही समस्या नहीं है, बल्कि बड़े भी इसकी चपेट में हैं। यह सिर्फ फोन या मैसेज करने तक ही सीमित नहीं रहा है। ना जाने कितने ही तरह के ऐप्स, व्हाट्सएप, फेसबुक जैसी सोशल मीडिया एप और गेम्स बड़ों एवं बच्चों को दिन भर व्यस्त रखते हैं लेकिन अगर मोबाइल के बिना आपको बेचैनी होती है तो समझ जाइये कि आप भी इस एडिक्शन के शिकार होते जा रहे हैं जो आपके लिए चिन्ता की बात है।
