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  • Jaunpur News: जोन स्तरीय निरंकारी बाल का हुआ समागम

    Jaunpur News: जोन स्तरीय निरंकारी बाल का हुआ समागम

    • जोन स्तरीय निरंकारी बाल का हुआ समागम

    तेजस टूडे सं.
    अवधेश मौर्य
    जौनपुर। बच्चों को बचपन से ही बाल संगत से जोड़ना आवश्यक है। बाल संगत में आने से बच्चों का सार्वभौमिक व आध्यात्मिक विकास होता है तथा वे प्यार, नम्रता व सहनशीलता जैसे दैवीय गुण ग्रहण करते हैं। यही गुण उनके अपने कैरियर और मिशन में आगे बढ़ने का मार्ग प्रशस्त करता है। बच्चे मन के सच्चे होते हैं, उनमें बैर‌, इर्ष्या, द्वेष‌ आदि बुराइयां नहीं होतीं। आज के बच्चे आने वाले अच्छे समाज की नींव के पत्थर हैं जो आगे चलकर सुदृढ़ तथा ऊंच-नीच की भावना से उठकर स्वच्छ समाज का निर्माण करने में सक्षम होंगे। आप चाहे तो उन्हें प्यार, मिल वर्तन, भाईचारा आदि अच्छी भावनाएं सीखा करके एक अच्छा नागरिक और इंसान बना सकते हैं। संस्कारवान बच्चे ही देश व समाज का भविष्य उज्जवल बनाते हैं।

    उक्त उद्गार नगर के मड़ियाहूं पड़ाव स्थित संत निरंकारी सत्संग भवन जौनपुर के प्रांगण में जोन स्तरीय निरंकारी बाल समागम पर उपस्थित विशाल सन्त समूह को सम्बोधित करते हुये लखनऊ से आये विद्वान संत जीएस तिवारी केन्द्रीय ज्ञान प्रचारक ने व्यक्त किया।

    इस दौरान बच्चों और युवाओं ने गीत, भजन, कविताएं और लघु नाटक के साथ प्रेरक विचार व्यक्त करते हुये निरंकार प्रभु और सत्संग से जुड़े रहने की सीख दिया। वहीं अमरनाथ विश्वकर्मा जोनल इंचार्ज ने निरंकारी बाल समागम के सफल आयोजन पर बच्चों, अभिभावकों, सेवादल अधिकारियों, सदस्यों, खेल मंत्री युवा कल्याण विभाग एवं साध संगत का स्वागत करते हुये आभार भी व्यक्त किया।

    इस अवसर पर तमाम ब्रांचों के मुखी महात्मा, संयोजक, क्षेत्रीय संचालक, संचालक, शिक्षक आदि उपस्थित रहे। इस बाल समागम में निरंकारी बाल प्रदर्शनी भी लगायी गयी जिसमें बहुत ही सुंदर ढंग से मिशन के संदेशों को उजागर किया गया।

     

     

     

     

  • Jaunpur News: वासंतिक नवरात्रि के चौथे दिन कूष्मांडा स्वरूप में भक्तों ने किया दर्शन—पूजन

    Jaunpur News: वासंतिक नवरात्रि के चौथे दिन कूष्मांडा स्वरूप में भक्तों ने किया दर्शन—पूजन

    • वासंतिक नवरात्रि के चौथे दिन कूष्मांडा स्वरूप में भक्तों ने किया दर्शन—पूजन

    • वैदिक मंत्रोचारण, हवन, पूजन, मां के जयकारों से वातावरण हुआ भक्तिमय

    तेजस टूडे सं.
    बिपिन सैनी
    चौकियां धाम, जौनपुर। मां शीतला चौकियां धाम में वासंतिक नवरात्रि के चौथे दिन मां कूष्मांडा स्वरूप में भक्तों ने मां शीतला जी का दर्शन पूजन किया। चौथे दिन कूष्मांडा माता रानी की पूजा की जाती है जो अपनी मंद मुस्कान से सृष्टि की रचना करने वाली देवी मानी जाती हैं। इस दिन भक्त पीले रंग के वस्त्र पहनकर मां को मालपुआ या हलवा-दही का भोग लगाकर और ‘ॐ कूष्मांडायै नमः’ मंत्र जप के साथ पूजा करने से सुख, समृद्धि और आरोग्य की प्राप्ति होती है। माँ कूष्मांडा को अष्टभुजा देवी भी कहा जाता है।
    नव दिन की व्रती महिलाएं सुबह स्नान के बाद पीले रंग के वस्त्र पहनकर पूजा स्थल को गंगाजल से शुद्ध कर माँ कूष्मांडा को पीले फूल, फल, धूप और दीप अर्पित करते हुये अष्टभुजा देवी की पूजा करते समय ‘ॐ देवी कूष्मांडायै नमः’ मंत्र का जाप किया। वहीं मां कूष्मांडा को मालपुआ अत्यन्त प्रिय है। इसके अलावा खीर, हलुवा या केसर युक्त पेड़ा भी चढ़ाया गया। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन मां की पूजा करने से रोग, दोष दूर होते हैं और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। यह दिन सूर्य से संबंधित दोषों को दूर करने के लिए भी विशेष माना जाता है।
    देखा गया कि चौकियां धाम में प्रातःकाल 4 बजे मन्दिर के कपाट खुलने के पश्चात माता रानी का भव्य श्रृंगार करके मन्दिर के महंत विवेकानंद पन्डा ने आरती-पूजन किया। मन्दिर खुलने के पहले ब्रम्ह मुहुर्त से ही माता रानी के दर्शन के लिये भक्तों की लम्बी कतार लगी रही। दुर्गा सप्तशती पाठ, वैदिक मंत्रोच्चारण, हवन, पूजन, जयकारों एवं घण्टों की गूंज से सारा वातावरण मनमोहक एवं भक्तिमय हो गया। कतार में खड़े दर्शनार्थी बारी-बारी से दर्शन-पूजन करते नजर आये। वहीं पूर्वांचल के कोने-कोने से आये श्रद्धालुओं ने मुंडन संस्कार, कढ़ाही, पूजन आदि करके परिवार समेत मां के चरणों में मत्था टेकते हुये सुख, शान्ति, समृद्धि, धन, यश, वैभव की कामना किया। नवरात्रि का चौथे दिन व्रती महिलाओं ने अपने घर मे विधि—विधान से दुर्गा सप्तशती पाठ करके आरती पूजन किया। दूर-दराज से धाम में आने वाले भक्तों का तांता देर शाम तक लगा रहा। दर्शन-पूजन करने के पश्चात दर्शन पवित्र कुण्ड के बगल में स्थित काल भैरवनाथ एवं मां काली मंदिर में भी दर्शन-पूजन किये। सुरक्षा की दृष्टि से मन्दिर परिसर में चौकियां चौकी इंचार्ज राम प्रकाश यादव अपने सहयोगी पुलिसकर्मी एवं पीएसी बल के साथ मौजूद रहे।

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     JAUNPUR NEWS: Hindu Jagran Manch serious about love jihad

    Job: Correspondents are needed at these places of Jaunpur

    600 बीमारी का एक ही दवा RENATUS NOVA

  • Jaunpur News: दया सरस्वती पैरामेडिकल व फार्मेसी कालेज की छात्राओं का दिव्यांगों संग खेली होली

    Jaunpur News: दया सरस्वती पैरामेडिकल व फार्मेसी कालेज की छात्राओं का दिव्यांगों संग खेली होली

    • दया सरस्वती पैरामेडिकल व फार्मेसी कालेज की छात्राओं का दिव्यांगों संग खेली होली

    तेजस टूडे सं.
    बिपिन सैनी
    चौकियां धाम, जौनपुर। नगर के रूहट्टा में स्थित राजेश स्नेह ट्रस्ट ऑफ एजुकेशन दिव्यांग बच्चों का स्कूल एवं पुनर्वास केंद्र में दया सरस्वती पैरामेडिकल कालेज धन्नेपुर की छात्राओं ने उपर्युक्त स्कूल के दिव्यांग बच्चों के साथ प्रबंधक मयंक सोनकर के निर्देशन में होली खेला।

    पैरामेडिकल की छात्राओं ने दिव्यांग बच्चों के स्कूल में नृत्य गायन प्रस्तुत किया जहां स्कूल के नेत्रहीन बच्चों ने भी गाना गाया और ढोल बजाया। इस दौरान कॉलेज की शिक्षिका दामिनी साहू के नेतृत्व में सभी दिव्यांग बच्चों को भोजन का पैकेट, मिठाई, बिस्किट, गुझिया, पापड़, फ्रूटी आदि वितरित किया गया। फिर सभी दिव्यांगों के साथ कॉलेज की छात्राओं ने रंग, गुलाल और फूलों से होली खेली। सभी दिव्यांग बच्चे भोजन सामग्री पाकर व होली खेल कर बहुत खुश हुये।
    इस मौके पर संस्था के उपाध्यक्ष डा. राजेश गुप्ता ने कालेज के प्रबन्धक, छात्राओं, शिक्षक व शिक्षिकाओं के प्रति आभार प्रकट किया। इस दौरान स्कूल की विशेष शिक्षिका हेमू वर्मा, संगीत के शिक्षक राहुल पाठक, कालेज की शिक्षिका पूजा मौर्य, आरती राजभर, अनुज, रेयान, छात्राएं सोनाली, अंशिका, चंदा, काजल, ममता, श्रृष्टि, शोली, उमा, शिवांगी, शिवानी, खुशी, निधि, सजल, मनीषा, प्रीति, सुनीता, पुष्पा, संध्या, उजाला, बीना, रिशु, डा. संदीप गुप्ता सहित तमाम लोग उपस्थित रहे।

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     JAUNPUR NEWS: Hindu Jagran Manch serious about love jihad

    Job: Correspondents are needed at these places of Jaunpur

    600 बीमारी का एक ही दवा RENATUS NOVA

  • सभी हैं मौन, सरकार के आगे 

    सभी हैं मौन, सरकार के आगे 

    सभी हैं मौन, सरकार के आगे

     फिर बोले कौन, सरकार के आगे

    हो गया कानून अंधा, नहीं दिखता चेहरा

    बन बैठा लोकतंत्र बहरा, सरकार के आगे

    हो गए कैद क़फस में हम

    अधिकार जो मांगे, सरकार के आगे

    महंगाई ने कर रखा गरीबों का हाल बेहाल

    कौन करे सवाल, सरकार के आगे

    डंडों से देंगे मार, जाँएगे गैस के गोले दागे

    जो मांगे रोजगार, सरकार के आगे

    राम राज्य में सुरक्षित नहीं, सीता जो

    कौन दिलाएँ न्याय रेप पीड़िता को, सरकार के आगे

    अमीर होता तो न्याय मिल जाता

    गरीब खड़ा हाथ जोड़, सरकार के आगे

    कलम पर भी बरसा प्रकोप बनकर काल

    नवीन तेरी क्या मजाल, सरकार के आगे

         :- नवीन फरमाणियाँ

  • एक बाप की कुर्बानी, एक बेटे की चुप्पी

    एक बाप की कुर्बानी, एक बेटे की चुप्पी

    एक बाप की कुर्बानी, एक बेटे की चुप्पी

    मगर अफसरों को छोड़ देने का अंजाम बहुत बुरा होगा

    कुमार सौवीर
    बाबर का बेटा हुमायूं और आजम खान का बेटा अब्दुल्ला आजम। कहानी कमोबेश बराबर है लेकिन हश्र अलहदा। अपने बीमार बेटे हुमायूँ की जान बचाने के लिए जहीरूदृीन मोहम्मद बाबर ने हुमायूं के पलंग के सात चक्कर लगाए थे। अल्लाह से दुआ करते हुए कि अल्लाह मेरी उम्र मेरे बेटे हुमायूं पर लगा दे। और यह कहकर उसने खुद मौत को गले लगा लिया था। बाबरनामा में लिखा है– “मैंने हुमायूँ के पलंग के चारों ओर चक्कर लगाए”। आजम खान ने अपने बेटे की सियासी जान बचाने के लिए पूरा सिस्टम हिला दिया, अफसरों को झुकाया, कानून तोड़ा और अंत में खुद मौत को गले लगा लिया। जेल की सलाखों के रूप में।
    तब बाबर का बेटा कम से कम बाद में पछताया था लेकिन यहाँ बेटे अब्दुल्ला आजम ने अपने पिता को ही ठोकर मार दी। कोर्ट में अब्दुल्ला आजम का बयान था कि “मैं तो बच्चा था, सारे कागजात पिताजी के लोग बनवाते थे। मुझे कुछ पता ही नहीं था”। सुनने में तो बात मासूम लगती है लेकिन तथ्यों की कसौटी पर यह बिल्कुल हजम नहीं होता। यह एक क्लासिक “बाप का कंधा” वाली बचकाना बहाना है जो कानूनी रूप से भी फेल हो चुका है।
    एक बाप की कुर्बानी, एक बेटे की चुप्पी रामपुर की सर्द हवा में आज फिर एक बूढ़ा आदमी जेल की सलाखों के पीछे चला गया। नाम है मोहम्मद आजम खान। उम्र 75 साल। कभी उत्तर प्रदेश की राजनीति का वो कद्दावर चेहरा, जिसके इशारे पर अफसर झुकते थे, आज खुद उसी सिस्टम की गिरफ्त में है। 17 नवंबर 2025 को रामपुर की विशेष एमपी-एमएलए अदालत ने उन्हें और उनके बेटे अब्दुल्ला आजम को 7-7 साल की सजा सुनाई। अपराध? दो अलग-अलग जन्मतिथियों वाले पैन कार्ड बनवाना। बस इतना सा अपराध लेकिन इस छोटी सी जालसाजी के पीछे एक बाप का पूरा जीवन दाँव पर लगा था।
    यह 2017 का साल था। उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने वाले थे। आजम खान रामपुर सदर सीट से दस बार के विधायक थे। उनकी राजनीतिक विरासत को कोई खतरा नहीं था लेकिन खतरा था उनकी राजशाही को। उनका बेटा अब्दुल्ला आजम उस वक्त 24 साल का था। असली जन्मतिथि पहली जनवरी 1993 थी। यानी फरवरी-मार्च 2017 के चुनाव में वह पच्चीस साल की न्यूनतम उम्र पूरी नहीं कर पाता। अगर बेटा चुनाव नहीं लड़ पाता तो रामपुर की गद्दी पर कोई वारिस नहीं बचता। सपा के अंदर ही कई लोग सीट हथियाने को तैयार बैठे थे। आजम खान ने फैसला किया कि बेटे को किसी भी कीमत पर विधायक बनाना है।
    बस यहीं से शुरू हुई वो जालसाजी, जिसने एक बाप को जेल और एक बेटे को बदनामी दे दी। सबसे पहले हाईस्कूल का सर्टिफिकेट बदला गया। फिर पासपोर्ट। फिर पैन कार्ड। एक पैन कार्ड में जन्मतिथि 1993, दूसरा 1990 में। दोनों के आवेदन में आजम खान का ही मोबाइल नंबर और ईमेल था। रामपुर के तत्कालीन बेसिक शिक्षा अधिकारी ने कोर्ट में बयान दिया– “आजम खान का फोन आया था, धमकाया था, हम मजबूर थे।” लखनऊ पासपोर्ट ऑफिस के अधिकारी ने भी यही कहा। अफसरों ने झुककर कानून तोड़ा, क्योंकि उस वक्त आजम खान सत्ता के शिखर पर थे।
    …और अब्दुल्ला? 24 साल का जवान। ग्रेजुएट, राजनीति में कदम रखने वाला। उसने नामांकन पत्र पर खुद साइन किया। फर्जी जन्मतिथि वाला हलफनामा खुद जमा किया। चुनाव जीता। स्वार सीट से विधायक बना। पिता ने उसके लिए सारी दुनिया हिला दी थी।
    फिर सत्ता बदली। बीजेपी की आकाश सक्सेना ने शिकायत की। मामला खुला। 6 दिसंबर 2019 को प्राथमिकी दर्ज हुई। आजम खान पर सौ से ज्यादा मुकदमे लगे। जौहर यूनिवर्सिटी की जमीन गई। बुलडोजर चले। पत्नी जेल गईं। बेटा जेल गया और आज 6 साल बाद उसी फर्जी पैन कार्ड के लिए आजम खान फिर जेल में हैं।
    कोर्ट में अब्दुल्ला ने कहा था– “मैं तो बच्चा था, मुझे कुछ पता नहीं था, सारे कागजात पिताजी के लोग बनवाते थे।” चौबीस साल की उम्र में बच्चा? जिस उम्र में लोग अपनी जिंदगी खुद चलाते हैं, वह बेटा कहता है उसे कुछ पता नहीं था। बस एक बार कह देता कि “हाँ, ये सब मैंने खुद करवाया था, मेरे पिता निर्दोष हैं” तो शायद आजम खान बच जाते। कम से कम एक बेटा इतिहास में सच बोलने वाले सपूत के तौर पर दर्ज हो जाता लेकिन वह चुप रहा। पिता की कुर्बानी पर चुप्पी साध ली।
    जिस बाप ने बेटे के लिए अपना सब कुछ लुटा दिया, उसी बाप को बेटे ने अकेला छोड़ दिया। आज रामपुर की सर्द रात में एक बूढ़ा आदमी जेल की ठंडी दीवार से सटा सो रहा होगा। उसके दिल में सिर्फ एक सवाल होगा– “मैंने तेरे लिए सब कुछ किया था बेटा… तूने मेरे लिए कुछ नहीं किया। ”इतिहास इसे जरूर लिखेगा। नाम होगा अब्दुल्ला आजम का। “सच बोलने वाले सितारे” के रूप में नहीं। बल्कि “अपने बाप को धोखा देने वाले बेटे” के रूप में। एक बाप की आँखों से गिरते आंसूओं की कोई गिनती नहीं होगी।
    इस पाप से योगी भी उऋण नहीं हो सकेंगे। कारण यह कि उन्होंने आजम खान के खानदान को तो उसके अपराध के लिए उसके पूरे खानदान को नेस्तनाबूत कर दिया लेकिन उन अफसरों पर चूं तक नहीं किया जिन्होंंने गैरकानूनी काम कर दिया। सवाल तो यह भी है सजा तो उन अफसरों पर भी होनी चाहिए जो आज बेदाग हैं। जिन्होंने जानते-बूझते ही डुप्लीकेट डाक्यूमेंट तैयार किया, भले ही किसी का दबाव रहा हो। तुम्हें दबाव पर काम करने के लिए नहीं दी गयी है नौकरी, कानून के हिसाब से काम करने के लिए नौकरी दी गयी है।

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    600 बीमारी का एक ही दवा RENATUS NOVA

  • बीएमसी चुनाव अकेले लड़ेगी कांग्रेस

    बीएमसी चुनाव अकेले लड़ेगी कांग्रेस

    बीएमसी चुनाव अकेले लड़ेगी कांग्रेस

    मुम्बई की राजनीति में वह क्षण एक बार फिर सामने है, जब चुनाव सिर्फ एक स्थानीय निकाय का नहीं, बल्कि पूरे राज्य की दिशा तय करने वाला माना जाता है। बृहन्मुंबई महानगर पालिका (बीएमसी) के दिसंबर-जनवरी में प्रस्तावित चुनावों को लेकर इस बार सबसे बड़ा राजनीतिक धमाका तब हुआ, जब कांग्रेस ने महा विकास आघाड़ी (एमवीए) में बने रहने के बावजूद अकेले चुनाव मैदान में उतरने का निर्णय ले लिया। यह फैसला जितना साहसिक दिखाई देता है, उतना ही यह संकेतों और संदेशों से भरा हुआ भी है। मुम्बई जैसे आर्थिक और राजनीतिक रूप से अत्यंत प्रभावशाली शहर में जहां हर सीट का महत्व है, वहां कांग्रेस का यह कदम पूरी राजनीति की रफ़्तार बदल सकता है। मुम्बई कांग्रेस की अध्यक्ष वर्षा गायकवाड़ और संगठन के वरिष्ठ नेताओं ने यह मांग लम्बे समय से उठाई थी कि पार्टी को बीएमसी जैसे विशाल मंच पर अपनी स्वयं की पहचान को सामने रखना चाहिए। पिछले कुछ वर्षों में गठबंधन राजनीति ने कांग्रेस के लिए उम्मीद से कम परिणाम दिये। विशेषकर स्थानीय निकायों में। वर्ष 2017 के बीएमसी चुनाव में कांग्रेस 31 सीटें लेकर तीसरे स्थान पर रही थी जबकि भाजपा 82 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनी थी लेकिन इस बार समीकरण बिल्कुल बदल चुके हैं और यही कारण है कि कांग्रेस ने यह दांव खेला है। पार्टी के महाराष्ट्र प्रभारी रमेश चेन्निथला ने भी स्पष्ट कर दिया कि स्थानीय इकाई ने जबरदस्त उत्साह से यह मांग की और नेतृत्व ने उनका मत स्वीकार किया।
    कांग्रेस का यह फैसला यूं ही नहीं हुआ। बिहार विधानसभा चुनावों में जिस तरह गठबंधन का हिस्सा होकर कांग्रेस को उम्मीद से कम सीटें मिलीं, उससे पार्टी कार्यकर्ताओं में यह विश्वास पैदा हुआ कि स्वतंत्र लड़ाई अधिक फायदेमंद साबित हो सकती है। कई विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस अगर बिहार में अकेले लड़ती तो वह कम से कम छह सीटें जीत सकती थी और उसका वोट प्रतिशत 12 से 14 प्रतिशत तक जा सकता था लेकिन गठबंधन की मजबूरी ने कांग्रेस को वह अवसर नहीं दिया। कार्यकर्ताओं और जमीनी नेताओं का उत्साह लगातार घट रहा था और यही हताशा मुंबई में बड़े बदलाव का कारण बनी। मुम्बई में कांग्रेस की स्थिति बिहार जितनी कमजोर नहीं है। यहां उसका परम्परागत वोट बैंक अभी भी काफी स्थिर है मुस्लिम वोटर लगभग 20–22 प्रतिशत, दलित 10–12 प्रतिशत और दक्षिण भारतीय समुदाय 8–10 प्रतिशत। यह तीनों समूह लम्बे समय से कांग्रेस के कोर सपोर्टर रहे हैं। 2017 के चुनावों में जिन इलाकों में मुस्लिम बहुलता थी, वहां कांग्रेस ने बेहतर प्रदर्शन किया था। आज भी मुंबई के दक्षिण और मध्य इलाकों तथा बांद्रा, अंधेरी, वर्ली जैसे क्षेत्रों में कांग्रेस का संगठन मजबूत माना जाता है। यही नहीं, पार्टी ने हाल के वर्षों में 50,000 से अधिक नए सदस्य जोड़े हैं और 1000 से अधिक टिकट आवेदन प्राप्त हुए हैं। यह संगठनात्मक ऊर्जा कांग्रेस को अकेले मैदान में उतरने का आत्मविश्वास देती है।
    कांग्रेस की इस चाल के पीछे सिर्फ आत्मविश्वास ही नहीं, बल्कि राजनीतिक रणनीति भी है। पार्टी को सबसे अधिक असहजता एमएनएस से बढ़ती नज़दीकियों को लेकर थी। जब उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे के बीच हाल के महीनों में सहयोग के संकेत मिले मतदाता सूची में गड़बड़ियों के विरोध में हुई संयुक्त रैली इसका उदाहरण है तो कांग्रेस की चिंता गहराने लगी। राज ठाकरे की राजनीति पर कांग्रेस हमेशा सवाल उठाती रही है। खासकर ‘मराठी मानूस’ और प्रवासी-विरोधी अभियानों के कारण। वर्षा गायकवाड़ ने खुलकर कहा कि कांग्रेस कभी भी एमएनएस के साथ हाथ नहीं मिला सकती। यदि यह गठबंधन और मजबूत होता तो न सिर्फ कांग्रेस को कम सीटें मिलतीं, बल्कि उसका सेक्युलर वोट बैंक भी बिखर सकता था। उद्धव ठाकरे ने कांग्रेस के अकेले लड़ने के फैसले पर कहा कि हर दल को अपने निर्णय लेने की स्वतंत्रता है और शिवसेना (यूबीटी) भी उसी तरह स्वतंत्र है। यह बयान दिखाता है कि एमवीए में सतही शांति के बावजूद अंदरूनी तनाव मौजूद है। कांग्रेस का मानना है कि यदि शिवसेना और एमएनएस मिलकर एक मजबूत मराठी फ्रंट बनाते हैं तो कांग्रेस को सिर्फ 50–60 सीटें मिल सकती थीं जबकि वह कम से कम 100 से अधिक सीटों पर लड़ने का दावा रखती है। कांग्रेस को यह भी आशंका है कि ‘मराठी बनाम अन्य’ की राजनीति में वह ‘आउटसाइडर’ बन जाएगी जिससे उसके कोर वोटर्स दूर हो सकते हैं।
    कांग्रेस की रणनीति में यह पहलू बेहद महत्वपूर्ण है कि अकेले लड़ने से उसे मुस्लिम और दक्षिण भारतीय वोटों का और अधिक एकजुट समर्थन मिल सकता है। एमएनएस के साथ शिवसेना की नजदीकी बढ़ने से मुस्लिम वोटर असहज हो सकते थे और कांग्रेस इसी भावना का लाभ उठाकर स्वयं को एकमात्र मजबूत सेक्युलर विकल्प के रूप में प्रस्तुत करना चाहती है। यह कांग्रेस के लिए सिर्फ वोटों की राजनीति नहीं, बल्कि अपनी वैचारिक स्थिति का भी बयान है।हालांकि इस फैसले से सबसे अधिक लाभ भाजपा को होने की आशंका है। भाजपा 2017 से अब तक बीएमसी में सबसे बड़ी ताकत रही है। यदि विपक्ष विभाजित होकर लड़ता है तो भाजपा को बहुत फायदा मिल सकता है। कांग्रेस का तर्क है कि ‘कब तक हम अपनी कीमत पर दूसरों का फायदा कराते रहेंगे?’ पार्टी का मानना है कि एमवीए में उसकी भूमिका लगातार छोटी होती जा रही थी और अब उसे अपनी ताकत और कमजोरी का आकलन खुद करना होगा। मुम्बई कांग्रेस के दो लाख से अधिक सक्रिय कार्यकर्ता, वर्षों से सड़कों पर सक्रिय पार्षद और मजबूत बूथ संरचना कांग्रेस के फैसले को वजन देती है। यह सिर्फ चुनाव लड़ने का नहीं, बल्कि अपना खोया हुआ राजनीतिक आधार पुनः हासिल करने का मौका है। मुम्बई जैसे शहर में जहां हर समुदाय की राजनीतिक समझ अलग होती है, कांग्रेस की सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वह इस विविधता के भीतर अपनी जगह दोबारा बनाये लेकिन अगर उसका वोट बैंक एकजुट हो गया तो अकेले लड़ने का यह दांव उसके लिए गेम-चेंजर साबित हो सकता है।
    बहरहाल यह फैसला कांग्रेस के लिए जोखिम और अवसर दोनों लेकर आया है। मुम्बई की बीएमसी का बजट 40,000 करोड़ रुपये से अधिक है देश की किसी भी नगरपालिका से बड़ा। यहां की राजनीति सिर्फ वार्डों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि राज्य और राष्ट्रीय राजनीति तक असर डालती है। कांग्रेस ने इस चुनाव में अपने भविष्य को दांव पर लगा दिया है। अगर यह दांव सफल रहा तो महाराष्ट्र की राजनीति में कांग्रेस की वापसी की कहानी लिखी जाएगी लेकिन अगर यह असफल हुआ तो पार्टी को गहरे संगठनात्मक पुनर्विचार की जरूरत पड़ेगी। मुम्बई की राजनीति अब एक नए मोड़ पर है। एक तरफ शिवसेना का अपना अस्तित्व बचाने का संघर्ष, दूसरी तरफ भाजपा की आक्रामक रणनीति और अब कांग्रेस का अपने पैरों पर खड़े होने का ऐलान। यह चुनाव सिर्फ एक निकाय का नहीं, बल्कि मुम्बई की पहचान, उसकी राजनीति और महाराष्ट्र की सत्ता संतुलन का भी फैसला करेगा। कांग्रेस ने अपनी चाल चल दी है, अब जनता की बारी है कि वह तय करे कि क्या, यह आत्मविश्वास मुम्बई में नई राजनीति का द्वार खोलेगा या फिर विपक्ष को और ज्यादा विभाजित कर देगा।

    अजय कुमार
    वरिष्ठ पत्रकार, लखनऊ
    मो.नं. 9335566111

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  • चुनाव आयोग पर हमलावर राहुल पर भड़के बुद्धिजीवियों की नसीहत

    चुनाव आयोग पर हमलावर राहुल पर भड़के बुद्धिजीवियों की नसीहत

    चुनाव आयोग पर हमलावर राहुल पर भड़के बुद्धिजीवियों की नसीहत

    देश के राजनीतिक माहौल में एक बार फिर सियासी तापमान बढ़ गया है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी द्वारा हाल ही में चुनाव आयोग को लेकर दिए गए बयान ने नई विवाद की लपटें उठा दी हैं। राहुल गांधी ने चुनाव आयोग को “चोर” कहकर संबोधित किया था जिसके बाद देश की लगभग 250 जानी-मानी हस्तियों ने उनके इस बयान पर कड़ी आपत्ति जताई है। इन हस्तियों में करीब सवा सौ पूर्व नौकरशाह, कुछ पूर्व जज, पूर्व सैन्य अफसर, शिक्षाविद, कलाकार और वरिष्ठ वकील शामिल हैं। इन सभी ने संयुक्त रूप से एक पत्र जारी कर राहुल गांधी के बयान को ‘लोकतांत्रिक संस्थाओं पर असंवैधानिक हमला’ करार दिया है। उनका कहना है कि देश की संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा बनाए रखना हर नागरिक का दायित्व है, चाहे वह आम आदमी हो या किसी बड़े राजनीतिक दल का शीर्ष नेता। पत्र में यह भी कहा गया है कि राहुल गांधी जैसे स्थापित नेता जब सार्वजनिक मंचों से इन संस्थाओं की निष्पक्षता पर सवाल उठाते हैं तो इससे देश के लोकतांत्रिक ताने-बाने को नुकसान पहुंचता है और जनता के विश्वास को ठेस लगती है।
    पूर्व नौकरशाहों और बुद्धिजीवियों के समूह ने यह भी कहा है कि विपक्ष का काम सवाल करना जरूर है लेकिन वह आलोचना सभ्य संवाद की सीमा में रहकर होनी चाहिए। पत्र में लिखा गया है कि राहुल गांधी का यह बयान न केवल चुनाव आयोग की साख को धूमिल करता है, बल्कि यह चुनाव प्रक्रिया में अविश्वास का माहौल भी पैदा करता है जो किसी भी लोकतांत्रिक समाज के लिए घातक है। कांग्रेस नेता ने हाल ही में एक जनसभा के दौरान चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करते हुए कहा था कि आयोग सत्तारूढ़ दल के इशारों पर काम कर रहा है। उन्होंने अपने भाषण में आरोप लगाया कि आयोग का व्यवहार निष्पक्षता की सीमाओं से बाहर जा चुका है और विपक्षी दलों को बराबरी का मौका नहीं मिल रहा। राहुल गांधी के इस बयान के बाद राजनीति के गलियारों में हड़कंप मच गया। सत्ता पक्ष के नेताओं ने इसे लोकतंत्र की मूल संस्थाओं का अपमान बताया। वहीं विपक्ष ने राहुल के बचाव में कहा कि यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हिस्सा है और संस्थाओं की जवाबदेही पर सवाल उठाना नागरिक अधिकार है।
    हालांकि जिन बुद्धिजीवियों ने यह विरोध पत्र लिखा है, उनका मानना है कि राहुल गांधी की टिप्पणी ‘लोकतंत्र के बुनियादी आदर्शों के विपरीत’ है। उनके मुताबिक लोकतंत्र में संस्थाएं किसी राजनीतिक लाभ या हानि से ऊपर होती हैं और उन पर इस प्रकार के आरोप लगाना जनता को भ्रमित करता है। एक पूर्व कैबिनेट सचिव ने कहा कि ऐसी भाषा का इस्तेमाल राजनीतिक विमर्श में नहीं होना चाहिए, खासकर तब जब चुनाव निकट हों। इन हस्तियों में से कई ने पहले भी संवैधानिक संस्थाओं के सम्मान की वकालत की है। कुछ पूर्व जजों का कहना है कि चुनाव आयोग ने अब तक देश में कई कठिन परिस्थितियों में भी निष्पक्ष चुनाव कराए हैं और इस संस्था पर सवाल उठाना बिना ठोस सबूत लोकतंत्र को कमजोर करने के बराबर है। वहीं कुछ पूर्व राजनयिकों का मानना है कि जब सार्वजनिक जीवन के बड़े नेता ऐसी टिप्पणियां करते हैं तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की लोकतांत्रिक छवि को भी क्षति पहुंचती है।
    इन हस्तियों ने अपने पत्र में कांग्रेस द्वारा शुरू किए गए “संविधान बचाओ, संस्थाएं बचाओ” (एसआईआर) अभियान पर भी आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि यह अभियान एक तरह से संवैधानिक संस्थाओं की कार्यशैली पर सामूहिक अविश्वास जताने जैसा है। उन्होंने कहा कि अगर किसी संस्था से असहमति है तो उसके खिलाफ सबूतों के साथ कानूनी प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए, न कि सार्वजनिक मंचों से संस्थाओं को ‘जनता का दुश्मन’ बताने का अभियान चलाया जाए। पत्र में यह भी उल्लेख किया गया है कि आज जब भारत विभिन्न सामाजिक और राजनीतिक चुनौतियों का सामना कर रहा है, तब नेताओं को जनता में भरोसा और एकता का संदेश देना चाहिए, न कि उन्हें संस्थाओं के खिलाफ भड़काना चाहिए। समूह ने यह अपील किया कि सभी राजनीतिक दल चुनाव आयोग जैसी संस्थाओं का सम्मान करें और उन्हें राजनीतिक विवादों से दूर रखें, ताकि लोकतंत्र की जड़ें और मजबूत हो सकें।
    दूसरी ओर कांग्रेस ने इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। पार्टी प्रवक्ता ने कहा कि कांग्रेस कभी संस्थाओं के खिलाफ नहीं रही है, बल्कि उसने हमेशा उनकी जवाबदेही की मांग किया है। उन्होंने यह भी कहा कि राहुल गांधी का बयान सत्ता पक्ष द्वारा चुनाव आयोग को अपने हित में उपयोग करने के संकेतों पर आधारित था जो लोकतंत्र की सेहत के लिए खतरनाक है। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि जब संस्थाएं सरकार के दबाव में काम करती दिखती हैं तो जनता का विश्वास पुनः स्थापित करने के लिए प्रश्न पूछना भी लोकतांत्रिक कर्तव्य है। इस पूरे विवाद ने राजनीतिक गलियारों में एक बड़ा विमर्श खड़ा कर दिया है। क्या संवैधानिक संस्थाओं की आलोचना लोकतंत्र की सेहत के लिए आवश्यक है या यह उसकी जड़ों को कमजोर करती है? कई विशेषज्ञ इसे ‘दो धार वाली तलवार’ मानते हैं। उनके अनुसार लोकतंत्र में संस्थाओं की जवाबदेही पर सवाल उठाना जरुरी है लेकिन उसे व्यक्तिगत या अपमानजनक शब्दों में रूपांतरित करना अनुचित है।
    पत्र जारी करने वाले समूह ने अंत में यह अपील भी की है कि सार्वजनिक जीवन से जुड़े व्यक्तियों को शब्दों की मर्यादा का ध्यान रखना चाहिए। जब देश के नेता या बड़े राजनीतिक चेहरे खुले मंच से संज्ञात्मक हमले करते हैं तो समाज में नकारात्मकता फैलती है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र भाषणों से नहीं, बल्कि संस्थाओं के प्रति विश्वास और सम्मान से मजबूत होता है। अब यह विवाद किस दिशा में बढ़ेगा, यह आने वाले समय में ही तय होगा लेकिन यह साफ है कि राहुल गांधी के बयान ने राजनीतिक विमर्श को नई दिशा दे दी है जहां संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता और गरिमा पर बहस तेज है, वहीं सत्ता पक्ष और विपक्ष अपने दृष्टिकोण से लोकतंत्र की रक्षा की बात कर रहे हैं। इस पूरे घटनाक्रम ने यह जरूर दिखा दिया है कि भारत के लोकतंत्र में बहस और मतभेद की परंपरा जिंदा है लेकिन उसे संयम और जिम्मेदारी के दायरे में रखना ही समाज के हित में है।
    स्वदेश कुमार
    वरिष्ठ पत्रकार, लखनऊ
    मो.नं. 9415010798

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  • आम चुनाव में बिहार की विनिंग टीम के साथ ही उतरेगी भाजपा

    आम चुनाव में बिहार की विनिंग टीम के साथ ही उतरेगी भाजपा

    आम चुनाव में बिहार की विनिंग टीम के साथ ही उतरेगी भाजपा

    भारतीय जनता पार्टी बिहार में भले ही नंबर एक की पार्टी उभरी हो लेकिन दूसरे नंबर की पार्टी जतना दल युनाइटेड के नेता नीतीश कुमार को ही वह वायदे के अनुसार मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठा रही है तो इसके पीछे तमाम किंतु-परंतु हैं। दरअसल नीतीश के साथ सरकार बनाते समय बीजेपे इस लिये कोई नया प्रयोग नहीं करेगी, क्योंकि उसकी नजर 2029 के लोकसभा चुनाव पर टिकी हुई है। बिहार में सत्ता समीकरण को लेकर पार्टी का रुख यह बताता है कि वह यहां किसी बड़े प्रयोग से बचना चाहती है और स्थिरता पर जोर दे रही है। पिछली सरकार के दौर में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और बीजेपी के दो उपमुख्यमंत्रियों के संतुलन ने गठबंधन को कार्यात्मक बनाए रखा था। अब जब विधानसभा में बीजेपी की स्थिति मजबूत है तब भी आलाकमान का यही फैसला कि वही पुरानी टीम बनी रहेगी, एक सोची-समझी रणनीति का परिणाम है।
    भाजपा समझती है कि बिहार का सामाजिक और राजनीतिक ताना-बाना बेहद संवेदनशील है। यहां सत्ता चलाने से ज्यादा मुश्किल उसमें निरंतरता बनाए रखना होता है। ऐसे में अगर पार्टी किसी नए चेहरे या ढांचे के साथ प्रयोग करती तो पुराने गठबंधन समीकरणों में हलचल हो सकती थी। मुख्यमंत्री पद पर नीतीश कुमार को यथावत बनाए रखने और दोनों पुराने डिप्टी सीएम को फिर से दोहराने का निर्णय उसी स्थिरता की गारंटी देता है जो जनता दल (यू) और बीजेपी के रिश्तों को सहज बनाती रही है। दरअसल भाजपा के शीर्ष नेतृत्व का लक्ष्य सिर्फ बिहार की सरकार चलाना नहीं, बल्कि आने वाले 2029 के लोकसभा चुनाव में राज्य से अपना आधार और सीटें और मजबूत करना है। 2019 के चुनाव में पार्टी और उसकी सहयोगी जदयू ने अच्छा प्रदर्शन किया था, लेकिन 2024 में जो हल्की गिरावट दिखी, उसने बीजेपी आलाकमान को यह सोचने पर मजबूर किया कि बिहार में संगठन के साथ सत्ता में भी सहजता का माहौल बनाकर जनता का भरोसा दोबारा अर्जित किया जाए। इसके लिए विनिंग कॉम्बिनेशन यानी विजयी फॉर्मूले को न छेड़ना ही सबसे व्यावहारिक रास्ता है।
    ऐसा इसलिये है, क्योंकि अक्सर राज्य स्तरीय राजनीति में बदलाव संगठनात्मक विचलन लाता है। अगर बीजेपी अपने डिप्टी सीएम या सरकार में चेहरों में बदलाव करती तो इसका संदेश नीचे के स्तर पर यह जा सकता था कि पार्टी फिर से प्रयोगों के दौर में है। बिहार के मतदाता प्रयोगों से ज्यादा परिणाम देखना चाहते हैं। एक स्थिर सरकार को वे पसंद करते हैं जो काम में निरंतरता दिखाए। आलाकमान यह समझता है कि बिहार में जो संतुलन नीतीश कुमार और बीजेपी के बीच तैयार हुआ है, उसी के भरोसे 2029 तक राजनीतिक ज़मीन तैयार की जा सकती है। नीतीश कुमार का चेहरा अभी भी बिहार की राजनीति में संतुलनकारी माना जाता है। हालांकि उनकी लोकप्रियता पहले जैसी नहीं रही लेकिन वे अभी भी सामाजिक समीकरणों को संभालने वाले नेता के तौर पर स्वीकार्य हैं। बीजेपी को उनकी यही छवि चाहिए, ताकि वह बड़े पैमाने पर वोटों का धु्रवीकरण किए बिना ही सत्ता और संगठन दोनों को मजबूत रख सके। यह रणनीति 2029 के लोकसभा चुनाव को देखते हुए इसलिए भी अहम है, क्योंकि भाजपा को केंद्र में अपना जनाधार मजबूत रखने के लिए बिहार जैसे बड़े राज्य से कम से कम 35 से अधिक सीटों का लक्ष्य चाहिए। पार्टी जानती है कि इसके बिना उत्तर प्रदेश पर ज्यादा दबाव बढ़ जाएगा। इसलिए बिहार में यदि गठबंधन स्थिर और प्रभावी रहता है तो लोकसभा में सीटों की गारंटी लगभग तय मानी जाती है।
    इसके अलावा बिहार से जुड़े अन्य समीकरण भी भाजपा नेतृत्व के ध्यान में हैं। जातीय जनगणना, आरक्षण और समाज के कमजोर वर्गों की भागीदारी जैसे मुद्दों पर नीतीश कुमार के माध्यम से सॉफ्ट पोलिटिकल हैंडलिंग की जा रही है। अगर भाजपा इन मुद्दों को सीधे अपने नेतृत्व में संभालती तो संभव है कि विपक्ष इसे ध्रुवीकरण के एजेंडे से जोड़ देता। नीतीश कुमार का रहना इसीलिए भाजपा के लिए एक कुशन का काम करता है। दूसरी ओर पार्टी का लक्ष्य राज्य संगठन को मजबूत करने का भी है। सरकार में पुरानी टीम के बने रहने से शीर्ष स्तर पर कोई असंतुलन नहीं होगा जिससे संगठन जिलों, मंडलों और बूथ स्तर पर चुनावी तैयारियों पर पूरी ऊर्जा लगा सकेगा। जब सरकार और संगठन दोनों में टकराव न्यूनतम होता है तब लोकसभा चुनाव के लिए ग्राउंड मैकेनिज्म अधिक परिणामकारी बनता है।
    भाजपा की यह रणनीति यह भी दर्शाती है कि वह अब बिहार को सिर्फ सहयोगी दल की राजनीति का मैदान नहीं मान रही। आलाकमान की कोशिश है कि धीरे-धीरे अपना वोट आधार स्वतंत्र रूप से इतना मजबूत किया जाए कि भविष्य में नीतीश कुमार जैसे सहयोगियों पर निर्भरता कम की जा सके। फिलहाल पार्टी के लिए नीतीश के साथ स्थिर रिश्ते बनाए रखना फायदेमंद सौदा है। कुल मिलाकर भाजपा ने यह निर्णय लेकर यह स्पष्ट कर दिया है कि उसका फोकस अल्पकालिक राजनीतिक लाभ पर नहीं, बल्कि दीर्घकालिक रणनीतिक मजबूती पर है। वही पुरानी विनिंग टीम बनाए रखना सिर्फ सत्ता की निरंतरता का प्रतीक नहीं, बल्कि 2029 के लक्ष्य की दिशा में बिछाई जा रही राजनीतिक बिसात का हिस्सा है। बिहार में स्थिरता का यह फॉर्मूला अगर अगले कुछ वर्षों तक कायम रहता है तो 2029 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को इसका सीधा लाभ मिलने की पूरी संभावना है।
    संजय सक्सेना
    वरिष्ठ पत्रकार,लखनऊ
    मो.नं. 9454105568

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    600 बीमारी का एक ही दवा RENATUS NOVA

  • कांग्रेस: कमजोर होती प्लेटफार्म एवं राहुल गांधी युग में पतन की पटकथा

    कांग्रेस: कमजोर होती प्लेटफार्म एवं राहुल गांधी युग में पतन की पटकथा

    कांग्रेस: कमजोर होती प्लेटफार्म एवं राहुल गांधी युग में पतन की पटकथा

    सुरेश गांधी
    भारतीय राजनीति में कांग्रेस कभी एक विराट पर्वत जैसी दिखाई देती थी, 28 राज्यों में प्रभाव, सत्ता में गहरी पकड़ और राष्ट्रव्यापी जनाधार। आज वही पार्टी कुछ चुनिंदा राज्यों में सिमट चुकी है। यह संकट अचानक पैदा नहीं हुआ, इसकी जड़ में वह नेतृत्व है जिसके हाथ में पार्टी ने 2004 से लेकर अब तक अपने भविष्य की कमान थमा रखी है। राहुल गांधी की राजनीति, उनके चुनावी दांव, आरोप-प्रत्यारोप की शैली और रणनीतियों ने कांग्रेस को जितना उठाया उससे कई गुना ज़्यादा डुबोया है, यह निष्कर्ष अब देश के विस्तृत राजनीतिक परिदृश्य को देखकर साफ दिखाई देता है. ऐसे में बड़ा सवाल तो यही है संविधानिक संस्थाओं पर अविश्वास का नैरेटिव अब किसका तारणहार बन पाएगा?
    भारतीय राजनीति की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस, जिसे कभी “राष्ट्रमाता” कहा जाता था, आज अपने अस्तित्व की जंग लड़ रही है। आज कांग्रेस का वजूद न सिर्फ राष्ट्रीय पैमाने पर सीमित हो गया है, बल्कि उसकी विधानमंडल शक्ति, संगठनात्मक संरचना और जनाधार भी चिंताजनक गिरावट पर है। राहुल गांधी 2004 में राजनीति में आए। 2009 के बाद उन्होंने पार्टी के भीतर निर्णयों पर गहरा प्रभाव जमाना शुरू किया। इसी कालखंड से कांग्रेस के चुनावी ग्राफ का निरंतर पतन शुरू हुआ। 2009 के बाद देशभर के 83 विधानसभा चुनावों में कांग्रेस 71 चुनाव हारी। 2014 लोकसभा में कांग्रेस 44 सीटों पर सिमट गई। इतिहास की सबसे शर्मनाक हार। 99 सीटों तक पहुँचने में पूरा एक दशक लग गया। 2014 में 11 राज्यों में कांग्रेस की सरकार थी, आज सिर्फ 3 राज्य, कर्नाटक, तेलंगाना, हिमाचल। विधानसभा सीटों का ग्राफ हर साल गिरता गया और कांग्रेस अब चुनाव मैदान में बड़े प्रतिद्वंद्वी के रूप में भी नहीं बची। उनके पक्ष में यह तर्क है कि वह दशक के अंत में कांग्रेस को नया उत्साह देने की कोशिश कर रहे थे, युवाओं को अपील करना, सोशल मीडिया का उपयोग करना, “भारत जोड़ो यात्रा” जैसी पहलों का नेतृत्व करना। इन पहलों का चुनावी लाभ सीमित रहा, खासकर राज्यों के स्तर पर जहां पार्टी का धरातलीय जाल (ग्रासरुट नेटवर्क) धीरे-धीरे खोता गया।
    राहुल की राजनीति ने कांग्रेस को ऐसा बना दिया है कि न जनता भरोसा करती है, न संगठन में ऊर्जा बची है, न नेतृत्व की दिशा स्पष्ट है। यह अलग बात है कि इस नाकामी को वह संवैधानिक संस्थाओं पर अविश्वास का राजनीतिक हथियार बनाते हैं। राहुल की ’नई राजनीति’ का यह नया हथकंडा है। खास तौर से तब जब चुनावी पकड़ कमजोर हो जाती है और जनता का विश्वास क्षीण होता जाता है, तब राहुल “आरोपों की राजनीति“ को हथियार बना लेते हैं। बीते कुछ वर्षों में राहुल गांधी और कांग्रेस की यही रणनीति रही, चुनाव आयोग, ईडी, सीबीआई, सुप्रीम कोर्ट, सेना, लगभग सभी संवैधानिक संस्थाओं पर प्रश्नचिह्न लेकिन इस बार जवाब आया देश के 272 दिग्गजों की ओर से। यह एक साधारण प्रतिक्रिया नहीं थी। यह राष्ट्र की संस्थाओं पर हो रहे अनवरत प्रहार के खिलाफ एक सामूहिक चेतावनी थी। देश के 272 प्रतिष्ठित व्यक्तियों, 16 पूर्व जज, 123 सेवानिवृत्त नौकरशाह, 14 पूर्व राजदूत और 133 पूर्व सैन्य अधिकारियों ने एक खुला पत्र जारी कर चुनाव आयोग के पक्ष में मजबूती से खड़ा होने की घोषणा की। पत्र की भाषा सख्त, स्पष्ट और सीधी थी। उसमें कहा गया, “भारत का लोकतंत्र बाहरी हमले से नहीं, बल्कि बेबुनियाद और जहरीली राजनीतिक बयानबाजी से चुनौती का सामना कर रहा है।” यह आरोप किसी एक नेता पर नहीं, बल्कि सीधे-सीधे राहुल गांधी और विपक्ष के नेताओं की हालिया टिप्पणियों पर केंद्रित था।
    पत्र के मुख्य बिंदु कांग्रेस की राजनीति की पोल खोलते हैं। 1. विपक्ष ने चुनाव आयोग पर आरोप लगाए, पर एक भी औपचारिक शिकायत या हलफनामा नहीं दिया। यह साफ संदेश था, आरोप हैं, पर सबूत नहीं। 2. राहुल गांधी की “वोट चोरी“, “वोट डकैती“, “एटम बम वाली खोज“, सब राजनीतिक नाटक। 272 दिग्गजों ने विशेष रूप से राहुल गांधी के हालिया बयानों का उल्लेख किया जिनमें उन्होंने ईसी पर वोट चोरी का आरोप लगाया और दावा किया कि उनकी खोज “एटम बम” जैसी है। पत्र में कहा गया, “बिना साक्ष्य इस तरह के बयान चुनाव आयोग के अधिकारियों को धमकाने और जनता में भ्रम फैलाने की कोशिश लगते हैं।” 3. एसआईआर प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी: कोर्ट निगरानी में सत्यापन, फर्जी वोटर हटाए गए, दिग्गजों ने साफ किया कि ईसी की एसआईआर प्रक्रिया, न्यायालय पर्यवेक्षण में तकनीकी पारदर्शिता के साथ फर्जी वोट हटाने और नए पात्र मतदाताओं को जोड़ने के लिए पूरी तरह विश्वसनीय तरीके से की गई। 4. “ईसी बीजेपी की बी-टीम है”, यह आरोप राजनीतिक हताशा का संकेत मात्र, जब विपक्ष किसी राज्य में जीतता है, ईवीएम “ईमानदार“ जब हारता है, ईवीएम “पक्षपाती.” पत्र ने इसे “सेलेक्टिव आक्रोश” और “राजनीतिक अवसरवाद” बताया।
    देखा जाय तो राहुल गांधी के हर आरोप उनके लिए उल्टा दांव साबित होते है। 2025 बिहार चुनाव इसका ताजा उदाहरण है। 2019 में उनका नारा था, “चौकीदार चोर है“. 2025 में नया नैरेटिव, “वोट चोरी“, फिर “वोट डकैती“। दोनों बार जनता ने इन आरोपों को पूरी तरह खारिज कर दिया। राहुल की 16 दिन की यात्रा, 25 जिलों का दौरा, लगातार सभाएं, महागठबंधन के बड़े नेता साथ मंच तैयार, कथा तैयार, सबकुछ “ईसी पर आरोप“ वाले नैरेटिव को मजबूत करने के लिए था लेकिन न कोई आंकड़ा, न कोई वीडियो, न कोई केस स्टडी, न कोई ठोस उदाहरण, न कोई शिकायत, न कोई हलफनामा, यानी शोर बहुत, साक्ष्य शून्य। जनता ने समझ लिया कि यह राजनीति “साक्ष्य“ नहीं, बल्कि “आरोप आधारित प्रचार“ है। बिहार चुनाव परिणामों ने महागठबंधन को आईना दिखा दिया कि जब बोतल खाली हो तो शोर कितना भी करो, वोटर उसे पहचान लेता है।
    राहुल गांधी की राजनीति का मूल संकट तीन स्तरों पर दिखाई देता है। 1. रणनीतिक विफलता : राहुल गांधी की रणनीति अक्सर “मोमेंटम आधारित“ रही, कभी यात्रा, कभी अभियान, कभी नारा, कभी अचानक आरोप। लेकिन किसी भी अभियान के लिए जरूरी है, निरंतरता, जमीनी संगठन, बूथ स्तर पर पकड़, तथ्य आधारित संवाद, कार्यकर्ताओं का नेटवर्क, राहुल ने यह कभी मजबूत नहीं किया। 2. वैचारिक दिशाहीनता: कांग्रेस किस रास्ते पर चल रही है? वामपंथी? समाजवादी? उदारवादी?, धर्मनिरपेक्ष?, कल्याणकारी?, नव-उदारवादी? जनता तो छोड़िए, कांग्रेस के कार्यकर्ताओं को भी स्पष्ट नहीं। राहुल की सलाहकार टीम अत्यधिक वैचारिक, जमीन से कटे हुये और राजनीतिक जटिलताओं को समझने में कमजोर मानी जाती है। कांग्रेस की बूथ इकाइयां खत्म हो गईं। जिला संगठन निष्क्रिय। राज्य इकाइयां टूट चुकीं। योग्य नेता पार्टी छोड़ते जा रहे हैं। जहाँ सरकार है, वहाँ अंतर्कलह चरम पर है। जहाँ विपक्ष है, वहाँ संघर्ष का ढांचा ही नहीं। नेतृत्व ऊपर है, संघर्ष नीचे गायब है।
    खास यह है, राहुल गांधीः जनता का भरोसा क्यों नहीं जीत पाए? जवाब है। 1. आरोपों की राजनीति जनता को पसंद नहीं आई, वोटर अब जागरूक है, वह भावनाओं से ज़्यादा तथ्य चाहता है। 2. हर चुनाव में हार का रिकॉर्ड, विश्वसनीयता वहीं खत्म हो जाती है जहां सफलता का कोई ट्रैक रिकॉर्ड नहीं। 3. जनता से संवाद का अभाव: राहुल के भाषणों में विषय हैं परंतु समाधान नहीं। प्रश्न हैं परंतु योजनाएँ नहीं। भावनाएँ हैं परंतु दिशा नहीं। 4. गठबंधन का अस्थायी सहारा: जहाँ कांग्रेस अकेले खड़ी होती है, वहां उसका वोट 10 से 15 फीसदी से आगे नहीं बढ़ पा रहा। यह आरोप कि ईवीएम खराब, ईसी पक्षपाती, वोट चोरी, वोट डकैती, आयोग बीजेपी की बी-टीम, यह सब एक गहरी चुनावी विफलता का संकेत है। जब संगठन कमजोर, मुद्दे कमजोर, नेतृत्व कमजोर तो ऐसे आरोप “राजनीतिक ऑक्सीजन“ बन जाते हैं लेकिन 272 दिग्गजों का खुला खत अब इस नैरेटिव को गंभीर झटका है। देश के इन अनुभवी लोगों ने साफ कहा, “आरोप राजनीतिक हैं, साक्ष्य शून्य।” यह कांग्रेस की साख पर एक बड़ा सवाल है।
    ऐसे में बड़ा सवाल है क्या कांग्रेस वापस उभर सकती है? यह संभव है परंतु इसके लिए राहुल गांधी को तीन बड़े कदम उठाने होंगे। 1. आरोपों की राजनीति छोड़कर जनता के मुद्दों पर काम करना, मुद्दे: अर्थव्यवस्था, शिक्षा, स्वास्थ्य, किसान, युवा, आरोपों से नहीं, योजनाओं से हल होंगे। 2. संगठन का पुनर्गठन: स्थानीय नेतृत्व को आगे लाना होगा। पुराने कार्यकर्ताओं को वापस जोड़ना होगा। डिजिटल नहीं, जमीनी नेटवर्क बनाना होगा। 3. वैचारिक स्पष्टता: कांग्रेस को तय करना होगा कि वह किस राजनीतिक आधार पर आगे जाना चाहती है। मतलब साफ है कांग्रेस का संकट नेतृत्व, नीति और नैरेटिवकृ तीनों का है। राहुल गांधी का नेतृत्व कांग्रेस को वह दिशा नहीं दे पाया जिसकी एक राष्ट्रीय पार्टी को आवश्यकता होती है। चुनावी हार राज्यों में सत्ता खत्म, संगठन कमजोर, विचारधारा अस्पष्ट और अब संवैधानिक संस्थाओं पर अविश्वास का खतरनाक नैरेटिव, इन सबने कांग्रेस को एक ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है जहां से या उसके पुनरुत्थान का रास्ता निकलेगा या फिर उसका पतन और गहराएगा। 272 दिग्गजों का खुला पत्र कांग्रेस के लिए चेतावनी है। एक लोकतांत्रिक प्रणाली में हार का अर्थ यह नहीं कि संस्थाएँ गलत हैं। इसका अर्थ सिर्फ यह है कि जनता ने विकल्प चुना। जनता बार-बार कांग्रेस के “कथा आधारित आरोपों“ को खारिज कर रही है। यदि कांग्रेस को भविष्य चाहिए, तो उसे सच बोलना होगा। अपने भीतर भी और देश के सामने भी। वरना वह इतिहास की किताबों में बस यह संदेश छोड़ जाएगी, “सबसे पुरानी पार्टी भी गलत नेतृत्व के नीचे ढह सकती है।”

    हार का ग्राफ: विधानसभा चुनावों में बेजोड़ गिरावट
    एक बेहद चिंताजनक पहलू यह है कि राहुल गांधी के प्रभावी होने के बाद से कांग्रेस ने लगभग 83 विधानसभा चुनावों में से 71 हारे हैं। यह हार की दर महज आकस्मिक असफलता नहीं, बल्कि संस्थागत कमजोर­पना का संकेत है जिसे सिर्फ नेता-व्यक्तित्व की विफलता से नहीं, बल्कि संगठन, नेतृत्व रणनीति और विचारधारा की गहराइयों में देखना होगा। यह ध्यान देने योग्य है कि यह गिरावट सिर्फ चुनाव हारने की बात नहीं है, यह कांग्रेस की निर्णय क्षमता, स्थानीय संगठन शक्ति और चुनावी रणनीति की संपूर्ण विफलता की कहानियों में बदल गई है। राहुल गांधी की अगुवाई में कांग्रेस वह प्रभावी पार्टी नहीं रह पाई है जो कभी पूरे देश में फैली हुई थी। लोकसभा चुनावों में तस्वीर थोड़ा हद तक बेहतर रही, 2024 के आम चुनावों में कांग्रेस ने 99 सीटें जीतीं। यह 2019 के मुकाबले एक सुधार है लेकिन यह उतनी बड़ी वापसी नहीं थी जितनी कांग्रेस समर्थक इसकी आशा कर रहे थे। इंडिया गठबंधन के रूप में कांग्रेस की भूमिका महत्वपूर्ण थी लेकिन अकेले उसकी ताकत राष्ट्रीय स्तर पर अपने पुराने दिन वापस लाने के लिए काफी नहीं दिखी। हालाँकि यह वृद्धि संयोग नहीं थी। कांग्रेस ने रणनीतिक रूप से कुछ क्षेत्रों पर फोकस किया। गठबंधन का सहारा लिया और मोदी-बीजेपी के खिलाफ लामबंद विपक्षी ताकतों का हिस्सा बनी, मगर यह पटरी पर वापसी नहीं, बल्कि रिंग में लौटने की कोशिश थी।

    प्रदेशों में शक्ति का सिकुड़ना
    सबसे बड़ी चिन्ता का विषय है कांग्रेस की घटती राज्यस्तरीय खेती। 2014 में कांग्रेस के पास 11 राज्यों में सरकार थी लेकिन अब यह संख्या सिर्फ तीन तक सीमित हो गई हैः कर्नाटक, तेलंगाना और हिमाचल प्रदेश। यह सीमित “जुड़ाव” राष्ट्रीय पार्टी की राष्ट्रीय शक्ति की धुंधली पड़ने वाली छवि देता है। यहाँ तक कि हिमाचल प्रदेश में भी कांग्रेस स्थिति के तंग आरोप पर चल रही है। कुछ रिपोर्ट्स कहती हैं कि क्रॉस-वोटिंग और अंदरूनी दरारें उसकी स्थिरता को खतरे में ला रही हैं। अगर हिमाचल चला गया तो कांग्रेस का उत्तर भारत में एकमात्र गढ़ भी खतरे में होगा और उसकी मौजूदगी सिर्फ दक्षिण में टेलंगाना और कर्नाटक तक सीमित रह जाएगी। यहां यह उल्लेख करना जरूरी है कि राज्य सरकारों में शक्ति का नुकसान सिर्फ “सीटों की बात” नहीं है, यह संगठनीय जड़ता, स्थानीय नेटवर्क और देशव्यापी संपर्क खोने की कहानी है।

    लॉस रिकार्ड और जवाबदेही
    हाल ही में भाजपा ने एक तंज के साथ दावा किया है कि राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस को 95 चुनावों में हार मिली है। यह केवल राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि वास्तविकता का प्रतिबिंब है, जैसा कुछ विश्लेषकों का मानना है “प्रतिष्ठान लिक्विडेशन” यानी संस्थागत क्षय का संकेत।

    संघठनात्मक कमजोरी
    राहुल गांधी, भले ही सार्वजनिक रूप से सक्रिय हों लेकिन कांग्रेस की संगठन संरचना लगातार कमजोर होती दिख रही है। स्थानीय स्तर पर पार्टी को युवाओं, बूथ लेवल कार्यकर्ताओं और धरातलीय नेताओं को जोड़ने में असफलता का सामना करना पड़ा है। इस संगठनात्मक विफलता ने विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को भारी नुक़सान पहुँचाया है।

    संवाद और संदेश की कमजोर नींव
    राहुल गांधी की सार्वजनिक यात्रा, जैसे “भारत जोड़ो यात्रा” और अन्य अभियानों ने नकली उम्मीदों को जगाया लेकिन चुनावी धरातल पर उनका संदेश अक्सर अस्पष्ट रहा। विपक्ष को जोड़ा जाय लेकिन उसे जीत में परिवर्तित करने की रणनीति कमजोर पड़ी, शायद इसलिए कि संदेश और संरचना में सामंजस्य नहीं था।

    संरचनात्मक और चुनावीय चुनौतियां
    कांग्रेस को सिर्फ एक “नेतृत्व समस्या” नहीं है। उसकी गिरावट की गहराई में कई संरचनात्मक और चुनावीय चुनौतियाँ निहित हैं: स्थानीय नेटवर्क का टूटना: कांग्रेस का बूथ स्तर पर नेटवर्क, जो कभी उसकी ताकत रहा करता था, कई राज्यों में कमजोर पड़ गया है। स्थानीय काडर की कमी और बूथ-संयोजन का कमजोर होना विधानसभा चुनावों में उसकी हार का एक बड़ा कारण रहा है। प्रतिद्वंद्वियों का मजबूतीकरण: भाजपा ने अपनी संगठनात्मक क्षमता बढ़ाई है और राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत होती जा रही है। इसके अलावा क्षेत्रीय पार्टियाँ कांग्रेस के कुछ पारंपरिक गढ़ों में प्रतिस्पर्धा बढ़ा रही हैं। इन राजनीतिक बदलावों ने कांग्रेस की सत्ता में वापसी की राह और कठिन बना दी है। गठबंधन राजनीति में जटिलता: इंडिया ब्लॉक की भागीदारी ने कांग्रेस को कुछ सीटों पर फायदा पहुंचाया लेकिन गठबंधन राजनीति अक्सर विचारधारात्मक जटिलताओं और संसाधन-पारस्परिकता की चुनौतियों से भरी होती है। यह कांग्रेस के लिए एक डबल-एजड तलवार रही है: गठबंधन के बिना अकेले मजबूत होना मुश्किल और गठबंधन में अपने एजेंडे को लागू करना कठिन। मूल्य और पहचान संकटः कांग्रेस, जिसे कभी भारत के स्वाधीनता आंदोलन, सामाजिक न्याय और आर्थिक विकास के प्रतीक के रूप में देखा जाता था। आज एक ऐसी पार्टी बन गई है जिसे “पारंपरिक” कहा जाता है लेकिन उसकी पहचान आधुनिक भारत में स्पष्ट नहीं है। इसके नीतिगत संदेश, नेतृत्व और संगठन आधुनिक राजनीतिक युग की मांगों के साथ सामंजस्य में नहीं दिखते जैसा कि वोटरों की अपेक्षा होती है।

    राहुल गांधी क्यों जिम्मेदार हैं?
    यह कहना गलत होगा कि राहुल गांधी अकेले कांग्रेस के पतन के लिए जिम्मेदार हैं। पार्टी की समस्या जटिल और गहरी है, यह सिर्फ एक नेता का मामला नहीं, बल्कि एक संस्थान का संकट है। फिर भी उनके नेतृत्व ने कुछ महत्वपूर्ण मोर्चों पर कांग्रेस को कमजोर किया है: हितों का असंतुलन: राहुल गांधी की ऊर्जा, व्यंजना और भाषण क्षमता में कमी नहीं है लेकिन उनका संगठनात्मक दृष्टिकोण और रणनीति अक्सर स्थानीय विस्तार और बूथ स्तर तक नहीं पहुँच पाती। राजनीतिक जुड़ाव और जमीन से कटाव: कांग्रेस का जमीनी जुड़ाव घटने का एक बड़ा कारण यह है कि उसके प्रमुख नेता और विचारक ग्रामीण और मध्यम वर्ग के आम मतदाता के मुद्दों से पर्याप्त दूरी बनाए रखते हैं। राहुल की नीतिगत प्राथमिकताएँ और सार्वजनिक निजीकरण, सामाजिक न्याय जैसी चर्चाएं, बहुत सारे वोटरों की रोज़मर्रा की समस्याओं से मेल नहीं खातीं। लंबे समय की रणनीति की कमी: कांग्रेस ने कई बार “पलायन रणनीति” अपनाई है। अचानक बड़े अभियानों, यात्रा और घोषणाओं के माध्यम से सक्रियता दिखाना, लेकिन निरंतरता की कमी रही है। चुनावी जीत पाने के लिए सिर्फ रैली और भाषण पर्याप्त नहीं होते; ज़रूरत है संरचनात्मक बदलाव, स्थिर संगठन और दीर्घकालीन रणनीति की। राहुल गांधी की भूमिका इस पुनरुत्थान में महत्वपूर्ण होगी लेकिन अकेले नेतृत्व से यह काम नहीं हो सकता। यह समय है जब कांग्रेस को “नेतृत्व” और “संस्थान” के बीच संतुलन बनाना होगा और यह तय करना होगा कि वह सिर्फ एक पारंपरिक पार्टी की मानसिकता में बचेगी या फिर नए भारत की चुनौतियों का जवाब देने वाली एक आधुनिक, जीवंत शक्ति बनेगी। यदि कांग्रेस इस संकट को अवसर में बदलना चाहे तो उसे न सिर्फ हार से सीखना होगा, बल्कि अपनी जड़ें फिर से गहराई तक लगाने होंगे। वरना वह सिर्फ राजनीतिक इतिहास की एक सीख बनकर रह जाएगी, एक दिग्गज पार्टी, जिसे समय ने पीछे छोड़ दिया।

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    600 बीमारी का एक ही दवा RENATUS NOVA

  • रेजांगला की खूनी बर्फीली चोटी एवं महानायक शैतान सिंह का स्वर्णिम इतिहास

    रेजांगला की खूनी बर्फीली चोटी एवं महानायक शैतान सिंह का स्वर्णिम इतिहास

    रेजांगला की खूनी बर्फीली चोटी एवं महानायक शैतान सिंह का स्वर्णिम इतिहास

    डा. दिलीप सिंह एडवोकेट
    वर्ष 1962 का समय था चीन और भारत की शत्रुता चरम पर थी। जवाहर लाल नेहरू की आत्म मुग्धता और तिब्बत के सर्वोच्च धर्म गुरु दलाई लामा को भारत में शरण देने के कारण हिंदी चीनी भाई-भाई नारा चकनाचूर हो चुका था और चिन्ह भारत को सबक सिखाने के लिए पूरी तरह तैयार था।‌ भारत के विदेशी मित्र देशों और गुप्तचर तंत्र ने इस भयानक खतरे का संकेत भी किया लेकिन नेहरू अपनी ही धुन में मस्त रहे और कहते रहे कि चीन ऐसा कभी नहीं कर सकता है।
    अंत में वही हुआ जिसका डर था। नेपाल से लेकर लद्दाख तक चीन ने नवंबर 1962 में बहुत भयानक आक्रमण कर दिया। पूरी तरह से निश्चित भारतीय सरकार और गोला बारूद की कमी से जूझ रही भारतीय सेनाएं दोनों ही चकरा गई। यह एक ऐसा रक्त रंजित युद्ध था जिसमें हजारों भारतीय सैनिकों को बिना किसी कारण के हथियारों और उचित नेतृत्व के अभाव में बलिदान होना पड़ा लेकिन अपना खून पर्वत शिखर पर बहकर उन्होंने देश की रक्षा किया, अन्यथा चीन लद्दाख से लेकर अरुणाचल प्रदेश को पूरी तरह कब्जा कर लिया होता। इस युद्ध की ऐसी-ऐसी गाथाएं हैं जो विश्व इतिहास में सुनहरे युद्ध कौशल के रूप में अंकित हैं जिसमें सबसे बड़ी ‌ महागाथा मेजर शैतान सिंह भाटी उनकी कुमाऊं बटालियन के सैनिकों और रेजांगला की चोटी की है।
    17 नवम्बर को गर्व से भरे चीन ने घोषणा किया कि वह 3 दिनों के अंदर की छोटी को पार कर अपनी चाय सुशील में पियेंगे जिस गति से भारत की हर हो रही थी और चीन ने पूरे अरुणाचल प्रदेश और अक्षय चीन और लद्दाख पर कब्जा कर लिया था, उससे यह असंभव भी नहीं लगता था लेकिन चीन और त्रिशूल के बीच में परमवीर मेजर शैतान सिंह तैनात थे जिनको पर कर पाना चीन और चीनी सेवा के लिये असंभव था।
    18 नवम्बर को 2000 से अधिक चीनी सैनिकों ने सुबह 5 बजे ही रेजांगला की छोटी सी भारती सेना की चौकी पर धावा बोल दिया। उनका यह विचार था कि 10 15 मिनट में चौकी कब्जा करके हुए आगे कश्मीर की तरफ बढ़ जायेंगे, क्योंकि उसे चौकी पर केवल 120 भारतीय सैनिक 13 में तैनात थे जिनका नेतृत्व मेजर शैतान सिंह कर रहे थे और ब्रिगेडियर रैना का आदेश था कि आखिरी गोली तक आखिरी जवान लड़ते रहे स्थिति बड़ी विषम थी, क्योंकि भारत के सैनिकों के पास बहुत गिनी चुनी बंदूके और कारतूस थे। खाने पीने की सामग्री भी नहीं थी।
    ऐसे में महानायक परमवीर शैतान सिंह ने सभी सैनिकों को एकत्र कर एक निर्णय लिया और कहा जो भी लौटना चाहे, वह लौट जायं और जो बचे, वहां आखिरी गोली तक चीन के खूंखार सैनिकों का सामना करें‌ लेकिन एक भी सैनिक वापस जाने को तैयार नहीं हुआ। इस पर मेजर शैतान सिंह ने सूबेदार रामचंद्र यादव सहित 5 अन्य सैनिकों को पीछे जाकर उनकी कल्पना से परे रक्त रंजित महान युद्ध के इतिहास को बताने का आदेश दिया। बाकी 114 सैनिक अपने प्राण का मोह छोड़कर एक तरफा भयानक युद्ध में जी जान से जुट गये।
    5 चीन की पहली टुकड़ी की जो सेना की बाढ़ आई, उसकी पूरी तरह से धराशाई कर दिया गया‌। इस पर चीन की सेना आश्चर्यचकित हो गई कि 2000 से अधिक सैनिकों से 120 सैनिक इतने बहादुरी से कैसे लड़ सकते हैं। इसके बाद सुबह 5:40 पर शून्य से 15 डिग्री नीचे तापमान में 16000 फीट से अधिक रेजांगला की चोटी पर मेजर शैतान सिंह ने सभी सैनिकों को फैलाकर अदभुत व्यूह की रचना की। चारों तरफ से गोली वर्षा करने का आदेश दिया और एक-एक गोली पर चीन के सैनिकों का नाम लिखने को कहा‌। इससे एक भी गोली बर्बाद ना हो और खुद वह एक खाईं है। दूसरी खाई तक जाकर अद्भुत वीरता के साथ लड़ते रहे।
    चीन की दूसरी टुकड़ी को भी भारत वालों ने मार गिराया लेकिन इसी बीच लगभग सारे भारतीय सैनिक मारे जा चुके थे। 3-4 सैनिक बचे थे जिनका नेतृत्व परमवीर मेजर शैतान सिंह कर रहे थे। मेजर शैतान सिंह हर खंदक में जाकर गोलियां चलाकर ऐसा अद्भुत कारनामा किया कि चीन की सेना चक्कर में पड़ गई। उनको यह समझ में आया कि हमने या तो गलत संख्या का आकलन किया या पीछे से भारत की टुकड़ियां और भी आ गई हैं और वह डर गये।
    इसी बीच एक खाई से दूसरी खाई में जाते समय दुर्भाग्य से मशीन गन की पूरी की पूरी वर्स्ट फायर मेजर शैतान सिंह के पेट में लगी उनका पेट फट गया और आंते बाहर निकल गई। यह देखकर बच्चे हुए 3-4 सैनिक हाहाकार कर उन्हें बचाने दौड़े तो मेजर ने उन्हें खाई में छिपकर लड़ने का आदेश दिया। फिर भी सूबेदार रामचंद्र यादव उन्हें खाईं के अंदर खींच कर ले गये जहां उन्होंने बाहर निकल चुकी आंतों को कपड़े से बांधा और लड़ने लगे। इसी बीच सूबेदार रामचंद्र ने देखा कि उनका सारा शरीर गोलियों से छलनी हो गया था और एक हाथ भी ना काम हो गया था। उन्होंने तत्काल रामचंद्र यादव को वापस जाकर सारी स्थिति ब्रिगेडियर को बचाने का आदेश दिया और अपने पैरों से मशीन गन चलाने लगे। अपने मेजर को इस हालत में छोड़कर आने का मन रामचंद्र यादव को नहीं हुआ लेकिन आदेश का पालन भयंकर कष्ट के साथ उन्हें करना ही पड़ा।
    इधर गोली बरसा बंद नहीं होने पर चीन की सी बुरी तरह निराश हो चुकी थी और पूरे कश्मीर को जीतने और त्रिशूल में चाय पीने का अपना इरादत बीच में ही छोड़कर भयभीत होकर भी आप वापस चले गये। उनके भी 1300 से अधिक सैनिक मारे गए थे जो पूरी भारतीय सीमा में चीन भारत युद्ध में नहीं मारे गए थे। उन्हें लगा कि यदि आगे बढ़ेंगे तो बचे हुए लोग भी मार डाले जायेंगे। इस प्रकार भारत के भू—भाग त्रिशूल में चाय पीने का चीन की सेवा का सपना धरा का धरा ही रह गया। इधर चीनी सैनिक पीछे मुड़े। उधर अंतिम सैनिक के रूप में ट्रिगर पर पर दाबे मेजर शैतान सिंह की अंतिम सांसें थम चुकी थी। ‌मेजर की परम वीरता अद्भुत युद्ध कौशल और रणनीति देखकर एक-एक सैनिक ने उनका अनुकरण किया और अपना बलिदान देकर संपूर्ण कश्मीर भारत के हाथ से जाने से बचा लिया।
    सरकार और उसके तंत्र द्वारा 13 कुमाऊं बटालियन जिसका नाम चार्ली कंपनी था, के ऊपर तरह-तरह के आरोप लगाये गये। समाचार पत्रों में भी। ऐसे समाचार पत्र लिखे गये जिनका लिखना भी इन महान वीर सैनिकों का अपमान है। कितने लोगों ने तो यहां तक लिख डाला कि मेजर शैतान सिंह और उनकी कंपनी डर के कारण भाग गई और कहीं छिप गई। पूरे 3 महीने के बाद कुछ चरवाहे उधर अपनी भेद लेकर निकले तो उन्होंने बर्फ में 114 कंकाल देखे। किसी के हाथ में ग्रेनेड रखा हुआ था तो किसी की अंगुली ट्रिगर पर थी तो कोई गोला फेंक रहा था जबकि मेजर शैतान सिंह के पैर की अंगुली उनकी मशीनगन पर जम गई थी‌। इसके पहले जब बच्चे हुए रामचंद्र यादव और 5 सैनिकों ने कल्पना के परे रोमांचकारी इस महान भीषण युद्ध का वर्णन किया तो लोगों ने उसको काल्पनिक कहानी मान लिया था‌। सोच रहे थे कि खुद को पाक साफ बनाने के लिए उन्होंने एक झूठी युद्ध की कहानी का निर्माण किया है। जैसा होना वास्तव में संभव है।
    बाद में चीन के युद्ध को लेकर बहुत बवाल मचा‌ और नेहरू की अनगिनत भूलों और गलतियों की तरह इस युद्ध का भी खामी आज भारत को भुगतना पड़ा। अरुणाचल प्रदेश जिसे नेफा कहते थे और लद्दाख जो आज जम्मू कश्मीर है, का लाखों वर्ग किलोमीटर भाग चीन ने जबरदस्ती कब्जा कर लिया और भारत के हाथ से कैलाश मानसरोवर सहित काफी भू—भाग निकल गया। बाद में असली कहानी आने पर मेजर शैतान सिंह को कृतज्ञ देश में याद किया और उन्हें दिवस होकर नेहरू सरकार को परमवीर चक्र देना पड़ा। बाकी महान अन्य सैनिकों को भी महावीर और वीर चक्र दिया गया मेजर शैतान सिंह के बलिदान दिवस 18 नवंबर को सत्ता पक्ष और विपक्ष के किसी भी राजनेता द्वारा उनको याद ना किया जाना, उनको श्रद्धांजलि ना देना और पाठ्य पुस्तकों में उनको न पढ़ाना केवल मेजर शैतान सिंह और उनकी कंपनी का नहीं संपूर्ण देश और सैनिकों का अपमान करने से अधिक है। जीवित ही इतिहास बन चुके परमवीर चक्र विजेता मेजर शैतान सिंह भाटी और उनकी संपूर्ण कुमाऊं बटालियन को हम संपूर्ण भारतवासी अश्रुपूरित श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।

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  • पहचान

    पहचान

    पहचान के संकट से जूझ रहा इंसान,
    कौन हूँ मैं, क्या हूँ मैं, कहाँ मेरा स्थान।
    राहें हज़ार पर मंज़िल अनजानी,
    ख़ुद को खोजता, खुद से ही हैरान।

    हवा का रुख जिधर, उधर झुके इंसान,
    अपने ही चेहरे पे ओढ़े कितने प्रमाण।
    सच के ऊपर जमी हैं झूठ की परतें
    चेहरों के पीछे थमी कहानियाँ कितनी।

    हम जैसे हैं, वैसे अब दिखते नहीं,
    जो दिखते हैं वो असल में होते नहीं।
    दुनिया की भीड़ में खोया हर इंसान,
    अपने ही अस्तित्व से जैसे गुमनाम।

    हर शाख पर लटकती लापता पहचान,
    हर मन में उठ रहा एक मौन तूफ़ान।
    मुखौटों की भीड़ में मर गई सच्चाई,
    झूठ की चादर में यूँ दुनिया ढक गई।

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  • उपलब्धि…!

    उपलब्धि…!

    मुझसे…!
    मेरे गाँव-देश-समाज के बच्चे…
    कभी… खौफज़दा नहीं दिखते…
    देखकर मुझको… दूर भी नहीं भागते
    अक्सर… खिलखिलाकर…
    अपने नन्हें हाथों की उँगलियों से,
    मेरे माथे के बाल नोच लेते हैं…
    नातेदार-रिश्तेदार और मेरे मित्र…!
    कभी भी मुझसे नाराज नहीं होते…
    गुरुजन-वृन्द देखकर मुझको…
    मुदित हो जाते हैं… प्रसन्न हो जाते हैं…
    मेरे दामन पर कोई दाग नहीं…
    कचहरी की उलझन से…!
    मैं एकदम मुक्त हूँ…
    वैद्य-चिकित्सक को…!
    घर आए जमाना हो गया है…
    थाना-पुलिस से मेरा रिश्ता…!
    ना काहू से दोस्ती,
    ना काहू से बैर जैसा…
    धरम-करम की गठरी मेरी…!
    दिनों-दिन भारी होती जा रही है…
    सबको पता है और सभी जानते हैं,
    राजनीति का ककहरा भी…!
    मैंने सीखा ही नहीं…
    गाँव-देश के कुत्ते-बिल्ली,गाय-भैंस…
    भेड़-बकरी और लोमड़-सियार…!
    किसी से भी नहीं है मेरा बैर…
    मेरे पड़ोसी को भी…!
    कभी जरूरत ही नहीं पड़ी,
    कि मनाये वह मुझसे अपनी खैर…
    पड़ोसियों से तो…!
    मैं मांग लिया करता हूँ…
    उनके चूल्हे की आग… और…
    नमक-तेल,धनिया-हल्दी-प्याज…
    देकर उनको ऊँची आवाज़…
    मानो या ना मानो प्यारे…
    गाँव-देश-समाज में… मुझसे…!
    कोई नहीं करता परदा…
    अंदरखाने तक पहुँच है मेरी,
    प्यारा है मुझे प्यारे…
    मेरे गाँव-देश-समाज का…
    हर एक घर… और… हर एक घरौंदा…
    नदी-नाले, बाग-बगीचे, ताल-तलैया,
    महल-मँड़ई, अरहर-गेहूँ-धान और
    आलू-मकई और साग-सनई…
    दूर नहीं हुआ हूँ…!
    इनसे मैं अभी भी कत्तई…
    अंदाज मेरा आज भी है,
    वही पुराना गँवई…
    मित्रों… यही है मेरी उपलब्धि… और…
    मैं अपनी इस उपलब्धि पर…!
    हर दम खुश रहता हूँ…

    रचनाकार—— जितेन्द्र दुबे
    अपर पुलिस उपायुक्त, लखनऊ

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  • त्योहारी उत्साह की शुरुआत जल्दी: ग्रैंड शॉप्सी मेला 2025 ने छोटे शहरों में खरीदारी की लहर बढ़ाई

    त्योहारी उत्साह की शुरुआत जल्दी: ग्रैंड शॉप्सी मेला 2025 ने छोटे शहरों में खरीदारी की लहर बढ़ाई

    त्योहारी उत्साह की शुरुआत जल्दी: ग्रैंड शॉप्सी मेला 2025 ने छोटे शहरों में खरीदारी की लहर बढ़ाई

    • 70% से अधिक ऑर्डर्स और ऐप इंस्टॉल टियर 3 और 4+ शहरों से हुए; बार-बार खरीदने वाले ग्राहक बिक्री में उछाल लेकर आए
    • मिलेनियल्स और जेन ज़ी खरीदार त्योहारी सीजन के उत्साह में सबसे आगे
    • घरेलू सामान, पुरुषों के फैशन और फुटवेयर श्रेणियों में रिकॉर्ड वृद्धि
    • स्थानीय व्यवसायों को सशक्त बनाने के लिए सेलर रिवॉर्ड्स प्रोग्राम शुरू किया गया

    बेंगलुरु – 26 सितंबर 2025: जैसे ही देश भर के परिवार त्योहारी सीजन की तैयारी कर रहे हैं, शॉप्सी बाय फ्लिपकार्ट ने अपने ग्रैंड शॉप्सी मेला के साथ उत्सव का माहौल बनाया, और त्योिहारी खरीदारी में जबरदस्त उछाल देखा गया। 70% से अधिक ऐप इंस्टॉल और ऑर्डर्स टियर 3 और 4+ शहरों से आए, जिसने भारत में किफायती और गुणवत्तापूर्ण उत्पादों की बढ़ती मांग को दर्शाया। विशेष रूप से मिलेनियल्स और जेन ज़ी ने घरेलू सामान, मेंस फैशन और फुटवेयर की मांग को बढ़ाया। शॉप्सी ने बिक्री अवधि के दौरान 44% की बढ़ोतरी दोबारा खरीदने वाले ग्राहकों में दर्ज की।

    त्योहारी सीजन के नजदीक आते ही, ग्रैंड शॉप्सी मेला ने परिवारों को त्योहारों की तैयारी के लिए जरूरी हर चीज खरीदने में मदद की। मजबूत बिक्री ने दिखाया कि किफायती कीमतों पर खरीदारी करने वाले लोगों ने 1,300 से ज्यादा श्रेणियों में 1 करोड़ से अधिक उत्पादों को 149 रुपये से कम कीमत पर चुना। दुर्गा पूजा के लिए कुर्ते से लेकर दिवाली की सजावट तक, शॉप्सी ने हर भारतीय परिवार की जरूरतों के लिए खास त्योहारी संग्रह तैयार किए और आसान खरीदारी अनुभव दिया। इससे शॉप्सी ने भारत में किफायती खरीदारी के लिए पसंदीदा मंच के रूप में अपनी जगह और मजबूत की।

    कपिल थिरानी, वाइस प्रेसिडेंट, शॉप्सी और फ्लिपकार्ट मार्केटप्लेस, फ्लिपकार्ट, ने कहा, “ग्रैंड शॉप्सी मेला के साथ, हमारा लक्ष्य ग्राहकों और विक्रेताओं को त्योहारी सीजन तक जल्दी पहुंच प्रदान करना था। इस साल की प्रतिक्रिया ने शॉप्सी के लिए एक नया मानक स्थापित किया है, जो पैसे की कीमत, क्वॉइलिटी सेलेक्शरन और स्थानीय विक्रेताओं के लिए डिजिटल पहुंच बढ़ाने पर हमारे निरंतर ध्यान को दर्शाता है। हमें मुख्य श्रेणियों में दहाई अंकों की वृद्धि और पहले कम सेवा वाले शहरों में रिकॉर्ड पहुंच से खुशी है। शॉप्सी ई-कॉमर्स को सबके लिए सुलभ बनाने, पहुंच को बढ़ाने, स्थानीय उद्यमियों को सशक्त बनाने और हर भारतीय परिवार को असाधारण मूल्य प्रदान करने के लिए प्रतिबद्ध है।”

    घरेलू सामान, मेंसवियर और फुटवेयर ने बढ़ाई त्योहारी मांग
    बिक्री में घरेलू आवश्यक वस्तुओं की मांग में 108% की वृद्धि देखी गई, जबकि पुरुषों के कैजुअल कपड़े और फुटवेयर में 95% की वृद्धि हुई। महिलाओं के कुर्ता और पैंट सेट, ईयरबड्स, और पुरुषों की एनालॉग घड़ियां शीर्ष बिक्री वाले उत्पादों के रूप में उभरे, जो त्योहारी सीजन की तैयारी में किफायती और स्टाइल को लेकर सजग खरीदारों के बीच शॉप्सी की मजबूत अपील को दर्शाते हैं।

    युवा भारत, स्थानीय विक्रेता ई-कॉमर्स की गति को बढ़ावा दे रहे हैं
    इस बार के ग्रैंड शॉप्सी मेला की वृद्धि को युवा खरीदारों की नई लहर ने बढ़ावा दिया, जिसमें मिलेनियल्स (48%) और जेन ज़ी (32%) ने मिलकर ग्राहक आधार का 80% से अधिक हिस्सा बनाया, जो भारत के डिजिटल-प्रथम खरीदारों के साथ मंच के मजबूत जुड़ाव को दर्शाता है। जेन ज़ी ने मुख्य रूप से पर्सनल ग्रूमिंग, फैशन, और परिधान पर ध्यान दिया, जबकि मिलेनियल्स ने घरेलू आवश्यक वस्तुओं और फैशन को प्राथमिकता दी, जिसने कुल बिक्री का 60% योगदान दिया। महिला खरीदारों ने भारत की खरीदारी पसंद को आकार देने में अपनी बढ़ती भूमिका पर जोर दिया, कुल ऑर्डर के 57% के साथ अग्रणी रही।

    विक्रेताओं को सशक्त बनाने के लिए प्रतिबद्ध, शॉप्सी ने भारत भर से नए स्थानीय विक्रेताओं को सफलतापूर्वक शामिल किया और विक्रेताओं को त्योहारी सीजन की तैयारी के लिए शिक्षित करना जारी रखा, ताकि वे मांग की उच्च लहर का पूरा लाभ उठा सकें। इस मान्यता की भावना को और बढ़ाते हुए, शॉप्सी ने एक सेलर रिवॉर्ड्स प्रोग्राम शुरू किया, जो सभी शॉप्सी श्रेणियों में सबसे अधिक ऑर्डर हासिल करने वाले शीर्ष विक्रेताओं को पुरस्कृत करने के लिए डिज़ाइन किया गया है, जिससे विक्रेताओं के त्योहारी सीजन को सफल बनाने के जबरदस्त प्रयासों को सराहा गया।

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  • छात्रसंघ चुनाव नतीजों का संदेश, जेन जेड मोदी के साथ

    छात्रसंघ चुनाव नतीजों का संदेश, जेन जेड मोदी के साथ


    दिल्ली सहित कई राज्यों में हुए छात्र संघ चुनावों ने एक बार फिर देश की राजनीति के भविष्य की दिशा को लेकर बड़े संकेत दिए हैं। इस बार चुनावी नतीजों में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का दबदबा साफ तौर पर देखने को मिला है जबकि कांग्रेस से जुड़ी एनएसयूआई और वामपंथी दलों की छात्र इकाइयाँ बुरी तरह पिछड़ गईं। छात्र राजनीति को हमेशा से राष्ट्रीय राजनीति की नर्सरी माना जाता रहा है। यही वजह है कि इन नतीजों को केवल छात्र संघ की परिधि में सीमित कर नहीं देखा जा सकता, बल्कि इसका असर आगामी विधानसभा और लोकसभा चुनावों में भी दिखाई देगा। छात्र राजनीति भारतीय लोकतंत्र का एक अहम आधार रही है। आज़ादी के बाद से ही विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में होने वाले छात्र संघ चुनाव के नतीजे यह बताते रहे हैं कि समाज की नई पीढ़ी किस दिशा में सोच रही है। यही कारण है कि एबीवीपी की कामयाबी को भारतीय जनता पार्टी के लिए एक बड़े उत्साहवर्धक संकेत के रूप में देखा जा रहा है। हाल के वर्षों में जिस तरह से बीजेपी ने नई पीढ़ी में अपनी पकड़ मजबूत की है, यह नतीजे उसी अभियान के विस्तार की तरह माने जा रहे हैं।
    कहा जाता है कि विश्वविद्यालय का माहौल समाज का आईना होता है। दिल्ली विश्वविद्यालय जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में एबीवीपी की जीत इस बात की गवाही देती है कि युवाओं में राष्ट्रवादी सोच, सांस्कृतिक गौरव और भारतीय परंपरा के प्रति झुकाव तेजी से बढ़ा है। बीजेपी ने केंद्र की सत्ता में रहते हुए नीतियों और योजनाओं में युवाओं को लगातार प्राथमिकता दी है। स्टार्टअप इंडिया, स्किल इंडिया, डिजिटल इंडिया जैसे कार्यक्रमों ने युवाओं में विश्वास जगाया है कि सरकार उनके भविष्य को लेकर गंभीर है। यही भरोसा छात्र संघ चुनावों में सीधे-सीधे दिख रहा है। दूसरी ओर कांग्रेस और वामपंथी छात्र संगठनों की हालत लगातार कमजोर होती जा रही है। कांग्रेस नेतृत्व पर आरोप है कि वह नई पीढ़ी से संवाद स्थापित करने में नाकाम रही है। पार्टी जिस तरह से युवाओं की आकांक्षाओं और सपनों को समझने में चूक कर रही है, उसका परिणाम छात्र संघ चुनावों में साफ दिख रहा है। एनएसयूआई के पास वैचारिक स्पष्टता का अभाव है और संगठन की ज़मीनी पकड़ लगातार कमजोर हुई है। वामपंथी राजनीति की सबसे बड़ी समस्या यह रही है कि वह पुराने नारों और बोझिल विमर्श की जकड़ से बाहर नहीं निकल पा रही। बढ़ती वैश्विक प्रतिस्पर्धा और आधुनिकता के बीच युवाओं को वामपंथी राजनीति में प्रेरणा कम, निराशा ज्यादा दिखाई देती है।
    इन चुनावों का बड़ा असर राष्ट्रीय राजनीति पर भी पड़ता है। भारतीय जनता पार्टी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नई पीढ़ी को अपने साथ जोड़ने की जिस मुहिम पर काम कर रहे हैं, उसमें ऐसे नतीजे उनके लिए शक्ति गुणन की तरह हैं। एबीवीपी की जीत यह संदेश देती है कि विश्वविद्यालयों में राष्ट्रवादी विचारधारा गहराई से जड़ें जमा रही है और वह आने वाले वर्षों में राजनीतिक तौर पर बीजेपी के लिए बैकअप शक्ति बन सकती है। मोदी का सबसे बड़ा लाभ यह है कि मौजूदा दौर में युवा स्वयं को पार्टी की नीतियों से जुड़ा हुआ महसूस कर रहा है। यह जुड़ाव केवल वोट बैंक की राजनीति तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि समाज में उस सोच की गहराई को बढ़ाएगा जिसे बीजेपी लंबे समय से विकसित कर रही है।कांग्रेस और वामपंथी दलों की हार से यह साफ झलक उभरती है कि उनके लिए आने वाले चुनाव और कठिन होंगे। यदि नई पीढ़ी उनका साथ छोड़ रही है तो यह केवल चुनावी पराजय नहीं, बल्कि उनके वैचारिक आधार को भी खोखला बना देगा। कांग्रेस को जिस तरह से लगातार राज्यों और केंद्र में हार का सामना करना पड़ा है, उसके पीछे एक बड़ी वजह युवाओं का मोहभंग है। अब छात्र संघ चुनावों के ये नतीजे उस प्रवृत्ति को और स्पष्ट कर रहे हैं।
    राजनीति में यह माना जाता है कि जो युवा को साध लेता है, वह भविष्य को साध लेता है। बीजेपी ने संगठित तरीके से एबीवीपी को मैदान में उतारा है और लगातार विश्वविद्यालयों में उसकी पकड़ मजबूत करने का काम किया है। यही वजह है कि आज एबीवीपी छात्र राजनीति की सबसे बड़ी ताकत बन चुकी है। दूसरी तरफ एनएसयूआई और वाम छात्र संगठन बिखरी हुई रणनीति और कमजोर संगठन क्षमता के शिकार हैं। इन चुनाव नतीजों से यह भी साबित होता है कि देश का राजनीतिक मानस परिवर्तन की प्रक्रिया से गुजर रहा है। एक समय था जब दिल्ली विश्वविद्यालय और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय जैसे केंद्र वामपंथी राजनीति के गढ़ माने जाते थे लेकिन आज वही संस्थान बदलते समय का संकेत दे रहे हैं। अब राष्ट्रीयता, सांस्कृतिक गौरव और आत्मनिर्भरता जैसे मुद्दे छात्रों की प्राथमिकता बन चुके हैं। यह बदलाव मोदी युग की राजनीतिक विचारधारा के अनुरूप है। आने वाले वर्षों में बीजेपी को इसका बहुत फायदा मिलेगा। जब ये छात्र पढ़ाई पूरी कर राजनीति, प्रशासन, मीडिया, टेक्नोलॉजी या किसी भी क्षेत्र में जायेंगे तो उनकी सोच और झुकाव भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में काम करेगा। वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस और वामपंथी दलों को भारी नुकसान उठाना पड़ेगा, क्योंकि उनके पास नई पीढ़ी को आकर्षित करने का कोई कारगर तरीका नजर नहीं आ रहा। छात्रसंघ चुनावों के नतीजे यह संदेश दे रहे हैं कि भारत की नई पीढ़ी मोदी और बीजेपी की राह पर बढ़ रही है। यदि यह प्रवृत्ति जारी रहती है तो आगामी लोकसभा चुनाव में बीजेपी की शक्ति और व्यापक होगी जबकि कांग्रेस और वामपंथी दल और किनारे लग जायेंगे।
    अजय कुमार
    वरिष्ठ पत्रकार, लखनऊ
    मो.नं. 9335566111

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  • तेजस्वी के खिलाफ घर वालों की बगावत से भाजपा गदगद

    तेजस्वी के खिलाफ घर वालों की बगावत से भाजपा गदगद


    बिहार की सियासत में इन दिनों सबसे ज्यादा चर्चा का विषय लालू प्रसाद यादव का परिवार बना हुआ है। लम्बे समय से राष्ट्रीय जनता दल में नेतृत्व की बागडोर संभाल रहे तेजस्वी यादव को लेकर एक बार फिर से घर के भीतर खटपट की खबरें सामने आ रही हैं। विपक्षी नेताओं ने इस खटपट को और गहराने का मौका पकड़ लिया है। भाजपा नेता अमित मालवीय ने तो तेजस्वी यादव को राजद का औरंगजेब तक करार दे दिया। उनका आरोप है कि तेजस्वी पहले अपने ही बड़े भाई का राजनीतिक करियर खत्म कर चुके हैं और अब अपने पिता लालू प्रसाद यादव तक को चुप करा दिया है। इस तरह का बयान मिलने के बाद यह सवाल और गहरा गया है कि क्या वाकई लालू परिवार में सब कुछ ठीक नहीं है। तेजस्वी के खिलाफ उनके बड़े भाई तेज प्रताप यादव, बहन मीसा भारती और रोहणी आचार्य तीनों खुलकर बयानबाजी कर रहे हैं। क्या इसका असर बिहार की राजनीति और खास तौर पर आगामी चुनावों में राजद पर पड़ेगा, यह भविष्य की राजनति में छिपा है।
    तेजस्वी यादव, जो लंबे समय तक लालू प्रसाद यादव के सबसे भरोसेमंद वारिस माने जाते रहे हैं, आज पूरी पार्टी की कमान संभाले हुए हैं लेकिन हाल के दिनों में संगठन और परिवार के भीतर से यह खबरें लगातार आ रही हैं कि सब कुछ सामान्य नहीं चल रहा है। लालू परिवार में राजनीतिक वर्चस्व को लेकर पुराने मतभेद कई बार सतह पर आए हैं। तेज प्रताप यादव और तेजस्वी यादव के बीच की तनातनी किसी से छिपी नहीं है। तेज प्रताप कई बार सार्वजनिक मंचों से अपनी उपेक्षा का दर्द बयां कर चुके हैं। कभी कहा गया कि उन्हें पार्टी में सम्मान नहीं मिल रहा तो कभी यह आरोप लगे कि उनकी अनदेखी कर सारी शक्ति धीरे-धीरे तेजस्वी के हाथों में सौंप दी गई है।
    तेज प्रताप यादव के अलावा मीसा भारती भी कई मौकों पर अपने राजनीतिक महत्वाकांक्षा को सामने ला चुकी हैं। मीसा को राजनीति में ज्यादा महत्वपूर्ण भूमिका क्यों नहीं मिल रही, यह सवाल समर्थकों के बीच खड़ा होता रहा है। इस तरह यह साफ है कि लालू परिवार में उत्तराधिकार और नेतृत्व का सवाल हमेशा से भीतर-भीतर तनाव का कारण बना रहा है। आज जब भाजपा जैसे विपक्षी दल लालू परिवार में इस खटपट को उभार रहे हैं और तेजस्वी यादव को औरंगजेब कहकर संबोधित कर रहे हैं तो यह केवल एक राजनीतिक बयान नहीं बल्कि एक गहरे संकट की ओर इशारा भी है। अमित मालवीय का आरोप यह संकेत देता है कि भाजपा आगामी चुनाव में इस परिवारिक विवाद को बड़े मुद्दे के रूप में सामने लाने की तैयारी कर रही है। उन्होंने जिस तरह कहा कि तेजस्वी ने अपने भाई को राजनीतिक रूप से खत्म कर दिया और पिता को जेल के हवाले छोड़ दिया, उसी तरह यह एजेंडा बनाकर जनता तक पहुंचाने का प्रयास किया जा सकता है। बिहार की राजनीति में परिवारवाद का सवाल हमेशा बड़ा मुद्दा रहा है। इस पर हमला कर विपक्ष अपने लिए मौका तलाशता है।
    लालू यादव का प्रभाव अब भी मुस्लिम-यादव समीकरण में गहरा है लेकिन समय के साथ परिस्थितियां बदल चुकी हैं। अब जनता यह भी देख रही है कि जिन नेताओं ने परिवार के नाम पर राजनीति की, उनके भीतर ही असहमति और मतभेद का माहौल क्यों है। राजद के मतदाताओं के सामने यह स्थिति असमंजस पैदा कर सकती है। तेजस्वी यादव की छवि जहां एक युवा और महत्वाकांक्षी नेता की है। वहीं दूसरी ओर उनके भीतर के परिवारिक विवाद विपक्ष के लिए मजबूत हथियार बनते जा रहे हैं। तेजस्वी यादव ने अब तक इस विवाद पर खुलकर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। वे अपनी राजनीतिक यात्राओं और अभियानों में लगे हुए हैं लेकिन पार्टी के भीतर यह असंतोष धीरे-धीरे और गहराता जा रहा है। संगठन के कई पुराने नेता भी निजी बातचीत में स्वीकार करते हैं कि अगर परिवारिक संघर्ष सार्वजनिक रूप से और बढ़ा तो इसका नुकसान पार्टी को चुनावी मैदान में भुगतना पड़ेगा। यह नुकसान खासकर उन इलाकों में झेलना पड़ सकता है जहां राजद का सामाजिक आधार कमजोर हो चुका है या फिर जहां भाजपा और जदयू ने पैठ बना ली है।
    लालू यादव का स्वास्थ्य और उनकी उम्र भी इस समय एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है। जेल की सजा और बीमारी के चलते लालू यादव अब सक्रिय राजनीति से दूर हैं। ऐसे में जो भूमिका पहले वे परिवार और पार्टी दोनों को एकजुट रखने के लिए निभाते थे, वैसी स्थिति आज नहीं रही। लालू प्रसाद यादव का राजनीतिक करिश्मा परिवार को जोड़े रखने का बड़ा सहारा था लेकिन आज वही संतुलन टूटता नजर आ रहा है। इस खालीपन में तेजस्वी यादव अपनी ताकत तो बढ़ा रहे हैं परंतु दूसरी ओर भाई-बहनों और यहां तक कि संगठन के भीतर एक वर्ग उपेक्षित महसूस कर रहा है। बिहार में चुनावी राजनीति पूरी तरह से समीकरण आधारित होती है। यादव-मुस्लिम मतों के साथ अन्य पिछड़ी जातियों और दलितों का समर्थन जीतने की जद्दोजहद हर चुनाव में होती है। यदि लालू परिवार में झगड़े की खबरें ज्यादा उभरें और विपक्ष इसका प्रचार करे तो इससे राजद के परंपरागत मतदाता भी कमजोर पड़ सकते हैं। मतदाता यह सोचने लग सकते हैं कि अगर परिवार ही एकजुट नहीं है तो पूरी पार्टी कैसे स्थिर नेतृत्व दे पायेगी।
    राजद के अंदरूनी संकट का फायदा भाजपा और जदयू जमकर उठाने की कोशिश करेंगे। तेजस्वी यादव भले ही मजबूत नेता के रूप में उभर रहे हों, लेकिन परिवार और संगठन के भीतर का यह मतभेद उनका सबसे बड़ा दुर्बल पक्ष बनता जा रहा है। चुनाव में जनता जब समर्थन देती है तो वह केवल नेता की छवि ही नहीं, बल्कि संगठन और उसके आंतरिक हालात को भी ध्यान में रखती है। ऐसे में अगर लालू परिवार में अनबन की खबरें लगातार सामने आती रहीं तो इसका सीधा असर राजद की सीटों पर पड़ेगा। इस समय भाजपा और उनके नेता पूरी तरह इस रणनीति पर काम कर रहे हैं कि लालू परिवार में जो भी दरार है, उसे जनता के बीच और बड़े मुद्दे के रूप में परोसा जाए। यही कारण है कि अमित मालवीय जैसे नेता तेजस्वी को औरंगजेब कहकर संबोधित करने से भी नहीं झिझक रहे हैं। यह कहानी केवल राजनीतिक बयानबाजी नहीं, बल्कि चुनावी लड़ाई की पूर्वभूमि है।
    अगर तेजस्वी यादव समय रहते परिवार के भीतर के इस असंतोष को सुलझा नहीं पाए तो यह संभव है कि आगामी बिहार चुनाव में राजद को भारी नुकसान उठाना पड़े। मतदाताओं का विश्वास टूट सकता है और विपक्ष को एक बड़ा मुद्दा मिल सकता है। राजद के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह विपक्ष को इस परिवारिक अनबन पर हमला करने का मौका न दे। लेकिन हालात जिस तरह से बन रहे हैं, उस पर काबू पाना आसान नहीं होगा। राजद का सामाजिक आधार अब भी मजबूत है और तेजस्वी की लोकप्रियता युवाओं में अच्छी है लेकिन परिवारिक विवाद को लेकर जनता के बीच अगर यह धारणा बन गई कि नेतृत्व केवल वर्चस्व की लड़ाई में उलझा है तो यह राजद को बिहार की चुनावी जंग में नुकसान पहुंचा सकता है। यही वजह है कि आज अमित मालवीय के बयान ने इस मुद्दे को और भी ज्यादा तूल दे दिया है और इसका असर सीधे-सीधे चुनावी राजनीति में देखने को मिल सकता है।
    संजय सक्सेना
    वरिष्ठ पत्रकार लखनऊ
    मो.नं. 9454105568

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    600 बीमारी का एक ही दवा RENATUS NOVA

  • चुनावी मौसम में उकसावे की राजनीति: यूपी को चाहिए चौकन्नी नजर

    चुनावी मौसम में उकसावे की राजनीति: यूपी को चाहिए चौकन्नी नजर


    सुरेश गांधी
    बदलते राजनीतिक मौसम में योगी आदित्यनाथ और उनकी प्रशासनिक टीम को वही कर दिखाना होगा जिसके लिए वे पहचाने जाते हैं। चौबीसों घंटे सतर्क रहना, हर अफ़वाह की जड़ तक पहुंचना और किसी भी साजिश को जन्म लेने से पहले ही खत्म करना। मतलब साफ है यूपी की शांति केवल कानून की सख्ती से नहीं, बल्कि समय रहते उठाए गए इन ठोस कदमों से सुरक्षित रह सकती है। यही वह संदेश है जो इस संवेदनशील दौर में सरकार, प्रशासन और जनता तीनों को आत्मसात करना चाहिए। यूपी ने अतीत में कई बार साबित किया है कि समय रहते की गई कार्रवाई बड़े संकट को टाल सकती है। बारावफ़ात जुलूसों को लेकर उपजे हालात फिर यही कह रहे हैं, “सतर्क रहना ही सबसे बड़ी सुरक्षा है।” सरकार को चाहिए कि जिला और राज्य स्तर पर खुफ़िया, पुलिस और नागरिक समाज की साझी रणनीति तुरंत लागू करे। आस्था के उत्सव को उन्माद बनने से रोकना प्रशासन का ही नहीं, बल्कि समाज के हर वर्ग का दायित्व है। आस्था को उन्माद में बदलने से किसी को लाभ नहीं, नुकसान सबका है। ताक़त का असली मतलब कानून मानते हुए समाज में भरोसा और भाईचारा बढ़ाना है।
    बिहार चुनाव के मद्देनज़र देश भर में राजनीतिक गर्मी बढ़ना स्वाभाविक है, पर यह किसी भी तरह साम्प्रदायिक तनाव या हिंसा में न बदले, यह सुनिश्चित करना सरकार और समाज दोनों का कर्तव्य है। खासकर इसकी आवश्यकता तब और बढ़ जाती है जब यूपी के कई जिलों में बारावफ़ात पर “आई लव मोहम्मद” पोस्टर और अचानक निकले जुलूसों से लोगों में भय का माहौल नजर आने लगा हो। कानपुर से शुरू हुई हलचल अब उन्नाव, बरेली, लखनऊ, महाराजगंज, भदोही और वाराणसी तक गूंज रही है। वाराणसी के दालमंडी और जैतपुरा जैसे इलाक़ों में भी युवाओं ने जुलूस निकालने का प्रयास किया जिसे प्रशासन ने तुरंत रोका।
    घटनाएं भले ही स्थानीय स्तर पर दिख रही हों लेकिन उनका फैलाव प्रदेश-भर में तेज़ है और यही सरकार व पुलिस-प्रशासन के लिए चेतावनी की घंटी है। हालांकि समय रहते मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सुरक्षा एजेंसियों को चौकन्ना कर दिया है। खुफ़िया तंत्र को पूरी तरह अलर्ट मूड में रखा हैं। प्रशासन हर ऐतिहाती कदम उठा रहा है, फिर भी सतर्कता बनाये रखना है और हर भड़काऊ गतिविधि पर तुरंत रोक लगानी ही होगी। सतर्कता ही वह कवच है जो चुनावी मौसम की गर्मी को समाज की शांति पर असर डालने से रोक सकता है। यही संदेश जनता, सरकार और राजनीतिक दलों, सभी के लिए समय की मांग है।
    यहां जिक्र करना जरुरी है कि बिहार चुनाव की आहट के साथ देश का राजनीतिक तापमान बढ़ रहा है। सोशल मीडिया पर उकसावे भरे संदेश, कुछ राजनीतिक मंचों से आए असंयमित वक्तव्य और कई शहरों में अचानक भीड़ इकट्ठा होने की घटनाएं उत्तर प्रदेश जैसे विशाल और संवेदनशील राज्य के लिए चेतावनी हैं। या यूं कहे कई जिलों में हाल के दिनों में कुछ धार्मिक अवसरों पर अचानक भीड़ जुटने और बिना अनुमति जुलूस निकालने जैसी घटनाएं प्रशासन के लिए संकेतक हैं। ये घटनाएं भले ही अलग-अलग शहरों में हुई प्रतीत हों परंतु उनका पैटर्न एक जैसा है, सोशल मीडिया पर तेजी से फैलती अपीलें, युवाओं का उत्साह और बिना सूचना के सार्वजनिक प्रदर्शन। ऐसे में सरकार और सुरक्षा एजेंसियों को समय रहते सतर्क रहना और हर पहलू की गहन जांच करना अनिवार्य है। यह अलग बात है कि देश के सबसे लोकप्रिय मुख्यमंत्रियों में शुमार योगी आदित्यनाथ और उनका प्रशासनिक तंत्र पहले भी कानून-व्यवस्था संभालने के लिए जाना जाता है लेकिन बदलते हालात में चौबीसों घंटे अलर्ट मोड ही राज्य की शांति का सबसे बड़ा सहारा है, क्योंकि अल्प समय में कई शहरों में एक जैसी घटनाएं दिखीं, बड़ा संदेश देती हैं, यह महज़ संयोग नहीं हो सकता।

    चुनावी मौसम में बढ़ती उकसावे की राजनीति
    बिहार में मतदान तिथियों की घोषणा का इंतजार और उससे पहले राजनीतिक बयानबाज़ी की गर्मी। कुछ जनसभाओं में नेताओं द्वारा असंयमित भाषा और सोशल मीडिया पर वायरल क्लिप्स से आमजन में तनाव का खतरा। ऐसी स्थितियों में पड़ोसी और देश के सबसे बड़े राज्य यूपी पर स्वाभाविक रूप से सबकी निगाह। भला क्यों नहीं 25 करोड़ की आबादी, सबसे अधिक संसदीय सीटें और धार्मिक-सांस्कृतिक विविधता। बिहार से भौगोलिक निकटता और सामाजिक रिश्तों के कारण यहां माहौल भड़काने की कोशिशें तेज़ हो सकती हैं। अतीत ने दिखाया है कि चुनावी मौसम में बाहरी तत्व अफ़वाह और उकसावे का सहारा लेकर प्रदेश की शांति भंग करने का प्रयास कर सकते हैं। ऐसे में सरकार यदि अभी से अपनी आंख, कान और नाक पूरी तरह खुले रखे तो न केवल प्रदेश की सुरक्षा सुनिश्चित होगी, बल्कि शांति और सद्भाव की वह मिसाल कायम होगी जिसकी आज पूरे देश को ज़रूरत है।

    योगी सरकार से अपेक्षा: बहुस्तरीय सतर्कता
    1. खुफ़िया तंत्र की सक्रियता: सोशल मीडिया की चौकसी, अफ़वाह फैलाने वाले ग्रुप्स पर नज़र। ज़िला व राज्य स्तर पर रियल टाइम सूचना साझा करने की मजबूत व्यवस्था।
    2. प्रशासनिक समन्वय: हर जिले में शांति समिति की नियमित बैठकें, स्थानीय नेताओं और नागरिक समाज को भरोसे में लेना। संवेदनशील इलाक़ों में तैनाती और कानून का सख्त पालन।
    3. कानूनी कार्रवाई में तेजी: भड़काऊ भाषण या फर्जी वीडियो फैलाने वालों पर तुरंत मुकदमा और गिरफ्तारी। अदालतों में फास्ट-ट्रैक सुनवाई ताकि डर का असर तुरंत दिखे।

    मुख्यमंत्री की छवि और जिम्मेदारी
    योगी आदित्यनाथ को जनता “कठोर लेकिन न्यायपूर्ण” प्रशासन के लिए पहचानती है। यह छवि केवल कानून लागू करने से नहीं, बल्कि समय रहते खतरों को भांपकर रोकने से बनी है। “ज़ीरो टॉलरेंस” की नीति अब डिजिटल युग के अनुरूप और मजबूत करनी होगी। चुनावी मौसम में उकसावे और अफ़वाहों का जवाब तेज़ और सटीक कार्रवाई से देना ही उनकी नेतृत्व शैली का स्वाभाविक विस्तार होगा।

    राजनीति से ऊपर शान्ति की प्राथमिकता
    सत्ता या विपक्ष, किसी भी दल को भड़काऊ भाषणों से लाभ नहीं होना चाहिए। मुख्यमंत्री को सभी दलों के साथ सर्वदलीय संवाद की पहल करनी चाहिए ताकि स्पष्ट संदेश जाए: कानून-व्यवस्था से समझौता किसी कीमत पर नहीं होगा।

    मीडिया और नागरिक समाज की भूमिका
    जिम्मेदार पत्रकारिता अफ़वाहों को रोक सकती है। नागरिक संगठनों और युवाओं को शांति और सौहार्द बनाए रखने में साझेदार बनाया जाए। पत्रकारिता का कर्तव्य है कि सनसनी से दूर रहकर तथ्यों पर आधारित जानकारी दे। नारे, अफ़वाह या अधूरी क्लिप्स से आग भड़क सकती है। ज़िम्मेदार रिपोर्टिंग प्रशासन को मदद पहुंचा सकती है, उलटा दबाव नहीं।

    बदलती परंपरा, बदलती चुनौतिया
    बारावफ़ात यानी ईद-ए-मिलादुन्नबी सदियों से आस्था और श्रद्धा का पर्व रहा है। पारंपरिक मिलाद, गरीबों को दान, मस्जिदों में सामूहिक दुआ इसकी पहचान रहे हैं लेकिन स्मार्टफोन और सोशल मीडिया के दौर में उत्सव का स्वरूप बदल रहा है। “ट्रेंड” बनाने की होड़, वायरल पोस्टर और लाइव प्रसारण का आकर्षण कई बार कानून-व्यवस्था को चुनौती देने लगता है।

    सोशल मीडिया का असर
    कानपुर की एक घटना का वीडियो चंद घंटों में पूरे प्रदेश में फैल गया। इंस्टाग्राम और शॉर्ट वीडियो प्लेटफॉर्म पर “आई लव मोहम्मद” हैशटैग के साथ हज़ारों पोस्ट दिखाई देने लगे। नतीजा: युवाओं में उत्साह के साथ-साथ समूह में शक्ति प्रदर्शन की भावना भी जाग उठी। यह दिखाता है कि किसी भी धार्मिक आयोजन में डिजिटल प्लेटफॉर्म कितनी तेजी से जनभावनाओं को भड़का या दिशा दे सकते हैं।

    प्रशासन की सख्ती और सबक
    कई जिलों में पुलिस ने त्वरित कार्रवाई कर अनधिकृत जुलूस रोके, धारा 144 लागू की और शांति समिति की बैठकें कीं। वाराणसी में समय रहते कदम न उठाए जाते तो संकरी गलियों और भीड़भाड़ वाले इलाकों में स्थिति बिगड़ सकती थी। यह प्रशासनिक सतर्कता सराहनीय है लेकिन यह भी संकेत है कि यदि तैयारी देर से होती तो नुकसान बड़ा हो सकता था।

    राज्य-स्तरीय रणनीति की जरूरत
    घटनाएं अब केवल जिला-स्तरीय नहीं रहीं। जब एक ही पैटर्न कई शहरों में दिख रहा है तो यह प्रदेश-व्यापी समन्वय की मांग करता है। खुफ़िया निगरानी: सोशल मीडिया मॉनिटरिंग को और तेज़ करने की ज़रूरत है। समन्वय तंत्र: ज़िले-ज़िले के पुलिस प्रमुख और खुफ़िया इकाइयां एक साझा रियल-टाइम प्लेटफ़ॉर्म पर जुड़ी हों। धार्मिक नेतृत्व से संवाद: इमामों और समाजसेवियों को भरोसे में लेकर स्पष्ट संदेश, आस्था का सम्मान परंतु कानून का उल्लंघन नहीं।

    राजनीति से परे सुरक्षा
    किसी भी घटना को चुनावी चश्मे से देखना खतरनाक है। धार्मिक भावना को राजनीतिक लाभ के लिए भुनाने की प्रवृत्ति रोकना उतना ही महत्वपूर्ण है जितना जुलूसों को नियंत्रित करना। सरकार को चाहिए कि इस मसले पर सभी दलों को साथ लेकर एक साझा शांति-अपील जारी करे।

    असली खतरा: भड़काने वाले
    इतिहास गवाह है कि किसी भी बड़े उपद्रव की जड़ में चंद लोग ही होते हैं जो भीड़ की भावनाओं को भड़काकर हालात बिगाड़ते हैं। ये लोग अक्सर परदे के पीछे रहते हैं, कभी धार्मिक उत्साह का सहारा लेते हैं तो कभी राजनीतिक फायदे का। सरकार के लिए सबसे ज़रूरी है कि ऐसे भड़काने वालों की पहचान की जाए और उन्हें कानूनी दायरे में लाया जाए। ऐसी घटनाओं को रोकने में खुफ़िया एजेंसियों की समय पर मिली जानकारी ही सबसे कारगर हथियार है।

    प्रशासन की प्राथमिकताएं
    1. पूर्वानुमान आधारित सुरक्षा: हर बड़े धार्मिक कार्यक्रम से पहले संभावित हॉटस्पॉट इलाकों का जोखिम आकलन। 2. शांति समिति बैठकें: नागरिक समाज, धर्मगुरु, स्थानीय संगठनों से संवाद कर शांति का संदेश। 3. कानून का सख्त पालनः बिना अनुमति किसी भी जुलूस या सभा पर त्वरित कार्रवाई।

    राजनीति से ऊपर उठकर निर्णय
    अक्सर ऐसी घटनाओं का राजनीतिक रंग चढ़ जाता है लेकिन कानून-व्यवस्था केवल प्रशासनिक विषय है, इसमें किसी भी दल या विचारधारा की नहीं, बल्कि जनता की सुरक्षा की चिंता सर्वोपरि होनी चाहिए। सभी राजनीतिक दलों को चाहिए कि ऐसे समय बयानबाज़ी से बचें और सरकार की रोकथाम कोशिशों में सहयोग दें।

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  • भारत में हिन्दू पूर्वजों के मतांतरित

    भारत में हिन्दू पूर्वजों के मतांतरित


    मुस्लिम एक कौम के रूप में इजरायल का विरोध व महान क्रेट संस्कृति से मतांतरित फिलीस्तीनी मुसलमानों का समर्थन करते हैं। भारतीय मुसलमानों ने अल्लामा इक़बाल के द्वि-राष्ट्र दर्शन “कौमें मजहब से बनती हैं” से प्रभावित होकर ‘राष्ट्र’ के बजाय ‘कौम’ को महत्व देकर अपने मजहबी हमास द्वारा अरबी विचारधारा के अनुरूप 7 अक्टूबर 2023 को हमासी जिहादियों द्वारा इजराइल में की गई कार्यवाही का समर्थन करना उचित समझा। हमास अथवा फिलीस्तीन मुसलमानों【वर्तमान में फिलिस्तीन के निम्न श्रेणी‌ मुस्लिम, इसके पहले ईसाई और इससे भी पूर्व अपनी मूल क्रेट वाली महान फिलिस्तीनी संस्कृति】की जो स्थिति है, वहीं भारतीय उपमहाद्वीप के मुसलमानों【वर्तमान मध्ययुगीन अरबी संस्कृति व पूर्व की मूल महान सनातन संस्कृति】की है।
    800 ईसा पूर्व यहूदियों का फिलिस्तीन में आखिरी राज जूडिया समाप्त हो गया, उन्हें अपना देश छोड़ना पड़ा और इसके बाद न यहूदियों का दुनिया में कोई राज्य रहा, न अपनी मातृभूमि में ही वह बस सके। वे दुनिया भर में राजनीतिक सत्ताविहीन, देश विहीन शरणार्थियों के लिए घूमते रहे और निकाले जाते रहे। यहूदी विश्व में दर-दर भटकने लगे। यहूदियों का इतिहास आंसुओं, आहों और दर्दों का इतिहास रहा। यह वह साझा इतिहास, साझा संस्कृति, साझा जीवन अनुभव, पूर्वजों को एक मानना या साझा पूर्वज, कैई पीढ़ी साथ झेले दुःख और समान विश्वास, साझा मातृभूमि और साझा चिंतन की प्रक्रिया थी, जिसने इजरायल की छोटी-छोटी जातियों, उप-जातियों, कबीलों और खानदानों को मथकर ‘एक लोग के रूप में’ बदल दिया।
    ‘यही साझा जीवन की अनुभूति और ध्येय उद्देश्य की एकता’ ने 1948 में फिर हजारों वर्षों के बाद उन्हें इजरायल में यहूदी राज्य की स्थापना की ओर खींच लाई और उन्हें एक लोग के रूप में सदियों तक बांधे रखा। चाहे उनके पास राजनीतिक सत्ता और कोई निश्चित भूभाग बसावट के लिए रहा या न रहा। इजराइल में बसने के बाद इजराइली तथा क्रेट से आए फिलिस्तीनी एक दूसरे में आत्मसात न कर सके और बराबर लड़ते रहे। मुख्य बात यह है कि फिलिस्तीनी धीरे-धीरे अपने मूल क्रेट सांस्कृतिक पहचान को खो बैठे, उनकी क्रेट संस्कृति समाप्त हो गई और वे पहले इसाई फिर इस्लाम मजहब ग्रहणकर एक तरह से अरब इस्लामिक जगत के अंग बन गये।
    इस तरह क्रेट अपनी उच्च संस्कृति खोकर एक निम्न श्रेणी की संस्कृति को अपना बैठे और उस संस्कृति (इस्लाम) में भी उन्हें एक निम्न स्थान मिला। मुस्लिम फिलिस्तीनियों ने खुद ही अपनी क्रेट वाली फिलिस्तीनी संस्कृति को मिटाना शुरू कर दिया और स्वयं भी एक कौम की हैसियत से मिट गए। आज दुनिया में कोई नहीं जानता कि फिलिस्तीनी कभी एक महान संस्कृति थी परन्तु यहूदी संस्कृति और यहूदियों का एक लोग के रूप में अन्त नहीं हुआ। उन्होंने अपनी संस्कृति को बराबर बनाए रखा और उस संस्कृति द्वारा दिया गया ज्ञान, विज्ञान और कला बराबर दुनिया में फैलाते रहे। यही उनकी पहचान थी। यहूदी धर्म ने दुनिया को एक दर्शन, नैतिकता के नियम और राज्य व्यवस्था के आधार दिये।
    पूर्व में यहूदियों को सांस्कृतिक रूप से समाप्त कर सदैव के लिए मुस्लिम राज्य बना लेने के उद्देश्य से भारी संख्या में अरबों को वहां बसाया जाने लगा। इसके साथ यहूदियों को कत्ल करना, गुलाम के रूप में बेचना और बलपूर्वक मुसलमान बनाना और यहुदी धार्मिक स्थलों को मस्जिदों में परिवर्तित करना प्रारंभ हो गया। टेंपल माउंट नामक प्रसिद्ध यहूदी धर्मस्थल में नमाज पढ़ना शुरू कर दिया गया। इस तरह यहूदियों के पवित्र शहर जैरूसलम को मुसलमानों ने भी अपना पवित्र शहर घोषित कर प्रसिद्ध मस्जिदों अल अक्सा एवं डोम आफ द रौक का निर्माण कराया। इस समय तक अर्थात ईसा की पहली सदी से ईसा का जन्म स्थल होने के कारण जैरूसलम ईसाइयों का भी पवित्र स्थान बन चुका था। अतः यहूदियों के साथ ईसाइयों को भी मुसलमानों के मजहबी अत्याचार का शिकार होना पड़ा।
    इजरायल में जैरूसलम यहूदी, ईसाई और मुसलमान तीनों का धार्मिक स्थल है परंतु न ईसाइयों ने इसे ही अपनी मातृभूमि के रूप में माना और न मुसलमानों ने ही उसे मातृभूमि के रूप में स्वीकार किया। पर मतांतरित फिलिस्तीनी मुसलमान एक छोटे से भाग पर अपना दावा कर रहे हैं जिसे गाजा पट्टी कहते हैं। निरंतर युद्धों की समस्या से बचने के लिए ईसाई अपने धार्मिक केंद्र को ही जैरूसलम से उठाकर वैटिकन सिटी रोम ले गए और वे भूल गए कि जैरूसलम और बैथेलम उनके आराध्य देव ईसा का जन्मस्थल है। आश्चर्यजनक रूप से मुसलमानों ने भी अपने पवित्रतम स्थलों में मक्का मदीना को प्रथम स्थान दे दिया जिनकी मस्जिदें अल अक्सा के बाद बनी थी।
    अल-अक्सा मस्जिद को मक्का मदीना के बाद इस्लाम में तीसरा पवित्र स्थान माना जाता है। 35 एकड़ में फैले इस परिसर को मुस्लिम अल-हरम-अल-शरीफ कहते हैं। यहूदी इसे टेंपल टाउन कहते हैं। वहीं ईसाइयों का मानना है कि यहीं ईसा मसीह को सूली पर लटकाया गया था। इसके बाद वो यहीं अवतरित हुए थे। इसी के भीतर ईसा मसीह का मकबरा है। यहूदियों का सबसे पवित्र स्थल डोम ऑफ द रोक भी यहीं स्थित है। ऐसे में इस स्थान को लेकर वर्षों से यहूदियों और फिलिस्तिनियों के मध्य विवाद जारी है।
    उल्लेखनीय है कि इंडोनेशिया ने किन्हीं परिस्थितिवश इस्लाम मज़हब को तो अपनाया परंतु अपनी महान सनातन संस्कृति का कदापि परित्याग नहीं किया। जिस कारण उनकी निष्ठा अरब/मुस्लिम देशों से न होकर स्वराष्ट्र में ही निहित है। दूसरी ओर अपनी मूल संस्कृति के परित्याग करते ही मतांतरितों की निष्ठा अपने आश्रयदाता राज्यों की जगह अरब व इस्लामिक देशों से जुड़ कर राष्ट्रांतरण हो जाता है। भले ही क्रेट फिलीस्तीन ने किन्हीं कारणों से इस्लाम मज़हब अपना लिया हो परंतु समय की मांग है कि उन्हें अपनी मूल महान क्रेट संस्कृति को आत्मसात करके यहूदियों के साथ सह-अस्तित्व में रहकर आत्म उन्नति व अपने बच्चों का भविष्य सुखमय कर सकेंगे, अन्यथा ये मतांतरित मुस्लिम अपनी पूर्व मूल संस्कृति को आत्मसात किये बिना स्वयं व विश्व के लिए समस्या ही बने रहेंगे।
    संकलनकर्ता व लेखक
    जयकिशन करनवाल, मेरठ (उ.प्र.)।
    पूर्व प्रचारक हिन्दू राईटर’स फोरम, नई दिल्ली।

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  • आईसीसी से जुड़ा भारत इसलिये पाक से निभाता है क्रिकेट रिश्ते

    आईसीसी से जुड़ा भारत इसलिये पाक से निभाता है क्रिकेट रिश्ते

    अभी कुछ दिनों पूर्व दुबई में खेले गए एशिया क्रिकेट कप के एक मैच में भारत ने पाकिस्तान को बुरी तरह से रौंद दिया था। वैसे यह पहली बार नहीं हुआ था। ज़्यादातर मौकों पर भारत अपने दुश्मन देश को जंग के मैदान से क्रिकेट के मैदान तक में पटकनी देता रहता है। भारत और पाकिस्तान के बीच कई बार उस समय हॉकी से लेकर क्रिकेट तक के अंतरराष्ट्रीय स्तर के मुकाबले होते रहे थे, जब दोनों देशों की सीमाओं पर तनाव या जंग जैसे हालात रहे थे। पूर्व में चाहे कांग्रेस की सरकार रही हो या फिर आज मोदी की सरकार, कोई इन अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों से किनारा नहीं कर सकती है। यह बात सब जानते और समझते हैं, लेकिन कुछ कथित बुद्धिजीवी और विपक्ष के नेता एशिया कप में भारत-पाक के बीच के मुकाबले ही आड़ लेकर मोदी सरकार को देश विरोधी साबित करने में लगे हैं। इसके लिए जनता को भड़काया जा रहा है। जबकि हकीकत यह है कि भारत एशिया कप में पाकिस्तान के खिलाफ खेलने के लिए बाध्य था, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंटों में भाग लेना किसी भी क्रिकेट बोर्ड की जिम्मेदारी और समझौते का हिस्सा है। यदि भारत खेलने से इंकार करता तो कई स्तरों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता जिसमें आर्थिक, राजनैतिक और खेल जगत की प्रतिष्ठा प्रभावित होती। इस मुद्दे पर भारत में विरोध मुख्यतः राजनीतिक है, पर इसके पीछे आर्थिक, कूटनीतिक और खेल प्रबंधन की मजबूरियां भी हैं।
    एशिया कप जैसा टूर्नामेंट इंटरनेशनल क्रिकेट काउंसिल (आईसीसी) और एशियन क्रिकेट काउंसिल (एसीसी) द्वारा आयोजित होता है जिसमें सदस्य देशों को अपनी टीम भेजनी पड़ती है और पूरे मैच शेड्यूल का पालन करना होता है। अगर भारत भाग नहीं लेता या पाकिस्तान के साथ खेलने से इंकार करता तो भारत को टूर्नामेंट से बाहर कर दिया जाता और भविष्य के आईसीसी इवेंट्स में भारत की भागीदारी पर सवाल उठते। वहीं आर्थिक दृष्टि से, भारत-पाक मैच सबसे अधिक आकर्षण पैदा करता है जिससे ब्रॉडकास्टिंग, स्पॉन्सरशिप और रेवेन्यू में भारी नुकसान होता। भारत की छवि वैश्विक क्रिकेट जगत में नकारात्मक होती और आईसीसी सख्त कदम उठाता, जैसे जुर्माना या बैन।
    यह भी नहीं भूलना चाहिए कि भारत-पाक मैच सबसे बड़े दर्शक संख्या, हाईएस्ट टीवी रेटिंग्स और स्पॉन्सरशिप डील्स का केंद्र है। भारत के न खेलने से आईसीसी और एसीसी को करोड़ों रुपये का नुकसान होता। आईसीसी में भारत की वित्तीय हिस्सेदारी घट जाती। अन्य टेलीविजन नेटवर्क और ब्रॉडकास्टर्स को री-नेगोशिएशन करनी पड़ती। दरअसल इस बात को भुलाया नहीं जा सकता कि खेल प्रतियोगिताओं को लेकर भारत का रुख साफ है। पाकिस्तान से द्विपक्षीय मैच नहीं परंतु बहुपक्षीय टूर्नामेंट्स में सरकार की अनुमति से खेलना ही पॉलिसी है। द्विपक्षीय सीरीज या पाक में टूर्नामेंट की बीजेपी/सरकार इजाजत नहीं देती परंतु एशिया कप, वर्ल्ड कप जैसे टाइटल्स में भाग लेना ज़रूरी है, ताकि भारत की क्रिकेट रणनीति, रेपुटेशन और ग्लोबल पोजिशन सुरक्षित रहे।
    बहरहाल भारत में इस मैच को लेकर भारी विरोध प्रदर्शनों और राजनीतिक बयानबाजी की लहर देखी गई। प्रमुख विपक्षी दलों से लेकर राजनीतिक संगठनों आम आदमी पार्टी, शिवसेना, कांग्रेस आदि विरोध में सड़क पर उतर आये। पाक क्रिकेटर्स के पुतले जलाये गये। सुप्रीम कोर्ट तक याचिका गई कि राष्ट्रहित से ऊपर नहीं है क्रिकेट। यह कहना गलत नहीं होगा कि आज की तारीख में सीमा पार आतंकी घटनाओं के बाद आम भारतीय जनमानस में पाकिस्तान के खिलाफ मैच ही विरोध का प्रतीक बन गया है। स्पोर्ट्स को भावनात्मक तौर पर देखा जाता है। परिवारों, फौजी समुदाय और युवा वर्ग में मैच बहिष्कार की आवाज तेज हो जाती है। यही वजह है कि “राष्ट्रभक्ति बनाम रुपया” की बहस अब तक जारी है जबकि केंद्र सरकार और बीसीसीआई बहुपक्षीय टूर्नामेंट्स में राजनीतिक दिशा-निर्देश का पालन करते हुए खेलने को मजबूर हैं। वहीं द्विपक्षीय खेल मुकाबलों में खेल अधिनियम के तहत बीसीसीआई और खेल मंत्रालय का तालमेल जरूरी है।
    कुल मिलाकर भारत-पाक क्रिकेट विवाद राजनीति की रणभूमि बन चुका है परंतु “खेल” की मजबूरी ऐसी है कि भारत आईसीसी या एसीसी के सामने पूरी तरह से मैच से पीछे नहीं हट सकता। भारत का न खेलना खिलाड़ियों के करियर, निवेश और अगले वर्ल्ड इवेंट्स पर असर डालता। विरोध राजनीतिक है परंतु पर्दे के पीछे खेल एवं आर्थिक हित ज्यादा ताकतवर हैं। इस मैच का विरोध भारत में कूटनीतिक और भावनात्मक स्तर पर है लेकिन भारत को खेलने की मजबूरी उसकी अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धता, वित्तीय निवेश और खेल प्रबंधन के कारण है। यदि भारत इनकार कर देता तो भारी वित्तीय नुकसान, अंतरराष्ट्रीय सजा और भारत की क्रिकेट प्रतिष्ठा पर सवाल खड़े होते।
    अजय कुमार
    वरिष्ठ पत्रकार लखनऊ
    मो.नं. 9335566111

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  • योगी राज में दूरी और असुरक्षा से सहमी महिला शिक्षक

    योगी राज में दूरी और असुरक्षा से सहमी महिला शिक्षक

    संजय सक्सेना
    वरिष्ठ पत्रकार लखनऊ
    मो.नं. 9454105568
    उत्तर प्रदेश में शिक्षकों की तबादला नीति और उससे जुड़ी जटिलताओं पर लंबे समय से बहस जारी रही थी। सरकार द्वारा बार‑बार नए आदेश जारी किए जा रहे थे किन्तु शिक्षकों की समस्याओं का समाधान नहीं निकल पा रहा था। विशेषकर महिला शिक्षिकाओं के लिए यह मुद्दा किसी बोझ से कम नहीं माना जा रहा था। दूरस्थ स्थानों पर नियुक्ति, परिवार से दूरी, परिवहन की कठिनाइयाँ और कार्यस्थल पर अपेक्षित सुविधाओं का अभाव उनके जीवन को और कठिन बना देता था। राज्य में यह कहा जा रहा था कि शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने और विद्यालयों में शिक्षकों का संतुलित वितरण सुनिश्चित करने के लिए तबादला नीति बनाई गई थी परंतु जब उसका क्रियान्वयन हुआ तो उसमें पारदर्शिता की कमी और पक्षपात के आरोप लगे। जिन शिक्षकों को पास में नियुक्ति की अपेक्षा थी, वे कई बार सैकड़ों किलोमीटर दूर भेज दिए गए। ग्रामीण क्षेत्रों में कार्यरत शिक्षक यह कहा करते थे कि विद्यालयों तक पहुँचना स्वयं एक बड़ी चुनौती थी। सड़कें जर्जर रहती थीं और परिवहन के साधन सीमित होते थे।
    महिलाओं के लिए यह कठिनाई और बढ़ जाती थी। विवाहित महिला शिक्षिकाएं परिवार और नौकरी के बीच संतुलन बनाने में असमर्थ हो रही थीं। बच्चों की पढ़ाई, बुज़ुर्गों की देखभाल और घरेलू ज़िम्मेदारियों के बीच यदि किसी दूरस्थ गाँव में नियुक्ति हो जाती थी तो दैनिक जीवन कष्टमय हो जाता था। कई बार यह सुनने में आता था कि महिला शिक्षिकाएँ सुरक्षा कारणों से अकेले विद्यालय तक जाने में आशंकित रहती थीं। अनेक महिला शिक्षिकाएँ यह अनुभव कर रही थीं कि यदि विद्यालय तक जाने के लिए बस या साझा सवारी उपलब्ध न हो तो सुबह‑सुबह घर से निकलकर शाम को अंधेरा होने के बाद लौटना बहुत असुरक्षित लगता था। कुछ प्रकरणों में यह बताया जा रहा था कि अभिभावक और परिवारजन स्वयं महिलाओं को रोज़ाना विद्यालय तक पहुँचाने और वापस लाने के लिए बाध्य हो रहे थे। यह बोझ पूरे परिवार के जीवन को प्रभावित करता था।
    जब शासन की ओर से यह घोषणा की गई थी कि तबादला नीति के माध्यम से शिक्षकों को उनकी प्राथमिकता दी जाएगी तब शिक्षकों ने उम्मीद जताई थी किन्तु वास्तविकता में यह देखा गया कि कई नाम आवेदन करने के बावजूद अपेक्षित रह गये। ग्रामीण क्षेत्र में कार्यरत कुछ शिक्षिकाएँ यह कह रही थी कि उनकी वरिष्ठता और सेवा अवधि को अनदेखा किया गया था। अनुसूचित क्षेत्रों और पिछड़े गाँवों में नियुक्त महिला शिक्षिकाओं का दर्द और गहरा था। वे यह मान रही थीं कि विद्यालय में बच्चों को पढ़ाना ही पर्याप्त नहीं होता, बल्कि वहाँ तक सुरक्षित पहुँचना किसी संघर्ष से कम नहीं होता।
    समाज में शिक्षकों को आदर्श माना जाता रहा है परंतु जब स्वयं उनका जीवन संघर्षमय हो तो यह आदर्श धुंधला पड़ने लगता है। महिला शिक्षिकाओं ने अपने अनुभव साझा किए थे कि सुबह‑सुबह परिवार को छोड़कर अजनबी परिवेश में जाना, छोटे‑छोटे बच्चों से दूर रहना और लगातार असुरक्षा झेलना उन्हें मानसिक और शारीरिक दोनों स्तर पर थका देता था। कई शिक्षिकाओं ने यह कहा था कि परिवार के सदस्य बीमार पड़ जायं तो छुट्टी लेकर घर पहुँचना आसान नहीं होता। लंबी दूरी और सीमित परिवहन सुविधा इस समस्या को और विकट बना देती थी। कहा जाता है पढ़ाई का वातावरण तब ही बेहतर बन सकता था जब शिक्षक मानसिक रूप से संतुलित और संतुष्ट हों। किंतु जब शिक्षकों को स्थानांतरण की अनिश्चितता और दूरदराज़ की कठिन नियुक्तियों का बोझ झेलना पड़ता तो उनकी कार्यक्षमता प्रभावित होती थी। बच्चों को पूर्ण मनोयोग से पढ़ाना कठिन हो जाता था। महिला शिक्षिकाओं ने यह स्वीकार किया था कि कई बार वे पढ़ाते समय भी मन ही मन घर और बच्चों की चिंता करती थीं। इस कारण उनकी अध्यापन की जो क्षमता होती थी, उसमें कमी आ जाती थी।
    शिक्षकों तथा शिक्षिकाओं की ओर से यह मांग लगातार उठती रही थी कि नीति में पारदर्शिता लाई जाय। वरिष्ठता, सेवा अवधि और पारिवारिक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर स्थानांतरण किया जाय। विशेषकर महिला शिक्षिकाओं की सुरक्षा, बच्चों की देखभाल और परिवार से निकटता को प्राथमिकता दी जाय। कई संगठनों ने यह प्रस्ताव रखा था कि विवाहित महिला शिक्षिकाओं को संभव हो सके तो पति के कार्यस्थल के निकट ही नियुक्ति दी जाय। अविवाहित और युवा शिक्षिकाओं को सुरक्षित एवं सुगम परिवहन वाले क्षेत्रों में रखा जाय। अतिरिक्त आवश्यकता के बिना किसी को अत्यधिक दूर न भेजा जाय।
    हालांकि शासन की ओर से यह दावा किया जाता रहा था कि हर समस्या पर गंभीरता से विचार हो रहा है किन्तु शिक्षक समुदाय का अनुभव कुछ और कह रहा था। शिक्षिकाओं को लगता था कि उनकी आवाज़ को उचित महत्व नहीं दिया जा रहा है। वर्षों से यह देखा जा रहा था कि शिक्षक संगठन इस विषय पर धरना‑प्रदर्शन करते रहे। पत्राचार और शिकायतों के बावजूद समाधान लंबित रहता था। महिला संगठन विशेष रूप से यह कहते रहे कि यदि महिलाओं को शिक्षा क्षेत्र से हतोत्साहित किया गया, तो इसका नकारात्मक असर आने वाली पीढ़ियों पर पड़ेगा। तमाम महिला शिक्षिकाएं अक्सर कहती मिल जाती हैं कि पढ़ाना केवल उनका कर्तव्य नहीं था, बल्कि समाज के भविष्य को आकार देने का प्रयास था परंतु जब वह हर दिन विद्यालय जाते समय असुरक्षा और दूरी का भय महसूस करती थीं तो उनका मनोबल टूट जाता था। उत्तर प्रदेश में शिक्षकों की तबादला नीति केवल एक शासकीय दस्तावेज़ भर नहीं थी, बल्कि उससे हज़ारों शिक्षकों का जीवन तय होता था। महिला शिक्षिकाएँ तो इस व्यवस्था से सबसे अधिक प्रभावित हो रही थीं। उनके सामने घर और विद्यालय दोनों का संतुलन साधने की चुनौती थी। प्रशासन यदि उनकी परिस्थितियों को नज़रअंदाज़ करता रहा तो शिक्षा व्यवस्था की गुणवत्ता पर भी गंभीर असर पड़ना तय था, इसलिए यह भावना प्रकट की जा रही थी कि नीतियों को ज़मीनी वास्तविकताओं से जोड़ना ज़रूरी है। केवल नियम बनाने से समस्या हल नहीं होती। जब तक महिला शिक्षकों की असल पीड़ा को सुना और समझा नहीं जाएगा, तब तक शिक्षा जगत में संतुलन और न्याय स्थापित नहीं हो पायेगा।

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  • वक्त एवं राजनीति का पहिया

    वक्त एवं राजनीति का पहिया

    वक्त ने कई बड़े नेताओं, दलों और विचारधाराओं को शिखर तक पहुँचाया और फिर उसी वक्त ने उन्हें ज़मीन पर ला दिया। राजनीति में वक्त का महत्व बढ़ जाता है, क्योंकि सत्ता, नेतृत्व और जनमत समय की धाराओं पर ही टिका रहता है।
    वैश्विक स्तरपर मानव इतिहास गवाह है कि वक्त कभी किसी का स्थायी साथी नहीं रहा।वक्त हमेशा से मनुष्य की समझ और नियंत्रण से परे रहा है। यह किसी का सगा नहीं होता, यह न रुकता है और न ही किसी के लिए ठहरता है। राजनीति में वक्त का महत्व और भी बढ़ जाता है क्योंकि सत्ता,नेतृत्व और जनमत समय की धाराओं पर ही टिका रहता है। आज जब हम राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय राजनीति के हालात देखते हैं तो साफ प्रतीत होता है कि वक्त ने कई बड़े नेताओं, दलों और विचारधाराओं को शिखर तक पहुँचाया और फिर उसी वक्त ने उन्हें ज़मीन पर ला दिया। यही कारण है कि वक्त का पहिया हमेशा करवट बदलता रहता है। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र ने अपने जीवन में देखा हूं कि जो साम्राज्य कभी अजेय माने जाते थे, वे धराशायी हो गये। जो नेता कभी अमर समझे जाते थे, वे इतिहास के पन्नों में फीके पड़ गए। राजनीति और सत्ता का हर खेल वक्त की ही मेहरबानी या बेरुख़ी पर आधारित है। वर्तमान राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय राजनीति में यह कहावत और भी सटीक बैठती है कि “वक्त कभी किसी का सगा नहीं होता, यह करवट बदलते ही शिखर को जमीन और जमीन को शिखर बना देता है।”साथियों बात अगर हम वक्त कभी किसी का सगा नहीं किस पर अनुभव का राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय राजनीति का विश्लेषण करें तो (1) भारतीय राजनीति का दृष्टिकोण-भारतीय राजनीति इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। आज़ादी के बाद कांग्रेस का वर्चस्व इतना मजबूत था कि उसे “नेचुरल पार्टी ऑफ गवर्नेंस” कहा जाने लगा। जवाहर लाल नेहरू से लेकर इंदिरा गांधी और राजीव गांधी तक, कांग्रेस ने दशकों तक सत्ता पर एक क्षत्र शासन किया परंतु वक्त ने करवट ली और 2014 के बाद कांग्रेस सत्ता से दूर होती चली गई।आज वही भारतीय जनता पार्टी, जो 1980-90 के दशक में सीमित सीटों तक सिमटी थी, राष्ट्रीय राजनीति की धुरी बन चुकी है।
    नरेंद्र मोदी का नेतृत्व आज भारतीय राजनीति की सबसे बड़ी ताकत है लेकिन यह भी सच है कि वक्त कभी किसी का सगा नहीं होता। जिस तरह कांग्रेस सत्ता से गिर गई, उसी तरह भविष्य में भाजपा को भी यही चुनौती झेलनी पड़ सकती है। (2) अंतरराष्ट्रीय राजनीति-अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप का उदाहरण बेहद प्रासंगिक है। 2016 में उन्होंने सबको चौंकाते हुए राष्ट्रपति पद जीता और खुद को अमेरिका का ‘परम नेता’ मान बैठे लेकिन 2020 में वे हार गए और उन्हें सत्ता छोड़नी पड़ी। यही नहीं, 6 जनवरी 2021 को कैपिटल हिल पर उनके समर्थकों की हिंसा ने उनकी छवि को और धूमिल कर दिया।लेकिन आज 2025 में ट्रंप फिर से वापसी कर रहे हैं। यही वक्त की असली तस्वीर है -यह न स्थायी हार देता है और न स्थायी जीत। (3) रूस-यूक्रेन युद्ध भी इस कथन को चरितार्थ करता है। व्लादिमीर पुतिन ने 2022 में युद्ध छेड़ा था, उम्मीद थी कि कुछ ही दिनों में यूक्रेन रूस के सामने घुटने टेक देगा। लेकिन वक्त ने करवट ली और वही युद्ध रूस के लिए दलदल बन गया। रूस की अर्थव्यवस्था को प्रतिबंधों ने कमजोर किया और पुतिन की छवि पर भी गहरा असर पड़ा। (4) मध्य-पूर्व का परिप्रेक्ष्य-इज़राइल-फ़िलिस्तीन संघर्ष भी दिखाता है कि वक्त कभी किसी का नहीं होता। कभी इज़राइल को अजेय माना जाता था लेकिन 2023-24 के गाज़ा संघर्ष ने उसकी छवि को धक्का पहुँचाया। वहीं फ़िलिस्तीनी मुद्दा जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दब चुका था, आज फिर से प्रमुख हो गया। साथियों बात कर हम वक्त का पहिया हमेशा एक जैसा नहीं रहता राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय नेताओं से विश्लेषण अनुभव के आधार पर करें तो (1) भारत के नेताओं का उत्थान-पतन-भारत में लाल बहादुर शास्त्री का अचानक प्रधानमंत्री बनना और ‘जय जवान जय किसान’ के नारे से अमर हो जाना दर्शाता है कि वक्त का पहिया कब किसे उठाए, कहा नहीं जा सकता। वहीं इंदिरा गांधी का ‘आयरन लेडी’ बनना और फिर आपातकाल में गिरती लोकप्रियता दिखाती है कि सत्ता का समय सदा समान नहीं रहता। नरेंद्र मोदी का वर्तमान वक्त सुनहरा है। वे न केवल भारत बल्कि दुनियाँ के सबसे लोकप्रिय नेताओं में शुमार हैं।अ भी उनका हाल ही में 17 सितंबर 2025 को 75वें जन्मदिवस पर दुनिया भर से शुभकामनाएं आईं। आम जनता से लेकर अंतरराष्ट्रीय नेताओं और आध्यात्मिक गुरुओं तक सभी ने प्रधानमंत्री को दीर्घायु और स्वस्थ जीवन की कामना करते हुए उनके नेतृत्व की सराहना की है।लेकिन राजनीति में यह स्थायी नहीं। विपक्ष का उभार, जनमत का बदलाव और वैश्विक परिस्थितियां भविष्य में उनकी चुनौती बन सकती हैं। (2) अंतरराष्ट्रीय राजनीति में उदाहरण-बराक ओबामा का दौर ‘येस वी कैन’ और उम्मीद का प्रतीक था परंतु उसी अमेरिका ने 2016 में ट्रंप को चुना, जिन्होंने बिल्कुल उलटी नीतियाँ अपनाईं। यह वक्त के पहिए का सटीक उदाहरण है।ब्रिटेन में बोरिस जॉनसन कभी ब्रेक्ज़िट के नायक माने गये लेकिन कोविड-19 की अव्यवस्था और पार्टीगेट स्कैंडल ने उनका राजनीतिक करियर खत्म कर दिया। जर्मनी में एंजेला मर्केल का 16 साल का लंबा शासन खत्म हुआ और एक नए युग की शुरुआत हुई। यह दर्शाता है कि सत्ता कितनी भी मज़बूत क्यों न लगे, वक्त का पहिया उसे बदल ही देता है। साथियों बात अगर हम वक्त का पहिया कैसे करवट बदल लेता है, अतीत और वर्तमान का तुलनात्मक विश्लेषण करें तो (1) भारत का बदलाव-1950 -70 के दशक का भारत गरीबी, विदेशी तकनीक और आयात पर निर्भर था लेकिन 1991 की आर्थिक उदारीकरण की करवट ने भारत को बदल दिया। आज वही भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर है। नेहरू के भारत और मोदी के भारत में फर्क यही वक्त का खेल है। पहले पंचवर्षीय योजनाएँ राजनीति की धुरी थीं, आज डिजिटल इंडिया, स्टार्टअप इंडिया और मेक इन इंडिया नए भारत की पहचान हैं। (2) विश्व राजनीति का बदलाव-(अ) सोवियत संघ कभी महाशक्ति था लेकिन 1991 में उसका विघटन हो गया। अमेरिका, जो वियतनाम युद्ध में हार चुका था, वही शीत युद्ध का विजेता बन गया। चीन, जो 1970 में पिछड़ा हुआ था, आज अमेरिका को चुनौती दे रहा है। (ब) अरब देशों का तेल साम्राज्य भी वक्त के पहिए का शिकार हो रहा है। कभी पेट्रोलियम उनकी शक्ति था, आज नवीकरणीय ऊर्जा और इलेक्ट्रिक वाहन उनके प्रभुत्व को चुनौती दे रहे हैं। (स) आधुनिक युग में वक्त की गति-21वीं सदी में वक्त का बदलाव और तेज़ हो गया है।
    सोशल मीडिया, 24×7 न्यूज़ और कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने राजनीति को पल-पल बदलने वाला खेल बना दिया है। आज एक ट्वीट या वायरल वीडियो किसी नेता का राजनीतिक करियर बना सकता है या बिगाड़ सकता है। 2024-25 के चुनावों में हमने देखा कि डिजिटल कैंपेन और सोशल मीडिया ट्रेंड्स ने नीतियों से बहुत ज्यादा असर डाला। साथियों बात अगर हम वक्त के पहिए का हम खुद अपने पुराने और आज के वक्त का ही विश्लेषण कर ले कि कुछ साल या दशक पूर्व हम क्या थे और अब क्या हैं तो हमें पता चल ही जाएगा कि वक्त कभी एक सा नहीं रहता। इतना ही नहीं, अगर हम अपने ही समाज या पीढ़ियों का विश्लेषण करें तो हमें अंदाज लग जाएगा कि वक्त का पहिया कैसे घूमकर बदलते रहता है इसलिए ही बड़े बुजुर्गों का कहना हैं, समय-समय की बात है। आज तुम्हारा समय है कल हमारा समय भी आएगा। हम हमारे शहर जिले राज्य या राष्ट्र की स्थिति देखें तो हमें ऐसे कई उदाहरण मिल जाएंगे, अपने को बड़े शहंशाह, तीरंदाज कहने मानने वाले लोगों को भी हमने लाचार, तारतार होते देखा होगा जिनके पास बेशुमार, दौलत पावर था और सब कुछ खरीद सकते थे परंतु वक्त का पहिया ऐसा फिसला कि उनका पैसा, पावर सब कुछ जमींरोज़ हो गया और पैसे—पैसे को मोहताज हो गये, हमने सुना ही नहीं अपनी आंखों से देखा भी जरूर होगा या फिर हमें यह अपने उम्र के बढ़ते चढ़ाव पर देखने को जरूर मिल जाएगा। अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि राजनीति में वक्त ही असली निर्णायक है। वक्त कभी किसी का सगा नहीं होता। यह शिखर को ज़मीन और ज़मीन को शिखर बना देता है। भारत, अमेरिका, रूस, चीन, यूरोप, मध्य-पूर्व—हर जगह यह सिद्धांत समान रूप से लागू होता है। नेताओं और राष्ट्रों को यह समझना चाहिए कि सत्ता और लोकप्रियता क्षणिक हैं। स्थायी केवल परिवर्तन है, इसीलिए यह याद रखना ज़रूरी है कि वक्त का पहिया हमेशा घूमता है और राजनीति का हर समीकरण उसी के हिसाब से बदलता है।
    प्रो. राहुल सिंह
    अध्यक्ष
    उत्तर प्रदेश वाणिज्य परिषद

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    600 बीमारी का एक ही दवा RENATUS NOVA

  • सनातन धर्म कहता है कि

    सनातन धर्म कहता है कि

    सनातन धर्म कहता है कि

    कहा गया है सत्य बोलें, प्रिय बोलें,
    अप्रिय हो जो वह सत्य नहीं बोलें,
    जो प्रिय असत्य हो वह नहीं बोलें,
    सनातन धर्म कहता है जो वही बोलें।

    “स्वान्तः सुखाय” लिखते रहिए,
    जो उचित लगे वही बोलते रहिए,
    जन हित का सदा ध्यान रखिये,
    राष्ट्र हित का लक्ष्य महान रखिये।

    संसार में जल, अन्न, सुभाषित
    तीनों ही जीवन के आभूषण हैं,
    फिर तो सभी मंगल ही मंगल हैं,
    प्रभू कृपा से सभी राहें सरल हैं।

    कभी आशा कभी निराशा है जिंदगी,
    कभी तो खुशी का बग़ीचा है जिंदगी,
    हंसता रुलाता हुआ राग है जिंदगी,
    कड़वे मीठे स्वाद, एहसास जिंदगी।

    अंत में कर्मो का हिसाब है जिंदगी,
    अन्त में ही क्यों, शुरू से अन्त तक
    अपने कर्मों का हिसाब है ज़िन्दगी,
    जो भी है प्रभू की देन है ज़िन्दगी।

    सुंदर हो न हो, सादगी होनी चाहिए,
    खुशबू न हो, पर महक होनी चाहिए,
    रिश्ता हो न हो, भावना होनी चाहिए,
    उलझी सुलझे का यत्न होना चाहिए।

    आदित्य सच्चे मन की अच्छाई कभी
    भी व्यर्थ नहीं जाती है, ये वो पूजा है,
    जिसकी खोज ईश्वर खुद करते हैं,
    और ऐसे भक्त पर कृपा बरसाते हैं।

    डा. कर्नल आदिशंकर मिश्र
    विद्या वाचस्पति, लखनऊ।

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    600 बीमारी का एक ही दवा RENATUS NOVA

  • मत करो… पुतलों से प्यार…!

    मत करो… पुतलों से प्यार…!

    मत करो… पुतलों से प्यार…!

    नुमाईस मैदान के मेले से खरीदकर
    अभी-अभी घर आए ही थे…
    डॉक्टर,वकील,पुलिस,नेता… और…
    मास्टर साहब के संग पत्रकार भाई
    आते ही शुरू हो गया था घर में शोर
    मच गया था हल्ला-गुल्ला,बवण्डर…
    सभी कह रहे थे…!
    हमने अपना पेट काटा,
    नहीं खाया चाट-पकौड़ी…
    नहीं खाया कोई बरफी-रसगुल्ला…
    तभी तो मुश्किल से घर आया है,
    हम सब का प्यारा सा पुतला…
    लड़ रहे थे… एक दूसरे से सभी…
    चुन्नू-मुन्नू और रंगा-बिल्ला…
    बताने को… यकीन दिलाने को…
    कि क्या-क्या कर सकता है…?
    उनका अपना बागड़बिल्ला…
    इसी बीच जाने क्या…?
    व्यंग्य कोई कुछ ऐसा बोला…
    कि आपस में लड़ने को…!
    हर कोई अपने हाथों में,
    लिए तैयार खड़ा था…
    अपना-अपना प्यारा पुतला…
    सभी एक दूसरे की मन से…!
    कर रहे थे भरपूर खिंचाई…
    जैसे पुतलों की आत्मा ही,
    उनमें हो उतर आयी…
    इक दूजे की करतूतों को लेकर…!
    सबकी हो रही थी… आपस में लड़ाई,
    किसी ने नैतिकता खूब गिनाई तो…
    किसी ने अपनी मोटी खूब कमाई…
    किसी ने करी सदाचार की गुहार तो,
    किसी ने करी कानूनी बौछार…
    किसी ने दी डण्डे की दुहाई… तो…
    किसी ने छपाई को बताया,
    हर एक मर्ज़ की दवाई…
    किसी ने गरमा-गरम माहौल में,
    राजनीति अपनी खूब चमकाई…
    तकरार आपस की ज्यादा बढ़ने पर,
    पारा मालिकान के चढ़ने पर…
    पुतले सारे हवा में उड़-उड़कर…
    टकराये और टूटने लगे… संग इसके…
    दिल… नादान दीवानों के टूटने लगे…
    प्यारे मित्रों…!
    अब कौन बताए इनको…?
    कि ये पुतले तो बिकने के लिए…
    और… टूटने के लिए ही होते हैं…
    तैयार विधाता के हाथों से हों…
    या फिर… हमारे हाथों से…!
    फिर… बेवजह ही कर रहे हैं…
    इन पुतलों को लेकर…
    ये आपस में रार-तकरार…
    संग इसके कौन बताये इनको… कि…
    इस माया जगत में…!
    लोग पुतला बनने को भी हैं तैयार
    यहाँ तक कि… करके…
    अलग-अलग सा अपना श्रृंगार…
    और… यहाँ कोई संदेह नहीं कि…!
    ये पुतले… और इनका गुरूर…
    टूटते भी हैं…!
    यहाँ सौ-सौ बार…
    इसलिए कहता हूँ प्यारे…!
    मानो तुम मेरी एक बात…
    मत करो… कत्तई मत करो…!
    यहाँ तुम पुतलों से प्यार…
    मत करो… कत्तई मत करो…!
    यहाँ तुम पुतलों से प्यार…

    रचनाकार—— जितेन्द्र दुबे
    अपर पुलिस उपायुक्त, लखनऊ

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    600 बीमारी का एक ही दवा RENATUS NOVA

  • सृजन और श्रम के देव भगवान विश्वकर्मा पूरे ब्रह्मांड के शिल्पकार

    सृजन और श्रम के देव भगवान विश्वकर्मा पूरे ब्रह्मांड के शिल्पकार

    सुरेश गांधी
    भारतीय संस्कृति में यदि किसी एक देवता को सृजन, कौशल और परिश्रम का जीवंत प्रतीक कहा जाए, तो वह हैं भगवान विश्वकर्मा हैं। वेदों और पुराणों में उनका उल्लेख ब्रह्मा के सातवें पुत्र और दिव्य शिल्प शास्त्र के आदि प्रवर्तक के रूप में मिलता है। ऋग्वेद में जिनका स्मरण “सर्वदेव शिल्पी” के रूप में हुआ है, वही विश्वकर्मा देवताओं के नगरों, महलों और अद्भुत यंत्रों के शिल्पकार हैं। वैसे भी 17 सितंबर का यह पर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि परिश्रम और सृजन की महागाथा है। भगवान विश्वकर्मा हमें सिखाते हैं कि सृजन ही सबसे बड़ा धर्म है और श्रम ही सबसे बड़ा तप। इस अवसर पर मशीनों, औजारों और यंत्रों के साथ हमें अपने कर्म, कौशल और श्रम को भी नमन करना चाहिए, क्योंकि यही सनातन संस्कृति का सबसे जीवंत सत्य है, कर्म ही पूजा है, शिल्प ही साधना। खास यह है कि इस साल विश्वकर्मा पूजा का शुभ मुहूर्त 17 सितंबर की सुबह 08 बजकर 15 मिनट से लेकर दोपहर 12 बजकर 50 मिनट तक रहेगा। पंचांग के अनुसार इस वर्ष विश्वकर्मा पूजा पर 100 साल बाद अमृत सिद्धि योग, सर्वार्थ सिद्धि योग, गुरु पुष्य योग, शिवयोग और एकादशी का संगम एक ही दिन पड़ रहा है। यह अनोखा योग पूजा की महत्ता और फल को कई गुना बढ़ा देगा।
    सनातन धर्म में भगवान विश्वकर्मा निर्माण एवं सृजन के देवता है। कहते हैं कि इस दिन भगवान विश्वकर्मा ने सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी के सातवें पुत्र के रूप में जन्म लिया था। भगवान विश्वकर्मा का जिक्र 12 आदित्यों और ऋग्वेद में है। उन्हें सृष्टि का पहला इंजीनियर माना जाता है। इस दिन घर, दुकान या फैक्ट्रियों में लोहे, वाहन और मशीनों की पूजा की जाती है। भगवान विश्वकर्मा की अनुकंपा से ये मशीनें जल्दी खराब नहीं होती हैं। कार्य, कारोबार में उन्नति आती है। भारत के कई हिस्सों में विश्वकर्मा पूजा बड़े ही धूमधाम से मनाई जाती है। महा विश्व कर्म पुराण में कहा गया है, “शिल्पं लोकोपकारम्, पुण्यं तदव्यतिरिक्तं तु पापमित्यभिधीयते।” अर्थात शिल्पकर्म स्वयं लोककल्याणकारी है, और श्रमपूर्वक अर्जित धन ही पुण्य है। बिना श्रम के जीवन यापन को पाप कहा गया है। यही संदेश आज की मशीनों और तकनीक से भरी दुनिया में और प्रासंगिक हो उठता है। मोबाइल, लैपटॉप या जटिल कारखाने, हर इंसान का जीवन अब किसी न किसी यंत्र से जुड़ा है और हर यंत्र के पीछे किसी न किसी का परिश्रम छिपा है। विश्वकर्मा पूजा हमें श्रम का सम्मान करना और कर्म को ही धर्म मानने की सीख देती है।

    पूजा का शुभ मुहूर्त
    पंचांग के अनुसार 17 सितंबर की सुबह 08ः12 बजे सूर्य का कन्या राशि में प्रवेश होगा। इसके तुरंत बाद से विश्वकर्मा पूजा की शुरुआत मानी जायेगी। ऐसे में पूजा का शुभ मुहूर्त सुबह 08ः15 बजे से लेकर दोपहर 12ः50 बजे तक रहेगा। खासकर इस बार विश्वकर्मा पूजा पर पूरे 100 सालों बाद चार बेहद शुभ योग बन रहे हैं जिससे पूजा का फल कई गुना बढ़ जायेगा। अमृत सिद्धि योग: यह योग स्वास्थ्य, आयु और समृद्धि को बढ़ाने वाला माना जाता है। सर्वार्थ सिद्धि योग: यह योग सभी कार्यों में सफलता दिलाने वाला है। गुरु पुष्य योग: ज्ञान, वैभव और आध्यात्मिक उन्नति के लिए अत्यंत शुभ। शिवयोग और एकादशी: यह योग पाप नाशक और मनोकामना पूरी करने वाला विशेष योग है। इन चार योगों के संयोग से विश्वकर्मा पूजा का महत्व और भी बढ़ जाता है। ज्योतिषाचार्यों का कहना है कि इस दिन विशेष रूप से व्यवसायी, श्रमिक, वाहन चालक, इंजीनियर और टेक्नीशियन इस पर्व को बड़ी श्रद्धा से मनाएं, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति और स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव पड़े। कहते हैं कि ब्रह्मा जी ने जब सृष्टि की रचना की थी, तब उसके सजाने और संवारने का काम विश्वकर्मा जी ने ही किया था। इसी श्रद्धा भाव से किसी कार्य के निर्माण और सृजन से जुड़े लोग विश्वकर्मा जयंती पर पूजा अर्चना करते हैं।

    पौराणिक स्मृतियों में दिव्य रचनाकार
    कथाओं में वर्णित है कि नारायण के नाभि-कमल से प्रकट हुए ब्रह्मा के पुत्र धर्म, धर्म के पुत्र वास्तुदेव और उन्हीं की पत्नी अंगिरसी से विश्वकर्मा का जन्म हुआ। त्रिशूल, सुदर्शन चक्र, पुष्पक विमान, इंद्रपुरी, कृष्ण की द्वारका, रावण की स्वर्ण लंका, हस्तिनापुर, जगन्नाथपुरी, इन सबकी दिव्यता विश्वकर्मा की अद्भुत शिल्पकला का परिणाम है। वे न केवल रचनाकार थे, बल्कि धर्म के रक्षक भी। जब देवताओं पर संकट आया, अस्त्र-शस्त्र की आवश्यकता पड़ी, तब यही दिव्य अभियंता आगे बढ़े और असुरों के विरुद्ध विजय के औजार गढ़े। ब्रह्मा के पुत्र ’धर्म’ और धर्म के पुत्र ’वास्तुदेव’ हुये। कहा जाता है कि धर्म की ’वस्तु’ नामक स्त्री से उत्पन्न ’वास्तु’ सातवें पुत्र थे जो शिल्प शास्त्र के आदि प्रवर्तक थे। उन्हीं वास्तुदेव की ’अंगिरसी’ नामक पत्नी से विश्वकर्मा उत्पन्न हुये। पिता की भांति विश्वकर्मा भी ववास्तुकला के अद्वितीय आचार्य बने। यह दिन ब्रह्मांड के दिव्य वास्तुकार भगवान विश्वकर्मा को समर्पित है। उन्हें पहले इंजीनियर के तौर पर जाना जाता है। भगवान विश्वकर्मा ने ही कई सारे पौराणिक शहर भी बसाये। मान्यता है कि बाबा विश्वकर्मा इस ब्रह्मांड के रचयिता हैं। कहते है पूरे श्रद्धा, विधि-विधान के साथ बाबा की पूजा-अर्चना की जाएं तो जीवन एवं घर में उन्नति व व्यापार में आने वाली कठिनाई दूर होकर धन-संपदा आने लगती है।

    युगों से आज तक की प्रासंगिकता
    विश्वकर्मा केवल मजदूरों और शिल्पियों के ही नहीं, बल्कि हर उस व्यक्ति के देव हैं जो मशीनों, उपकरणों या तकनीक के सहारे अपना कार्य करता है। आज का हर पेशा, इंजीनियर से लेकर तकनीकी विशेषज्ञ तक, कहीं न कहीं उनके आशीष का ही विस्तार है। जब हम अपने यंत्रों की पूजा कर उनकी दीर्घायु की प्रार्थना करते हैं तो यह केवल परंपरा नहीं, बल्कि श्रम, कौशल और प्रगति का उत्सव है। सनातनियों के लिए ये त्योहार बहुत महत्वपूर्ण होता है। इस दिन लोग अपने कारखानों और वाहनों की पूजा करते हैं।

    विश्वकर्मा सनातन धर्म के सबसे बड़े रक्षक
    भगवान विश्वकर्मा जी देवताओं के शिल्पकार थे, इसलिए इन्हें शिल्प के देवता के नाम से भी जाना जाता है। भगवान विश्वकर्मा सनातन धर्म के सबसे बड़े रक्षक थे। देवी-देवताओं के ऊपर जब भी संकट आया, जब भी असुरों से लड़ाई हुई या आसुरी शक्तियों का विनाश करना हुआ तो देवताओं को अस्त्र-शस्त्र भगवान विश्वकर्मा ने ही प्रदान किया। सभी जानते हैं कि बिना अस्त्र-शस्त्र के कोई भी लड़ाई नहीं जीती जा सकती। भगवान विश्वकर्मा ने न सिर्फ सृष्टि की सुंदर रचना की, बल्कि उसे बचाया भी है। विश्व को बनाने वाले विश्वकर्मा जी के पुराण महाविश्वकर्मपुराण के बीसवें अध्याय में राजा सुव्रत को उपदेश करते हुए शिवावतार भगवान कालहस्ति मुनि कहते हैं।
    ब्राह्मणाः कर्म्ममार्गेण ध्यानमार्गेण योगिनः। सत्यमार्गेण राजानो भजन्ति परमेश्वरम्।।
    ब्राह्मण अपने स्वाभाविक कर्मकांड आदि से (चूंकि वेदसम्मत कर्मकांड में ब्राह्मण का ही अधिकार है), योगीजन ध्यानमग्न स्थिति से और राजागण सत्यपूर्वक प्रजापालन से परमेश्वर की आराधना करते हैं।

    स्त्रियों वैश्याश्च शूद्राश्च ये च संकरयोनयः। भजन्ति भक्तिमार्गेण विश्वकर्माणमव्ययम्।। स्त्री, वैश्य, शूद्र तथा वर्णसंकर जन, (जो कार्यव्यवस्था एवं धर्मव्यवस्था के कारण कर्मकांड अथवा शासन आदि की प्रत्यक्ष सक्रियता से दूर हैं,) वे भक्तिमार्ग के द्वारा उन अविनाशी विश्वकर्मा की आराधना करते हैं। इन्हीं विश्वकर्मा उपासकों के कारण भारत का ऐतिहासिक सकल घरेलू उत्पाद आश्चर्यजनक उपलब्धियों को दिखाता है, क्योंकि इनका सिद्धांत ही राजा सुव्रत को महर्षि कालहस्ति ने कुछ इस प्रकार बताया है।

    शृणु सुव्रत वक्ष्यामि शिल्पं लोकोपकारम्। पुण्यं तदव्यतिरिक्तं तु पापमित्यभिधीयते।। इति सामान्यतः प्रोक्तं विशेषस्तत्वत्र कथ्यते। पुण्यं सत्कर्मजा दृष्टं पातकं तु विकर्मजम्।। हे सुव्रत! सुनिए, शिल्पकर्म (इसमें हजार से अधिक प्रकार के अभियांत्रिकी और उत्पादन कर्म आएंगे) निश्चित ही लोकों का उपकार करने वाला है। शारीरिक श्रमपूर्वक धनार्जन करना पुण्य कहा जाता है। उसका उल्लंघन करना ही पाप है। अर्थात् बिना परिश्रम किये भोजन करना ही पाप है। यह व्यवस्था सामान्य है। विशेष में यही है कि धर्मशास्त्र की आज्ञानुसार किये गए कर्म का फल पुण्य है और इसके विपरीत किये गए कर्म का फल पाप है। यही कारण है कि संत रैदास को नानाविध भय और प्रलोभन दिए जाने पर भी उन्होंने धर्मपरायणता नहीं छोड़ी, अपितु धर्मनिष्ठ बने रहे।

    विश्वकर्मा पूजा विधि
    विश्वकर्मा जयंती पर सुबह जल्दी उठकर स्नान व ध्यान करें और साफ कपड़े पहनें। इसके बाद ऑफिस, दुकान, वर्कशॉप, फैक्ट्री आदि छोटे या बड़े संस्थान की पूरी तरह साफ सफाई करें। साथ ही सभी उपकरण, औजार, सामान, मशीन की भी साफ—सफाई करें। फिर पूरी जगह गंगाजल से छिड़काव करें। पूजा के लिए सबसे पहले पूजा स्थल पर कलश स्थापित करें और फिर चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाकर विश्वकर्मा की तस्वीर या मूर्ति स्थापित करें और माला पहनाएं। इसके बाद हाथ में फूल और अक्षत लेकर ध्यान करें। इसके बाद फूल अक्षत लेकर मंत्र पढ़ें और चारो ओर छिड़कें। इसके बाद सभी मशीन व औजार आदि पर रक्षा सूत्र बांधे और प्रणाम करें। फिर भगवान को फल, मिष्ठान आदि का भोग लगाएं। साथ में पूरे संस्थान और मशीन, औजार आदि चीजों की भी आरती करें। पूजन में भगवान विष्णु का भी ध्यान करें और यज्ञ आदि का आयोजन करें। इसके बाद पूजा के स्थान पर रंगोली बनाएं और इसके बाद भगवान विश्वकर्मा की मूर्ति की स्थापना करें. इसके बाद देसी घी का दीपक जलाएं और भगवान विश्वकर्मा को फूल चढ़ाएं. भगवान विश्वकर्मा के सामने हाथ जोड़कर इस मंत्र का जाप करें… ’ओम आधार शक्तपे नमः’, ’ओम कूमयि नमः’ और ’ओम अनंतम नमः’ इस मंत्र के जाप के बाद व्यापार से जुड़े उपकरणों, मशीनरी और स्पेयर पार्ट्स की पूजा करना न भूलें. जहां पूजा कर रहे हों, उस परिसर में हर जगह आरती लेकर जाएं और भोग सभी में वितरण कर दें। पूजा के बाद भगवान विश्वकर्मा से सफलता की कामना करें।

    लगायें भोग, बरसेगी कृपा
    मूंग दाल की खिचड़ी की सरल तैयारी के लिए केवल दो मुख्य सामग्रियों मूंग दाल और चावल की आवश्यकता होती है जिन्हें नमक, हल्दी और मसालों के साथ पकाया जाता है। भगवान विश्वकर्मा को चढ़ाने से पहले खिचड़ी के ऊपर देसी घी डाला जाता है। हिंदू परंपरा में हर शुभ अवसर पर खीर बनाई जाती है। चावल को दूध के साथ पकाया जाता है। चीनी, इलायची और ड्राइ फ्रुट्स मिलाए जाते हैं। बूंदी के लड्डू एक लोकप्रिय प्रसाद है और इसे कई हिंदू देवताओं को चढ़ाया जाता है। बूंदी को बेसन के साथ तैयार किया जाता है और फिर चीनी की चाशनी में भिगोया जाता है जिसे बाद में लड्डू का आकार दिया जाता है। नारियल के लड्डू को कसा हुआ नारियल, गाढ़ा दूध, इलायची पाउडर और घी के साथ बनाया जाता है और कटे हुए मेवों से सजाने से पहले, गेंदों का आकार दिया जाता है। पंचामृत दूध, दही, शहद, घी और चीनी को बराबर मात्रा में मिलाकर बनाया जाता है। इसे आम तौर पर हिंदू धार्मिक समारोहों के दौरान भोग के रूप में पेश किया जाता है। गेहूं के आटे, चीनी, दूध और इलायची पाउडर को घोल में मिलाकर बनाया जाता है। फिर मालपुआ सुनहरा भूरा होने तक डीप फ्राई किया जाता है। फल केला और सेब जैसे फल हिंदू धर्म में पूजा समारोहों के दौरान भोग के रूप में लोकप्रिय रूप से उपयोग किये जाते हैं।

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    600 बीमारी का एक ही दवा RENATUS NOVA

  • क्या इस्लाम से खतरा केवल गैर-मुस्लिम को ही है?

    क्या इस्लाम से खतरा केवल गैर-मुस्लिम को ही है?


    पाकिस्तान में शिया, कादियानी, खोजे, बहौरे मुसलमानों को पाकिस्तान में कयामत और दोजख का वर्णन अपनी आंखों से देखने और भुगतने को मिल चुका है। इसका वर्णन कुरान में बड़े विस्तार से किया गया है और जिसकी तारीख के बारे में लिखा है कि यह ‘केवल अल्लाह को ही मालूम है।’ यह कयामत और जलजला बिना तुरही बजे पाकिस्तान में उसी दिन से आ चुका है जब वह बना। पाकिस्तान में बताया जा रहा था कि केवल सुन्नी ही सच्चे मुसलमान है, बाकी सब मुसलमान जिसमें शिया और कादियानी आदि सम्मिलित हैं काफिर और दहरिये हैं जिनके कत्ल करने की इजाजत शरीयत देती है।
    “अब पाकिस्तान में अफगान शरणार्थियों के पास वैध दस्तावेज न होने के आधार देश निकाला जा रहा है और कौम उनके साथ लूटपाट में संलग्न है। पाकिस्तानी मीडिया साइट डॉन ने इस मुद्दे पर एक रिपोर्ट प्रकाशित की है जिसमें बताया गया कि सरकार ने 1.7 मिलियन गैर-दस्तावेज वाले शरणार्थियों से पाकिस्तान छोड़ने व अपने साथ केवल 50,000/- रुपए की धनराशि ले जा सकेंगे। कौम उनकी मजबूरियों का फायदा उठाने में जुटे हुई है।
    मोहम्मद आसिफ निवासी मच्छर कॉलोनी ने अपनी दुकान मात्र 0.3 मिलियन (88,590 पाकिस्तानी रुपए) में बेचनी पड़ी और उसके चाचा के द्वारा 5.2 मिलियन में खरीदे घर को 1.4 मिलियन में बेचना पड़ा। ऐसा न करने पर पाकिस्तान की पुलिस द्वारा गिरफ्तार करने की सम्भावना बताई जा रही है।
    सरकार ने कहा था कि गैर-दस्तावेज वाले अफगानी चूँकि कोई व्यापार या बैक के माध्यम से वित्तीय लेन-देन नहीं कर सकते, इसलिए वे एक विश्वासपात्र पाकिस्तानी को चुनें और उसके नाम से अपना काम और वित्तीय लेन-देन करें…। अब यही विश्वास पात्र फ्रंटमैन उनकी मजबूरियों का फायदा उठाने से पीछे नहीं हट रहे और उनकी बचत को लूटने में लगे हैं।
    एमनेस्टी ने चेताया है कि इस प्रतिबंध के चलते हजारों अफगानियों खासकर महिलाओं-लड़कियों की सुरक्षा व उनका जीवन सब दाव पर लग जाएगा।” (आप इण्डिया, 11 नवंबर, 2023, जयन्ती मिश्रा की रिपोर्ट)
    ऐसा ही एक हिजरत (देश त्याग) का प्रयत्न खिलाफत आंदोलन के समय 1919-20 में किया गया। तुर्की के सुल्तान ने, जो इस्लामी जगत का खलीफा था, द्वितीय विश्व युद्ध में हारने के पश्चात यह तय किया कि अब तुर्की दारुल हरब हो गया है, इसलिए वह इस्लामी देश अफगानिस्तान में हिजरत करेंगे।
    भारत में भी मुसलमानों में यह भाव जगा कि वे भी अपने खलीफा के साथ अफगानिस्तान में हिजरत करेंगे। मौलाना अब्दुल बारी के एक फतवे ने इस बेवकूफी को भारतीय मुसलमानों में एक धार्मिक उन्माद की स्थिति में पहुंचा दिया। (काजी अब्दुल गफ्फार: हयात-ए-अजमल, अंजुमन तरक्की उर्दू, अलीगढ़ (1950) पृ. 221)
    सिन्ध के करीब 18000 मुस्लिम परिवार अपने घर, जमीन, दुकान एवं व्यवसाय आधे-चौथाई दामों में बेचकर अफगानिस्तान को चल दिए। लगभग 10,000 और परिवार हिजरत की तैयारी में लग गए और उन्होंने भी अपना सब कुछ बेच दिया। अफगानिस्तान सरकार ने तब इस समस्या को समझा और अपनी सीमाएं इन हिजरत करने आ रहे सिंधी मुसलमानों के लिए बंद कर दी तथा तुर्की के खलीफा को भी अफगानिस्तान आने से मना कर दिया।
    अफगानिस्तान सीमा पर पड़े सिन्धी मुसलमानों से पठानों ने उनका धन व स्त्रियों को लूट लिया और वे पूर्णरूपेण बर्बाद होने के पश्चात वापस सिन्ध लौटे, जहां वे आज तक गरीबी में जिंदगी व्यतीत कर रहे हैं। (विस्तृत विवरण के लिए देखिए सेन्सस आफ इन्डिया 1921, कलकत्ता, भारत सरकार प्रकाशन)
    जयकिशन कर्णवाल
    मेरठ, उत्तर प्रदेश।

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    600 बीमारी का एक ही दवा RENATUS NOVA

  • पितरों को नमन

    पितरों को नमन

    पितरों को नमन

    वो कल थे तो आज हम हैं
    उनके ही तो अंश हम हैं।

    जीवन मिला उन्हीं से
    उनके कृतज्ञ हम हैं,

    सदियों से चलती आयी
    श्रंखला की कड़ी हम हैं।

    गुण धर्म उनके ही दिये
    उनके प्रतीक हम हैं,

    रीत रिवाज़ उनके हैं दिये
    संस्कारों में उनके हम हैं।

    देखा नहीं सब पुरखों को
    पर उनके ऋणी तो हम हैं,

    पाया बहुत उन्हीं से पर
    न जान पाते हम हैं।

    दिखते नहीं वो हमको
    पर उनकी नज़र में हम हैं,

    देते सदा आशीष हमको
    धन्य उनसे हम हैं।

    खुश होते उन्नति से
    दुखी होते अवनति से,
    देते हमें सहारा
    उनकी संतान जो हम हैं।

    इतने जो दिवस मनाते
    मित्रता प्रेम आदि के,
    पितरों को भी याद कर लें
    जिनकी वजह से हम हैं।

    आओ नमन कर लें, कृतज्ञ हो लें,
    क्षमा माँग लें, आशीष ले लें
    पितरों से जो चाहते हमारा भला
    उनके जो अंश हम हैं…!!!
    रामराज प्रजापति
    वाजिदपुर, जौनपुर, उ.प्र.

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    600 बीमारी का एक ही दवा RENATUS NOVA

  • बापू…!

    बापू…!

    बापू…!

    जब भी कभी… किसी बात पर…
    मैं या मेरा बचपन,
    कोई ज़िद लेकर अड़ा…
    देखते ही देखते… सामने ही सबके…
    बापू ने गाल पर दो-चार थप्पड़…!
    मुझको जड़ा ही जड़ा…
    इस माया जगत में…!
    हर इक गलत राह पर,
    उनकी पारखी नजरों ने,
    झट से मुझे तड़ा ही तड़ा…
    समझ पाए हम भले देर से,
    पर रंग चेहरे का मेरे मित्रों…!
    वहीं का वहीं… उड़ा ही उड़ा…
    कुछ कहने का… यहाँ तक कि…
    भाव अपना रखने का…!
    सारा का सारा उत्साह,
    ठंडा… वहीं पर पड़ा ही पड़ा…
    देखकर बालपन के इस दौर को,
    बड़ा ही आसान है प्यारे…!
    कह देना… बापू को अपने…
    गुस्सैल बेहद और बेहद कड़ा…
    पर… उलट इसके प्यारे…!
    देखा है मैंने… यह भी यहाँ…
    बापू हमेशा ही… हम सबके लिए…
    रहा धन वैभव का भरा सा घड़ा…
    खुला हो सकता है जो कभी,
    कभी धरती की गहराई में गड़ा…
    छाया उसकी… शीतल ही रही हरदम
    चाहे सूखा रहा हो या रहा हो हरा…
    चाहे पास में खड़ा मिला हो या…!
    कहीं कोने में हो पड़ा…
    लेकर गिला-शिकवा-शिकायत कोई
    अपने बापू से जो… कभी कोई लड़ा…
    सच मानिये… खुद ही उसने…!
    काट डाला… खुद का अपना ही धड़ा…
    कुछ ही दिनों में खुद को…
    पाता है… वह धरती पर पड़ा… और…
    कहते हुए दिखते हैं लोग कि,
    देखो बदबू दे रहा है… यह सड़ा-सड़ा…
    और ज़्यादा क्या लिखूँ… मैं प्यारे…
    बापू पर तो लिख सकता हूँ,
    कई निबंध मैं बड़ा से बड़ा… पर…
    सूक्त वाक्य वह आज कहता हूँ…
    जिसे अंगूँठी के नगीने सा…!
    रखा है मैंने जड़ा… कि…
    बापू तो कहते थे सदा…!
    कि सुनो मेरे प्यारे… सुनो बेटे हमारे…
    बाप की नजर में…!
    बेटा कभी… नहीं हो सकता है बड़ा…
    गूढ़ बात उनकी यह प्यारे ,
    भले समझ ना आई थी… तब हमको
    पर याद बहुत आई मुझे…
    जब वो पावन हंस…!
    मुक्त गगन में अकेला ही उड़ा…
    सच कहूँ तो उसी दिन से प्यारे…
    ख़ुद-ब-ख़ुद विचार मन में आने लगा,
    कि उठो यार अब दुनिया को समझो,
    होना ही पड़ेगा… तुमको अब बड़ा…
    होना ही पड़ेगा… तुमको अब बड़ा…

    रचनाकार—— जितेन्द्र दुबे
    अपर पुलिस उपायुक्त, लखनऊ

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    600 बीमारी का एक ही दवा RENATUS NOVA

  • हिन्दी की गरिमा नीर गंगा सम

    हिन्दी की गरिमा नीर गंगा सम

    हिन्दी की गरिमा नीर गंगा सम

    पर्यटक बन मैं भ्रमण कर रहा हूँ,
    हिन्दी साहित्य का आनंद ले रहा हूँ,
    मुझे प्रेम हो गया है कविता रचना से,
    शाश्वत सुख की अनुभूति ले रहा हूँ।

    हिन्दी कविता के नौ रस अति मोहक
    अलंकार व्याकरण बद्ध सम्मोहक,
    नव साहित्य सृजन का श्रेष्ठ धर्म,
    भुवन राममय में निर्वहन कर रहा हूँ।

    हिंदी मातृभाषा मेरी, हम सबकी,
    जननी सम प्रिय अति पावन लागै,
    शिशुपन, बचपन, यौवन की साथी,
    हिन्दी सदा मेरे आपके मन को भावै।

    पढ़ी, लिखी है अंग्रेज़ी भी सबने,
    पर संस्कृति की बेटी है रुचिकर,
    हिंदी भारतीय भाषाओं की अग्रजा
    को मिले राजभाषा का अधिकार।

    हिन्दी की गरिमा नीर गंगा सम,
    अति-पावन श्रेष्ठ औषधि सम,
    कल्पना, सोच, संकल्प, लेखनी,
    आदित्य सम्पूरित अभिलाषा मम।

    डा. कर्नल आदिशंकर मिश्र
    विद्या वाचस्पति, लखनऊ

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    600 बीमारी का एक ही दवा RENATUS NOVA

  • दुश्मन देश के साथ क्रिकेट का क्या औचित्य?

    दुश्मन देश के साथ क्रिकेट का क्या औचित्य?

    14 सितम्बर को दुबई इण्टरनेशनल क्रिकेट स्टेडियम में होने वाला एशिया कप 2025 का भारत-पाकिस्तान मुकाबला खेल से कहीं अधिक एक भावनात्मक और राजनीतिक बहस बन चुका है। आम तौर पर इस मैच का ऐलान होते ही पूरे देश में उत्साह और रोमांच का माहौल बनता है। टिकट कुछ ही घंटों में बिक जाते हैं, पब और रेस्टोरेंट्स बड़ी स्क्रीन पर लाइव प्रसारण दिखाने के लिए बुकिंग शुरू कर देते हैं और लोग इसे क्रिकेट का महाकुंभ मानते हैं लेकिन इस बार नज़ारा बिल्कुल उलट है। पहलगाम हमले और ऑपरेशन सिंदूर की टीस अब भी ताज़ा है और देश का जनमानस पूछ रहा है कि जब हमारे जवानों और नागरिकों का खून अभी सूखा भी नहीं तो दुश्मन देश के साथ क्रिकेट खेलने का क्या औचित्य है?
    22 अप्रैल को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुआ आतंकी हमला भारत की आत्मा को झकझोर देने वाला था। 4 आतंकियों ने बैसरन घाटी में टूरिस्टों पर अंधाधुंध फायरिंग की और धर्म पूछकर लोगों को गोलियों से भून दिया। इस नृशंस वारदात में 26 निर्दोषों की जान चली गई जिनमें महिलाएं, बच्चे, एक नेपाली नागरिक और एक ईसाई पर्यटक शामिल थे। 22 लोग घायल हुए। आतंकी संगठन ‘द रेसिस्टेंस फ्रंट’ (TRF) जो लश्कर-ए-तैयबा की शाखा है, ने इसकी जिम्मेदारी ली। भारतीय खुफिया एजेंसियों ने साफ किया कि यह पाकिस्तान प्रायोजित हमला था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तुरंत सऊदी अरब यात्रा रद्द कर आपात बैठक बुलाई और गृह मंत्री अमित शाह ने सुरक्षा समीक्षा की। इसके बाद भारत ने अटारी-वाघा बॉर्डर बंद कर दिया, पाकिस्तानी वीज़ा रद्द कर दिए और सिंधु जल संधि स्थगित कर दी। इस हमले की तुलना ‘हमास पैटर्न’ से की गई क्योंकि इसमें सीधे निर्दोष नागरिकों को निशाना बनाया गया।
    पहलगाम की इस त्रासदी के बाद देश का गुस्सा शांत नहीं हुआ था कि मई में भारत ने जवाबी कार्रवाई के तौर पर “ऑपरेशन सिंदूर” शुरू किया। भारतीय वायुसेना के राफेल विमानों ने पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के मुजफ्फराबाद और कोटली से लेकर पाकिस्तान के बहावलपुर तक नौ आतंकी ठिकानों को SCALP मिसाइलों से तबाह कर दिया। रक्षा मंत्रालय के अनुसार इस कार्रवाई में करीब 100 आतंकी और 130 पाकिस्तानी सैनिक मारे गये लेकिन पाकिस्तान ने भी पलटवार किया और ड्रोन तथा मिसाइल हमलों में भारत ने 20 जवान खो दिए। यह देश के लिए एक और बड़ा सदमा था। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि भारत ने मुंहतोड़ जवाब दिया है लेकिन शहीदों की कुर्बानी ने जनता को गहराई तक आहत कर दिया।
    इसी पृष्ठभूमि में जब भारत-पाकिस्तान क्रिकेट मैच की घोषणा हुई तो जनता का गुस्सा फूट पड़ा। ट्विटर, फेसबुक और इंस्टाग्राम पर BoycottPakCricket और PahalgamAttack जैसे हैशटैग ट्रेंड करने लगे। लोग लिख रहे थे कि शहीदों के खून पर क्रिकेट का तमाशा नहीं होना चाहिए। कई जगहों पर बीसीसीआई के खिलाफ प्रदर्शन हुए पाकिस्तानी झंडे जलाए गए। मुरादाबाद में सपा नेता एसटी हसन ने कहा कि शहीदों के अपमान को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। बीजेपी के पूर्व सांसद गौतम गंभीर ने ट्वीट किया कि आतंकवाद रुके बिना पाकिस्तान से कोई मैच नहीं खेला जाना चाहिए। शिवसेना (UBT) के संजय राउत ने इसे राष्ट्रद्रोह बताया और बीसीसीआई को कटघरे में खड़ा किया। आदित्य ठाकरे ने तो यहां तक कहा कि पाकिस्तान से क्रिकेट खेलना शहीदों के परिवारों के जख्मों पर नमक छिड़कना है। यहां तक कि लेफ्ट और राइट पार्टियां, जो अक्सर एक-दूसरे के खिलाफ रहती हैं, इस बार एक सुर में पाकिस्तान के साथ क्रिकेट का विरोध करती दिखीं।
    सिर्फ राजनीतिक दल ही नहीं, बल्कि क्रिकेट जगत के कई बड़े नाम भी इस बहस में कूद पड़े। पूर्व क्रिकेटर हरभजन सिंह ने साफ कहा कि भारत-पाक मैच तब तक नहीं होना चाहिए जब तक रिश्ते सामान्य नहीं हो जाते। उनका कहना था कि जब हमारे जवान घर नहीं लौटते तो ऐसे समय में पाकिस्तान के साथ क्रिकेट खेलना देश की भावनाओं के साथ खिलवाड़ है। यही भावना शहीदों के परिवारों की भी है। कानपुर के शहीद शुभम द्विवेदी की पत्नी और पिता ने सोशल मीडिया पर भावुक पोस्ट लिखकर सरकार और बीसीसीआई से पाकिस्तान का पूर्ण बहिष्कार करने की मांग किया।
    दूसरी तरफ सरकार और बीसीसीआई का रुख कुछ और है। अगस्त 2025 में खेल मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि पाकिस्तान के साथ द्विपक्षीय सीरीज नहीं होगी लेकिन एशिया कप जैसे बहुपक्षीय टूर्नामेंट्स में भारत की भागीदारी बनी रहेगी। बीसीसीआई सचिव देवजीत सैकिया ने भी यही कहा कि भारत सरकार ने बहुपक्षीय टूर्नामेंट्स में रोक नहीं लगाई है। चूंकि एशिया कप का आयोजन एशियन क्रिकेट काउंसिल (ACC) के तहत हो रहा है और पाकिस्तान ने भारत में खेलने से इनकार कर दिया, इसलिए मैच दुबई में तय किया गया। बीसीसीआई अधिकारियों ने खुद मैच के लिए दुबई जाने से इनकार किया है लेकिन टीम को भेजा जा रहा है। सवाल यह उठ रहा है कि जब सरकार ने पाकिस्तान के साथ सिंधु जल संधि स्थगित कर दी, जब बॉर्डर सील कर दिए गये तो फिर क्रिकेट को अपवाद क्यों बनाया जा रहा है?
    इस बीच सुप्रीम कोर्ट में भी यह मामला पहुंचा। पुणे के एक सामाजिक कार्यकर्ता ने याचिका दाख़िल की कि भारत-पाकिस्तान मैच रद्द किया जाए क्योंकि यह शहीदों का अपमान है लेकिन अदालत ने त्वरित सुनवाई से इनकार कर दिया और कहा कि यह सिर्फ एक खेल है, इसमें भावनाओं को न मिलाया जाए। यह फैसला जनता के गुस्से को और भड़का गया। लोग कह रहे हैं कि अगर यह सिर्फ खेल है तो फिर देशभक्ति के नाम पर हर मंच पर क्रिकेट का इस्तेमाल क्यों किया जाता है? इस पूरे विवाद का असर मैदान से बाहर भी दिख रहा है। आम तौर पर भारत-पाक मुकाबले के टिकट कुछ ही घंटों में बिक जाते हैं लेकिन इस बार दुबई स्टेडियम के आधे टिकट अभी भी अनबिके हैं। रेस्तरां और पब ने भी बड़े स्क्रीन पर मैच दिखाने के विज्ञापन बंद कर दिए हैं। एक प्रतिष्ठिात समाचार पत्र के ऑनलाइन पोल में 80 फीसदी लोगों ने पाकिस्तान से क्रिकेट खेलने का विरोध किया है। यह साफ संकेत है कि जनता इस बार क्रिकेट को मनोरंजन के तौर पर स्वीकार करने को तैयार नहीं है।
    कुछ विश्लेषक तर्क दे रहे हैं कि भारत को इस मैच से 7000 करोड़ रुपये से ज्यादा का राजस्व और करोड़ों की व्यूअरशिप मिलती है। क्रिकेट भारत की सॉफ्ट पावर है और इसका असर 2036 ओलंपिक की मेज़बानी की दावेदारी पर भी पड़ सकता है लेकिन दूसरी तरफ तर्क यह भी है कि अमेरिका और रूस जैसे देशों ने भी शीत युद्ध के दौरान ओलंपिक का बहिष्कार किया था, फिर भी वे महाशक्तियां बनीं। भारत 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने की राह पर है तो क्या शहीदों की कुर्बानी से ऊपर क्रिकेट का पैसा रखा जा सकता है? इस मैच को लेकर पाकिस्तान के पूर्व कप्तान शाहिद अफरीदी के बयानों ने भी आग में घी डालने का काम किया है। उन्होंने कहा कि भारत क्रिकेट का इस्तेमाल राजनीति के लिए करता है जिससे भारतीय सोशल मीडिया और ज़्यादा भड़क उठा। बीजेपी पर विपक्षी दल आरोप लगा रहे हैं कि सरकार पाकिस्तान के खिलाफ सिर्फ ज़ुबानी राष्ट्रवाद दिखाती है लेकिन व्यावहारिक स्तर पर क्रिकेट और अन्य क्षेत्रों में ढील दे देती है।
    अब सवाल यह है कि जब प्रधानमंत्री खुद कह चुके हैं कि “खून और पानी एक साथ नहीं बह सकते,” तो क्या खून और क्रिकेट साथ बह सकते हैं? क्या शहीदों के खून का मोल सिर्फ इतना है कि हम सोशल मीडिया पर श्रद्धांजलि दें और अगले ही पल दुश्मन देश के साथ बैट-बॉल का खेल खेलने बैठ जाएं?14 सितंबर को जब टीम इंडिया मैदान पर उतरेगी तो खिलाड़ियों का ध्यान भले रन और विकेट पर हो लेकिन दर्शकों की निगाहें सिर्फ क्रिकेट पर नहीं होंगी। वे यह भी देख रहे होंगे कि क्या शहीदों की कुर्बानी से बड़ा हमारे लिए कोई खेल हो सकता है। यह मुकाबला सिर्फ भारत और पाकिस्तान के बीच क्रिकेट नहीं, बल्कि देश की आत्मा और सम्मान की कसौटी भी है।
    अजय कुमार
    वरिष्ठ पत्रकार लखनऊ
    मो.नं. 9335566111

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  • वंशवाद में सिमटती देश की राजनीति

    वंशवाद में सिमटती देश की राजनीति


    भारतीय राजनीति में वंशवाद का मुद्दा कोई नई बात नहीं है लेकिन हाल ही में एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) और नेशनल इलेक्शन वॉच (एलईडब्लूय) द्वारा 12 सितंबर 2025 को जारी रिपोर्ट ने इस पुरानी समस्या को एक बार फिर ताज़ा कर दिया है। इस रिपोर्ट में देश भर के 5,204 सांसदों, विधायकों और विधान परिषद सदस्यों की गहन पड़ताल की गई और चौंकाने वाला तथ्य सामने आया कि हर पांच में से एक नेता, यानी लगभग 21 प्रतिशत जनप्रतिनिधि, राजनीतिक परिवारों से आते हैं। यह आंकड़ा सिर्फ संख्याओं का खेल नहीं है, बल्कि यह लोकतंत्र की कमजोर होती नींव का प्रतीक है। लोकसभा में यह आंकड़ा और भी अधिक, 31 प्रतिशत तक पहुँच गया है। राज्यसभा में 21 प्रतिशत, राज्य विधानसभाओं में 20 प्रतिशत और विधान परिषदों में 22 प्रतिशत नेता परिवारवाद की छाया में राजनीति कर रहे हैं।परिवारवाद की जड़ें इतनी गहरी हैं कि उन युवा नेताओं को आगे बढ़ने का मौका ही नहीं मिलता है जिनके परिवार में कोई राजनीति से जुड़ा नहीं है। सवाल यह है कि कांग्रेस में गांधी परिवार, राष्ट्रीय जनता दल में लालू के बाद उनके बेटे तेजस्वी यादव, समाजवादी पार्टी में मुलायम सिंह के बाद उनके बेटे अखिलेश यादव, तमिलनाडु में करुणानिधि की वंशवाद वाली सियासत, महाराष्ट्र में उद्धव की शिवसेना में उद्धव ठाकरे के बाद उनके बेटे आदित्य ठाकरे, राम विलास पासवान के बाद उनके बेटे चिराग पासवान को, पंजाब में बादल परिवार, हरियाणा में चौटाला परिवार तो बसपा में मायावती के बाद उनके भतीजे आकाश, पश्मिच बंगाल में ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी को ही उत्तराधिकारी की कुर्सी क्यों मिलती है। क्या पार्टी में परिवार से बाहर के नेताओं की कमी रहती है।
    बात राष्ट्रीय दलों से शुरू की जाय तो इसमें कांग्रेस सबसे आगे है। नेहरू-गांधी परिवार की विरासत यहाँ स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी जैसे नाम सिर्फ कांग्रेस की ही नहीं, बल्कि देश की राजनीति में वंशवाद का प्रतीक बन चुके हैं। कांग्रेस के कुल नेताओं में 32 प्रतिशत परिवारवादी हैं। समाजवादी पार्टी (सपा) में यह आंकड़ा 30 प्रतिशत, भाजपा में 17 प्रतिशत और वामपंथी दल सीपीआई(एम) में केवल 8 प्रतिशत है। इसके विपरीत, तृणमूल कांग्रेस, एआईएडीएमके जैसी दलों में यह प्रतिशत काफी कम है दृ 10 और 4 प्रतिशत। इसका कारण है कि ये दल मजबूत संगठन और काडर-आधारित संरचना पर विश्वास करते हैं जिससे नये नेताओं को मौका मिल पाता है।
    क्षेत्रीय दलों की स्थिति और भी चिंताजनक है। एनसीपी (शरद पवार गुट) और जम्मू-कश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस में 42-42 प्रतिशत नेता राजनीतिक परिवारों से आते हैं। वाईएसआर कांग्रेस में यह आंकड़ा 38 प्रतिशत और तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) में 36 प्रतिशत है। यह दर्शाता है कि दक्षिण भारत में भी परिवारवाद अब राजनीति का स्थायी हिस्सा बन चुका है। टीडीपी के चंद्रबाबू नायडू और वाईएसआरसी के जगन मोहन रेड्डी इसके जीते-जागते उदाहरण हैं।
    राज्यवार आंकड़े भी चिंताजनक हैं। उत्तर प्रदेश वंशवाद का सबसे बड़ा गढ़ माना जाता है। 604 जनप्रतिनिधियों में 141 (23 प्रतिशत) परिवारवादी हैं। लोकसभा में यूपी के 28 सांसदों में राहुल गांधी (रायबरेली), अखिलेश यादव (कन्नौज), अनुप्रिया पटेल (अपना दल), जितिन प्रसाद (पीलीभीत) और जयंत चौधरी (रालोद) शामिल हैं। राज्यसभा में राम गोपाल यादव, आरपीएन सिंह, नीरज शेखर जैसे नामों ने यह साबित किया कि यहां वंशवाद गहराई तक फैला हुआ है। समाजवादी पार्टी के 161 नेताओं में 48 (30 प्रतिशत) और भाजपा के 17 प्रतिशत नेता वंशवादी हैं।
    अनुपात में आंध्र प्रदेश सबसे ऊपर है जहां 255 नेताओं में 86 (34 प्रतिशत) परिवारवादी हैं। महाराष्ट्र में 403 में 129 (32 प्रतिशत), बिहार में 360 में 96 (27 प्रतिशत), कर्नाटक में 326 में 94 (29 प्रतिशत) और असम में केवल 13 (9 प्रतिशत) नेता परिवारवादी हैं। तमिलनाडु (15 प्रतिशत) और पश्चिम बंगाल (9 प्रतिशत) में काडर-आधारित दलों की मजबूती के कारण यह आंकड़ा कम है। झारखंड और हिमाचल प्रदेश में यह क्रमशः 28 और 27 प्रतिशत है। इन आंकड़ों से यह साफ़ होता है कि बड़े और प्रभावशाली राज्यों में वंशवाद लोकतंत्र को निगलता जा रहा है।
    महिलाओं के मामले में स्थिति और भी गंभीर है। कुल 539 महिला सांसदों-विधायकों में 47 प्रतिशत (251) नेता सियासी परिवारों से हैं जबकि पुरुष नेताओं में यह आंकड़ा केवल 18 प्रतिशत (856/4,665) है। उत्तर प्रदेश में 69 महिला नेताओं में से 29 (42 प्रतिशत), महाराष्ट्र में 39 में 27 (69 प्रतिशत), आंध्र प्रदेश में 29 में 20 (69 प्रतिशत) और बिहार में 44 में 25 (57 प्रतिशत) महिला नेता परिवारवाद से आते हैं। तेलंगाना में यह आंकड़ा 64 प्रतिशत और गोवा-पुडुच्चेरी में 100 प्रतिशत है। भाजपा में 41 प्रतिशत और कांग्रेस में 53 प्रतिशत महिला नेता परिवार से हैं। सपा में यह संख्या 67 प्रतिशत है। इसका मतलब यह साफ़ है कि महिलाओं को राजनीति में लाने का मार्ग परिवारवाद के माध्यम से ही संभव होता है जबकि गैरराजनीतिक पृष्ठभूमि वाली महिलाओं के लिए अवसर सीमित रह जाते हैं। वंशवाद केवल बड़े दलों तक सीमित नहीं है। छोटे और अपंजीकृत दलों के 87 नेताओं में से 21 (24 प्रतिशत) वंशवादी हैं। नौ दल पूरी तरह से परिवार आधारित हैं। निर्दलीयों में 94 में से 23 (24 प्रतिशत) नेता राजनीतिक परिवारों से आते हैं। यह दिखाता है कि वंशवाद हर स्तर पर गहरा चुका है और इसका दायरा न केवल राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय दलों तक, बल्कि स्थानीय राजनीति तक फैल चुका है।
    एडीआर की रिपोर्ट ने इसके चार प्रमुख कारण बताए हैं। पहला कारण है चुनावों का महंगा होना। एक औसत उम्मीदवार को चुनाव जीतने के लिए करोड़ों रुपये खर्च करने पड़ते हैं। ऐसे में दल उन लोगों को टिकट देते हैं जिनके पास पैसा और नेटवर्क हो। दूसरा कारण है दलों में आंतरिक लोकतंत्र का अभाव। उम्मीदवारों का चयन पारदर्शी नहीं होता और परिवार हावी हो जाते हैं। तीसरा कारण ‘जीतने की क्षमता’ का तर्क है। राजनीतिक परिवारों के नाम और नेटवर्क वोट दिलाने में मदद करते हैं। चौथा कारण सामाजिक न्याय के नाम पर बने दलों में भी परिवारवाद का प्रभाव है। सपा, आरजेडी जैसे दलों में परिवार ही राजनीति का केंद्र बन चुके हैं।
    इस रिपोर्ट में वंशवाद को रोकने के लिए कुछ ठोस सुझाव भी दिए गए हैं। सख्त कानून बनाए जाने चाहिए, ताकि दलों में आंतरिक लोकतंत्र सुनिश्चित किया जा सके। आंतरिक चुनाव और गुप्त मतदान के माध्यम से पद चयन और टिकट वितरण में पारदर्शिता लानी चाहिए। महिलाओं के लिए एक-तिहाई टिकट अनिवार्य की जानी चाहिए और उल्लंघन पर सख्त कार्रवाई हो। महिलाओं का सशक्तिकरण सुनिश्चित करना होगा और प्रॉक्सी या टोकन उम्मीदवारों की नीति समाप्त करनी होगी। उम्मीदवारों को परिवार की शक्ति के बजाय योग्यता के आधार पर चयनित किया जाना चाहिए। चुनाव आयोग की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। दलों को अपने चयन मानदंड सार्वजनिक करने होंगे और दलों को आरटीआई के दायरे में लाया जाना चाहिए। चुनाव खर्च पर सख्त सीमा लगाई जानी चाहिए। युवाओं को भी मौके मिले, गैर-वंशवादी उम्मीदवारों और महिलाओं को प्रोत्साहित किया जाए और मतदाताओं को वंशवाद के नुकसान के बारे में जागरूक किया जाय।
    वंशवाद लोकतंत्र को धीरे-धीरे खोखला कर रहा है। यह नई प्रतिभाओं को दबाता है, जवाबदेही को कमजोर करता है और लोकतांत्रिक मूल्यों के साथ खिलवाड़ करता है। एडीआर की यह रिपोर्ट इस बात का स्पष्ट संकेत है कि सभी दल कांग्रेस, भाजपा, सपा, टीडीपी को अपनी कमियों को सुधारना होगा। नेपाल में जेन जेड ने नेपोटिज़्म के खिलाफ आंदोलन कर सरकार तक गिरा दी। भारत के युवा भी अगर जागरूक हो तो बदलाव की राह बन सकती है। प्रधानमंत्री मोदी ने गैर-राजनीतिक युवाओं को मौका देने की बात कही है लेकिन जमीनी बदलाव अभी धीमा है। सवाल यह है कि क्या हम योग्यता पर आधारित लोकतंत्र चाहते हैं या वंशवाद के खेल को जारी रखना चाहते हैं? जवाब आने वाला समय ही देगा।
    संजय सक्सेना
    वरिष्ठ पत्रकार लखनऊ
    मो.नं. 9454105568

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  • 2047: अमृतकाल में भारत की राह तय करेगा काशी का भविष्य

    2047: अमृतकाल में भारत की राह तय करेगा काशी का भविष्य


    सुरेश गांधी
    जब भारत अपनी आज़ादी के 100 वर्ष पूरे करेगा, तब उसकी पहचान केवल आर्थिक शक्ति से नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, सांस्कृतिक गहराई और पर्यावरण-संवेदनशील विकास से होगी या यूं कहे भारत 2047 का अर्थ केवल चमकदार अर्थव्यवस्था या जीडीपी नहीं, बल्कि हर नागरिक की गरिमा और परंपरा की रक्षा है। यह समान अवसरों वाला समाज है जहां हर बच्चे को डिजिटल और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, हर परिवार को बेहतर स्वास्थ्य सेवा और हर युवा को गरिमापूर्ण रोजगार मिले। स्वच्छ ऊर्जा, जल संरक्षण और हरित तकनीक विकास की रीढ़ बनें। उत्तर प्रदेश और उसकी आत्मा कहे जाने वाली काशी (वाराणसी) इस परिवर्तन की धुरी हैं। यहां से निकला कोई भी सुधार न केवल प्रदेश बल्कि पूरे देश को दिशा देगा। वाराणसी इस बदलाव का नेतृत्व कर सकता है जहां घाटों की प्राचीनता और गलियों की आधुनिकता हाथ थामे चलें। जब काशी की हर गली में स्वच्छता, रोशनी और अवसर की खुशबू होगी तभी शताब्दी वर्ष का जश्न सच में पूर्ण होगा। यही असली अमृतकाल की परिभाषा है और यही भारत की आत्मा का उत्सव।
    आज़ादी की शताब्दी वर्ष 2047 अब कोई दूर का स्वप्न नहीं, बल्कि ठोस तैयारी और दूरदर्शिता की मांग करता वर्तमान है। प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र वाराणसी, जहां आस्था, इतिहास और संस्कृति की अनगिन परतें हैं, भारत के उस भविष्य का प्रतीक है जिसमें प्राचीन धरोहर और आधुनिक विकास का अद्भुत संगम है। गंगा की अनंत धाराओं पर झिलमिलाता काशी का चांदनी आभा से भरा आकाश, यह दृश्य केवल एक नगर का नहीं, बल्कि भारत की सनातन आत्मा का प्रतीक है। हजारों वर्षों से यह भूमि साधना और जागरण का दीपक जलाए हुए है। आज जब भारत अपनी आज़ादी के शताब्दी वर्ष 2047 की ओर बढ़ रहा है, काशी केवल तीर्थ नहीं, बल्कि अमृतकाल की दिशा दिखाने वाला उज्ज्वल पथप्रदर्शक बन खड़ा है लेकिन सवाल है कि इस लक्ष्य तक कैसे पहुंचा जाए, ख़ासकर तब, जब गलियों की तंग चौकियों, टूटी नालियों और गंदगी से जूझता यह नगर रोज़ाना हमें उसकी वास्तविक चुनौतियों से परिचित कराता है। मतलब साफ है वाराणसी के गलियारों से होकर ही भारत 2047 का रास्ता निकलता है, यह सर्वविदित है। विकास का अर्थ केवल चौड़ी सड़कों और ऊंची इमारतों तक सीमित नहीं होना चाहिए। यह सांस्कृतिक स्मृति और आधुनिक नागरिक जीवन का संतुलन है। जब काशी की हर गली स्वच्छ, रोशन और सुरक्षित होगी, जब हर घर में पानी, शिक्षा और रोज़गार की रोशनी होगी, तब ही भारत अपनी शताब्दी का जश्न उस गर्व से मना पाएगा जो केवल अतीत की नहीं, भविष्य की भी धरोहर बनेगी।
    वैसे भी 2047 का भारत केवल आर्थिक महाशक्ति नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और पर्यावरणीय संतुलन का आदर्श होना चाहिए। शिक्षा में क्रांति के तहत हर बच्चे तक डिजिटल और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पहुंचानी होगी। स्थानीय भाषाओं में उच्च-स्तरीय शोध सामग्री उपलब्धता के साथ ही हर ब्लॉक में डिजिटल स्मार्ट-क्लास और उच्च शिक्षा में शोध-नवाचार के लिये राज्य-निधि की स्थापना करनी होगी। स्वास्थ्य का अधिकार यानी जिला स्तर पर विश्वस्तरीय अस्पताल, 2030 तक हर 10,000 लोगों पर कम-से-कम एक बहु-विशेषज्ञ अस्पताल सहित टेलीमेडिसिन और ग्रामीण स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं का जाल बिछाना होगा। स्वच्छ ऊर्जा और जल प्रबंधन के लिए सौर, पवन और बायो-गैस को रोज़मर्रा के जीवन का हिस्सा बनाना होगा। साथ ही वर्षा जल-संरक्षण और नदी पुनर्जीवन की योजनाएं विकसित करनी होगी। रोज़गार का नया मानक गढ़ने के साथ ही कृषि आधारित उद्योग, स्टार्टअप इनक्यूबेशन और ग्रामीण हस्तशिल्प का अंतरराष्ट्रीय विपणन पर जोर देना होगा। जैविक खेती का विस्तार, फसल बीमा की 100 फीसदी कवरेज और किसान उत्पादक संगठन (एफपीओ) को सीधे वैश्विक बाजार से जोड़ना होगा। देश की सबसे बड़ी आबादी वाला राज्य होने के नाते यूपी में शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार को प्राथमिकता देनी ही होगी। खासकर पूर्वांचल औद्योगिक कॉरिडोर के तहत वाराणसी, गाज़ीपुर, आज़मगढ़, भदोही, मिर्जापुर और गोरखपुर को जोड़ते हुए आईटी और फूड-प्रोसेसिंग हब बनाना होगा। स्मार्ट कृषि यानी सेंसर-आधारित सिंचाई, जैविक खेती और किसान उत्पादक संगठन को बढ़ावा देना होगा। महिला एवं युवा उद्यमिता के क्षेत्र में ज़िला स्तर पर माइक्रो-फाइनेंस और को-वर्किंग स्पेस देना होगा।

    चुनौती और अवसर
    23 करोड़ की आबादी वाला यूपी अगर शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार में निर्णायक सुधार करे तो भारत की प्रगति को कई गुना गति दे सकता है। काशी की गलियां आध्यात्मिकता की जीवित स्मृतियां हैं, मगर यथार्थ में जलभराव, कचरा और जर्जर मकानों से जूझती हैं। कॉरिडोर और घाटों का सौंदर्यीकरण सराहनीय है परंतु मोहल्लों के भीतर अब भी पुराने ढर्रे का दर्द है। इसे तत्काल सुधारना होगा। गली-नाली जीर्णोद्धार के अंतर्गत हर वार्ड का डिजिटल नक्शा और स्मार्ट ड्रेनेज सफाई अभियान चलाना होगा। 24×7 पेयजल आपूर्ति करनी होगी, पाइपलाइन दुरुस्ती और जल मीटरिंग को दुरुस्त करना होगा. कचरा प्रबंधन के तहत घर-घर पृथक कचरा संग्रह, मोहल्ला-स्तर कम्पोस्टिंग प्लांट को बढ़ती आबादी को देखते हुए और अधिक विकसित करना होगा। सौर रोशनी यानी प्रमुख सड़कों पर ही नहीं सभी गलियों में सौर-ऊर्जा आधारित स्ट्रीट लाइट लगानी होगी। इसके अलावा मध्यम अवधि में इन-सिटू स्लम अपग्रेडेशन के तहत बिना विस्थापन के झुग्गी क्षेत्रों को पक्का मकान में बदलना होगा। पैदल-पथ और ई-शटल यानी पुरानी गलियों में निजी वाहनों पर रोक, इलेक्ट्रिक रिक्शा सेवा को बढ़ावा देना होगा। हस्तशिल्प बाजार को बेहतर बनाने के लिए बुनकर और काष्ठ-शिल्पियों के लिए डिज़ाइन लैब और निर्यात केन्द्र की स्थापना करनी होगी। साथ ही हस्तकला संकुल बड़ालालपुर को बुनकरपरक बनाना होगा जिससे वे उसका लाभ ले सकें। हरियाली परियोजना के तहत मोहल्लों में छोटे पार्क, छतों पर ग्रीन गार्डन योजना को विकसित करना होगा। कुछ प्रमुख सड़कों पर भूमिगत यूटिलिटी रिंग के तहत बेहतरी तो हुई है लेकिन बिजली, पानी, इंटरनेट और गैस का साझा नेटवर्क तैयार करना अभी बाकी है। गंगा तट की बाढ़ सुरक्षा को बायो-इंजीनियरिंग से तटबंध, वर्षा जल-संग्रह आदि पर खास परियोजनाओं का संचालन करना होगा। सांस्कृतिक पर्यटन वृत्त के मामले में विश्वस्तरीय संग्रहालय, संगीत-गली महोत्सव और इंटरनेशनल रिसर्च सेंटर को और अधिक विकसित करनी होगी। क्लाइमेट-रेज़िलिएंट अवसंरचना के अंर्गत बाढ़ और हीटवेव दोनों से सुरक्षित आवास बनाना होगा।

    नागरिक भागीदारी: असली कुंजी
    काशी का भविष्य केवल इसके प्राचीन वैभव में नहीं, बल्कि आधुनिक सुविधाओं और नागरिक भागीदारी में भी है। 2047 में जब भारत आज़ादी का शताब्दी पर्व मनाए, तब काशी की हर गली स्वच्छ, रोशन और अवसरों से भरी हो, यही असली अमृतकाल की पहचान होगी। यह केवल वाराणसी का नहीं, बल्कि पूरे भारत का संकल्प है और यही हमारे स्वतंत्रता उत्सव का सबसे सच्चा उत्सव होगा। हालांकि सरकार की योजनाएं तभी सफल होंगी जब नागरिक सक्रियता से जुड़ें। वार्ड एक्शन सेल के तहत हर मोहल्ले में 10 से 15 सदस्यों की निगरानी टीम गठित करनी होगी। पब्लिक डैशबोर्ड यानी ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म जहां हर योजना की प्रगति दिखाई दें, को बढ़ावा देना होगा। सीएसआर और क्राउडफंडिंग के तहत स्थानीय व्यापारी, प्रवासी काशीवासी और धार्मिक संस्थाओं का आर्थिक सहयोग करना होगा।

    मापदंड और लक्ष्य
    दो वर्षों में 80 फीसदी जलभराव की घटनाओं में कमी लानी होगी। 5 वर्षों में चौबीसों घंटे पानी और शत-प्रतिशत कचरा पृथक्करण योजना विकसित करने को प्राथमिकता देना होगा। अगले दस वर्षों में 90 फीसदी मकानों का बाढ़-रोधी नवीनीकरण करना होगा।

    परम्परा की गहराइयों से भविष्य की उड़ान
    महामुक्ति की कामना लिए यहां की हर गली में इतिहास सांस लेता है। शैव साधना की गंभीरता, बुद्ध के करुणा संदेश, कबीर की निर्भीक वाणी, सब कुछ इस नगरी के कण-कण में आज भी गूंजता है। यही वह भूमि है जहां ऋषियों ने ब्रह्मज्ञान दिया और संतों ने समाज को नई दृष्टि। और यही वह काशी है, जो आज आधुनिक विज्ञान, स्मार्ट तकनीक और डिजिटल युग की ऊर्जा से परिपूर्ण हो, भविष्य का नया नक्शा गढ़ रही है।

    आधुनिक विकास का सांस्कृतिक आलोक
    विश्वनाथ धाम कॉरिडोर की भव्यता, घाटों का नवीनीकरण, रिवरफ्रंट की नयी चमककृयह सिर्फ विकास नहीं, बल्कि अतीत और आधुनिकता के अनोखे संगम की साक्षी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहल से काशी का कायाकल्प केवल ईंट-पत्थर का विस्तार नहीं, बल्कि यह संदेश है कि जड़ों से जुड़कर भी दुनिया के साथ कदमताल किया जा सकता है।

    गंगा: नदी से अधिक, जीवन की चेतना
    अमृतकाल का भारत तभी संपूर्ण होगा जब उसकी नदियां अविरल और निर्मल रहें। गंगा यहां केवल जलधारा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय जीवनरेखा है। काशी में चल रही स्वच्छता मुहिम, हरित ऊर्जा और जैविक खेती की पहलकदमियां यही दर्शाती हैं कि विकास और प्रकृति का संतुलन ही असली प्रगति है। काशी की यह पर्यावरण-संवेदनशील सोच पूरे देश के लिए आदर्श बन सकती है।

    ज्ञान और नवाचार की नई काशी
    काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की शैक्षणिक गरिमा, आईआईटी बीएचयू के शोध प्रयोग, स्टार्टअप्स की नई उड़ान, यह सब बताता है कि ज्ञान का पुरातन दीपक अब नवाचार की रोशनी से और प्रखर हो रहा है। यही वह चेतना है जो भारत को 2047 तक आत्मनिर्भर और विश्वगुरु बनाने की ताकत देती है।

    विश्व को जोड़ती सांस्कृतिक कूटनीति
    वाराणसी अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की सॉफ्ट पावर का उजला चेहरा है। यहां का शास्त्रीय संगीत, योग, आयुर्वेद, बनारसी बुनकरी और गंगा-जमुनी तहजीब विदेशी अतिथियों के लिए अद्भुत आकर्षण हैं। काशी की यह सांस्कृतिक कूटनीति भारत की वैश्विक पहचान को और गहरा करती है।

    अमृतकाल का संदेश
    काशी का मर्म यही कहता है, “परंपरा और प्रगति विरोधी नहीं, सहयात्री हैं।” जब भारत अमृतकाल की ओर बढ़ रहा है, काशी यह स्मरण कराती है कि विकास तभी दिव्य होगा जब वह आत्मा, संस्कृति और प्रकृति का आदर करे। गंगा के जल में प्रतिबिंबित दीपों की लहरों-सा काशी भारत को यह संदेश देती है कि आधुनिकता की ओर बढ़ते हुए भी अपनी आध्यात्मिक जड़ों से जुड़े रहना ही सच्चा विकास है। अमृतकाल का भारत जब 2047 में विश्व के शिखर पर खड़ा होगा तो उसकी राह में काशी की यह अमर ज्योति सदैव पथ आलोकित करती रहेगी।

    क्या कहते हैं काशीवासी
    वाराणसी व्यापार मंडल के अध्यक्ष अजीत सिंह बग्गा कहते हैं कि आज़ादी के सौ साल पूरे होने में अब दो दशक से भी कम समय बचा है। भारत 2047 का सपना सिर्फ़ आर्थिक शक्ति बनने का नहीं, बल्कि हर नागरिक के जीवन को गरिमामय बनाने का है। इस दृष्टि से उत्तर प्रदेश, देश की जनसंख्या, राजनीति और संस्कृति का केंद्र होगा जो सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। और यूपी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संसदीय क्षेत्र वाराणसी, यह दिखाने का सबसे बड़ा उदाहरण है कि परंपरा और आधुनिकता का संगम कैसा हो सकता है। वाराणसी की संकरी गलियों को पैदल मार्ग घोषित करना होगा, बाहरी क्षेत्रों में मल्टीलेवल पार्किंग की व्यवस्था करनी होगी। ई-शटल सेवा और छोटे इलेक्ट्रिक रिक्शा का प्रोत्साहन देना होगा। गलियों में हस्तशिल्प हाट, साड़ी-बुनाई और पीतल कारीगरी के लिए स्थायी बाजार मुहैया कराना होगा। युवाओं के लिए पर्यटन गाइड, होम स्टे और डिजिटल टूरिज़्म प्रशिक्षण देना होगा।

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  • मध्य प्रदेश पर्यटन में संस्कृति, प्रकृति और प्रशासनिक नवाचार की संगति

    मध्य प्रदेश पर्यटन में संस्कृति, प्रकृति और प्रशासनिक नवाचार की संगति

    डॉ. मयंक चतुर्वेदी
    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह कथन कि “मध्य प्रदेश पर्यटन भारत की अर्थव्यवस्था में नई ऊर्जा का संचार करेगा” केवल एक औपचारिक प्रशंसा भर नहीं है, देखा जाए तो यह उस गहन परिवर्तन की ओर संकेत है जो राज्‍य ने पिछले कुछ वर्षों में पर्यटन के क्षेत्र में किया है। आज जब वैश्विक परिदृश्य में पर्यटन उद्योग अर्थव्यवस्था की धुरी, रोजगार का प्रमुख स्रोत और सांस्कृतिक कूटनीति का माध्यम बन चुका है, तब मप्र का यह उदय राष्ट्रीय ही नहीं, वैश्विक संदर्भ में भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
    मध्य प्रदेश की धरती पर नजर डालें तो यह मानो भारत का एक सजीव मिनिएचर प्रतीत होती है। यहां की सांस्कृतिक विविधता, प्राचीन धरोहरें, प्राकृतिक सौंदर्य, जनजातीय जीवन और आध्यात्मिक वातावरण सभी मिलकर एक ऐसी समृद्ध विरासत का निर्माण करते हैं जो पर्यटकों को अद्भुत अनुभव प्रदान करती है। खजुराहो में बाहर से अंदर की यात्रा कराते कामुक शिल्प से लेकर भीमबेटका की गुफा चित्रकल, सांची के स्तूप, ग्वालियर-ओरछा के भव्य किले, सतपुड़ा की गहरी वादियों से लेकर बांधवगढ़ और कान्हा के बाघों तक यह प्रदेश पर्यटन के हर आयाम को अपने भीतर समेटे हुए है किंतु इस विरासत को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने का कार्य केवल प्राकृतिक उपहारों से नहीं हुआ है, उसके लिए दूरदृष्टि, प्रशासनिक इच्छाशक्ति और सतत प्रयास आवश्यक रहे हैं।
    अभी हाल ही में केंद्रीय पर्यटन और संस्कृति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने मध्य प्रदेश टूरिज्म बोर्ड (एमपीटीबी) को प्रतिष्ठित बेस्ट स्टेट टूरिज्म बोर्ड अवॉर्ड से सम्मानित किया है। इस राष्ट्रीय स्तर के सम्मान ने भारत के पर्यटन क्षेत्र में नवाचार, उत्कृष्टता और सतत विकास को लेकर मध्य प्रदेश की अग्रणी भूमिका को रेखांकित किया है। इस तरह के अनेक सम्‍मान एवं पुरस्‍कार लगातार मप्र को पर्यटन क्षेत्र में मिल रहे हैं। वास्‍तव में यही वह बिंदु है जहां राज्‍य के पर्यटन विभाग और विशेष रूप से अपर मुख्य सचिव पर्यटन, संस्कृति, गृह और धार्मिक न्यास एवं धर्मस्व तथा प्रबंध संचालक, मध्य प्रदेश टूरिज्म बोर्ड शिव शेखर शुक्ला के नेतृत्व को रेखांकित करना जरूरी हो जाता है। प्रशासनिक सेवा में अपने व्यापक अनुभव और गहन समझ के कारण शुक्ल ने पर्यटन को केवल सरकारी विभाग की गतिविधि न मानकर इसे राज्य की अर्थव्यवस्था और समाज का केंद्र बिंदु बनाने का प्रयास किया। उनके प्रयासों ने यह सिद्ध किया कि यदि नियोजन और क्रियान्वयन में स्पष्टता हो तो किसी भी क्षेत्र में उल्लेखनीय परिवर्तन संभव है।
    सबसे पहले बात करें दृष्टिकोण की। शुक्ल ने पर्यटन को एक समग्र विकास उपकरण के रूप में देखने की सोच विकसित की। उनके लिए पर्यटन केवल होटल या गाइड तक सीमित नहीं था, बल्कि यह ग्रामीण आजीविका, महिला सशक्तिकरण, हस्तशिल्प संवर्द्धन और पर्यावरण संरक्षण से जुड़ा एक समग्र अभियान था। यही कारण है कि उन्होंने पर्यटन स्थलों को विकसित करते समय स्थानीय समुदाय को केंद्र में रखा। चाहे ओरछा में होमस्टे मॉडल की शुरुआत हो या भील व गोंड अंचलों में सांस्कृतिक महोत्सवों का आयोजन इन पहलों ने न केवल पर्यटकों को आकर्षित किया, बल्कि स्थानीय लोगों के लिए स्थायी आजीविका भी सुनिश्चित की।
    पर्यटन की आधुनिक अवधारणा में अनुभव आधारित यात्रा (Experience-based tourism) की बड़ी भूमिका है। शुक्ल ने इस प्रवृत्ति को भली भांति समझा और राज्‍य में नाइट सफारी, हेरिटेज वॉक, एडवेंचर ट्रेल्स, कुलिनरी फेस्टिवल्स जैसी गतिविधियों को बढ़ावा दिया। इससे एक ओर जहां पर्यटक केवल दर्शक न रहकर सहभागी बन पाए, वहीं दूसरी ओर राज्य ने खुद को एक ब्रांड के रूप में स्थापित किया। “एमपी गजब है” जैसी टैगलाइन को नई ऊर्जा मिली और यह केवल एक विज्ञापन वाक्य नहीं रहा, बल्कि वास्तविक अनुभवों से जुड़कर पर्यटकों के मन में बसा।
    आधुनिक तकनीक के प्रयोग में भी शिवशेखर शुक्ल ने खास पहल की। डिजिटलीकरण के युग में पर्यटन को यदि वैश्विक प्रतिस्पर्धा में आगे लाना है तो तकनीक का उपयोग अनिवार्य है। शुक्ल ने डिजिटल कैंपेन, वर्चुअल टूर और ऑनलाइन बुकिंग पोर्टल को बढ़ावा दिया। कोविड-19 महामारी के दौरान जब यात्रा ठप हो गई थी, तब मध्य प्रदेश पर्यटन विभाग ने वर्चुअल प्लेटफॉर्म के जरिए पर्यटकों से जुड़ाव बनाए रखा। यह दूरदृष्टि ही थी जिसने राज्य को महामारी के बाद तेजी से उबरने में मदद की।
    आज राज्‍य की पहचान ईको-टूरिज्‍म से भी है। सतपुड़ा, बांधवगढ़, कान्हा, पेंच जैसे राष्ट्रीय उद्यान विश्व स्तर पर प्रसिद्ध हैं किंतु चुनौती यह थी कि इन उद्यानों के विकास और संरक्षण के साथ वहां रहने वाले स्थानीय समुदायों को भी जोड़ा जाय। शुक्ल ने इस दिशा में ईको-टूरिज्‍म बोर्ड की गतिविधियों को मजबूती दी। अब गांवों में ईको हॉटल्स, गाइड प्रशिक्षण और स्थानीय हस्तशिल्प विपणन जैसी योजनाओं के जरिए वन्यजीव संरक्षण के साथ स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूत किया जा रहा है।
    इसी तरह से संस्कृति और पर्यटन का गहरा संबंध है। शुक्ल ने इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए खजुराहो डांस फेस्टिवल, तांगा महोत्सव, ओरछा महोत्सव और मंडला आदिवासी उत्सव जैसे आयोजनों को नया आयाम दिया। इन आयोजनों ने एक ओर जहां देश-दुनिया के कलाकारों को मंच दिया, वहीं दूसरी ओर राज्‍य की विविधतापूर्ण सांस्कृतिक आत्मा को वैश्विक पहचान दिलाई। इसके लिए विदेशों में रोड शो, अंतरराष्ट्रीय ट्रैवल मार्ट्स में भागीदारी और एमपी टूरिज्‍म की आक्रामक मार्केटिंग के माध्यम से राज्य की उपस्थिति को दर्ज कराया गया। परिणामस्वरूप मप्र न केवल घरेलू पर्यटकों का प्रिय गंतव्य बना है, बल्कि विदेशी पर्यटकों के लिए भी एक आकर्षण का केंद्र बनता जा रहा है।
    आंकड़े बताते हैं कि 2024 में राज्य ने लगभग 13.41 करोड़ पर्यटकों का स्वागत किया जो पिछले वर्ष की तुलना में करीब 19.6 प्रतिशत अधिक है। इनमें विदेशी पर्यटकों की संख्या लगभग 1.67 लाख रही। राज्य सरकार के अनुसार पर्यटन से प्राप्त राजस्व में वर्ष 2024-25 के दौरान 17 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई और इसका योगदान प्रदेश की सकल घरेलू उत्पाद में लगभग 3 से 3.5 प्रतिशत तक रहा है। अब लक्ष्य इसे आगामी वर्षों में 5 प्रतिशत तक पहुँचाने का है। अत: पर्यटन में बढ़ते निवेश का सीधा असर रोजगार पर दिखाई दे रहा है। वैश्विक निवेश सम्मेलन 2025 में पर्यटन क्षेत्र से जुड़े प्रस्तावों की राशि लगभग 4,468 करोड़ रही। एक अध्ययन के अनुसार पर्यटन क्षेत्र में प्रत्येक 10 लाख का निवेश औसतन 90 प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष नौकरियाँ सृजित करता है। इस पैमाने पर देखें तो यदि घोषित निवेश पूरी तरह लागू होता है तो लाखों नए रोजगार अवसर पैदा हो सकते हैं।
    इसी बीच मध्य प्रदेश पर्यटन बोर्ड ने कौशल विकास कार्यक्रमों पर भी जोर दिया है। अब तक 4000 से अधिक युवाओं को हॉस्पिटैलिटी, ट्रैवल मैनेजमेंट और सांस्कृतिक आयोजनों से जुड़े कौशलों का प्रशिक्षण दिया गया है। इनमें से लगभग 50 प्रतिशत युवा पूर्णकालिक पेशेवर के रूप में कार्यरत हो चुके हैं। यह संकेत है कि पर्यटन न केवल बड़े निवेश से, बल्कि मानवीय संसाधन विकास से भी रोजगार का मजबूत आधार तैयार कर रहा है।
    कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि यह वही परिदृश्य है जिसकी ओर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संकेत करते हुए कहा था कि “मध्य प्रदेश पर्यटन भारत की अर्थव्यवस्था में नई ऊर्जा का संचार करेगा।” वास्‍तव में प्रधानमंत्री मोदी द्वारा मध्य प्रदेश पर्यटन की प्रशंसा इसीलिए सार्थक है, क्योंकि यह केवल प्राकृतिक सौंदर्य की देन नहीं, बल्कि योजनाबद्ध प्रशासनिक प्रयासों का परिणाम है जिसमें शिवशेखर शुक्ल जैसे अधिकारियों एवं कर्मचारियों की भूमिका अग्रगण्‍य है। निश्चित ही आज शुक्‍ल के नेतृत्व में पर्यटन विभाग ने यह सिद्ध किया है कि यदि ईमानदारी और समर्पण से काम हो तो भारत के किसी भी राज्य को वैश्विक मानचित्र पर स्थापित किया जा सकता है। अंततः यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि मध्य प्रदेश पर्यटन की इस नई उड़ान के केंद्र में शिवशेखर शुक्ल जैसे अधिकारी की दूरदृष्टि और समर्पण प्रमुख कारक है। उनका कार्य हमें यह विश्वास दिलाता है कि यदि नेतृत्व सही हो, दृष्टिकोण स्पष्ट हो और प्रयास निरंतर हो तो कोई भी राज्य अपनी सीमाओं से निकलकर वैश्विक क्षितिज पर चमक सकता है।
    (लेखक राष्‍ट्रीय फिल्‍म प्रमाणन बोर्ड एडवाइजरी कमेटी के पूर्व सदस्‍य एवं पत्रकार हैं)

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  • हिन्दी भाषा राष्ट्रीय एकता की मजबूत कड़ी

    हिन्दी भाषा राष्ट्रीय एकता की मजबूत कड़ी

    हिन्दी दिवस (14 सितम्बर) पर विशेष
    हिन्दी है सबसे प्यारी, यह है सबको दुलारी। शब्दों की मिठास है हिंदी, भारत की खास है हिंदी।”
    हिन्दी दिवस हर वर्ष 14 सितंबर को उस ऐतिहासिक दिन की याद में मनाया जाता है। जब 1949 में भारतीय संविधान सभा ने हिंदी को भारत की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया। हिंदी मात्र संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति, सभ्यता और राष्ट्रीय एकता की पहचान है। हर वर्ष 14 सितंबर को मनाया जाने वाला हिंदी दिवस केवल एक औपचारिक अवसर नहीं है, बल्कि यह हमारी सांस्कृतिक पहचान, राष्ट्रीय एकता और भाषाई गौरव का प्रतीक है। यह केवल बोलने और पढ़ने की भाषा नहीं है, बल्कि यह हमारी संस्कृति, परंपराओं और विचारों का संगम है। मेरा मानना है कि अगर हिंदी को विज्ञान, तकनीक, प्रशासन शिक्षा आदि क्षेत्रों में समान रूप से प्रतिष्ठित किया जाए तो इसका विस्तार पूरे देश में सरलता के साथ हो सकता है। साथ ही वैश्विक स्तर पर यह एक सशक्त भाषा के रूप में उभरेगी। ऐसे में हम लोगों की जिम्मेदारी है कि हिंदी को अपनाए ही नहीं, बल्कि इसकी गरिमा को बनाने के साथ-साथ इसे आने वाली पीड़ियों तक संरक्षित करें। हिंदी केवल हमारी भाषा ही नहीं, बलिक हमारी अस्मिता है, इसलिए हमें अपनी भाषा हिंदी पर गर्व होना चाहिए। 1953 से प्रतिवर्ष मनाए जा रहे इस दिवस का महत्व आज के डिजिटल युग में और भी बढ़ गया है, जब भाषा न केवल सेवा का माध्यम है बल्कि तकनीकी प्रगति और वैश्विक पहचान का आधार भी बन गई है। इस दिन को हिंदी भाषा को सम्मानित करने और उसके प्रचार-प्रसार को बढ़ावा देने के लिए मनाया जाता है।

    ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: संघर्ष से सम्मान तक
    14 सितंबर 1949 का दिन भारतीय भाषा इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित है। इस दिन संविधान सभा ने देवनागरी लिपि में लिखी हिंदी को भारत संघ की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया था। यह निर्णय व्यावहारिक आवश्यकता और सांस्कृतिक पहचान के संतुलन का परिणाम था। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान महात्मा गांधी ने हिंदी को ‘जनभाषा’ कहा था। उनका मानना था कि जो भाषा देश की सबसे अधिक जनसंख्या द्वारा समझी जाती हो, वही राष्ट्रभाषा बनने की अधिकारी है। आज जब हम देखते हैं कि हिंदी को 52.83 करोड़ लोग मातृभाषा के रूप में बोलते हैं और लगभग 30 करोड़ अन्य लोग इसे द्वितीय भाषा के रूप में प्रयोग करते हैं तो गांधी जी की दूरदर्शिता स्पष्ट होती है।
    आधुनिक भारत में हिंदी की बढ़ती प्रासंगिकता

    1. डिजिटल क्रांति में हिंदी की भूमिका
    आज का युग डिजिटल क्रांति का युग है। इंटरनेट पर हिंदी सामग्री में प्रतिवर्ष 94% की वृद्धि हो रही है जो किसी भी अन्य भारतीय भाषा से कहीं अधिक है। गूगल के अनुसार भारत में इंटरनेट का प्रयोग करने वाले 42% लोग हिंदी में सर्च करते हैं। यह आंकड़ा दिखाता है कि तकनीकी प्रगति में हिंदी कितनी तेजी से अपना स्थान बना रही है। उदाहरण के लिए WhatsApp पर भेजे जाने वाले संदेशों में से 70% हिंदी या हिंदी मिश्रित भाषा में होते हैं। YouTube पर हिंदी सामग्री की खपत अंग्रेजी से भी अधिक हो गई है। ये तथ्य साबित करते हैं कि जनसामान्य अपनी मातृभाषा में ही सहज महसूस करता है।

    2. आर्थिक विकास में भाषा की शक्ति
    भाषा केवल संवाद का साधन नहीं, बल्कि आर्थिक विकास का भी महत्वपूर्ण कारक है। हिंदी भाषी क्षेत्रों में स्थित उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान जैसे राज्य आज तेजी से औद्योगीकरण की राह पर हैं। नोएडा, गुरुग्राम, पुणे जैसे शहरों में आईटी कंपनियों में हिंदी में काम करने वाले कर्मचारियों की संख्या लगातार बढ़ रही है। एक ठोस उदाहरण देखें तो, 2023 में माइक्रोसाफ्ट ने अपने आफिस सूट में हिंदी एआई असिस्टेंट लॉन्च किया जिससे हिंदी भाषी कार्यकर्ताओं की उत्पादकता में 35% तक वृद्धि हुई। इससे स्पष्ट होता है कि मातृभाषा में काम करने से न केवल सहजता आती है बल्कि दक्षता भी बढ़ती है।

    वैश्विक मंच पर हिन्दी की बढ़ती पहुंच
    अंतर्राष्ट्रीय स्वीकृति के उदाहरण
    आज हिंदी विश्व की चौथी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है। यूनेस्को के अनुसार 2050 तक हिंदी बोलने वालों की संख्या 65 करोड़ तक पहुंच सकती है। इस प्रक्षेपण के पीछे कई ठोस कारण हैं:——
    शिक्षा क्षेत्र में विस्तार: अमेरिका की 45 विश्वविद्यालयों में हिंदी विभाग हैं। हार्वर्ड, येल, कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय में हिंदी के प्रोफेसर हैं। जापान में 27 विश्वविद्यालयों में हिंदी पढ़ाई जाती है।
    मीडिया का प्रभाव: बॉलीवुड फिल्में 100 से अधिक देशों में रिलीज होती हैं। Netflix, Amazon Prime पर हिंदी सामग्री की मांग तेजी से बढ़ रही है। ‘गली बॉय’, ‘लगान’ जैसी फिल्में अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों के लिए नामांकित हुईं।
    व्यावसायिक क्षेत्र में हिंदी अंतर्राष्ट्रीय कंपनियां अब हिंदी बाजार को गंभीरता से ले रही हैं। Amazon का ‘Alexa’ हिंदी में बात करता है। Google Assistant हिंदी में 1000 से अधिक commands समझता है। McDonald’s, KFC, Domino’s जैसी कंपनियों ने अपने Indian menus में हिंदी नाम शामिल किये हैं।

    चुनौतियां और समाधान
    1. अंग्रेजी के वर्चस्व की चुनौती
    यह तर्क अक्सर दिया जाता है कि अंग्रेजी ज्ञान-विज्ञान की भाषा है और आधुनिक युग में इसके बिना प्रगति संभव नहीं। परंतु यह धारणा पूर्णतः सही नहीं है। चीन, जापान, जर्मनी, फ्रांस जैसे देशों ने अपनी मातृभाषा में तकनीकी और वैज्ञानिक विकास किया है।
    व्यावहारिक समाधान: द्विभाषी शिक्षा प्रणाली अपनाई जा सकती है। जहां बुनियादी शिक्षा मातृभाषा में हो और उच्च शिक्षा में अंग्रेजी को साधन के रूप में प्रयोग किया जाए। फिनलैंड इस मॉडल का सफल उदाहरण है।

    2. तकनीकी शब्दावली का अभाव
    हिंदी में तकनीकी शब्दावली की कमी एक वास्तविक समस्या है। परंतु यह समस्या असाध्य नहीं है।
    समाधान की दिशा: वैज्ञानिक और तकनीकी शब्दावली आयोग (CSTT) द्वारा लगातार नए शब्दों का निर्माण किया जा रहा है। ‘कंप्यूटर’ के लिए ‘संगणक’, ‘टेलीफोन’ के लिए ‘दूरभाष’ जैसे शब्द सफलतापूर्वक प्रचलित हुए हैं।

    3. क्षेत्रीय भिन्नता की समस्या
    हिंदी के विभिन्न क्षेत्रीय रूप कभी-कभी संवाद में बाधा बनते हैं। परंतु यह विविधता एक समस्या कम, समृद्धता अधिक है।
    रचनात्मक समाधान: खड़ी बोली को मानक रूप मानते हुए, क्षेत्रीय बोलियों को सांस्कृतिक धरोहर के रूप में संरक्षित किया जा सकता है। स्कूलों में ‘हिंदी की विविधता’ को एक विषय के रूप में पढ़ाया जा सकता है।

    हिन्दी के भविष्य की सम्भावनाएं
    1. कृत्रिम बुद्धिमत्ता में हिन्दी
    AI और Machine Learning के क्षेत्र में हिंदी की भूमिका तेजी से बढ़ रही है। ChatGPT, Google Bard जैसे AI Tools अब हिंदी में भी काम करते हैं। भविष्य में हिंदी में Voice Commands, Automated Translation, और Smart Home Devices का प्रयोग व्यापक होगा।

    2. ई-गवर्नेंस में हिंदी की भूमिका
    डिजिटल इंडिया मिशन के तहत सरकारी सेवाओं का डिजिटलीकरण हो रहा है। Common Service Centers पर 80% सेवाएं हिंदी में उपलब्ध हैं। UMANG app में 13 भारतीय भाषाओं में सेवाएं हैं जिसमें हिंदी सबसे लोकप्रिय है।

    3. स्टार्टअप इकोसिस्टम में हिंदी
    हिंदी में content creation, digital marketing, e-learning के क्षेत्र में अनगिनत अवसर हैं। Byju’s, Unacademy जैसी कंपनियों ने हिंदी content में भारी निवेश किया है। YouTube पर हिंदी channels की earnings अंग्रेजी channels से कई गुना बढ़ रही है।

    सुझाव और सिफारिशें
    1. शिक्षा व्यवस्था में सुधार
    —— प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में अनिवार्य हो
    —— उच्च शिक्षा में हिंदी माध्यम के विकल्प बढ़ाए जायं
    —— तकनीकी पुस्तकों का हिंदी अनुवाद प्राथमिकता से हो
    2. तकनीकी विकास में सहयोग
    —— हिंदी keyboards और fonts में सुधार
    —— Voice-to-text technology का विकास
    —— हिन्दी content creators के लिए विशेष प्रोत्साहन
    3. सांस्कृतिक संरक्षण के साथ आधुनिकीकरण
    —— पारम्परिक साहित्य का डिजिटाइजेशन
    —— हिन्दी podcasts और audio books को बढ़ावा
    —— सोशल मीडिया पर हिंदी content के लिए विशेष campaigns

    भविष्य की दिशा
    हिंदी दिवस 2024 पर यह स्पष्ट है कि हिंदी केवल एक भाषा नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक चेतना का प्रतिबिंब है। यह राष्ट्रीय एकता की धुरी है, आर्थिक विकास का साधन है और वैश्विक पहचान का आधार है। आज के डिजिटल युग में हिंदी की स्थिति पहले से कहीं मजबूत है। इंटरनेट, सोशल मीडिया और AI के साथ इसका तालमेल इसकी भविष्य की संभावनाओं को उज्जवल बनाता है परंतु इसके लिए सिर्फ सरकारी प्रयास पर्याप्त नहीं हैं। समाज के हर वर्ग को आगे आना होगा। युवाओं को समझना होगा कि हिंदी सीखना प्रगति में बाधा नहीं, बल्कि अतिरिक्त शक्ति है। व्यापारियों को अनुभव करना होगा कि हिंदी में व्यवसाय करना अधिक लाभकारी है। शिक्षकों को महसूस करना होगा कि मातृभाषा में शिक्षा देना अधिक प्रभावी है। जब हम कहते हैं “हिंदी है हम, वतन है हम” तो यह केवल भावनात्मक उद्गार नहीं है। यह एक व्यावहारिक सच्चाई है कि हिंदी हमारी पहचान है, हमारी शक्ति है और हमारे भविष्य की आधारशिला है। इस हिंदी दिवस पर संकल्प लें कि हम अपनी भाषा के प्रति गर्व महसूस करेंगे, इसका सम्मान करेंगे और इसे आगे बढ़ाने में अपना योगदान देंगे, क्योंकि जैसा कि भारतेंदु हरिश्चंद्र ने कहा था – “निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।” आज यह वाक्य पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक और सत्य है।
    डा. सुनील कुमार
    असिस्टेंट प्रोफेसर जनसंचार एवं पत्रकारिता विभाग
    वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय, जौनपुर।

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  • पड़ोसी देशों की अराजकता में भारतीय संविधान की ताकत का संदेश

    पड़ोसी देशों की अराजकता में भारतीय संविधान की ताकत का संदेश


    “हमें अपने संविधान पर गर्व है… पड़ोसी देशों को देखिए, वहां क्या हो रहा है।” सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई की यह टिप्पणी हाल ही में संविधान पीठ की सुनवाई में आई। यह वाक्य केवल एक कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा नहीं था, बल्कि दक्षिण एशियाई लोकतंत्र की मौजूदा स्थिति पर गहन चिंतन और चेतावनी भी था। गवई ने नेपाल और बांग्लादेश का हवाला देकर बताया कि जब संवैधानिक संस्थाएं कमजोर होती हैं, जब जनता का भरोसा व्यवस्था से उठता है तो लोकतंत्र भीड़तंत्र में बदल जाता है। भारत का संविधान आज इस मायने में सबसे बड़ी ढाल है कि उसने बार-बार हमें संकटों से निकालकर लोकतंत्र की नींव को मजबूत रखा।
    नेपाल का उदाहरण सबके सामने है। बीते दिनों वहां की सड़कों पर जिस तरह का आक्रोश देखने को मिला, उसने पूरे दक्षिण एशिया का ध्यान खींचा। सोशल मीडिया पर बैन लगाने के सरकार के फैसले ने आग में घी का काम किया। युवा वर्ग, जिसे ‘जेन-जेड’ कहा जा रहा है, अब केवल अभिव्यक्ति की आज़ादी के लिए नहीं बल्कि भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और राजनीतिक अस्थिरता के खिलाफ आवाज उठा रहा है। संसद भवन तक भीड़ का पहुंचना, सुप्रीम कोर्ट परिसर में तोड़फोड़ और नेताओं के घरों पर हमले यह साबित करते हैं कि जनता का धैर्य टूट चुका है। प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली और राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल को इस्तीफा देना पड़ा लेकिन हिंसा थमी नहीं। सेना को कर्फ्यू लगाना पड़ा, फिर भी आंदोलन जारी है।
    नेपाल में यह अस्थिरता नई नहीं है। 2008 में जब राजशाही खत्म हुई, तो लगा था कि अब लोकतंत्र स्थिरता और विकास का रास्ता खोलेगा।लेकिन हकीकत उलट निकली। पिछले 17 वर्षों में वहां 14 सरकारें बदल चुकी हैं, कोई भी प्रधानमंत्री कार्यकाल पूरा नहीं कर सका। बार-बार राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के अधिकारों पर विवाद हुआ। सुप्रीम कोर्ट ने सरकारें गिराईं और बहाल कीं। संविधान जो 2015 में लागू हुआ था, वह भी स्थिरता नहीं ला सका। परिणाम यह है कि जनता अब व्यवस्था से मोह भंग कर चुकी है और राजशाही की वापसी की मांग तक उठने लगी है।
    बांग्लादेश का परिदृश्य भी कुछ ऐसा ही है। हाल ही में प्रधानमंत्री शेख हसीना को सत्ता छोड़नी पड़ी और वे कुछ समय के लिए भारत में शरण लेने आईं। यह उस देश की त्रासदी है जिसने 1971 में पाकिस्तान से अलग होकर स्वतंत्रता पाई थी और लोकतांत्रिक भविष्य की उम्मीद जगाई थी। लेकिन वहां लगातार सत्ता संघर्ष, विपक्षी दलों के बीच अविश्वास और चुनावी प्रक्रिया पर सवालों ने संस्थाओं को खोखला बना दिया। जनता का भरोसा टूटने का नतीजा यही होता है कि लोकतंत्र केवल औपचारिकता रह जाता है और सड़क पर हिंसा ही असली राजनीति बन जाती है।
    इन हालातों की तुलना में भारत का लोकतंत्र और संविधान सबसे मजबूत उदाहरण बनकर सामने आता है। भारत ने भी संकटों का सामना किया है। 1975 का आपातकाल हमारे लोकतंत्र पर सबसे बड़ा हमला था। उस दौर में मौलिक अधिकार निलंबित कर दिये गये। मीडिया पर सेंसरशिप लगी और विपक्षी नेता जेल में ठूंस दिये गये लेकिन वही संविधान, वही लोकतांत्रिक चेतना और वही जनता थी जिसने 1977 में इंदिरा गांधी को सत्ता से बाहर कर दिया। जब जनता ने देखा कि नई सरकार उनकी उम्मीदों पर खरी नहीं उतर रही तो 1980 में उन्होंने इंदिरा को फिर से बहुमत से सत्ता में वापस ला दिया। यही संविधान की खूबसूरती है कि वह न केवल नेताओं को उनकी सीमा दिखाता है, बल्कि जनता को भी सही रास्ता चुनने की ताकत देता है।
    भारत की न्याय पालिका इस संविधान की सबसे बड़ी प्रहरी रही है। 1990 में मंडल कमीशन का मामला जब देशभर में हिंसा का कारण बना, तब सुप्रीम कोर्ट ने नौ जजों की पीठ बनाकर यह स्पष्ट किया कि आरक्षण पचास प्रतिशत से ज्यादा नहीं होगा और ‘क्रीमी लेयर’ को बाहर रखा जाएगा। इससे सामाजिक न्याय और समान अवसर का संतुलन बना रहा। 1992 में बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के बाद देश दंगों की आग में झुलस रहा था, तब सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि धार्मिक आस्था भी संविधान से ऊपर नहीं हो सकती। 2019 में आया फैसला संवैधानिक मर्यादा में रहा और देश ने बिना बड़े दंगे के उसे स्वीकार किया। इसी तरह 2जी स्पेक्ट्रम और कोयला घोटाले के मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के फैसले रद्द कर दिए। यह संदेश गया कि राष्ट्रीय संपत्ति का गलत इस्तेमाल करने वाला कोई भी नेता कानून से ऊपर नहीं है। यही वह तंत्र है जिसकी वजह से भारत में जनता का संविधान और न्याय पालिका पर भरोसा बना रहा जबकि पड़ोसी देशों में यह भरोसा टूट गया।
    भारत का संघीय ढांचा भी इसकी सबसे बड़ी ताकत है। केंद्र और राज्यों के बीच सत्ता का संतुलन किसी एक को तानाशाह बनने से रोकता है। चुनाव आयोग की निष्पक्षता ने भी लोकतंत्र को सुरक्षित रखा। यही कारण है कि हर पांच साल में सत्ता बदलने का अधिकार जनता के हाथ में रहता है और कोई भी नेता खुद को अजेय मानने की गलती नहीं कर पाता। चीफ जस्टिस की टिप्पणी दरअसल हमें यही याद दिलाती है कि लोकतंत्र केवल सत्ता का खेल नहीं है, बल्कि यह जनता की ताकत का प्रतीक है। भारत ने हर संकट से संवैधानिक रास्ते से ही बाहर निकलने का सबक सीखा है। इमरजेंसी हो, मंडल हो, बाबरी मस्जिद का विवाद हो या घोटालों का दौर हर बार संविधान ने रास्ता दिखाया।
    नेपाल और बांग्लादेश के हालात भारत के लिए भी चेतावनी हैं। अगर कभी संस्थाओं की स्वतंत्रता कमजोर हुई या नेताओं ने जनता का भरोसा तोड़ा तो हालात बिगड़ सकते हैं लेकिन अब तक भारत ने संविधान को ही सबसे बड़ा हथियार बनाया है। यही वजह है कि जब पड़ोसी देश अराजकता और अस्थिरता में झुलस रहे हैं, भारत का लोकतंत्र और संविधान मजबूती का प्रतीक बनकर सामने आता है। नेपाल का ‘जेन-जेड’ आंदोलन बता रहा है कि नई पीढ़ी अब पुरानी राजनीति और पुराने तौर-तरीकों को स्वीकार नहीं करेगी लेकिन हिंसा और आगजनी समाधान नहीं है। भारत का अनुभव यह कहता है कि परिवर्तन का रास्ता केवल संविधान और लोकतांत्रिक प्रक्रिया से ही निकलता है। जनता को अधिकार भी यही देता है और जिम्मेदारी का बोध भी यही कराता है।
    मुख्य न्यायाधीश गवई की टिप्पणी इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सिर्फ गर्व करने की बात नहीं है, बल्कि यह भविष्य के लिए चेतावनी भी है। अगर हमने अपने संविधान और संस्थाओं की रक्षा नहीं की तो हम भी उसी स्थिति में पहुंच सकते हैं जहाँ आज नेपाल और बांग्लादेश खड़े हैं। भारत की उपलब्धि यही है कि संविधान को व्यवहार में उतारा गया है। यह किताब में बंद दस्तावेज नहीं, बल्कि एक जीवंत परंपरा है जिसने 75 वर्षों से देश को दिशा दी है। इसी संविधान ने हमें लोकतंत्र के अंधेरों से बार-बार रोशनी की ओर पहुँचाया है। यही वजह है कि भारत आज दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में गर्व से खड़ा है जबकि पड़ोसी देशों की स्थिति हमें यह याद दिलाती है कि अगर संविधान कमजोर हो तो लोकतंत्र केवल एक छलावा बन जाता है।
    अजय कुमार
    वरिष्ठ पत्रकार लखनऊ
    मो.नं. 9335566111

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  • रामनगर की रामलीलाः जहां हर गली में बसती है अयोध्या, हर दृश्य में झलकता है त्रेता युग

    रामनगर की रामलीलाः जहां हर गली में बसती है अयोध्या, हर दृश्य में झलकता है त्रेता युग


    सुरेश गांधी
    गंगा के उस पार बसे रामनगर में हर साल आश्विन मास की संध्या आते ही लगता है मानो त्रेता युग लौट आया हो। गलियां अयोध्या बन जाती हैं, किला राजमहल, चौपालें जनकपुर और मैदान स्वर्णिम लंका। ढोल-नगाड़ों की थाप, अवधी की चौपाइयों और “जय श्रीराम” के उद्घोष के बीच जब हजारों श्रद्धालु प्रसंग-दर-प्रसंग कथा के साथ चलते हैं तो यह आयोजन केवल नाट्य नहीं, बल्कि आस्था और संस्कृति का जीवंत महाकुंभ प्रतीत होता है। जी हां, इन दिनों रामनगर भक्ति और उल्लास से सराबोर हैं। चारों ओर दीपों की रोशनी, ढोल-नगाड़ों की गूंज और रामचरित मानस की चौपाइयों की स्वर-लहरियां वातावरण को अद्भुत बना देती हैं। हर वर्ष की भांति इस बार भी आश्विन मास में यहां रामनगर की ऐतिहासिक रामलीला आरंभ हुई है जिसने नगर को अयोध्या के पावन रूप में ढाल दिया है। यह केवल नाट्य प्रस्तुति नहीं, बल्कि श्रद्धा, संस्कृति और अध्यात्म का ऐसा जीवंत महाकुंभ है जिसे देखकर हर कोई अपने आपको त्रेता युग का साक्षी मान बैठता है। खास यह है कि रामनगर की रामलीला को यूनेस्को ने “मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर” घोषित किया है। हर साल यहां हजारों विदेशी शोधार्थी और पर्यटक पहुंचते हैं जो भारतीय संस्कृति की इस अद्वितीय परंपरा को नजदीक से देखना चाहते हैं।
    धर्म एवं आस्था की नगरी काशी से गंगा पार उतरते ही रामनगर का वातावरण नवरात्र के दिनों में पूरी तरह बदल जाता है। सजी हुई गलियां, आस्थावान जनसमूह और चौपाइयों की गूंज, सब मिलकर ऐसा दृश्य रचते हैं, मानो स्वयं तुलसीदास की रामचरितमानस जीवंत हो उठी हो। संध्या होते ही लगता है मानो त्रेता युग लौट आया है। गलियां अयोध्या बन जाती हैं, किला राजमहल, चौपालें जनकपुर और मैदान स्वर्णिम लंका। ढोल-नगाड़ों की थाप, अवधी की चौपाइयों और “जय श्रीराम” के उद्घोष के बीच जब हजारों श्रद्धालु प्रसंग-दर-प्रसंग कथा के साथ चलते हैं तो यह आयोजन केवल नाट्य नहीं, बल्कि आस्था और संस्कृति का जीवंत महाकुंभ प्रतीत होता है, यही है विश्वविख्यात रामनगर की रामलीला। यह रामलीला केवल मंचन नहीं, बल्कि जीवन का अनुष्ठान है। यहां हर दर्शक केवल देखने नहीं आता, बल्कि कथा का हिस्सा बनता है।
    रामलीला देखने वाले श्रद्धालु इसे नाटक नहीं मानते। उनके लिए यह भक्ति और दर्शन का अनुभव है। जब सीता स्वयंवर के दृश्य में भगवान राम शिवधनुष उठाते हैं तो हजारों की भीड़ का “जय श्रीराम” उद्घोष वातावरण को थर्रा देता है। लंका दहन के समय आकाश में उठती अग्नि-लपटें केवल दृश्य नहीं, बल्कि अधर्म पर धर्म की विजय का जीवंत प्रतीक बन जाती हैं। तेजी से बदलते आधुनिक जीवन में जहां उत्सव केवल दिखावे और व्यापार तक सीमित हो रहे हैं, वहां रामनगर की रामलीला हमें याद दिलाती है कि उत्सव केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि संस्कृति और समाज की आत्मा होते हैं। यह लीला एक ऐसा दर्पण है जिसमें भारतीय जीवन-मूल्य, धर्म और लोकसंस्कृति एक साथ झलकते हैं। मतलब साफ है रामनगर की रामलीला केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि भारतीय समाज और संस्कृति की धड़कन है। यह हमें जोड़ती है, हमारे भीतर छिपे श्रद्धा और विश्वास को जगाती है और यह संदेश देती है कि चाहे समय कितना भी बदल जाए, धर्म, सत्य और संस्कृति की ज्योति कभी बुझने नहीं चाहिए।

    ढाई सौ वर्षों से बहती आस्था की गंगा
    रामनगर की रामलीला की परंपरा लगभग ढाई सौ वर्ष पुरानी है। 18वीं शताब्दी में काशी नरेश महाराजा उदित नारायण सिंह ने इसकी शुरुआत की थी। उनका उद्देश्य था कि रामचरित मानस केवल ग्रंथों तक सीमित न रहकर जन-जन तक जीवंत स्वरूप में पहुंचे। तब से लेकर आज तक यह परंपरा निरंतर चल रही है और काशी नरेश इसकी गरिमा और परंपरा के संरक्षक बने हुए हैं। काशी नरेश आज भी राज सिंहासन पर विराज करके रामलीला का संचालन करते हैं। जनता उन्हें भगवान राम का प्रतिनिधि मानकर नमन करती है। यह दृश्य हर उस व्यक्ति के लिए अद्भुत होता है जो पहली बार इस लीला का हिस्सा बनता है। यह केवल औपचारिक परंपरा नहीं, बल्कि जनता और राजपरिवार के बीच आस्था का वह सेतु है जो सदियों से अटूट बना हुआ है। खास बात यह है कि इसमें आधुनिक नाट्य तकनीक या कृत्रिम मंच का उपयोग नहीं होता। पूरा नगर ही मंच बन जाता है, कहीं जनकपुर, कहीं चित्रकूट, कहीं पंचवटी तो कहीं लंका। दर्शक कथा के साथ स्थान बदलते हैं और वे स्वयं को उस कालखंड में जीता हुआ अनुभव करते हैं। दर्शक भी स्थिर होकर नहीं बैठते, बल्कि कथा के साथ चलते हैं, स्थल-दर-स्थल तक जाते हैं और कथा का अंग बन जाते हैं। यही कारण है कि यहां की रामलीला 31 दिनों तक निरंतर चलती है और तुलसीदास कृत रामचरित मानस का हर प्रसंग अभिनय और पाठ के साथ प्रस्तुत होता है। इस रामलीला की आत्मा है, तुलसीदास का रामचरित मानस। प्रत्येक प्रसंग और संवाद सीधे मानस से लिए जाते हैं। अवधी की चौपाइयां जब गंगा तट पर गूंजती हैं तो पूरा वातावरण भक्ति रस से भर जाता है। यहां कलाकार किसी पारिश्रमिक की अपेक्षा नहीं रखते। उनका पुरस्कार है, जनता का आशीर्वाद और ईश्वर की कृपा। यही कारण है कि यह आयोजन केवल नाट्यकला न रहकर भक्ति और सेवा का जीवंत उदाहरण है।

    31 दिनों का अनुष्ठान
    लगभग पूरे महीने प्रतिदिन रामचरितमानस के प्रसंग क्रमवार मंचित होते हैं। दर्शक की उमड़ती है भीड़। लोग केवल देखने नहीं, बल्कि कथा के साथ चलते हैं। कला नहीं, साधना। कलाकार कोई पारिश्रमिक नहीं लेते, वे इसे अपनी सेवा और साधना मानते हैं। भाषा और लोकधुनों की शक्ति। चौपाइयों की स्वर लहरियां और अवधी की मिठास वातावरण को भक्तिमय बना देती हैं।लीला की विशेषताएं।

    परम्परा: 18वीं शताब्दी में काशी नरेश उदित नारायण सिंह ने की शुरुआत।
    मंचन शैली: पूरा नगर ही मंच, दर्शक कथा के साथ चलते हैं। किला प्रांगण में सजीव होता त्रेता युग।
    अवधि: 31 दिन तक निरंतर रामचरितमानस का जीवंत मंचन।
    काशी नरेश की भूमिका: आयोजन के संरक्षक; श्रद्धालुओं के लिए भगवान राम का प्रतिनिधि। आज भी लीला के संरक्षक, आस्था और परंपरा का प्रतीक।
    वैश्विक पहचान: यूनेस्को द्वारा “मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर” घोषित।
    भक्ति की विशेषता: कलाकार बिना पारिश्रमिक, केवल सेवा भाव से अभिनय करते हैं।
    सीता स्वयंवर: जनकपुर के राजदरबार में धनुष तोड़ते ही उमड़ पड़ी हर्ष, ध्वनि, राम-सीता मिलन का अलौकिक दृश्य। दरबार की चौपाल में गूंजती चौपाइयां और ‘जय श्रीराम’।
    लंका दहन: आकाश को चीरती मशालें, जब अधर्म पर धर्म की विजय होती है।
    रामजन्मोत्सव: किले के आंगन में जब ढोल-नगाड़ों की गूंज के बीच रामलला प्रकट होते हैं तो पूरा वातावरण ‘जय श्रीराम’ के उद्घोष से गूंज उठता है।
    राम-सीता विवाह बारात: राम-सीता विवाह का प्रसंग आते ही पूरा रामनगर जनकपुर में बदल जाता है। ढोलक की थाप और शहनाई की गूंज के बीच बारात गलियों से गुजरती है। छतों और चौखटों से महिलाएं फूल बरसाती हैं। बच्चे कौतूहल से बारात का हिस्सा बनने को आतुर दिखाई देते हैं। लोग कहते हैं, जब तक रामनगर की बारात न देखी, तब तक विवाह का असली आनंद अधूरा है। खास यह है कि फूलों से सजी गलियों से गुजरती राम बारात तो से झरते फूल और चौखटों से उठते मंगल गीत।
    वनगमन प्रसंग: वनगमन का दृश्य सबसे मार्मिक होता है। राम, सीता और लक्ष्मण जब राजमहल छोड़कर वनगमन करते हैं तो हजारों श्रद्धालु उनके साथ पैदल चल पड़ते हैं। यह दृश्य केवल नाटक नहीं लगता, बल्कि सचमुच ऐसा लगता है मानो राम वन की ओर बढ़ रहे हों और नगर की जनता उन्हें विदा कर रही हो। हजारों श्रद्धालु साथ चलते हुए उन्हें भावुक विदाई देते हैं।
    हनुमान झांकी: रामभक्ति की अद्भुत झलक, हनुमान का रूप देखते ही श्रद्धालुओं में भक्ति और उत्साह का ज्वार उमड़ पड़ता है।
    लंका दहन: लंका दहन और रावण वध का दृश्य आते ही पूरा आकाश “जय श्रीराम” के उद्घोष से गूंज उठता है। विशाल मैदान में खड़े रावण के पुतले के गिरते ही श्रद्धालुओं की आँखों में उल्लास और भक्ति की चमक एक साथ दिखाई देती है। अग्नि की लपटों में घिरी स्वर्णिम लंका, हनुमान के जयकारों से गूंज उठता है पूरा रामनगर।
    रावण वध: विजय का क्षण, रावण वध के साथ ही आसमान ‘जय श्रीराम’ के उद्घोष से थर्रा उठा।
    राम राज्याभिषेक: सोने के सिंहासन पर विराजमान राम, अयोध्या ही नहीं, पूरा रामनगर रामराज्य के उल्लास में डूबा।
    काशी नरेश का दरबार: राज सिंहासन पर विराजमान काशी नरेश, जनता उन्हें आज भी भगवान राम का प्रतिनिधि मानकर श्रद्धा अर्पित करती है।

    श्रद्धालुओं और पर्यटकों के अनुभव
    वाराणसी की वृद्धा जया देवी बताती हैं, हर वर्ष रामलीला देखे बिना जीवन अधूरा लगता है। यह हमारे लिए पूजा के समान है। जर्मनी से आए शिवानी दंपत्ति कहते हैं, यह नाटक नहीं, बल्कि जीती-जागती संस्कृति है। यहां लोग अभिनय नहीं देखते, बल्कि अपने विश्वास को जीते हैं। बीएचयू के सीनियर डॉ विजयनाथ मिश्रा उनका कहना है कि यह लीला जीवंत परंपरा और सांस्कृतिक धरोहर का वह अनमोल रत्न है जो आज भी हमें त्रेता युग की ओर ले जाता है। यह आस्था का मेला, अध्यात्म का उत्सव और संस्कृति की अद्भुत जीवंतता है। यहां मौजूद हर हृदय में राम के आदर्श अंकुरित हो उठते हैं। यहां मंच और दर्शक का भेद मिट जाता है। हर श्रद्धालु कथा का हिस्सा बन जाता है। यह आयोजन हमें बताता है कि भारत की संस्कृति में धर्म और कला एक-दूसरे के पूरक हैं। यही वह शक्ति है जिसने इस परंपरा को ढाई सौ वर्षों से अमर बनाए रखा है। और यही कारण है कि हर वर्ष गंगा तट पर स्थित यह नगर, मर्यादा पुरुषोत्तम राम के आदर्शों से आलोकित होकर मानवता को धर्म, सत्य और मर्यादा का संदेश देता है। यहां के कण-कण में गूंजता है रामचरित मानस का स्वर। अवधी भाषा का माधुर्य और भक्ति का रस जब गंगा तट पर गूंजता है तो वातावरण अलौकिक बन उठता है। गांव-गांव से आए लोग, साधु-संत, विदेशी अतिथि, सभी एक साथ इस भक्ति-धारा में बहते हैं। यहां कोई व्यावसायिकता नहीं, बल्कि केवल सेवा और श्रद्धा ही इसकी धुरी है। यही वह शक्ति है जिसने इस परंपरा को सदियों से अमर बनाए रखा है।

    प्रमुख झांकियां
    रामनगर की रामलीला की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह पूरे एक माह तक चलती है और हर दिन नए प्रसंग की झांकी प्रस्तुत होती है। प्रथम दिवस पर रामजन्मोत्सव का दृश्य होता है। इसके बाद बाललीलाएं, गुरुकुल वास, सीता स्वयंवर, विवाह उत्सव, वनगमन, वनवास के प्रसंग क्रमशः प्रस्तुत किए जाते हैं। लंका दहन और रावण वध का दृश्य अंतिम दिनों में होता है। विजयादशमी के दिन राम का राजतिलक सम्पन्न होता है और नगर हर्षोल्लास से भर जाता है। हर दिन हजारों की संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहते हैं और गंगा किनारे का यह नगर आस्था की लहरों से गूंज उठता है।

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    600 बीमारी का एक ही दवा RENATUS NOVA

  • एशिया के देश स्वेच्छाचारिता, भ्रष्टाचार एवं हिंसा के नये दौर में…

    एशिया के देश स्वेच्छाचारिता, भ्रष्टाचार एवं हिंसा के नये दौर में…


    एशिया के देश स्वेच्छाचारिता, भ्रष्टाचार और हिंसा के एक नए दौर में हैं। आम लोगों के जीवन में असुरक्षा बढ़ी है। इसका एक ताजा उदाहरण नेपाल में सोशल मीडिया को नियंत्रित करने पर युवाओं के विद्रोह रूप में सामने आया है। वे बड़े पैमाने पर बेरोजगारी के शिकार थे। बड़ी संख्या में नेपाली युवा अपने देश में काम न पाकर दुबई जैसे नगरों में जहालत के बीच काम करने जाते हैं और रोज काठमांडू एयरपोर्ट पर 4–5 युवाओं की लाशें पहुंचती हैं। दूसरी तरफ हर राजनेता के घर रुपयों की संदूकों से भरते जा रहे थे।
    बुरी आर्थिक दशा से परेशान होकर युवा सोशल मीडिया में मुखर होने लगे। उनकी बातें दुनिया के दूसरे देशों में पहुंच रही थीं। सरकार ने सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगा दिए। नौजवानों को लगा, उनका श्वासरुद्ध हो गया है। वे लाखों की संख्या में अचानक सड़कों पर उमड़ पड़े। उनका दमन हुआ, गोली कांड में बीसाधिक व्यक्ति मारे गये। उनका आक्रोश बढ़कर संसद, राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के घरों में आगजनी तक पहुंच गया। उल्लेखनीय है कि भ्रष्टाचार के विरुद्ध इस आवाज के पीछे एक अत्यंत लोकप्रिय नेपाली पॉप गायक सुदान है।
    सोशल मीडिया एक खुला आकाश है। इसमें पतंग उड़ाएं, मिसाइल छोड़ें या झूठ के बगुले उड़ाएं, समाज को विशेषकर युवाओं को कई बंधनों से गुजरने के बाद यह आकाश मिला है। इस आकाश को उनसे छीना नहीं जा सकता। हर वंचना, सूचनाओं की वंचना भी हिंसा को जन्म देती है और समाज का माहौल खराब करती है। कहीं भी कुछ मूल्यवान छीनने पर वही घटना होगी जो नेपाल में हुई। यह कैसी विडम्बना है कि अब सोशल मीडिया ही आखिरी शरणस्थल है। यह 21वीं सदी में व्यवस्था का सेफ्टी बाल्व भी है।
    यह भी कहने की जरूरत है कि इन घटनाओं से खुश होकर जो घर बैठे भारत में भी ऐसी किसी घटना की प्रतीक्षा कर रहे हैं, वे भ्रम में हैं। नेपाल एक छोटा और बहुत कम विविधता वाला देश है, इसलिए यहां यह संभव हुआ। नेपाल की राजशाही को उलटने के समय भी कुछ ऐसा ही दृश्य था।
    डा. ब्रजेश यदुवंशी
    सम्पादक/साहित्यकार
    मान्यता प्राप्त पत्रकार
    उत्तर प्रदेश शासन।

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    600 बीमारी का एक ही दवा RENATUS NOVA

  • जनसुनवाई में आये फरियादी की पीड़ा को डीएम ने समझा और किया निस्तारण

    जनसुनवाई में आये फरियादी की पीड़ा को डीएम ने समझा और किया निस्तारण

    जनसुनवाई में आये फरियादी की पीड़ा को डीएम ने समझा और किया निस्तारण

    जौनपुर। जिलाधिकारी डा. दिनेश चन्द्र के समक्ष जनसुनवाई के दौरान फरियादी राधेश्याम यादव निवासी चक इंग्लिस हैदर हुसैन बरेठी विकास खण्ड बरसठी ने प्रार्थना पत्र के माध्यम से अवगत कराया कि वे दोनों आंख से दिव्यांग होने के साथ अत्यन्त गरीब है। उनके पास रहने के लिये आवास भी नहीं है। आवास और दिव्यांग पेंशन के आवेदन के दौरान आधार कार्ड की मांग की जाती है। आधार कार्ड न होने के कारण दिव्यांग पेंशन और मुख्यमंत्री आवास सहित अन्य सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं ले पा रहे हैं।
    उक्त प्रार्थना पत्र को संज्ञान में लेते हुये जिलाधिकारी ने फरियादी को राजकीय वाहन से भेजकर 1 घण्टे के भीतर आधार कार्ड बनवाते हुये नियमानुसार दिव्यांग पेंशन और मुख्यमंत्री आवास योजना का लाभ देने हेतु प्रक्रिया शुरू करा दिया। जिलाधिकारी ने राधेश्याम को अंगवस्त्रम प्रदान करते हुये हरसंभव मदद हेतु आश्वासन भी दिया। साथ ही जिलाधिकारी ने राधेश्याम जी को इलेक्ट्रानिक ब्लाइन्ड स्टीक भी प्रदान किया गया और अंगवस्त्रम देकर सम्मानित भी किया।
    जिलाधिकारी ने बताया कि मुख्यमंत्री जी का स्पष्ट निर्देश है कि एसे प्रकरण में संवेदनशीलता के साथ त्वरित राहत दिलाई जाय। राधेश्याम जी द्वारा त्वरित गति से सुनवाई होने पर मुख्यमंत्री जी और जिला प्रशासन को धन्यवाद ज्ञापित किया गया। इस अवसर पर जिला दिव्यांगजन सशक्तिकरण अधिकारी दिव्या शुक्ला सहित अन्य सम्बन्धित लोग उपस्थित रहे।

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    600 बीमारी का एक ही दवा RENATUS NOVA

  • मायावती ने तोड़ा गठबन्धन का मोह

    मायावती ने तोड़ा गठबन्धन का मोह

    मायावती ने तोड़ा गठबन्धन का मोह

    कहा— बसपा अकेले लड़ेगी बिहार की 243 विधानसभा सीटें
    बिहार विधानसभा चुनाव 2025 का बिगुल अभी पूरी तरह नहीं बजा है लेकिन सियासी हलचलों ने पूरे राज्य में माहौल गरमा दिया है। इस बीच बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती ने ऐसा फैसला सुनाया जिसने सभी बड़े गठबंधनों को चौंका दिया। मायावती ने साफ कर दिया कि बसपा न तो भाजपा-जदयू के नेतृत्व वाले एनडीए के साथ जाएगी और न ही कांग्रेस-राजद के इंडिया गठबंधन में शामिल होगी। पार्टी सभी 243 सीटों पर अपने दम पर चुनाव लड़ेगी। यह ऐलान इसलिए भी अहम है, क्योंकि बिहार की राजनीति जातीय समीकरणों और गठबंधन की मजबूरियों पर टिकी रहती है और ऐसे में किसी बड़े दल का अकेले मैदान में उतरना कई समीकरणों को बदल सकता है। बसपा की जड़ें उत्तर प्रदेश की राजनीति में गहरी हैं जहाँ दलितों के सहारे मायावती 4 बार मुख्यमंत्री बनीं। पार्टी ने हमेशा बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर और कांशीराम के विचारों को आधार बनाया लेकिन यूपी से बाहर बसपा का असर सीमित ही रहा। बिहार में 1990 के दशक और 2000 के शुरुआती वर्षों में बसपा ने जरूर कई सीटों पर ठीक-ठाक वोट बटोरे थे। 2010 के विधानसभा चुनाव में बसपा को 3% वोट मिले थे जो बाद में गिरते-गिरते 2020 में 0.38% पर आ गए। सीटों की बात करें तो बसपा अब तक बिहार विधानसभा में एक भी सीट नहीं जीत पाई है। 2020 में गोपालगंज जैसी कुछ सीटों पर बसपा ने मजबूत मुकाबला जरूर किया लेकिन जीत हाथ नहीं लगी। यह इतिहास बताता है कि बिहार में बसपा की मौजूदगी तो है लेकिन उसे वोटों को सीटों में बदलने की चुनौती हमेशा से रही है।
    मायावती ने 2019 लोकसभा चुनाव में सपा के साथ गठबंधन कर 10 सीटें जीती थीं। यह बसपा के लिए बड़ी उपलब्धि थी लेकिन 2024 में जब पार्टी ने अकेले मैदान में उतरने का फैसला किया तो परिणाम शून्य रहा। यह अनुभव मायावती के लिए कड़वा था लेकिन उन्होंने इससे यह निष्कर्ष निकाला कि गठबंधन के सहारे मिली जीत टिकाऊ नहीं होती। यही कारण है कि अब उन्होंने क्षेत्रीय और राष्ट्रीय गठबंधनों से दूरी बना ली है। उनका मानना है कि बसपा को अपनी स्वतंत्र पहचान के साथ खड़ा होना होगा, चाहे शुरुआत में नतीजे कमजोर ही क्यों न हों। बसपा ने इस बार बिहार को 3 जोन में बांटा है। हर जोन की जिम्मेदारी वरिष्ठ नेताओं को दी गई है, ताकि संगठनात्मक स्तर पर मजबूती लाई जा सके। मायावती ने अपने भतीजे और राष्ट्रीय संयोजक आकाश आनंद को बिहार की कमान दी है। आकाश सितंबर से ‘अधिकार यात्रा’ शुरू करेंगे जिसमें दो दर्जन जिलों को कवर किया जाएगा। इस यात्रा का मकसद है दलित, अति पिछड़ा (EBC) और पसमांदा मुस्लिम समाज तक पहुँचना। बसपा का मानना है कि अगर इन वर्गों में सेंध लगाई जाए तो बिहार की राजनीति में जगह बनाई जा सकती है।
    बिहार की राजनीति हमेशा जातीय समीकरण पर टिकी रही है। राज्य में दलितों की आबादी करीब 16% है। अति पिछड़े वर्ग (EBC) करीब 20% हैं। मुसलमान लगभग 17% हैं जिनमें पसमांदा मुस्लिम सबसे बड़ी हिस्सेदारी रखते हैं। ये तीनों वर्ग मिलकर बिहार की लगभग आधी आबादी बनाते हैं। राजद यादव-मुस्लिम समीकरण पर टिका है। जदयू कुर्मी-कोइरी और अति पिछड़ों पर, भाजपा ऊपरी जातियों और शहरी मतदाताओं पर। ऐसे में बसपा का दांव है कि दलित, अति पिछड़े और पसमांदा मुस्लिम को जोड़कर वह ‘तीसरा विकल्प’ बने। मायावती के ‘मायावती मॉडल’ में जाटव/रविदास समाज को कोर वोट मानकर बाकी जातियों को भी साथ लाने की योजना है। हालांकि आंकड़े बताते हैं कि बसपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती वोट को सीट में बदलने की है। 2020 चुनाव में पार्टी ने कई सीटों पर 10-15 हजार वोट हासिल किये लेकिन जीत नहीं सकी। इसका कारण यह है कि बिहार में दलित वोटों का बंटवारा पहले से ही जदयू, राजद और कांग्रेस के बीच है। वहीं मुस्लिम वोट पर राजद और कांग्रेस का दबदबा है। ऐसे में बसपा को वोट शेयर बढ़ाने के लिए जमीनी स्तर पर लंबे संघर्ष की जरूरत होगी।
    मायावती के इस ऐलान ने इंडिया गठबंधन में बेचैनी बढ़ा दी है। विपक्ष को डर है कि बसपा के मैदान में उतरने से दलित और मुस्लिम वोटों का बंटवारा होगा जिसका सीधा फायदा भाजपा-एनडीए को मिल सकता है। यही स्थिति 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों में भी देखी गई थी, जब बसपा और अन्य छोटे दलों ने वोट काटकर भाजपा को बढ़त दिलाई। विश्लेषकों का मानना है कि 2025 में भी अगर बसपा 2-3% वोट हासिल कर लेती है तो कई सीटों पर नतीजे बदल सकते हैं। बिहार की राजनीति में कई बार 2-3 हजार वोट का अंतर तय करता है कि जीत किसकी होगी। बिहार चुनाव में केवल एनडीए और इंडिया गठबंधन ही नहीं, बल्कि कई छोटे दल भी सक्रिय हो चुके हैं। लोक जनशक्ति पार्टी (राम विलास) ने सभी 243 सीटों पर चुनाव लड़ने का ऐलान किया है। विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) ने आरक्षण पर गीत लॉन्च करके प्रचार अभियान शुरू कर दिया है। सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के ओम प्रकाश राजभर भी बिहार में तीसरे मोर्चे की संभावनाएं तलाश रहे हैं। इन सबके बीच बसपा का अकेले उतरना यह संकेत देता है कि बिहार में इस बार मुकाबला केवल दो गठबंधनों के बीच सीमित नहीं रहेगा।
    आकाश आनंद पर मायावती ने बड़ी जिम्मेदारी डाली है। यह न केवल बिहार चुनाव की चुनौती है बल्कि उनके नेतृत्व कौशल की भी परीक्षा है। अगर आकाश आनंद अपनी ‘अधिकार यात्रा’ और संगठनात्मक पकड़ से बसपा को कुछ सीटें दिलाने में सफल रहते हैं तो यह उनके राजनीतिक करियर का मजबूत आधार बनेगा। वहीं अगर परिणाम निराशाजनक रहे तो विपक्ष बसपा को वोटकटवा पार्टी बताने से पीछे नहीं हटेगा मायावती का यह ऐलान केवल चुनावी रणनीति नहीं बल्कि एक बड़ा राजनीतिक संदेश भी है। उन्होंने साफ कर दिया कि बसपा किसी भी गठबंधन की मोहताज नहीं है। पार्टी बाबा साहेब के मिशन और कांशीराम की सोच के सहारे अपनी स्वतंत्र पहचान बनाएगी। यह दांव जोखिम भरा जरूर है लेकिन इससे बसपा की छवि मजबूत हो सकती है।
    बिहार चुनाव 2025 में बसपा का यह कदम तय करेगा कि पार्टी राष्ट्रीय राजनीति में अपनी जमीन कैसे मजबूत करती है। अगर दलित, अति पिछड़ा और पसमांदा मुस्लिम समाज बसपा के साथ खड़ा होता है तो आने वाले समय में बिहार की राजनीति का नया समीकरण उभर सकता है लेकिन अगर यह दांव विफल हुआ तो बसपा की स्थिति और कमजोर हो सकती है। फिलहाल इतना तय है कि मायावती ने बिहार चुनाव को लेकर बड़ा दांव खेला है। यह दांव सत्ता दिलाए या न दिलाये लेकिन सियासी संदेश जरूर देगा कि बसपा अब समझौते की राजनीति से बाहर निकलकर अपनी अलग पहचान के साथ मैदान में है।
    अजय कुमार
    वरिष्ठ पत्रकार लखनऊ
    मो.नं. 9335566111

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    600 बीमारी का एक ही दवा RENATUS NOVA

  • सत्ता का अधिपत्य नहीं, बल्कि सांस्कृतिक चेतना है हिन्दू राष्ट्र

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    सत्ता का अधिपत्य नहीं, बल्कि सांस्कृतिक चेतना है हिन्दू राष्ट्र

    सुरेश गांधी
    मोहन भागवत का संदेश केवल भाषण नहीं, बल्कि भविष्य का खाका है। इसमें हिंदू राष्ट्र की व्यापक अवधारणा, शिक्षा-संस्कार की अनिवार्यता, सामाजिक सद्भाव और सेवा भाव जैसे बिंदु जुड़े हैं। भारत की आत्मा उसकी संस्कृति और परंपरा में है। यदि नई पीढ़ी इन मूल्यों को आत्मसात करेगी तो अगले तीन दशकों में भारत न केवल आर्थिक महाशक्ति बनेगा, बल्कि दुनिया का मार्गदर्शक भी होगा। आज भी संघर्ष जारी है, मगर हमें विश्वास है, भारत विश्वगुरु बनेगा और मानवता को नई दिशा देगा। मतलब साफ है डॉ. मोहन भागवत के विचार और संघ की शताब्दी वर्ष की व्याख्यान माला से स्पष्ट होता है कि संघ समय के अनुसार अपनी कार्यशैली और दृष्टिकोण में बदलाव ला रहा है। यह बदलाव संगठनात्मक शक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज के नैतिक, सांस्कृतिक और वैचारिक विकास पर केंद्रित है। संघ का समावेशी दृष्टिकोण, सामाजिक समरसता और राष्ट्र निर्माण की दिशा में योगदान आज अत्यंत प्रासंगिक है। समाज में एकजुटता, नैतिकता और समावेशिता से ही राष्ट्र सशक्त और आत्मनिर्भर बन सकता है। शताब्दी वर्ष का यह संदेश न केवल संघ के स्वयंसेवकों के लिए प्रेरणादायक है, बल्कि पूरे देश के नागरिकों के लिए मार्गदर्शक है। राष्ट्र निर्माण केवल राजनीतिक निर्णयों या सत्ता संघर्ष से नहीं होता, बल्कि समाज के प्रत्येक नागरिक की जिम्मेदारी, जागरूकता और सक्रिय भागीदारी से संभव है। या यूं कहे आरएसएस और डॉ. मोहन भागवत की यह यात्रा भारतीय समाज के समग्र विकास, सांस्कृतिक जागरूकता और राष्ट्र निर्माण की दिशा में प्रेरणादायक मार्गदर्शन प्रस्तुत करती है।
    राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) का स्थापना वर्ष 1925 से लेकर आज तक भारतीय समाज और राष्ट्र निर्माण में उसकी भूमिका उल्लेखनीय रही है। संघ ने समाज में नैतिकता, संस्कृति और सेवा के मूल्यों को मजबूत किया है। 2025 में संघ का शताब्दी वर्ष केवल संगठन की उपलब्धियों का उत्सव नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश लेकर आया है। संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित तीन दिवसीय व्याख्यान माला ’100 वर्ष की संघ यात्राः नए क्षितिज’ में संघ की विचारधारा, कार्यशैली और भविष्य की दिशा पर विस्तार से विचार प्रस्तुत किए। उनका दृष्टिकोण स्पष्ट है: राष्ट्र निर्माण केवल सत्ता या राजनीति तक सीमित नहीं, बल्कि सामाजिक, नैतिक और सांस्कृतिक जागरूकता के माध्यम से संभव है। डॉ. भागवत का यह संदेश वर्तमान समय में विशेष प्रासंगिक है, जब भारत के सामाजिक ताने-बाने में विविधता के बावजूद एकता बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो गया है। उनका मानना है कि व्यक्ति और समाज दोनों का सशक्तिकरण राष्ट्र की मजबूती के लिए अनिवार्य है।
    डॉ. भागवत ने ’हिंदू’ की परिभाषा को पारंपरिक धार्मिक सीमाओं से हटाकर सांस्कृतिक और समावेशी दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया। उनके अनुसार हिंदू केवल जातीय या धार्मिक पहचान नहीं, बल्कि जीवन दर्शन और सांस्कृतिक मूल्य है। इस दृष्टिकोण से यह संदेश मिलता है कि हिंदूत्व में विविधताओं को स्वीकार करना और उनमें एकता बनाए रखना महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहाः “जो सबको साथ लेकर चलता है, वही हिंदू है।“ यह विचार भारतीय समाज में रूढ़िवाद को चुनौती देता है और आधुनिक भारत में व्यापक पहचान स्थापित करता है। हिंदूत्व केवल धार्मिक कर्मकांड या जातीयता तक सीमित नहीं है, बल्कि जीवन के नैतिक मूल्यों, संस्कार और सामाजिक उत्तरदायित्व से जुड़ा है। शताब्दी वर्ष की तैयारी में संघ ने दिल्ली विज्ञान भवन में तीन दिवसीय व्याख्यान माला आयोजित की। इस कार्यक्रम में डॉ. भागवत ने गंभीरता और संतुलन के साथ संगठन की विचारधारा, कार्यप्रणाली और भविष्य की दिशा को रेखांकित किया। यह आयोजन केवल संघ के भीतर के लोगों के लिए नहीं, बल्कि समाज के सभी वर्गों के लिए एक आमंत्रण था, संवाद और विचार विमर्श के लिये।

    संघ और भाजपा के सम्बन्ध
    अक्सर यह कहा जाता रहा है कि संघ भाजपा को नियंत्रित करता है। डॉ. भागवत ने इसे पूरी तरह स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि संघ और भाजपा स्वतंत्र संस्थाएं हैं। संघ का उद्देश्य केवल समाज को जोड़ना और राष्ट्र निर्माण में योगदान देना है, न कि सत्ता में भागीदारी। यह भी स्पष्ट किया कि संघ भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव में कभी हस्तक्षेप नहीं करता। संघ का कार्य है समाज को नैतिक और वैचारिक रूप से सशक्त करना, ताकि नागरिक अपने कर्तव्यों और जिम्मेदारियों को समझ सकें। डॉ. भागवत ने रिटायरमेंट और उम्र पर भी अपनी राय देते हुये कहा कि उम्र केवल एक आंकड़ा है। यदि व्यक्ति सक्षम और सक्रिय है तो 80 साल की उम्र में भी वह समाज और राष्ट्र के लिए काम कर सकता है। उन्होंने आदर्श परिवार संरचना में तीन बच्चों की सलाह दी जिससे सामाजिक और आर्थिक संतुलन बनाए रखा जा सके।

    काशी, मथुरा और ज्ञानवापी मुद्दे पर संघ की स्थिति
    डॉ. भागवत ने काशी, मथुरा, ज्ञानवापी जैसे संवेदनशील मुद्दों पर संघ की स्थिति स्पष्ट की। उनका कहना था कि संघ इन मुद्दों पर कोई आंदोलन नहीं करेगा लेकिन स्वयंसेवक व्यक्तिगत रूप से अपने दृष्टिकोण और मान्यताओं के अनुसार आंदोलन में भाग ले सकते हैं। उन्होंने मुस्लिम समुदाय से भी समझदारी और संवेदनशीलता बनाए रखने का आह्वान किया। यह दृष्टिकोण साम्प्रदायिक सौहार्द और सामाजिक समरसता को बढ़ावा देता है। संघ केवल वैचारिक मार्गदर्शन देता है, प्रत्यक्ष संघर्ष या हिंसा में शामिल नहीं होता। संघ का यह दृष्टिकोण समाज के प्रत्येक व्यक्ति और समुदाय को संयम और समझदारी के साथ कार्य करने का संदेश देता है। यह भारतीय लोकतंत्र और सामाजिक समरसता को मजबूती प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

    आरक्षण और सामाजिक समरसता
    डॉ. भागवत ने आरक्षण के मुद्दे पर संतुलित दृष्टिकोण पेश करते हुये कहा कि निचले वर्गों को सशक्त बनाने के लिए आरक्षण आवश्यक है लेकिन यह तब तक होना चाहिए जब तक वे स्वयं इसे लेने से इनकार न कर दें। साथ ही उन्होंने सामाजिक मेल-जोल और समानता पर जोर दिया। उनका कहना था कि दलितों और पिछड़ों के साथ समानता और सम्मान के साथ व्यवहार करने से समाज में दूरी घटेगी और एक सशक्त राष्ट्र का निर्माण होगा। संघ का यह दृष्टिकोण केवल नीति तक सीमित नहीं है। यह समाज के आचरण और संस्कार को बदलने की दिशा में भी योगदान देता है। समावेशिता, न्याय और सामाजिक सहभागिता के माध्यम से संघ भारतीय समाज में स्थायी सकारात्मक परिवर्तन की दिशा में कार्य करता है।

    नेतृत्व और संघ का भविष्य
    डॉ. भागवत ने संघ के भविष्य और नेतृत्व पर अपना विचार साझा करते हुये उन्होंने कहा कि संघ में समय के अनुसार बदलाव संभव हैं लेकिन तीन मूलभूत तत्व अपरिवर्तनीय हैं: व्यक्ति निर्माण से समाज के आचरण में परिवर्तन संभव है। पहले समाज बदलना चाहिए, फिर व्यवस्था और शासन बेहतर होंगे। हिंदुस्थान हिंदू राष्ट्र है। उन्होंने यह भी कहा कि संघ में स्वयंसेवकों को पद, पैसा या सत्ता नहीं मिलता; उन्हें केवल सेवा का अवसर मिलता है। यह सेवा समाज और राष्ट्र दोनों के लिए है। संघ का उद्देश्य सत्ता में भागीदारी नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र को नैतिक और वैचारिक रूप से सशक्त बनाना है। डॉ. भागवत का यह दृष्टिकोण स्पष्ट करता है कि संघ संगठनात्मक और नैतिक दृष्टि दोनों से समाज में बदलाव लाने का प्रयास कर रहा है।

    राष्ट्र निर्माण में संघ का योगदान
    संघ का कार्य केवल संगठनात्मक विस्तार तक सीमित नहीं है। यह समाज की नैतिक, सांस्कृतिक और वैचारिक मजबूती पर केंद्रित है। संघ ने शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्राम विकास, सांस्कृतिक जागरूकता और सामाजिक सेवा के क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। डॉ. भागवत ने भी इस बात पर जोर दिया कि राष्ट्र निर्माण का मार्ग शिक्षा और मूल्य आधारित समाज से होकर गुजरता है। व्यक्ति के नैतिक और सामाजिक विकास के बिना राष्ट्र का सशक्त होना असंभव है। संघ के स्वयंसेवक गांव-गांव, नगर-नगर जाकर समाज की जागरूकता और सेवा का काम कर रहे हैं। संघ द्वारा चलाए जा रहे स्वयंसेवा शिविर, स्वास्थ्य जांच अभियान, पर्यावरण जागरूकता कार्यक्रम और शिक्षा संवर्धन परियोजनाएँ देश भर में समाज के कमजोर वर्गों तक पहुँच बनाती हैं। यह कार्य राष्ट्र निर्माण में संघ की व्यावहारिक भूमिका को स्पष्ट रूप से दर्शाता है।

    शैक्षिक और सांस्कृतिक योगदान
    डॉ. भागवत ने संघ की शिक्षा और संस्कृति पर आधारित पहलुओं को भी रेखांकित किया। संघ द्वारा चलाए जाने वाले विद्यालय और प्रशिक्षण केंद्र युवा पीढ़ी में नैतिकता, नेतृत्व क्षमता और सामाजिक जिम्मेदारी विकसित करते हैं। संघ का मानना है कि युवा राष्ट्र के भविष्य का आधार हैं, इसलिए उनका प्रशिक्षण केवल अकादमिक ज्ञान तक सीमित नहीं, बल्कि व्यक्तित्व विकास, सामाजिक चेतना और सेवा भावना तक विस्तारित है। सांस्कृतिक दृष्टि से भी संघ ने विविधताओं में एकता बनाए रखने का काम किया है। भारत के विभिन्न राज्यों में आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रम, लोक कला और भाषा संवर्धन योजनाएँ यह सुनिश्चित करती हैं कि देश की विविध सांस्कृतिक धरोहर बनी रहे और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचे। डॉ. मोहन भागवत के विचार और संघ की शताब्दी वर्ष की व्याख्यानमाला से यह स्पष्ट होता है कि संघ समय के अनुसार अपनी कार्यशैली और दृष्टिकोण में परिवर्तन ला रहा है। यह बदलाव संगठनात्मक शक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज के नैतिक, सांस्कृतिक और वैचारिक विकास पर केंद्रित है। संघ का समावेशी दृष्टिकोण, सामाजिक समरसता और राष्ट्र निर्माण की दिशा में योगदान आज अत्यंत प्रासंगिक है।

    नैतिकता और समावेशिता से ही आत्मनिर्भर बन सकता है भारत
    डॉ. भागवत का संदेश यह स्पष्ट करता है कि समाज में एकजुटता, नैतिकता और समावेशिता से ही राष्ट्र सशक्त और आत्मनिर्भर बन सकता है। शताब्दी वर्ष का यह संदेश न केवल संघ के स्वयंसेवकों के लिए प्रेरणादायक है, बल्कि पूरे देश के नागरिकों के लिए मार्गदर्शक है। राष्ट्र निर्माण केवल राजनीतिक निर्णयों से नहीं होता, बल्कि समाज के प्रत्येक नागरिक की जिम्मेदारी, जागरूकता और सक्रिय भागीदारी से संभव है। संक्षेप में आरएसएस और डॉ. मोहन भागवत की यह यात्रा भारतीय समाज के समग्र विकास, सांस्कृतिक जागरूकता और राष्ट्र निर्माण की दिशा में प्रेरणादायक मार्गदर्शन प्रस्तुत करती है। मोहन भागवत का स्पष्ट विचार है कि भारत अगले 20 से 30 वर्षों में विश्वगुरु बनेगा। मगर इसके लिए समाज को शिक्षा, संस्कार और आत्मगौरव से भरी नई पीढ़ी तैयार करनी होगी। उन्होंने मिशनरी गतिविधियों, भारतीय परंपरा, जनसंख्या, सरकार-संघ संबंध, हिंदू राष्ट्र जैसे मुद्दों पर खुलकर अपनी बात रखी। भागवत ने कहा कि 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बाद अंग्रेजों ने भारत की छवि बिगाड़ने की साजिश की। देश के बारे में भ्रांतियां फैलाई गईं, ताकि भारत कभी सिर न उठा सके लेकिन स्वामी विवेकानंद ने शिकागो में अपने विचारों से इन सबको करारा जवाब दिया। आज भी हमारे खिलाफ झूठ और विकृति फैलाई जाती है, ताकि प्रगति रुक जाए। मगर भारत अब जाग चुका है। संघ प्रमुख ने मिशनरी संस्थाओं के कामकाज पर निशाना साधते हुए कहा कि असली सेवा तो भारत के संत और समाजसेवी कर रहे हैं। “मिशनरी संस्थाओं के मुकाबले हमारे संत कहीं अधिक काम करते हैं। सेवा हमारे जीवन का अंग है, दिखावे का साधन नहीं।”

    शिक्षा का असली अर्थ: संस्कार और आत्मगौरव
    भागवत ने शिक्षा को केवल साक्षरता नहीं, बल्कि “मनुष्य निर्माण” बताया। उन्होंने कहा, सच्ची शिक्षा से इंसान विष को भी अमृत बना सकता है। बच्चों को तकनीक का उपयोग करना आना चाहिये लेकिन तकनीक मालिक न बने। शिक्षा का उद्देश्य नौकरी नहीं, बल्कि मनुष्य को मनुष्य बनाना है। उन्होंने इतिहास और परंपरा से जुड़ाव को जरूरी बताते हुए कहा कि बच्चों के भीतर गौरव और आत्मविश्वास तभी आएगा जब वे जानेंगे कि भारत की जड़ें कितनी गहरी हैं।

    हिन्दू राष्ट्र का मतलब: सबका सम्मान, सबका विकास
    भागवत ने साफ किया कि हिंदू राष्ट्र की अवधारणा को लेकर फैलाई गई भ्रांतियां गलत हैं। “हिंदुत्व का मतलब संकीर्णता नहीं, बल्कि सेवा, सत्य और करुणा का मार्ग है। हमारे धर्म अलग हो सकते हैं, मगर समाज के नाते हम सब एक हैं। यही एकता भारत को विश्वगुरु बनाएगी।” भागवत का यह बयान सबसे ज्यादा चर्चा में रहा, “भारतीय परिवारों को कम से कम तीन बच्चे पैदा करने चाहिए।” इस पर सामाजिक हलकों में बहस छिड़ गई। कुछ ने इसे 145 करोड़ की आबादी वाले देश के लिए चुनौती बताया तो समर्थकों ने इसे हिंदू समाज की जनसंख्या संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता बताया। 75 वर्ष की उम्र पूरी करने के बाद उनके “सेवानिवृत्त“ होने की चर्चाओं पर उन्होंने कहा कि न मैं रिटायर होऊंगा और न ही किसी और को कहूंगा। मैं 75 के बाद भी काम करने के लिए तैयार हूं।

    विश्वगुरु का मार्ग: शिक्षा, सेवा और आत्मगौरव
    संघ प्रमुख ने कहा कि भारत का लक्ष्य केवल आर्थिक ताकत बनना नहीं है। असली लक्ष्य है, नई पीढ़ी को मूल्य आधारित शिक्षा देना, समाज में सद्भाव और एकता स्थापित करना, तकनीक को मानवता की सेवा में लगाना, आत्मगौरव और आत्मविश्वास को जगाना। हमको केवल राज्य नहीं चलाना है, हमें प्रजापालन करना है। उसके लिए आने वाली दो-तीन पीढ़ियों को बनाना होगा। तभी भारत विश्वगुरु बनेगा।

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  • अफजाल का मकसद राजनीतिक संतुलन साधना

    अफजाल का मकसद राजनीतिक संतुलन साधना

    अफजाल का मकसद राजनीतिक संतुलन साधना

    पूर्वांचल की राजनीति हिंदू-मुस्लिम संतुलन पर टिकी है। तारीफ़ करके अफ़ज़ाल अंसारी यह संदेश देना चाहते हैं कि वे केवल मुस्लिम वोट बैंक तक सीमित नहीं हैं। अंसारी परिवार की छवि अक्सर विवादों से जुड़ी रही है। संघ या हिंदुत्व की तारीफ़ से वे सकारात्मक और सर्वसमावेशी चेहरा दिखाना चाहते हैं। मौजूदा दौर में बीजेपी-आरएसएस का प्रभाव बहुत बड़ा है। तारीफ़ करके वे सत्ता से सीधा टकराव टालना चाहते हैं।गाज़ीपुर और पूर्वांचल में बड़ी संख्या में हिंदू मतदाता हैं। इस बयान से वे उन्हें भी संदेश देना चाहते हैं। यह भी संकेत हो सकता है कि अंसारी आने वाले चुनावी समीकरणों और गठबंधनों को ध्यान में रखकर अपनी पोज़िशनिंग बदल रहे हैं। कुल मिलाकर अफ़ज़ाल अंसारी की तारीफ़ें सिर्फ़ औपचारिक नहीं, बल्कि संतुलन साधने और भविष्य की राजनीति को ध्यान में रखकर दी गईं रणनीतिक टिप्पणियां मानी जा रही हैं।

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  • स्वयं को परमात्मा मानने लगे हैं आजकल के महात्मा

    स्वयं को परमात्मा मानने लगे हैं आजकल के महात्मा

    स्वयं को परमात्मा मानने लगे हैं आजकल के महात्मा

    आजकल के महात्मा लोग मुहम्मदवाद व अहमभाव से पीड़ित होकर स्वयं को परमात्मा के स्थान पर स्थापित करने में लगे हैं जिसकी परिणीति स्वरुप गणेश मूर्ति का मुहम्मदीकरण व प्रेमानन्दीकरण होना स्वाभाविक है। अरब सहित अन्य देशों से हिंदू धर्म को विनष्ट किए बिना मुहम्मदवाद की स्थापना करना सर्वथा असंभव था। अरबवासी केवल मूर्तिपूजक ही नहीं थे, बल्कि उनकी वास्तुकला (मूर्ति निर्माण कला) का आधार हिंदुओं के त्रिदेव या त्रिमूर्ति का सिद्धांत था। चूंकि मुहम्मद लोगों के मनों में अपना स्वरूप स्थापित करना चाहता था और यह तब तक संभव नहीं था जब तक कि हिंदू मूर्तियों का विध्वंस न कर दिया जाय जिनका उनके दृश्य रूप और पारंपरिक कथाओं के कारण व्यापक प्रभाव था जो सदियों की काल में निर्मित हुआ था जिसकी पुष्टि व स्पष्ट प्रमाण हदीस करती है- “जाबिर बिन समूरा ने अल्लाह के पैगंबर के यह कहते हुए वृत दिया था (अल्लाह उन्हें शान्ति दे)। “मैं मक्का के पत्थर को पहचानता हूं जो मेरे पैगंबर बनने से पूर्व मुझे सलाम किया करता था और मैं उसे अभी भी पहचानता हूं। (मुस्लिम खंड 4: 5654 पृ. 1478) इस हदीस से 3 बातों की पुष्टि हो जाती है।
    —— मुहम्मद को पहला इलहाम (ईश्वरीय संदेश) तब प्रगट हुआ, जब वह 40 वर्ष का था। इस उम्र के पड़ाव से ही उसने इस्लाम के उपदेश देना प्रारंभ किया तो उससे पूर्व उसका क्या पंथ था? यह इस हदीस से स्वयं स्पष्ट है।
    ‘मक्का का पत्थर’ अन्य कुछ नहीं हो सकता सिवाय मक्का के प्रमुख मंदिर ‘काबा के काले पत्थर’ (हज्र-ए-अस्वद) के, जिसमें और मूर्तियां भी स्थापित थी। ये शब्द, “मुझे सलाम किया करता था” स्पष्ट करते हैं कि इस्लाम के संस्थापक बनने से पहले पैगंबर मुहम्मद नियमित रूप से काबा के मंदिर के दर्शनों के लिए जाया करता था। “काला पत्थर’ बिना शक्ल की मूर्ति है जो अभी भी काबा में शोभायमान है और जो इस्लामी रीति रिवाजो का प्रमुख भाग है।
    मुहम्मद दावा करता है कि यह मूर्ति उसको सलाम किया करती थी। चूंकि सलाम करना एक प्रकार की पूजा ही है, मुहम्मद को काबा पर मूर्ति पूजा द्वारा अपनी स्वयं की मूर्ति के समान पूजा कराने की प्रेरणा मिली, इसलिये उसे दूसरी मूर्तियों के स्थान पर अपने आपको स्थापित कर देने की आवश्यकता अनुभव हुई, ताकि मुहम्मदवाद स्थायी हो जाए। इसके लिए हिंदुत्व को ही पकड़ा, क्योंकि वही अरबी मूर्ति पूजा का आधार था।
    इस्लाम निःसंदेह मुहम्मद की पूजा का ही पंथ है परंतु इसे मुहम्मदवाद कहने के स्थान पर ‘ईश्वर पूजा का सच्चा पंथ’ कहा जाता है। मुहम्मद ने अपने अनुयायियों की इतनी बड़ी संख्या जो पूजा तो मुहम्मद की करती है किंतु दावा अल्लाह की पूजा का करती है, का निर्माण किया, इसी प्रकार वर्तमान महात्मा उपदेशकों ने ईश्वर की पूजा के लिए अपने आप को मध्यस्ता के रुप प्रक्षेपित किया हुआ है।
    मुहम्मद ने संसार में अपने आपको अल्लाह का एकमात्र प्रतिनिधि प्रक्षेपित कर मूर्तियों को तोड़ दिया और वह अन्य मूर्तियों की भांति, वास्तविक अल्लाह के रूप में माना व पूजा जाने लगा। “हमने तुम्हें सारे संसार के लिए केवल दयालुता बनाकर ही भेजा है।” (21: 107, पृ. 586) और अपने आपको मानव प्रेम का पैगंबर प्रक्षेपित किया। अनेक हदीसें हैं जो मुहम्मद का प्रेम पाने के लिए उग्रता के साथ समर्थन करती हैं। उदाहरण के लिए “किसी भी व्यक्ति का ईमान तब तक पूरा नहीं होता जब तक उसकी दृष्टि में (मुहम्मद) उसके परिवार वालों से उसकी संपत्ति से और संपूर्ण मानवजाति से अधिक प्रिय नहीं हो जाता।” (मुस्लिम खंड 1 : 70-71, पृ. 37)
    पूरी तरह आज्ञा पालन करने के लिए उसने दावा किया कि मानव व्यवहार के लिए वह दैवी आदर्श है और जिसका उसके सभी अनुयायियों द्वारा ठीक उसी प्रकार अनुकरण किया जाना चाहिए: “तुम्हारे (ईमान वालों) लिए जो अल्लाह और ‘आखिरत के दिन’ की आशा रखता है, अल्लाह के ‘रसूल’ में एक आदर्श उदाहरण है।” (कुरान 33 : 21, पृ. 748) जो कोई भी ‘जन्नत’ जाना चाहता है, ‘अल्लाह और आखिरत’ की अनुकूलता की आशा रखता है, उसे पैगंबर के व्यवहार के आदर्श का अनिवार्य रूप से अनुसरण करना चाहिए। जिसे ‘सुन्नाह’ कहते हैं, सभी मुसलमान मुहम्मद के ढंग से जीना चाहते हैं। यहां तक कि छोटी से छोटी क्रियाओं जैसे खाना, पीना, बातचीत करना, सोना, पोशाक पहनना, आदि में भी नकल करना आवश्यक है। वस्तुतः मुहम्मद ने अपने अनुयायियों की सारी मानसिकता को पूरी तरह से नियंत्रित कर रोबोट बना दिया है।
    मुहम्मद का अपने देवत्व के संदर्भ में ‘मध्यस्थता का अधिकार’ उसका अचूक हथियार है कि ‘कियामत के दिन’ यह केवल अल्लाह ही है जो तय करेगा कौन ‘जन्नत’ में जाएगा और कौन ‘जहन्नम’ में। मुहम्मद के हित और सुविधा के लिए कुरान अपने मत में पलटी लगा जाता है और आखिर में घोषित करता है कि: “उस दिन कोई मध्यस्थता का अधिकारी नहीं होगा, सिवाय उसके जिसे परम दयालु (प्रभु) अल्लाह ने अधिकार दिया है जिसके अधिकार को वह स्वीकार कर ले।” (कुरान 20: 109, पृ. 568)। यही बात सहीह मुस्लिम (खण्ड 4, 5655, पृ. 1478) में पूरी तरह स्पष्ट की गई है- “मैं (मुहम्मद) ही पहला मध्यस्थता करने वाला, और पहला व्यक्ति हूंगा जिसकी मध्यस्थता को अल्लाह द्वारा स्वीकृत किया जाएगा।”
    मुहम्मद को अधिकार है कि अपने अनुयाइयों को भले ही वे कातिल, बलात् शीलहरणकर्ता, चोर, झूठे और अपराधी क्यों न हो, जन्नत भेज सकेगा और गैर-मुस्लिमों (गैर-ईमानवालों) को वह जहन्नम में ही भेजेगा, भले ही वे अत्यन्त सदाचारी रहे हों। कुरान कहता है: “निश्चय ही ये शब्द एक उदार पैगंबर के हैं जिसके अल्लाह के सिंहासन पर अधिकार सुरक्षित है, जिसकी आज्ञा का पालन होता है और जो विश्वसनीय है। (कुरान 81: 19-21, पृ. 1132) इससे अब कोई भी समझ सकता है कि अल्लाह तो कहने भर के लिए है, क्योंकि मुहम्मद ने मानव मात्र के भाग्य को अपने हाथों में समेट लिया है। अल्लाह तो मुहम्मद का एक कारिंदा मात्र है, क्योंकि वह (अल्लाह) वही करता है जो मुहम्मद उससे कराता है। उदाहरण के लिए इस्लामी कानून में कोई भी मुसलमान एक समय में चार से अधिक पत्नी नहीं रख सकता किंतु मुहम्मद की एक ही साथ कम से कम 9 पत्नियां तो थीं। स्पष्ट है कि वह अल्लाह के कानून से ऊपर था।
    अब यह सुस्पष्ट है कि मुहम्मद मूर्ति पूजा का विरोध नहीं था, वरन् वह दूसरी मूर्तियों से घृणा करता था, क्योंकि वह स्वयं को उनका स्थानापन्न बनना चाहता था। संक्षेप में वह अन्य सभी मूर्तियों को हटाकर अकेले अपनी मूर्ति की ही पूजा करना चाहता था। इसके अलावा मुहम्मद जान गया था कि और लोग भी हैं जिनका अंहकार अति विशाल है और चाहते हैं कि उन्हें भी आध्यात्मिक महापुरुषों के रूप में पूजा जाए और याद किया जाय, इसलिए उसने अपनी ही दैवी छाया के नीचे एक सर्व समावेशी देव मंदिर के निर्माण की आज्ञा दे दी। इसका अर्थ यह हुआ कि जो कोई इन छोटे देवताओं में विश्वास रखेगा, स्वाभाविक रूप में उसका ही अनुसरण करेगा। वे पैगंबर मुहम्मद के परिवार के सदस्य हैं जिनके नाम है- अली (फातिमा, हसन, हुसैन सहित) साथ ही अबू बकर, उमर, उस्मान, अनेकों अन्य जो उसकी सेवा में भली प्रकार रत रहे जिससे उनका उद्देश्य सफल हो सका। इस्लाम वास्तव में मूर्ति भंडक नहीं है यानी कि मूर्ति पूजा विरोधी नहीं है, वरन् मूर्ति पूजक ही है, जब तक कि वह केवल पैगंबर मुहम्मद, उसके निकट संबंधियों और साथियों तक सीमित हैं जिनकी उसकी आध्यात्मिक नेतागिरी में पूजा होती रहती है। (यह लेख, अनवर शेख द्वारा 1994 में लिखित why muslims destroy hindu temple? पर आधारित है।)
    जय किशन कर्णवाल मेरठ
    संकलनकर्ता, लेखक
    पूर्व प्रचारक हिन्दू राईटर’स फोरम,
    नई दिल्ली।

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  • बुरी आदतों की बेड़ियों से मुक्ति है सच्ची आजादी

    बुरी आदतों की बेड़ियों से मुक्ति है सच्ची आजादी

    बुरी आदतों की बेड़ियों से मुक्ति है सच्ची आजादी

    सुरेश गांधी
    हम हर साल 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस मनाते हैं। यह दिन हमें याद दिलाता है कि गुलामी के बंधन तोड़ना ही आज़ादी नहीं है, बल्कि जीवन के हर क्षेत्र में स्वतंत्र होना भी उतना ही जरूरी है। सवाल यह है, क्या हम अपनी बुरी आदतों, निर्भरताओं और लतों से सच में आज़ाद हैं? हमें खुद से भी पूछना चाहिए, क्या हम अपनी बुरी आदतों, निर्भरताओं और लतों से सच में आज़ाद हैं? आज बहुत से लोग दिन-रात मोबाइल में डूबे रहते हैं, जंक फूड पर निर्भर हैं या फिर इंद्रियों के वश में जीते हैं। सच्ची स्वतंत्रता का मतलब है, वही सोचना जो हमें और समाज को सुख दे, वही बोलना जो दूसरों का सम्मान बढ़ाए, और वही करना जो सृष्टि को सुंदर बनाए। मतलब साफ है सच्ची आज़ादी केवल राजनीतिक स्वतंत्रता नहीं है, बल्कि अपने विचार, आदतों, शरीर और संसाधनों पर नियंत्रण पाना भी है। यदि हम बुरी आदतों, फिजूलखर्ची, लत और भौतिकवादी मानसिकता से मुक्त हो जायं तो ही जीवन में सही मायने में स्वतंत्रता का अनुभव कर सकेंगे।
    स्वतंत्रता संग्राम का मूल उद्देश्य केवल अंग्रेज़ी हुकूमत से मुक्ति पाना नहीं था, बल्कि एक ऐसे भारत का निर्माण करना था जो न्याय, समानता, पारदर्शिता और जनकल्याण के सिद्धांतों पर खड़ा हो। आज़ादी के 78 वर्ष बाद भी, जब हम राष्ट्रगान के साथ तिरंगा लहराते हैं तो यह सवाल मन में उठता है, क्या हम वास्तव में उस सपनों के भारत को पा सके हैं जिसकी कल्पना हमारे पूर्वजों ने की थी? दुर्भाग्य से आज देश के सामने तीन ऐसी जकड़नें हैं जो हमारी लोकतांत्रिक यात्रा को कमजोर कर रही हैं। भ्रष्टाचार, परिवारवाद और तुष्टिकरण। ये तीनों न केवल शासन-प्रशासन की पारदर्शिता को निगलते हैं, बल्कि राष्ट्र की विकास गति को भी बाधित करते हैं। जी हां, देश को बाहरी दुश्मनों से नहीं, बल्कि इन आंतरिक बुराइयों से सबसे बड़ा खतरा है। जब तक भ्रष्टाचार, परिवारवाद और तुष्टीकरण खत्म नहीं होते, तब तक 1947 की स्वतंत्रता अधूरी है। सच्ची आज़ादी वही होगी, जब हर नागरिक को समान अवसर, ईमानदार शासन और न्यायपूर्ण व्यवस्था मिले।
    या यूं कहे अंग्रेज़ों की गुलामी से मुक्ति पाने के बाद भी यदि हम इन तीन जकड़नों से मुक्त नहीं हो पाते तो यह आज़ादी अधूरी है। असली आज़ादी तब होगी जब भ्रष्टाचार पर पूरी तरह लगाम लगे और हर योजना का लाभ पारदर्शिता के साथ जनता तक पहुंचे। परिवारवाद का अंत हो और नेतृत्व का चयन केवल योग्यता, ईमानदारी और जनसेवा के आधार पर हो। तुष्टिकरण की राजनीति समाप्त हो और हर नागरिक को समान अधिकार, अवसर और न्याय मिले, बिना जाति, धर्म या क्षेत्र के भेदभाव के। मतलब साफ है आज़ादी की सालगिरह सिर्फ झंडा फहराने और भाषण देने का अवसर नहीं, बल्कि आत्ममंथन का भी समय है। यदि हम इन तीनों विकृतियों को समाप्त करने का संकल्प लें, तभी हम अपने बच्चों को एक सशक्त, समृद्ध और सच्चे अर्थों में स्वतंत्र भारत सौंप पायेंगे।

    अनुशासन से स्वतंत्रता
    किसी संगठन या व्यक्ति में अनुशासन की कमी का दोष अक्सर दूसरों पर डाल दिया जाता है, जबकि सुधार की शुरुआत खुद से होनी चाहिए। ट्रैफिक सिग्नल तोड़ना, गलत जानकारी देना, समय पर काम न करना, ये सब छोटी-छोटी अनुशासनहीनताएं हैं, जिनसे छुटकारा पाना जरूरी है।

    तनाव और चिंता से मुक्ति
    चिंता कभी खत्म नहीं होती- पढ़ाई, नौकरी, प्रमोशन… हर मोड़ पर नई चिंता। असल में हमें समस्या नहीं, बल्कि अपनी प्रतिक्रिया मारती है। ऐसे में अपना ध्यान उन चीजों पर लगाएं, जिन पर आपका नियंत्रण है। अपने लिए नई चुनौतियां तय करें, सकारात्मक सोच अपनाएं और मानसिक शांति बनाए रखें।

    नशे की लत से आजादी
    नशे से छुटकारा पाना कठिन है लेकिन असंभव नहीं। सही इलाज, पर्याप्त नींद, व्यायाम और नशे के माहौल से दूरी इस मुक्ति में सहायक होते हैं।

    भौतिकवाद की बेड़ियां
    हमारी इच्छाएं और दिखावटी जीवनशैली हमें प्रकृति और सरलता से दूर कर रही हैं। हर व्यक्ति साल में कम से कम एक पौधा लगाए, पानी की बर्बादी रोके और संसाधनों का जिम्मेदारी से उपयोग करे।

    फिजूलखर्ची पर नियंत्रण
    पैसा आपका सेवक है, मालिक नहीं। खर्च करने से पहले सोचेंकृक्या यह जरूरत है या सिर्फ चाहत? न्यूनतम जीवनशैली अपनाकर बचत और संतोष दोनों पाया जा सकता है।

    समय का अनुशासन
    आज का काम कल पर न टालें। अगले दिन का शेड्यूल रात में ही तय करें, अधूरे काम को प्राथमिकता दें और खुद को समय पर काम पूरा करने की आदत डालें।

    स्वास्थ्य की आजादी
    तेज़ रफ्तार जिंदगी में स्वास्थ्य अक्सर पीछे छूट जाता है। नियमित व्यायाम, योग और संतुलित आहार से शरीर को बीमारियों के बंधन से मुक्त रखा जा सकता है।

    भ्रष्टाचार, परिवारवाद और तुष्टिकरण से मुक्ति बगैर अधूरी है आजादी
    भ्रष्टाचार केवल पैसों की हेरा—फेरी नहीं, बल्कि यह व्यवस्था के प्रति लोगों का विश्वास तोड़ने वाली बीमारी है। जब जनता देखती है कि मेहनत और योग्यता से ज्यादा रिश्वत और जोड़-तोड़ से काम होते हैं तो उसकी उम्मीदें खत्म हो जाती हैं। आज़ादी के बाद से अनेक योजनाएं बनीं, बजट आवंटित हुये लेकिन भ्रष्ट तंत्र ने उनकी सफलता को निगल लिया। भ्रष्टाचार की जड़ें केवल सरकारी दफ्तरों में ही नहीं, बल्कि समाज के हर स्तर तक फैली हैं, राजनीति से लेकर व्यवसाय और शिक्षा तक। लोकतंत्र की ताकत उसकी भागीदारी में है, लेकिन जब राजनीतिक दल या संस्थाएं कुछ परिवारों की जागीर बन जाती हैं, तो लोकतंत्र केवल नाम का रह जाता है। परिवारवाद से न केवल नई और प्रतिभाशाली नेतृत्व पीढ़ी का मार्ग अवरुद्ध होता है, बल्कि नीतियां भी जनहित के बजाय निजी हित में बनने लगती हैं। चाहे राष्ट्रीय स्तर पर हो या स्थानीय निकायों में जब सत्ता व नेतृत्व की चाबी वंशानुगत हो जाती है तो “जनता का जनता के लिए जनता द्वारा“ शासन एक खोखला नारा बन जाता है।
    तुष्टिकरण नीति, किसी विशेष वर्ग या समुदाय को खुश करने के नाम पर, समाज में कृत्रिम विभाजन पैदा करती है। यह न केवल समानता और न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है, बल्कि इससे सामाजिक सौहार्द भी खतरे में पड़ता है। जब शासन का आधार निष्पक्षता और कानून के राज के बजाय वोट बैंक बन जाता है तो नीतियां राष्ट्रहित में नहीं, बल्कि चुनावी गणित में बनती हैं। कहने का अभिप्राय है कि जब तक भ्रष्टाचार, परिवारवाद और तुष्टिकरण जिंदा हैं आजादी का कोई मायने नहीं, क्योंकि सत्ता की ये तीन जकड़नें ऐसी है, जो आज़ादी के मायने निगल रहीं हैं। तिरंगे के साए में लोकतंत्र की ये 3 सबसे बड़ी बीमारियां ये अहसास कराती है कि 78 साल बाद भी गुलामी की नई जंजीरों में भारत जकड़ा है. भ्रष्टाचार, वंशवाद और तुष्टिकरण ये तीनों लोकतंत्र के न सिर्फ घातक दुश्मन है, बल्कि ये साबित करती है कि भारत से सिर्फ अंग्रेज़ गये, ये तीन गुलामियां अभी बाकी हैं। जब तक इनसे मुक्ति नहीं मिलेगी, तब तक सच्ची स्वतंत्रता का सपना अधूरा रहेगा।
    भारत ने 1947 में विदेशी शासन से मुक्ति पाई लेकिन आज़ादी के 78 साल बाद भी 3 आंतरिक दुश्मन हमारे लोकतंत्र और विकास की राह में सबसे बड़ी रुकावट बने हुए हैं। भ्रष्टाचार, परिवारवाद और तुष्टीकरण। ये तीनों बुराइयाँ न केवल शासन-प्रशासन को कमजोर करती हैं, बल्कि समाज की एकता और आर्थिक प्रगति को भी पीछे धकेल देती हैं। भ्रष्टाचार सिर्फ़ रिश्वतखोरी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस मानसिकता का प्रतीक है जिसमें निजी लाभ के लिए कानून और नैतिकता की बलि दी जाती है। इससे विकास योजनाओं का पैसा ग़लत जेबों में चला जाता है। ईमानदार अफसर हाशिये पर चले जाते हैं और जनता का लोकतंत्र पर विश्वास डगमगाने लगता है। इसे खत्म करने के लिए पारदर्शी व्यवस्था, कड़े दंड और लोकपाल जैसी संस्थाओं को मजबूती देना ज़रूरी है।
    खास तौर से जब राजनीति या संस्थानों में वंश और रिश्तेदारी, योग्यता से ऊपर रखी जाती है तो लोकतंत्र ‘जनतंत्र’ से ‘परिवारतंत्र’ में बदल जाता है। राजनीति में यह प्रवृत्ति, प्रतिभाशाली कार्यकर्ताओं का हक छीन लेती है, नीतियों को परिवार केंद्रित बना देती है और जनता के विश्वास को चोट पहुंचाती है। इससे निपटने के लिए दलों के भीतर आंतरिक लोकतंत्र और पारदर्शी नेतृत्व चयन आवश्यक है। तुष्टीकरण का मतलब है किसी विशेष वर्ग या समुदाय को अनुचित लाभ देकर राजनीतिक फायदा लेना। इसके दुष्परिणाम समाज में असमानता और असंतोष बढ़ता है, राष्ट्रीय एकता कमजोर होती है और विकास योजनाएं वोट बैंक के बोझ तले दब जाती हैं। समान अवसर और न्याय आधारित नीतियां ही इसका विकल्प हैं। इन बुराइयों से मुक्ति के लिये चुनावी चंदे में पारदर्शिता, भ्रष्टाचार विरोधी कानूनों का सख्त पालन हो। वोट देने से पहले सोच-समझकर निर्णय लेने की पहली शर्त हो। सीबीआई, चुनाव आयोग जैसी संस्थाओं को दबाव से मुक्त करना हो जो उदाहरण बनें, न कि अपवाद।

    आगे का स्वर्णिम पथ
    आजादी के 78 वर्ष बाद भारत एक बार फिर उस पहचान की ओर बढ़ रहा है जिसके लिए कभी उसे सोने की चिड़िया कहा जाता था। जब 15 अगस्त 1947 को यह देश गुलामी की जंजीरों से मुक्त हुआ, तब हमारे पास न पर्याप्त अनाज था, न मजबूत उद्योग, न आधुनिक शिक्षा और न ही रक्षा क्षमता लेकिन आज भारत दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और 2027 तक तीसरे स्थान पर पहुंचने की ओर अग्रसर है। फोर्ब्स का अनुमान है कि अगले 10 वर्षों में भारत की अर्थव्यवस्था 8 ट्रिलियन डॉलर की होगी जबकि जेफरीज और पीडब्ल्यूसी का मानना है कि यह 10 ट्रिलियन डॉलर का आंकड़ा पार कर सकती है। अभी हमारी जीडीपी लगभग 3.94 ट्रिलियन डॉलर है और बीते दशक में औसतन 7 फीसदी की दर से बढ़ी है। विशेषज्ञों का आकलन है कि आने वाले 10-20 वर्षों में यह वृद्धि दर 10 फीसदी तक पहुंच सकती है।

    मैन्युफैक्चरिंग और रक्षा में नई पहचान
    ‘मेक इन इंडिया’ और पीएलआई स्कीम का असर अब दिखने लगा है। विदेशी कंपनियां चीन का विकल्प तलाशते हुए भारत का रुख कर रही हैं। अगले दशक में भारत वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग हब बनने की ओर अग्रसर है। रक्षा क्षेत्र में भी भारत आत्मनिर्भरता की ओर तेजी से बढ़ रहा है। वर्ष 2023 में रक्षा निर्यात 25 फीसदी बढ़कर ₹20,915 करोड़ तक पहुंच गया। आने वाले वर्षों में भारत दुनिया के शीर्ष 10 रक्षा निर्यातक देशों में शामिल हो सकता है और 2040 तक टॉप 5 में भी।

    स्टार्टअप क्रांति और युवा शक्ति
    भारत आज दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा स्टार्टअप इकोसिस्टम है, 12.3 लाख से अधिक रजिस्टर्ड स्टार्टअप और 100 से ज्यादा यूनिकॉर्न के साथ। देश की औसत आयु 30 वर्ष से कम है जो हमारी सबसे बड़ी ताकत है। अगले 10 वर्षों में 16 करोड़ से अधिक नई नौकरियां पैदा होने की संभावना है और 80 करोड़ से अधिक लोग कार्यबल में होंगे।

    कृषि, विज्ञान और खेल में छलांग
    आज भारत न केवल अपनी पूरी आबादी को खाद्यान्न उपलब्ध कराता है, बल्कि उत्पादन के मामले में दुनिया में दूसरे स्थान पर है। हमारे वैज्ञानिक अंतरिक्ष में नए कीर्तिमान गढ़ रहे हैं और खिलाड़ी ओलंपिक सहित विश्व स्तरीय प्रतियोगिताओं में परचम फहरा रहे हैं। दुनिया के हर कोने में भारतीय अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा रहे हैं लेकिन चुनौतियां भी बड़ी है, इन उपलब्धियों के बावजूद सवाल बने हुए हैं, आज भी बड़ी आबादी गरीबी में क्यों जी रही है? बेटियों को बराबरी का हक मिलने के बाद भी वे यौन हिंसा का शिकार क्यों होती हैं? गांवों में सड़क, पानी, बिजली, शिक्षा और चिकित्सा जैसी सुविधाओं की कमी क्यों पलायन को मजबूर करती है? बेरोजगारी और महंगाई क्यों विकराल रूप ले रही हैं? जाति और धर्म के नाम पर वैमनस्य क्यों बढ़ रहा है और चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित कर रहा है? ये वे प्रश्न हैं जो हमें यह सोचने पर मजबूर करते हैं कि सिर्फ आर्थिक प्रगति ही पर्याप्त नहीं है, सामाजिक सद्भाव, समान अवसर और न्याय भी उतने ही जरूरी हैं।

    संकल्प का समय
    स्वतंत्रता दिवस का जश्न तभी सार्थक होगा जब हम न केवल अपनी उपलब्धियों पर गर्व करें, बल्कि एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में अपने कर्तव्यों का पालन भी करें। शासन को जवाबदेह बनाए रखें, वैमनस्य को खत्म करने का प्रयास करें और आने वाली पीढ़ियों के लिए ऐसा भारत बनाएं जो सचमुच सोने की चिड़िया कहलाने योग्य हो। गगन में लहराता तिरंगा सिर्फ विजय का प्रतीक नहीं, बल्कि यह स्मरण कराता है कि स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी है। अगर हम एकजुट होकर आगे बढ़ें तो 2047 में स्वतंत्रता के शताब्दी वर्ष तक भारत निश्चित ही एक समृद्ध, शक्तिशाली और न्यायपूर्ण राष्ट्र बन सकता है। जब हम 2047 में स्वतंत्रता के 100 वर्ष पूरे करेंगे तो हमारा लक्ष्य सिर्फ आर्थिक महाशक्ति बनना नहीं, बल्कि एक ऐसा राष्ट्र बनना होना चाहिए जो न्यायपूर्ण, समृद्ध, सुरक्षित और एकजुट हो। अगर हम एकजुट होकर आगे बढ़ें तो भारत फिर से दुनिया की सोने की चिड़िया बन सकता है।

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    600 बीमारी का एक ही दवा RENATUS NOVA

  • ‘समृद्धि’ और ‘संघर्ष’ में उलझी जंग-ए-आजादी का ‘जश्न’

    ‘समृद्धि’ और ‘संघर्ष’ में उलझी जंग-ए-आजादी का ‘जश्न’

    ‘समृद्धि’ और ‘संघर्ष’ में उलझी जंग-ए-आजादी का ‘जश्न’
    सुरेश गांधी
    आज जब हम स्वतंत्रता दिवस की 79वीं वर्षगांठ मना रहे हैं, तिरंगे की शान में सिर ऊँचा कर रहे हैं, तब एक कड़वी सच्चाई हमारी सामूहिक अंतरात्मा को झकझोर रही है, क्या यही वह आज़ादी थी जिसका सपना हमारे शहीदों ने देखा था? ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक भारत की जीडीपी का 18 फीसदी धन सिर्फ़ पांच परिवारों के पास केंद्रित है। अगर इसमें बाकी सौ अरबपति परिवारों की संपत्ति भी जोड़ दी जाय तो यह प्रतिशत और भी डरावना हो जाएगा। दूसरी तरफ़, देश की आधी से अधिक आबादी रोज़ 375 रुपये से कम पर गुजर-बसर कर रही है। एक राष्ट्र का अमीर होना अच्छी बात है लेकिन जब संसाधनों का बंटवारा असमान हो, तो यह विकास अराजकता की ओर ले जाता है। अगर सरकारी नीतियां केवल कुछ घरानों को लाभ पहुंचाएं और करोड़ों लोगों के घर में चूल्हा जलाना मुश्किल हो जाय तो यह ‘विकास’ नहीं, बल्कि ‘असमानता का साम्राज्य’ है और यह साम्राज्य लोकतंत्र और सामाजिक स्थिरता, दोनों के लिए खतरा है।
    भारत की अर्थव्यवस्था की रफ्तार न सिर्फ दुनिया में चर्चा का विषय है, बल्कि देश में भी आर्थिक विकास का ढोल पीटा जा रहा है लेकिन इस शोर के बीच या यूं कहे विकास के पीछे एक गंभीर असमानता का सच छिपा है। आज केवल पांच भारतीय परिवार देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का लगभग 18 फीसदी धन अपने पास रखते हैं। अगर बाकी सौ अरबपति परिवारों की संपत्ति जोड़ दी जाय तो यह अनुपात और भी बढ़ जाएगा। ऑक्सफैम की रिपोर्ट के अनुसार भारत में शीर्ष 1 फीसदी अमीरों के पास 40 फीसदी से अधिक राष्ट्रीय संपत्ति है जबकि निचले 50 फीसदी के पास केवल 3 फीसदी। अमेरिका या यूरोप जैसे पूंजीवादी देशों में भी अमीर-गरीब का अंतर है लेकिन भारत में यह अंतर रिकॉर्ड गति से बढ़ रहा है। खास तौर से तब जब मोदी सरकार का आर्थिक विकास मॉडल जीडीपी वृद्धि दर को लेकर दुनिया में सुर्खियां बटोर रहा है। ऐसे में बड़ा सवाल तो यही है क्या यह वृद्धि देश के करोड़ों नागरिकों के जीवन में सुधार ला रही है? क्या यही है नया भारत का विकास मॉडल, जिसमें चंद घरानों के महल और बहुसंख्यकों के झोपड़े साथ खड़े हैं? जब नीति-निर्माण और कर-रियायतें केवल कुछ कॉरपोरेट घरानों को और ताकतवर बना दें जबकि खेतों में किसान आत्महत्या करें और शहरों में मजदूर दिहाड़ी को तरसें तो यह ‘विकास’ नहीं, आर्थिक अन्याय है।
    मतलब साफ है स्वतंत्रता दिवस पर हमें सिर्फ तिरंगे को सलामी नहीं देनी चाहिए, बल्कि उस वादे को भी याद रखना चाहिए जो हमारे शहीदों ने किया था, एक न्यायपूर्ण, समान और सम्मानजनक भारत का निर्माण। वरना आने वाली पीढ़ियां हमसे पूछेंगी, क्या यही आज़ादी थी? बता दें कि 2022 से 23 में भारत की शीर्ष 1 फीसदी आबादी का हिस्सा राष्ट्रीय आय में 22.6 फीसदी और संपत्ति में 40.1 फीसदी तक पहुंच गया है, यह इतिहास में सबसे ऊँचे स्तर पर। इसके पीछे ‘बिलियोनैरीराज’ बन चुका है जहां चंद परिवार देश की आर्थिक धुरी बन गए हैं और बाकी सौ करोड़ से अधिक नागरिकों को सिर्फ संघर्ष ही देखने को मिलता है। भारत की जीडीपी की चमकदार रफ्तार के पीछे एक सच्चाई छुपी है जो आर्थिक असमानता के चरम को उजागर करती है। आज सिर्फ 5 भारतीय परिवार देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का करीब 18 फीसदी धन अपने पास रखते हैं। अगर इसमें सौ और अरबपति परिवारों की संपत्ति जोड़ दी जाय तो यह आंकड़ा और भी ज्यादा हो जाएगा। 1947 में हमें राजनीतिक आज़ादी मिली थी, विदेशी शासन से मुक्ति लेकिन आर्थिक आज़ादी आज भी अधूरी है। आज़ादी का सही अर्थ है, ऐसा भारत, जिसमें हर नागरिक को समान अवसर, सम्मानजनक जीवन और अपनी मेहनत का न्यायसंगत फल मिले।
    अगर सौ करोड़ भारतीय भूख और बेरोजगारी से जूझते रहें और चंद परिवार अरबों-खरबों में खेलें तो यह व्यवस्था सामाजिक विस्फोट की ओर बढ़ेगी। ऐसे में न सिर्फ संतुलित नीति का होना जरुरी है, बल्कि कर नीतियों में असमानता दूर हो, शिक्षा और स्वास्थ्य में निवेश बढ़े, श्रमिकों और किसानों के लिए न्यूनतम आय की गारंटी हो और संपत्ति के संकेंद्रण पर सख्त निगरानी हो। आर्थिक विशेषज्ञों की मानें तो प्रगतिशील कर प्रणाली (आय-कर और संपत्ति-कर) को मजबूत किया जाए। शिक्षा, स्वास्थ्य और पोषण में सार्वजनिक निवेश बढ़ाया जाए। रोज़गार सृजन को प्राथमिकता दी जाए ताकि जीडीपी की वृद्धि का लाभ हर वर्ग तक पहुंचे। इतिहासकार और अर्थशास्त्री बताते हैं कि भारत में असमानता का स्तर अब औपनिवेशिक ब्रिटिश राज के दौर से भी ज्यादा है। यह स्थिति ब्राज़िल और दक्षिण अफ्रीका जैसे अत्यधिक असमान देशों की बराबरी कर रही है जबकि अमेरिका जैसे विकसित देशों में भी शीर्ष 1 फीसदी की हिस्सेदारी भारत से कम है। मतलब साफ है एक राष्ट्र का अमीर होना तभी मायने रखता है जब उसकी संपन्नता का लाभ हर नागरिक तक पहुंचे। वरना यह विकास सिर्फ कुछ लोगों की तिजोरी भरने का साधन बन जाता है और लोकतंत्र के भीतर ‘असमानता का साम्राज्य’ पनपने लगता है जो आर्थिक स्थिरता और सामाजिक शांति, दोनों के लिए खतरनाक है।

    भारत में असमानता का नया रिकार्ड
    ‘वर्ल्ड इनइक्वलिटी लैब’ की रिपोर्ट के मुताबिक 2022 से 23 में भारत की शीर्ष 1 फीसदी आबादी राष्ट्रीय आय का 22.6 फीसदी और राष्ट्रीय संपत्ति का 40.1 फीसदी अपने पास रखती है जो इतिहास में सबसे ऊँचा स्तर और दुनिया के सबसे असमान देशों में से एक। वहीं सबसे गरीब 50 फीसदी आबादी के हिस्से में राष्ट्रीय आय का मात्र 15 फीसदी और संपत्ति का 6 फीसदी हिस्सा आया। यह खाई पिछले तीन दशकों में लगातार चौड़ी होती गई है। इसका मतलब है कि शीर्ष 1 फीसदी का हिस्सा 5 गुना अधिक है जबकि संपत्ति में विषमता और भी ज्यादा, उन्होंने कुल संपत्ति का लगभग 6.7 गुना हिस्सा संभाला है।

    अन्तर्राष्ट्रीय तुलना (2022-23)
    भारत 22.6, 40.1 (भारी केंद्रित), ब्राज़िल 10 फीसदी संपत्ति अधिक (85 फीसदी), दक्षिण अफ्रीका अत्यधिक विषमता (टॉप 10 हिस्सेदारी), अमेरिका- अन्य अपेक्षाकृत कम असमानता। भारत में शीर्ष 1 फीसदी की आय हिस्सेदारी दक्षिण अफ्रीका और ब्राज़िल जैसे अत्यधिक असमान देशों का स्तर पार कर चुकी है और संपत्ति की विषमता भी भयावह स्तर पर है।

    5 परिवारों का दबदबा
    हुरान इंडिया मोस्ट वैलुएबुल फेमिली बिजनेस 2025 की रिपोर्ट के अनुसार भारत के शीर्ष 300 पारिवारिक व्यापारों की कुल संपत्ति 134 लाख करोड़ रुपये हैं जो तुर्की और फिनलैंड की जीडीपी से अधिक है। इनमें सबसे अमीर अंबानी परिवार की संपत्ति 28.2 लाख रुपये करोड़ है जो भारत की जीडीपी का लगभग एक बारहवां भाग है। या यूं कहे अडानी, बिड़ला, मित्तल और गोदरेज जैसे परिवार भी इस आर्थिक साम्राज्य के स्तंभ हैं। हालांकि यह सिर्फ आंकड़े नहीं हैं, बल्कि आर्थिक अन्याय का प्रमाणपत्र हैं जो बताते हैं कि विकास का लाभ किस ओर जा रहा है।

    1. ‘बिलीयोनैरीज राज’ बनाम ‘ब्रिटिश राज’—— यह विषमता भारत में अब सूबे के समय से भी अधिक बढ़ गयी है, अर्थात “बिलियोनैरीराज” अब “ब्रिटिशराज” से अधिक आर्थिक असमान और केन्द्रित हो गया है।

    2. नीति-निर्माण के लिए दिशा—— वैश्विक अध्ययन (वर्ल्ड इंक्वालिटी लैब) सुझाव देते हैं कि बेहतर आय-कर और संपत्ति-कर, साथ ही स्वास्थ्य, शिक्षा व पोषण में सार्वजनिक निवेश इस असमानता को घटाने में कारगर हो सकते हैं।

    3. अन्तरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य—— भारत में तीन दशक में असमानता में लगातार वृद्धि हुई है जबकि संघर्षशील देशों जैसे चीन ने तुलनात्मक रूप से बेहतर वितरण नीति अपनाया है।

    4. नागरिकों और विकास का ताना बाना—— जीडीपी की वृद्धि के बावजूद अगर इसका लाभ केवल कुछ परिवारों तक सीमित रहे तो आम नागरिकों की असंतुष्टि बढ़ती है जो सामाजिक और राजनीतिक अस्थिरता ला सकता है।

    ‘ब्रिटिशराज’ से भी आगे ‘बिलीऔनैरीराज’—— अंतरराष्ट्रीय शोध बताते हैं कि आज भारत में आर्थिक असमानता का स्तर ब्रिटिश शासनकाल से भी ज्यादा है। ब्राज़िल और दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों में भी असमानता अधिक है, लेकिन भारत का शीर्ष 1 फीसदी आय और संपत्ति हिस्सेदारी के मामले में उनसे मुकाबला कर रहा है। दुनिया के कई देशों ने कर सुधार और कल्याणकारी योजनाओं से असमानता को नियंत्रित किया लेकिन भारत में यह और तेज़ी से बढ़ी है।

    विकास का असंतुलन
    मोदी सरकार का आर्थिक मॉडल जीडीपी वृद्धि को प्राथमिकता देता है लेकिन यह वृद्धि असमान बंटवारे के साथ हो रही है। कुछ गिने-चुने घराने तो तेजी से अमीर हो रहे हैं, जबकि सौ करोड़ से ज्यादा लोग रोज़ी-रोटी, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी ज़रूरतों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी और कुपोषण कायम है। शहरी गरीब महंगाई से जूझ रहे हैं। शिक्षा और स्वास्थ्य की पहुंच सीमित है। ऐसे में अगर सरकारी नीतियां केवल चंद उद्योगपतियों को ही फल-फूलने दें और सौ करोड़ लोगों के घर का चूल्हा मुश्किल से जले तो यह आर्थिक विकास नहीं, बल्कि असमानता की मशीन है। वाराणसी व्यापार मंडल के अध्यक्ष अजीत सिंह बग्गा ने कहा कि एक लोकतांत्रिक देश में विकास का मतलब सिर्फ जीडीपी की बढ़ोतरी नहीं, बल्कि नागरिकों के जीवन में समान अवसर और सम्मान होना चाहिए। अगर भारत का आर्थिक मॉडल सिर्फ पाँच परिवारों को और अमीर बना रहा है और करोड़ों लोगों को और ग़रीबी में धकेल रहा है तो यह ‘बिनिलयोनैरीराज’ है जो किसी भी समय सामाजिक विस्फोट और अराजकता को जन्म दे सकता है।

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    600 बीमारी का एक ही दवा RENATUS NOVA

  • वो भूली दास्तां…

    वो भूली दास्तां…

    वो भूली दास्तां…

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    बकुलिहा: यूपी को पहला ‘नमक सत्याग्रही’ देने वाला गांव
    उन्नाव फोर लेन हाईवे बनने के बाद कई गांवों-कस्बों के नाम लिखे दिखने लगे हैं। उनमें एक है- बकुलिहा। करीब 5 हज़ार की आबादी वाले इस गांव के लिए भी कटा है। आजकल गांव का रास्ता पक्का है। कुछ समय पहले यह कच्चा था। अन्य की तरह इसे साधारण गांव समझने की भूल मत कीजिएगा। स्वाधीनता संग्राम में इस गांव का खासा योगदान रहा है। हालांकि स्वाधीनता से जुड़े अन्य स्थानों की तरह यह भी अब भूला-बिसरा ही है।
    उत्तर प्रदेश में नमक सत्याग्रह के लिए पहला ‘सत्याग्रही’ देने का श्रेय लालगंज से 12 किलोमीटर दूर स्थित इसी गांव के नाम दर्ज है। दांडी में 7 अप्रैल 1930 को समुद्र के खारे जल से नमक बनाकर ब्रिटिश हुकूमत के ‘नमक कर’ के आदेश का उल्लंघन करने के बाद महात्मा गांधी ने सारे देश में नमक सत्याग्रह का आग्रह किया। उत्तर प्रदेश में नमक सत्याग्रह की सफलता के लिए कानपुर से प्रकाशित होने वाले प्रताप अखबार के ‘प्रतापी’ पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी की अध्यक्षता में समिति गठित की गई। इस समिति में पंडित जवाहरलाल नेहरू रफी अहमद किदवई और मोहन लाल सक्सेना सदस्य के रूप में शामिल किये गये।
    इसी समिति ने उत्तर प्रदेश में नमक सत्याग्रह के शुभारंभ के लिए रायबरेली को चुना। तब यह सवाल उठा था कि आखिर रायबरेली ही क्यों? इस सवाल का जवाब जवाहर लाल नेहरू ने इन शब्दों में दिया-‘ रायबरेली में अंगद, हनुमान, सुग्रीव जैसे कार्यकर्ता घड़ी भर की सूचना मिलते ही जान हथेली पर रखकर निकल पड़ते हैं।’ इसकी दूसरी वजह रायबरेली का 1921 का किसान आंदोलन भी था। रायबरेली का ‘मुंशीगंज गोलीकांड’ भारतीय स्वाधीनता इतिहास में मिनी जलियांवाला बाग कांड के रूप में याद किया जाता है। सई नदी के तट पर ब्रिटिश हुकूमत और जमींदार सरदार वीरपाल सिंह के कारिंदों द्वारा बरसाई गई गोलियों से सैकड़ो किसान शहीद हुए। किसानों के खून से नदी का पानी लाल हो गया था। इस गोली कांड की सूचना पर रायबरेली आए जवाहर लाल नेहरू को नजर बंद कर दिया गया था। अपनी ‘आत्मकथा’ में उन्होंने इस कांड का जिक्र भी किया है। गणेश शंकर विद्यार्थी को इस कांड की विस्तार से रिपोर्ट छापने के लिए दंडित भी किया गया था। बाराबंकी में जन्मे रफी अहमद किदवई की कर्मभूमि रायबरेली ही रही। यह तीनों उत्तर प्रदेश में नमक सत्याग्रह के शुभारंभ के लिए गठित की गई समिति के सदस्य थे।
    रायबरेली को नमक सत्याग्रह के शुभारंभ के लिए चुने जाने की एक वजह यह भी हो सकती है। समिति ने अपने इस निर्णय की सूचना महात्मा गांधी को भी भेजी। महात्मा गांधी भी मुंशीगंज गोलीकांड भूल नहीं थे, इसलिए उन्होंने फैसले पर तुरंत मोहर लगाते हुए अपने साबरमती आश्रम में रहने वाले रायबरेली के शिवगढ़ के बाबू शीतला सहाय को एक पत्र देकर रायबरेली भी भेजा। यह पत्र था, राजा अवधेश सिंह और उनके भाई कुंवर सुरेश सिंह के नाम। पत्र में इन दोनों को रायबरेली के आंदोलन को नेतृत्व देने का निर्देश दिया गया था।
    जिला स्तर पर रफी अहमद किदवई मोहन लाल सक्सेना और कुंवर सुरेश सिंह की समिति ने 8 अप्रैल 1930 को डलमऊ के गंगा तट पर नमक बनाने का ऐलान किया और प्रथम सत्याग्रही के रूप में बकुलिहा गांव में जन्मे बाबू सत्य नारायण श्रीवास्तव को चुना गया। डलमऊ के मेंहदी हसन ने सत्याग्रह के लिए शेख सखावत अली का मकान निश्चित किया लेकिन प्रशासन ने 7 अप्रैल को ही मेहंदी हसन को गिरफ्तार कर लिया। रफी अहमद किदवई की तलाश में छापे मारे जाने लगे। ब्रिटिश पुलिस की सक्रियता को देखते ही बाबू सत्यनारायण श्रीवास्तव अंग्रेज हुकूमत की आंखों में धूल झोंकते हुए रफी अहमद किदवई के साथ रायबरेली आ गए। 1921 के मुंशीगंज गोलीकांड को ध्यान रखते हुए पंडित मोतीलाल नेहरू भी प्रयाग से रायबरेली पहुंच गये।
    ब्रिटिश पुलिस और प्रशासन की सक्रियता के चलते डलमऊ में गंगा के किनारे नमक बनाने का प्लान फेल हो गया लेकिन मोती लाल नेहरू की उपस्थिति में 8 अप्रैल 1930 को बाबू सत्य नारायण श्रीवास्तव ने लोनी मिट्टी से नमक बनाकर नमक कानून तोड़ कर प्रथम सत्याग्रही होने का गौरव प्राप्त किया। बाबू सत्य नारायण 1921 के असहयोग आंदोलन में नौकरी छोड़कर शामिल हुए। कई वर्षों तक जिला कांग्रेस कमेटी के मंत्री रहे। नमक एवं व्यक्तिगत सत्याग्रह, लगान बंदी और भारत छोड़ो आंदोलन में करीब साढ़े 3 वर्ष से ज्यादा दिन जेल में बंद रहे। ₹200 जुर्माना भी हुआ। लगानबंदी आंदोलन के दौरान बकुलिहा को बारडोली जैसा बनाने का श्रेय भी बाबू सत्यनारायण श्रीवास्तव को ही है।
    रायबरेली के कांग्रेस कार्यालय तिलक भवन में ‘नमक कर’ के विरोध में नमक बनाकर उत्तर प्रदेश में नमक सत्याग्रह की शुरुआत 8 अप्रैल 1930 को हुई। इसके बाद रायबरेली समेत पूरे प्रांत में गांव-गांव नमक बनने का सिलसिला शुरू हो गया। नमक कर के खिलाफ सत्याग्रह प्रारंभ होने के बाद मोती लाल नेहरू जैसे ही वापस गए रायबरेली में अंग्रेज पुलिस ने गिरफ्तारियां शुरू कर दी। बाबू सत्य नारायण श्रीवास्तव, महावीर, चतुर्थी तथा रामदुलारे को गिरफ्तार कर लिया गया। नमक कानून तोड़ने में बाबू सत्यनारायण श्रीवास्तव 6 महीने तक जेल में रहे।
    आजादी के आंदोलन में बकुलिया गांव स्वाधीनता संग्राम सेनानी के केंद्र में रहा। महात्मा गांधी जवाहर लाल नेहरू रफी अहमद किदवई से लेकर आजादी के राष्ट्रीय नायकों का गांव में आना-जाना रहा। गांव का कामामाई मंदिर आजादी के आंदोलन कार्यों के कार्यालय की तरह उपयोग में आता रहा। मंदिर से सटे बाग में सभाएं होती रही लेकिन सरकार और सरकारी अधिकारियों के लिए यह ऐतिहासिक गांव अब एक साधारण गांव की तरह ही है। हालांकि ग्राम प्रधान सुरेश त्रिवेदी ने आजादी के आंदोलन की याद दिलाने और बाबू सत्य नारायण श्रीवास्तव की स्मृतियों को जीवंत रखने के लिए गांव के एक प्रवेश द्वार पर ‘बाबू सत्य नारायण श्रीवास्तव द्वार’ निर्मित कराया है। नमक सत्याग्रह के लिए प्रथम सत्याग्रही देने वाले बकुलिहा गांव के इतिहास से नई पीढ़ी अनजान है। अब नई पीढ़ी को आजादी के इतिहास से परिचित कराने की जरूरत है।
    -—गौरव अवस्थी
    मो.नं. 9415034340

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  • स्वतंत्रता के श्वेत—श्याम बिन्दु

    स्वतंत्रता के श्वेत—श्याम बिन्दु

    स्वतंत्रता के श्वेत—श्याम बिन्दु

    डा. दिलीप सिंह एडवोकेट
    15 अगस्त 1947 को 190 वर्ष के शासन के बाद और करोड़ों लोगों के बलिदान के फल स्वरुप देश को विभाजित स्वतंत्रता प्राप्त हुए जिसमें भारत ने पाकिस्तान, अफ़गानिस्तान, तिब्बत, नेपाल, भूटान, म्यांमार, श्रीलंका, मालदीव, बांग्लादेश जैसे अपने विभाग को दिए बाद में अरुणाचल प्रदेश और कश्मीर का काफी भाग चीन और पाकिस्तान ने कब्जा कर लिया और स्वतंत्रता प्राप्ति के 78 वर्ष बीत गए आज हम अपनी आजादी बनाने जा रहे हैं तो गंभीर आत्मवलोकन और निष्पक्ष विवेचना करनी है कि इन वर्षों में हमने लोकतांत्रिक भारत में क्या खाया और क्या पाया है।
    इतना तो निश्चित है कि 1947 में भारत की स्थिति बहुत ही दयनीय और शोचनीय थी, क्योंकि भारत लगातार 800 वर्षों तक तुर्क मुगलों द्वारा और 190 वर्ष अंग्रेजों द्वारा लूटा गया था। देश का सब कुछ लूट कर बाहर चला गया था। केवल गिनती के राजनेताओं बड़े अधिकारियों और दलाल लोगों और सेठ—साहूकारों उद्योगपतियों के पास ही धन बचा था। देश की 99% जनता नंगी भूखी थी। इसी बीच पाकिस्तान से बिगड़े संबंध के कारण 1948 में पाकिस्तान से युद्ध भी लड़ना पड़ा। उधर गांधी जी द्वारा भी काफी धन—दौलत जबरदस्ती पाकिस्तान को दिल देने से स्थिति और भी भयानक हो गई थी। देश की इच्छा और जनमत के विरुद्ध सरदार पटेल की जगह नेहरू को जबरदस्ती प्रधानमंत्री बनाए जाने से और लॉर्ड माउंटबेटन से आजादी के बाद भी वायसराय बने रहने से देश की स्थितियां और भी दानी हो गई थीं।
    कालांतर में धीरे-धीरे देश का विकास शुरू हुआ उद्योग धंधे और नदियों पर बंद बढ़ने से और परमाणु रिएक्टर स्थापित होने से आर्थिक स्थिति में सुधार होना शुरू हुआ लेकिन नेहरू की अति महत्वाकांक्षा और राजनीतिक एवं कूटनीतिक विफलता के कारण और डा. राजेंद्र प्रसाद से उनका पूरी तरह मतभेद होने के कारण सारी प्रगति बेईमानी हो गई। विश्व मंच पर नेहरू की भीषण असफलता के बीच चीन ने भारत पर भीषण आक्रमण किया और उसे बुरी तरह पराजित किया और लाखों वर्ग किलोमीटर भूभाग छीन लिया। तिब्बत के दलाई लामा को जबरदस्ती शरण देने और तिब्बत को चीन के अधिकार में मान लेने और भारत का वीटो पावर चीन को सौंप देने से इतना गहरा झटका लगा जिससे भारत अभी भी सुधर नहीं पाया और इसी भीषण अपमान के चलते नेहरू का देहासान भी हो गया।
    नेहरू की नीतियां पूरे विश्व के लिए बहुत ही मूर्खतापूर्ण थी। कैलाश मानसरोवर जैसे पवित्र स्थान अक्षय चीन भारत के कब्जे से निकल जाने से और गिलगित-बाल्टिस्तान, मुजफ्फराबाद, पाकिस्तान के जीत लेने से भारत जो रस से लगभग सटा हुआ था, अब रस से बहुत दूर हो गया और उस पर पाकिस्तान और चीन का नियंत्रण हो गया। भारत रत्न लाल बहादुर शास्त्री ने देश को काफी हद तक संभाला था लेकिन बहुत बड़े विश्वास घात और षड्यंत्र के चलते विदेशी इशारों पर उन्हें ताशकंद में समझौता के कालखंड में मार दिया गया और नेताजी सुभाष चंद्र बोस की तरह आज तक उनका रहस्य यस का तस बना हुआ है।
    इसके बाद इंदिरा गांधी की विवादास्पद नीतियां लोकतंत्र का काला अध्याय आपातकाल लागू हुआ। न्याय पालिका की दुर्गति हुई देश के मुकदमे करोड़ की संख्या में चारों ओर हाहाकार मच गया। इसके बाद मिली-जुली सरकारों का दौर चला। फिर कांग्रेस और भाजपा के बीच रास्ता काशी और नूर कश्ती होते-होते 2014 में पहली बार मोदी जी के नेतृत्व में भाजपा की पूर्ण बहुमत की सरकार बनी जो आज भी चल रही है, फिर भी देश में कोई बहुत कुछ उल्लेखनीय सुधार नहीं हुआ।
    फिर भी कुछ क्षेत्रों में भारत में विश्व स्तरीय प्रगट किया जिसमें परमाणु भौतिकी रक्षा अनुसंधान विमान क्षेत्र और अंतरिक्ष विज्ञान कैसे भाग आते हैं। कृषि उत्पादन में भी अभूतपूर्व वृद्धि हुई और भारत चीन के बाद विश्व का दूसरा सबसे बड़ा खाद्यान्न उत्पादक देश है। दुग्ध क्रांति के फलस्वरुप भारत दूध में पहला और चीनी उत्पादन में भी पहला स्थान रखता है। इसके अलावा धान गेहूं पटसन और झूठ लोहा इस्पात जैसे क्षेत्रों में भी अभूतपूर्व प्रगति हुई लेकिन इस कालखंड में फिर से सियाचिन 1971 का भारत-पाकिस्तान का युद्ध कारगिल और गलवान घाटी एवं कश्मीर फर्क आतंकवादियों के लगातार आक्रमण से देश को भारी क्षति हुई जिसका असर यहां की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ा।
    इसके अलावा खेलों में भारत की स्थिति बहुत ही खराब रही भारत कभी भी ओलंपिक खेलों में सर्वश्रेष्ठ किस स्थान तक भी नहीं पहुंच सका जबकि चीन जैसे स्थान जो 1948 तक भारत से बहुत पीछे थे। 1970 के दशक से अभूतपूर्व प्रगति करते हुए अर्थ वित्त खेल सहित हर क्षेत्र में आज पहले स्थान पर पहुंच गये। भारत कभी भी ओलंपिक खेलों में एक से अधिक स्वर्ण पदक एक साथ नहीं जीत पाया। इससे अधिक दुर्भाग्य और क्या हो सकता है कुछ भारतीय खिलाड़ियों ने व्यक्तिगत स्तर पर कालखंड में पूरे विश्व में अपना जादू बिखर और सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी बने में सुनील गावस्कर, कपिल देव, सचिन तेंदुलकर, रोहित शर्मा, विराट कोहली, दिग्विजय सिंह, अशोक कुमार, विश्वनाथन आनंद, साइना नेहवाल, पीवी सिंधु, मैरी कॉम, अभिनव बिंद्रा, नीरज चोपड़ा, सुशील कुमार जैसे गिने—चुने नाम शामिल हैं। सबसे दुखद बात यह कि आज तक भारत को ओलंपिक खेलों के आयोजन करने योग्य भी नहीं समझ गया।
    भारत की सरकार और बुद्धिजीवी लोगों तथा तमाम मीडिया के लोगों को बातों को बढ़ा—चढ़ाकर खाने की आदत पड़ गई है। जैसे अंतरिक्ष क्षेत्र में भारत ने अभूतपूर्व प्रकट किया है लेकिन आज भी वह अमेरिका चीन और रूस से बहुत पीछे है। यह तीनों देश अपने अंतरिक्ष स्टेशन बन चुके हैं। चांद पर पहुंच चुके हैं। जब भारत अपना मानव चंद्रमा पर उतार देगा तब वह 1969 में अमेरिका की बराबरी करेगा। इस सच को छिपाकर भारत के चंद्रयान मिशन को बहुत बढ़ा—चढ़ाकर दिखाया जाता है, फिर भी चंद्रयान और मंगल अभियान उच्च कोटि के अभियान रहे।
    आज 78 वर्षों में भी देश भ्रष्टाचार बेरोजगारी महंगाई सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों तथा सरकारी तंत्रों की संवेदनहीनता लाल पिता शाही भ्रष्टाचार और घूसखोरी से बुरी तरह जूझ रहा है। देश का अपार काला धन और करोड़ों घुसपैठिए देश की अर्थव्यवस्था खोखला करने के लिए काफी है। बढ़ती जनसंख्या विशेष कर मुस्लिम जनसंख्या देश की सारी प्रगति और उपलब्धियां को फीका करके उसे धरातल पर ला देती हैं। यदि 5 करोड़ के लिए 10 वर्षों में सुविधाएं जुटा जाती हैं तो 10 करोड लोग पैदा हो जाते हैं, इसलिए सब कुछ और भी विकेट और भयानक हो जाता है निश्चित रूप से बिजली पानी और सड़क क्षेत्र में बहुत अधिक प्रगति हुई है लेकिन बिजली चोरी और सड़क पर भीषण दुर्घटनाएं बहुत ही भीषण चिंता का विषय है। रेल हवाई जहाज और सड़क दुर्घटनाओं में भारत के सबसे अधिक लोग मरते हैं। यही हाल रोग बीमारियों के और सांपों के काटे जाने को लेकर भी हैं।
    लोकतंत्र का सजक प्रहरी प्रेस मीडिया बहुत लाचार और विवश है। कुछ गिने—चुने सरकारी सुविधा प्राप्त प्रिंट इलेक्ट्रानिक मीडिया को छोड़ दिया जाए तो बाकी स्थितियां बहुत ही खराब है। मध्यम और जनपद स्तर के समाचार पत्रों को बहुत अधिक संघर्ष करना पड़ता है और सच छापने की बहुत भारी कीमत उनको चुकानी पड़ती है। विज्ञापन और सुविधाओं के लिए सरकार पर निर्भर यह तंत्र सरकार और अधिकारियों की आलोचना और बुराई एक सीमित दायरे से अधिक जाकर नहीं कर सकता है। पुलिस की हालत तो इतनी खराब है कि अधिकांश भारतीयों का विश्वास ही पुलिस से उठ चुका है और रात में कोई अपनी महिलाओं एवं लड़कियों को थाने में भेजने में हजार बार सोचता है। न्याय पालिका की स्थिति भी बहुत खराब है 5 करोड़ से अधिक मुकदमे लंबित हैं जो स्थिति को भयानक रूप में प्रदर्शित करते हैं। अगर 100 वर्ष इसी गति से सब कुछ चलता रहे तो भी मुकदमों का निस्तारण नहीं हो पाएगा। लगभग हर सरकारी विभागों की यही हालत है। कहीं भी पत्रावली बिना लेनदेन के आगे नहीं बढ़ती है।
    कुछ चीजों को बहुत बढ़ा—चढ़ाकर कहा जाता है। जैसे भारत विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है। बात बिल्कुल सही है लेकिन यह भी देखना होगा कि विश्व की सर्वश्रेष्ठ 10 अर्थव्यवस्था में तीसरे स्थान से लेकर दसवें स्थान तक की अर्थव्यवस्था में बहुत मामूली अंतर है। उसमें भी तीसरे चौथे पास में और छठें स्थान में नाम मात्र का अंतर है। अगर भारत तीसरे स्थान पर भी पहुंच जाता है तो इसमें कोई बहुत बड़ी आश्चर्य की बात नहीं है, क्योंकि कोई भी सरकार रहेगी। तीसरे स्थान तक भारत का 5 वर्ष में पहुंच जाना निश्चित है लेकिन भारत की असली अर्थव्यवस्था की तुलना चीन और अमेरिका से है जो भारत से 4 से लेकर 6 गुना अधिक है तब समझ में आता है कि अभी हम बहुत पीछे हैं। भारतीय राजनेता इतनी चालाक है कि वह हमेशा पाकिस्तान से तुलना करके भारत की श्रेष्ठ दिखाते हैं। बगल में चीन की कभी तुलना नहीं करते हैं जो भारत के लिए असली और सबसे बड़ा खतरा है। किसी भी जगह चले जाइए, सब जगह भ्रष्टाचार बेईमानी ल घूसखोरी भ्रष्टाचार का अड्डा है। चाहे पुलिस हो रेल विभाग हो परिवहन विभाग हो रजिस्ट्री विभाग हो बिजली विभाग हो, हर जगह यही हालत है। देश के लोगों को गलत दिशा में मोड जा रहा है। सरकार समर्थक लोग चीन और अमेरिका के सामानों का बहिष्कार करने की बात करते हैं जबकि उनके घर लगभग सारे सामान चीन और अमेरिका द्वारा बने हैं। यह कभी नहीं प्रयास किया जाता कि हम चीन एवं अमेरिका से अच्छे सामान उनसे सस्ती दर्पण बनाने का प्रयास करें।
    इस प्रकार निष्पक्ष रूप से यह कहा जा सकता है कि भारत में स्वतंत्रता के बाद 78 वर्षों में बहुत भारी प्रगट किया है लेकिन अगर रूस और अमेरिका से तुलना करके देखा जाय तो हम अर्थव्यवस्था, खेल, अंतरिक्ष शक्ति में उनसे बहुत पीछे हैं। इसी प्रकार प्रति व्यक्ति आमदनी में भारत विश्व के 100 सर्वश्रेष्ठ देशों में भी नहीं है। न्याय व्यवस्था, बिजली, पानी, सड़क की उत्तम व्यवस्था और रेलगाड़िया की रफ्तार प्रेस की स्वतंत्रता के मन में भी भारत की स्थिति बहुत सोचनी है। विश्व में कूटनीति और राजनीति के क्षेत्र में भी भारत बहुत पीछे है। इसी तरह उच्चतर शोध अच्छे विश्वविद्यालय अच्छे समाचार पत्रों के मन में भी भारत की स्थिति बहुत ही खराब है। गंदगी प्रदूषण और हरियाली को लेकर तो भारत की स्थिति चिंता से भी चिंतनीय है। स्थितियां इतनी खराब है कि लोगों की यात्रा के लिए आरक्षित टिकट का मिल पाना गंगा स्नान के बराबर है। यही देश की वास्तविक स्थिति है और ट्रेनों में यात्रा करने वाले कोई भी सुरक्षित नहीं है। जंजीर से बांधकर रखा गया शौचालय का मग्गा इसका प्रमाण है, फिर भी देश आगे बढ़ रहा है। अगर कोई सच्चा राष्ट्रभक्त व्यक्ति आ जाएगा तो उसी दिन से भारत बिल्कुल सही दिशा में सोने की चिड़िया और जगतगुरु हो सकता है।

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  • घायल दुकानदार की उपचार के दौरान हुई मौत

    घायल दुकानदार की उपचार के दौरान हुई मौत

    सिहौली चौराहे पर बाइक की टक्कर से हुये थे घायल
    तेजस टूडे सं.
    विनोद कुमार
    केराकत, जौनपुर। स्थानीय कोतवाली क्षेत्र के सिहौली बाजार में बाइक की टक्कर से घायल दुकानदार की वाराणसी के ट्रामा सेंटर में उपचार के दौरान मौत हो गई। उधर पुलिस ने आरोपी बाइक के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया है मौत की खबर लगते परिजनों में कोहराम मच गया।
    जानकारी के अनुसार सरौनी पूरबपट्टी केराकत के निवासी 52 वर्षीय रामदुलार यादव शुक्रवार की रात में बाजार से दुकान बंद कर 8 बजे घर के लिए निकले थे। जैसे ही वह जौनपुर केराकत मार्ग के सिहौली चौराहे के पास पहुंचे थे। इस दौरान लापरवाही से आ रही बाइक चालक ने विपरीत दिशा में आकर टक्कर मार दी और टक्कर मारने के बाद बाइक सवार बाइक लेकर फरार हो गया। उधर धक्का लगने से रामदुलार साइकिल समेत सड़क पर गिर पड़े । गंभीर रूप से घायल हो गये।
    सूचना लगने पर परिजन आनन—फानन में जिला अस्पताल उपचार के लिए ले गये जहां डॉक्टरों ने हालत गंभीर देखते हुए वाराणसी के लिए रेफर कर दिया। वाराणसी के ट्रामा सेंटर में उपचार चल रहा था जहां घायल रामदुलार की मौत हो गई। इसके बाद इसके बाद परिजन मृतक के पुत्र विवेक यादव ने आरोपी बाइक यूपी 62 सीडी 8368 के खिलाफ तहरीर दिया जिस पर पुलिस ने मामला दर्ज कर आरोपी बाइक और चालक की तलाश में जुट गई। उधर परिजनों ने मृतक का अंतिम संस्कार कर दिया।

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  • राहुल गांधी, देश विरोधी राजनीति का एक बड़ा चेहरा

    राहुल गांधी, देश विरोधी राजनीति का एक बड़ा चेहरा

    राहुल गांधी, देश विरोधी राजनीति का एक बड़ा चेहरा

    राहुल गांधी, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेता और नेहरू-गांधी परिवार के वारिस, भारतीय राजनीति में एक ऐसा नाम हैं जिनका हर कदम और बयान विवादों को जन्म देता है। राहुल के पिता राजीव गांधी, दादी इंदिरा गांधी और परदादा जवाहर लाल नेहरू, सभी देश के प्रधानमंत्री रह चुके हैं। इस विशेषाधिकार प्राप्त पृष्ठभूमि के बावजूद राहुल गांधी की राजनीतिक यात्रा को उनके आलोचक देश के हितों के खिलाफ मानते हैं जिसमें उनके बयान और कार्य भारत की छवि को नुकसान पहुंचाने वाले माने जाते हैं। वह प्रधानमंत्री से लेकर संवैधानिक संस्थाओं पर हमलावर रहते हैं। आजकल राहुल गांधी चुनाव आयोग पर आरोपों की झड़ी लगाये हुए हैं। इतना ही नहीं, जब भी देश में कोई परेशानी नजर आती है तो राहुल गांधी उस समय निगेटिव पॉलटिक्स करते नजर आते हैं।
    राहुल गांधी पर सबसे गंभीर आरोप यह है कि वह विदेशी मंचों पर भारत की छवि को धूमिल करते हैं। 2023 में लंदन में एक कार्यक्रम में उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) को आतंकी संगठन मुस्लिम ब्रदरहुड से जोड़ा और दावा किया कि भारत के संस्थान, जैसे प्रेस, न्याय पालिका और चुनाव आयोग पर कब्जा कर लिया गया है। इस बयान को भारतीय जनता पार्टी ने भारत को बदनाम करने की कोशिश बताया। 2025 में पहलगाम आतंकी हमले के बाद राहुल ने सरकार की विदेश नीति पर सवाल उठाते हुए कहा कि कोई भी देश भारत का समर्थन नहीं कर रहा। बीजेपी नेता अमित मालवीय ने इसे ‘‘पाकिस्तान का समर्थन’’ करने वाला बयान करार दिया, क्योंकि संयुक्त राष्ट्र और कई देश भारत के साथ खड़े थे। ऐसे बयानों को आलोचक देश की एकता और सम्मान के खिलाफ मानते हैं।
    राहुल गांधी के बयान अक्सर तथ्यों से परे और गैर-जिम्मेदाराना माने जाते हैं। 2024 के लोकसभा और महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में उन्होंने इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए और चुनाव आयोग पर वोट चोरी का आरोप लगाया। चुनाव आयोग ने इन दावों को खारिज करते हुए उन्हें ‘बेबुनियाद’ बताया। इसी तरह 2024 में अमेरिका में दिए एक बयान में राहुल ने कहा कि अगर भारत निष्पक्ष समाज बन जाय तो कांग्रेस आरक्षण खत्म करने पर विचार कर सकती है। इस बयान को बीजेपी और अन्य दलों ने आरक्षण-विरोधी करार दिया जिससे सामाजिक तनाव बढ़ा। हालांकि राहुल ने बाद में स्पष्टीकरण दिया लेकिन उनके आलोचकों का कहना है कि उनके बयान हमेशा संवेदनशील मुद्दों को भड़काने वाले होते हैं।
    2016 में नोटबंदी के दौरान राहुल ने इसे की साजिश बताकर देश की अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाने का आरोप लगाया। उनके इस बयान को बीजेपी ने भारत की आर्थिक प्रगति को बदनाम करने की कोशिश माना। इसी तरह 2007 में बाबरी मस्जिद के मुद्दे पर उनके बयान ने हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच तनाव पैदा किया। आलोचकों का कहना है कि राहुल गांधी की राजनीति ध्रुवीकरण को बढ़ावा देती है और वह जानबूझकर भारत की छवि को कमजोर करने वाले बयान देते हैं।
    राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा और जाति जनगणना जैसे प्रयासों को उनके समर्थक सामाजिक न्याय की दिशा में कदम मानते हैं लेकिन उनके आलोचकों का कहना है कि यह सब वोट बैंक की राजनीति का हिस्सा है। उनकी विदेश यात्राओं में भारत की आलोचना और सरकार को ‘तानाशाही’ या ‘आपदा’ जैसे शब्दों से नवाजना देश के हितों के खिलाफ माना जाता है। बीजेपी और उनके विरोधी उन्हें पप्पू जैसे तंज के साथ एक अपरिपक्व नेता के रूप में चित्रित करते हैं जो बार-बार तथ्यहीन और गैर-जिम्मेदाराना बयानों से देश को नुकसान पहुंचाते हैं।
    राहुल गांधी की राजनीति को उनके आलोचक भारत की प्रगति और एकता के लिए खतरा मानते हैं। उनकी विशेषाधिकार प्राप्त पृष्ठभूमि, जो उन्हें सत्ता के करीब ले आई, उनके बयानों और कार्यों के सामने बौनी नजर आती है। विदेशी मंचों पर भारत की आलोचना, संवेदनशील मुद्दों पर गैर-जिम्मेदाराना टिप्पणियां और संस्थानों पर हमले, राहुल गांधी को उनके विरोधियों की नजर में देश-विरोधी नेता बनाते हैं। उनकी राजनीति, चाहे वह रणनीति हो या अनजाने में की गई गलती, भारत के लिए नुकसानदायक मानी जाती है।
    अजय कुमार
    वरिष्ठ पत्रकार लखनऊ
    मो.नं. 9335566111

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  • जमीन से पाताल की गहराई कितनी है?

    जमीन से पाताल की गहराई कितनी है?

    जमीन से पाताल की गहराई कितनी है?

    जमीन से पाताल की गहराई का सवाल सुनकर दिमाग में कई तरह की बातें आती हैं। हमारे पुराने धार्मिक ग्रंथों में पाताल को पृथ्वी के नीचे का एक रहस्यमय दुनिया बताया गया है लेकिन अगर साइंस की नजर से देखें, तो ये पृथ्वी की गहराई की बात करता है। आइए, इसे आसान और बोलचाल की भाषा में समझते हैं। हमारी हिंदू कहानियों में पाताल को 7 निचले लोकों में से एक माना जाता है। इनका नाम है अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, रसातल और पाताल। ये कोई आम जगह नहीं, बल्कि एक ऐसी दुनिया है जहां नाग, दानव और असुर रहते हैं। पुराणों में लिखा है कि भगवान विष्णु ने अपने वराह अवतार में पाताल से पृथ्वी को उठाया था।
    पाताल की गहराई को इन कहानियों में अथाह यानी बिना किसी माप के बताया गया है। इसका मतलब ये कि ये इतना गहरा है कि कोई इसका अंत नहीं जानता। ये गहराई सिर्फ दूरी की बात नहीं, बल्कि हमारे मन के डर, रहस्य और अनजान दुनिया की कल्पना को दिखाती है। जैसे महाभारत में अर्जुन और श्रीकृष्ण की पाताल यात्रा की कहानी है जो शायद एक प्रतीक है जैसे आत्मा की गहराई में उतरना। कुछ पुराणों में पाताल की गहराई को हजारों योजन (एक योजन यानी 12-15 किलोमीटर) बताया गया है लेकिन ये भी सिर्फ एक तरीका है अनंत को समझाने का।

    साइंस की नजर से-
    अब साइंस की बात करें। अगर पाताल को पृथ्वी के नीचे की गहराई मानें, तो हमें पृथ्वी की बनावट को समझना होगा। पृथ्वी की सतह से इसके केंद्र तक की दूरी करीब 6,371 किलोमीटर है। पृथ्वी को चार हिस्सों में बांटा गया है-
    1. ’क्रस्ट (ऊपरी परत)’ -ये पृथ्वी की सबसे पतली परत है जहां हम रहते हैं। समुद्र के नीचे ये 5-10 किलोमीटर और जमीन पर 30-70 किलोमीटर मोटी है। 2. ’मेंटल’- ये क्रस्ट के नीचे है और 2,900 किलोमीटर तक जाता है। ये गर्म चट्टानों से बना है, जो इतनी गर्मी और दबाव में हैं कि धीरे-धीरे हिलती-डुलती रहती हैं। 3. ’बाहरी कोर’- ये तरल है, लोहे और निकल से बना, और 2,200 किलोमीटर मोटा है। 4. ’आंतरिक कोर’- ये पृथ्वी का सबसे गहरा हिस्सा है, ठोस है और 1,220 किलोमीटर बड़ा है। इसका तापमान सूरज की सतह जितना, यानी 5,500 डिग्री सेल्सियस! साइंस में इंसान ने ज्यादा गहराई तक नहीं पहुंचा। सबसे गहरी खुदाई रूस में हुई जिसे ’कोला सुपरडीप बोरहोल’ कहते हैं। वह सिर्फ 12.3 किलोमीटर तक गई जहां तापमान 180 डिग्री सेल्सियस हो गया। इससे ज्यादा गहराई में जाना अभी मुमकिन नहीं, क्योंकि वहां गर्मी और दबाव बर्दाश्त से बाहर है।
    कुल मिलाकर पौराणिक और साइंटिफिक नजरिए में फर्क है। कहानियों में पाताल एक रहस्यमय, अनंत दुनिया है जो हमारे मन की गहराई और अनजान चीजों को दिखाता है। साइंस में ये पृथ्वी की परतों की गहराई है जिसे हम माप सकते हैं। मिसाल के तौर पर पुराणों में पाताल की गहराई को हजारों किलोमीटर बताते हैं लेकिन साइंस कहता है कि पृथ्वी का केंद्र 6,371 किलोमीटर पर है। दोनों में एक बात कॉमन है-हमारी जिज्ञासा। कहानियां हमें आध्यात्मिक रास्ता दिखाती हैं और साइंस हमें हकीकत समझाता है। अंत में यही कहा जा सकता है कि अगर पुराणों की मानें तो यह अनंत है। एक ऐसी जगह जो हमारे मन की कल्पना से भी परे है। साइंस की मानें तो पृथ्वी के केंद्र तक 6,371 किलोमीटर लेकिन हम सिर्फ 12.3 किलोमीटर तक पहुंचे हैं। दोनों नजरिए हमें एक ही बात सिखाते हैं। हम इंसान हमेशा अनजान को जानने की कोशिश करते हैं, चाहे वह कहानियों से हो या साइंस से। पाताल की गहराई सिर्फ एक सवाल नहीं, बल्कि हमारी उत्सुकता की कहानी है।
    संजय सक्सेना
    वरिष्ठ पत्रकार लखनऊ
    9454105568

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  • खुद को ख्यातिलब्ध बताने की…!

    खुद को ख्यातिलब्ध बताने की…!

    खुद को ख्यातिलब्ध बताने की…!

    जब कभी देखता हूँ…!
    समाचार पत्रों में या पत्रिकाओं में
    चिकित्सकों की राय-सलाह-परामर्श
    पता नहीं क्यों, हो जाता है स्मृतिलोप
    और… अंतर ही भूल जाता हूँ कि…
    क्या होता है अर्श या फिर…!
    क्या होता है फर्श…
    प्रकाशित विषय-आर्टिकल में….!
    रोग के दस सम्भावित लक्षणों में से
    सात-आठ खुद-ब-खुद…
    मेल खाते नजर आते हैं… और…
    जो उपचार चिकित्सक सुझाते हैं…
    उनमें से पाँच-सात पहले से ही…!
    हम खुद ही आजमाएं होते हैं…
    पथ्य भी जो सुझाए जाते हैं…!
    उनमें से भी अधिकांश का,
    देसज रूप से पालन…
    हम पहले से ही किए हुए होते हैं…
    ऐसी दशाओं में व्यग्र होकर,
    छोटी-मोटी बीमारियों में भी…!
    पाठक बहुत घबराता है… और…
    अंदर ही अंदर कुढ़ता चला जाता है…
    मित्रों…वैसे भी कहते हैं कि…
    बुद्धि भय का कारण है…!
    इसलिए भ्रमवश-भयवश…
    भागकर वह लैब-पैथ में,
    ढेर सारी जाँचें… ख़ुद ही करवाता है…
    और…खुद ही विश्लेषण करता हुआ
    नीम-हक़ीम-वैद्य-चिकित्सक..और..
    साथ ही… खुद के लिए खतरा-ए-जान…
    बन जाता है… और…!
    भीतर-ही-भीतर से खुद को,
    कमजोर बनाता है… क्योंकि…
    गम्भीर बीमार होने का अज्ञात भय…
    उसे हरपल-हरदम सताता है…
    मित्रों अब प्रश्न इस बात का है कि
    जब चिकित्सक और अस्पताल…!
    दोनों ही उपलब्ध हैं चारों ओर…
    फिर जरूरत क्या है…?
    प्रकाशित हो राय इनकी… या फिर…
    सन्देश- विज्ञापन इनका…!
    टीवी-समाचार पत्र-सोशल मीडिया
    चट्टी-चौराहा, गली-गुच्चा हर ओर…
    जब हर चीज को समझने वाले…
    कायदे से सब कुछ समझाने वाले…
    प्रशिक्षित लोग हमारे पास उपलब्ध हैं
    फिर जरूरत क्या पड़ी है…?
    इन महानुभावों को…
    प्रचार-प्रसार के माध्यम से…!
    इतना सब कुछ बताने की…
    और… जरूरत क्या पड़ी है…?
    किसी चिकित्सक को प्रचार-प्रसार कर
    ख़ुद को ख्यातिलब्ध बताने की…!
    ख़ुद को ख्यातिलब्ध बताने की…!

    रचनाकार—— जितेन्द्र दुबे
    अपर पुलिस उपायुक्त, लखनऊ

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    600 बीमारी का एक ही दवा RENATUS NOVA

  • चुनाव आयोग पर फिर राहुल गांधी का ‘विस्फोटक’ हमला

    चुनाव आयोग पर फिर राहुल गांधी का ‘विस्फोटक’ हमला

    चुनाव आयोग पर फिर राहुल गांधी का ‘विस्फोटक’ हमला

    कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने मतदाता सूची में गड़बड़ी को लेकर एक और सनसनीखेज बयान दिया है। उन्होंने दावा किया कि उनके पास ऐसी बड़ी चीजें हैं जिनके खुलासे से भारत का चुनाव आयोग कठघरे में खड़ा हो सकता है। यह बयान न केवल उनकी पिछली टिप्पणियों की निरंतरता है, बल्कि भारतीय लोकतंत्र और इसकी चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल उठाता है। राहुल गांधी ने संसद परिसर में मीडिया से रूबरू होते हुए दावा किया कि उनके पास मतदाता सूची में गड़बड़ी को लेकर ठोस सबूत हैं जो चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हैं। उन्होंने संकेत दिया कि ये सबूत इतने विस्फोटक हैं कि इनके सार्वजनिक होने पर चुनाव आयोग की साख खतरे में पड़ सकती है। हालांकि उन्होंने विशिष्ट विवरण या सबूतों को तत्काल सार्वजनिक नहीं किया जिससे उनके बयान पर सवाल उठ रहे हैं। यह बयान ऐसे समय में आया है जब बिहार में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया और महाराष्ट्र व कर्नाटक के हाल के चुनावों में मतदाता सूची को लेकर पहले से ही विवाद चल रहा है।
    राहुल गांधी ने कहा कि उनकी पार्टी ने कर्नाटक के एक निर्वाचन क्षेत्र में मतदाता सूची की गहन जांच की और पाया कि 45, 50, 60 और 65 वर्ष की आयु के हजारों नए मतदाता पंजीकृत किए गए हैं जो संदिग्ध है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि चुनाव आयोग ने इन गड़बड़ियों को नजरअंदाज किया और पारदर्शिता सुनिश्चित करने में विफल रहा। उनके इस बयान ने विपक्षी दलों को एकजुट करने का काम किया है। खासकर शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट) और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार गुट) जैसे सहयोगियों ने उनके दावों का समर्थन किया है।
    बहरहाल राहुल गांधी का यह पहला अवसर नहीं है जब उन्होंने चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगाए हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव और महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के दौरान भी उन्होंने मतदाता सूची में धांधली और फर्जी वोटिंग के आरोप लगाए थे। तब उन्होंने महाराष्ट्र में मतदाता संख्या में असामान्य वृद्धि का दावा किया जिसमें 5 महीनों में 41 लाख नए मतदाता जोड़े गये जबकि पिछले पांच वर्षों में केवल 31 लाख की वृद्धि हुई थी। उन्होंने इसे वोट चोरी का ब्लूप्रिंट करार दिया और आरोप लगाया था कि फर्जी मतदाताओं को जोड़कर और मतदान प्रतिशत को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाकर धांधली की गई। इसके अलावा राहुल गांधी ने चुनाव आयोग से डिजिटल मतदाता सूची और मतदान केंद्रों की सीसीटीवी फुटेज सार्वजनिक करने की मांग की थी जिसे आयोग ने गोपनीयता और सुरक्षा कारणों से खारिज कर दिया। उनके इन दावों को सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी और चुनाव आयोग ने निराधार और असंवैधानिक बताते हुए चुनाव आयोग को बदनाम करने की कोशिश करार दिया। बीजेपी नेता निशिकांत दुबे ने तो यह भी कहा कि राहुल गांधी को अपने पिता राजीव गांधी द्वारा पारित कानूनों की जानकारी नहीं है जो मतदाता सूची पुनरीक्षण को नियंत्रित करते हैं।

    चुनाव आयोग का राहुल गांधी को उत्तर
    चुनाव आयोग ने ठोस सबूत के अभाव में हर बार राहुल गांधी के आरोपों को बार-बार खारिज किया है। आयोग ने कहा कि कर्नाटक लोकसभा चुनाव 2024 की मतदाता सूची को लेकर कांग्रेस ने लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 की धारा 24 के तहत कोई अपील दायर नहीं की जो एक वैध कानूनी उपाय था। इसके अलावा 2024 के लोकसभा चुनाव में हारे हुए किसी भी कांग्रेस उम्मीदवार ने जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 80 के तहत चुनाव याचिका दायर नहीं की। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि मतदाता सूची सभी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों के साथ साझा की जाती है और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त प्रावधान हैं।
    आयोग ने राहुल गांधी के बयानों को अनुचित और धमकी भरा बताया और कहा कि एक संवैधानिक संस्था को निशाना बनाना दुर्भाग्यपूर्ण है। इसके बावजूद आयोग ने राहुल गांधी को महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के आरोपों पर चर्चा के लिए आमंत्रित किया लेकिन इस पर कोई ठोस प्रगति नहीं हुई। वहीं दूसरी तरफ राहुल गांधी के बयानों ने भारतीय चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनके दावों ने विपक्षी दलों को एक मंच पर ला दिया है जो चुनाव आयोग से अधिक पारदर्शिता की मांग कर रहे हैं। हालांकि उनके सबूतों की कमी और विशिष्ट विवरण न देने की रणनीति ने उनके दावों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए हैं। अगर राहुल गांधी के पास वास्तव में 100 प्रतिशत पुख्ता सबूत हैं। जैसा कि उन्होंने दावा किया है तो इन्हें सार्वजनिक करना या कानूनी प्रक्रिया के तहत प्रस्तुत करना उनके और उससे भी अधिक देश के लिए महत्वपूर्ण होगा। दूसरी ओर चुनाव आयोग की ओर से बार-बार खारिज किए जाने और कानूनी उपायों का उपयोग न करने के लिए कांग्रेस की आलोचना ने इस विवाद को और जटिल बना दिया है। यह संभव है कि राहुल गांधी का यह बयान राजनीतिक रणनीति का हिस्सा हो जिसका उद्देश्य विपक्षी मतदाताओं को एकजुट करना और सत्तारूढ़ दल पर दबाव बनाना हो। हालांकि बिना ठोस सबूतों के इस तरह के गंभीर आरोप संवैधानिक संस्थाओं के प्रति जनता का भरोसा कमजोर कर सकते हैं जो लोकतंत्र के लिए खतरनाक हो सकता है।
    लब्बोलुआब यह है कि राहुल गांधी के हालिया और पूर्व के बयानों ने भारत में चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर एक महत्वपूर्ण बहस छेड़ दी है। उनके दावे, हालांकि गंभीर हैं। अभी तक ठोस सबूतों के अभाव में विवादास्पद बने हुए हैं। चुनाव आयोग ने इन आरोपों को खारिज करते हुए अपनी प्रक्रियाओं की पारदर्शिता का दावा किया है। इस स्थिति में राहुल गांधी और कांग्रेस के लिए यह महत्वपूर्ण होगा कि वे अपने दावों को कानूनी या सार्वजनिक मंच पर साबित करें, ताकि उनकी विश्वसनीयता बनी रहे। जनता का भरोसा कायम रहे। यह विवाद न केवल राजनीतिक बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की साख से जुड़ा है और इसका समाधान दोनों पक्षों के लिए एक चुनौती बना रहेगा।
    अजय कुमार
    वरिष्ठ पत्रकार लखनऊ
    मो.नं. 9335566111

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    600 बीमारी का एक ही दवा RENATUS NOVA

  • डिम्पल की तौहीन पर अखिलेश की चुप्पी की मजबूरी

    डिम्पल की तौहीन पर अखिलेश की चुप्पी की मजबूरी

    डिम्पल की तौहीन पर अखिलेश की चुप्पी की मजबूरी

    संजय सक्सेना
    वरिष्ठ पत्रकार लखनऊ
    9454105568
    उत्तर प्रदेश की सियासत में समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव की छवि एक प्रखर नेता के रूप में होती है। अखिलेश खुलकर अपनी बात कहते हैं। यूपी में बीजेपी को समाजवादी पार्टी टक्कर देती रही है लेकिन अखिलेश की राजनीति का यह एक ही पक्ष है, दूसरा पक्ष इसके बिल्कुल उलट है। दरअसल बात जब अल्पसंख्यकों से जुड़ी होती है तो अखिलेश यादव अपना मुंह सिल लेते हैं। सत्ता मे रहते अखिलेश न ने तुष्टिकरण की सियासत के चलते सीरियल ब्लास्ट के आरोपी आतंकवादियों पर से केस वापस लेने तक में गुरेज नहीं किया। इसी तरल लव जेहाद की घटनाओं और धर्मांतरण पर भी सपा प्रमुख चुप्पी साधे रखते हैं जबकि हिन्दुत्व, आरएसएस, श्री रामलला मंदिर, कांवड़ियों और सनातन के खिलाफ जहर उगलने का कोई मौका नहीं छोड़ते हैं। हद तो तब हो गई जब मुस्लिम वोट बैंक के चक्कर में सपा प्रमुख ने एक मौलाना द्वारा उनकी पत्नी डिंपल यादव के खिलाफ दिये गये विवादित बयान पर भी चुप्पी साधे रखी। शायद उनको लगता होगा कि यह इम्पारटेंट नहीं है कि डिंपल की बेइज्जती हुई हुई बल्कि इम्पारटेंट यह है कि डिंपल की बेइज्जती करने वाले के खिलाफ मुंह खोलने से सपा का मुस्लिम वोट बैंक नाराज हो सकता है।
    गौरतलब हो कि इसी के चलते राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव की पत्नी और मैनपुरी सांसद डिंपल यादव पर मौलाना साजिद रशीदी की अभद्र टिप्पणी ने न केवल एक राजनीतिक विवाद को जन्म दिया है, बल्कि सपा के लिए एक गंभीर चुनौती भी खड़ी कर दी है। इस घटना पर अखिलेश यादव की चुप्पी ने न सिर्फ उनके नेतृत्व पर सवाल उठाए हैं, बल्कि सपा के महिला वोट बैंक को भी खतरे में डाल दिया है। यह मुद्दा 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले सपा की रणनीति और छवि के लिए गंभीर संकट बन सकता है। मौलाना साजिद रशीदी ने 22 जुलाई 2025 को संसद मार्ग स्थित मस्जिद में सपा सांसदों की बैठक के दौरान डिंपल यादव के पहनावे पर आपत्तिजनक टिप्पणी की थी। उन्होंने डिंपल को राजनीतिक हिंदू महिला कहकर उनके साड़ी पहनने पर सवाल उठाए और मस्जिद की तौहीन का आरोप लगाया। इस टिप्पणी का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ जिसके बाद लखनऊ के विभूतिखंड थाने में सपा नेता प्रवेश यादव ने मौलाना के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई।
    प्रवेश यादव ने अपनी तहरीर में कहा कि मौलाना साजिद ने मैनपुरी सांसद डिंपल यादव पर अमर्यादित टिप्पणी कर पूरे समाज को ठेस पहुंचाई है। यह सिर्फ एक महिला की गरिमा को ठेस नहीं, बल्कि समाज की हर महिला इस टिप्पणी से आहत है लेकिन अखिलेश ने अंत तक मुंह नहीं खोला। बहरहाल इस विवाद ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को सपा पर हमला करने का मौका दे दिया। भाजपा की वरिष्ठ नेता और महिला कल्याण मंत्री बेबी रानी मौर्य ने लखनऊ में पत्रकार वार्ता में कहा कि डिंपल यादव पर की गई टिप्पणी नारी सम्मान पर हमला है। अखिलेश यादव की चुप्पी सवाल खड़े करती है। क्या उन्होंने सत्ता के लिए अपनी पत्नी का अपमान स्वीकार कर लिया है? उन्होंने यह भी जोड़ा, ‘यह एक महिला सांसद की गरिमा पर ही नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति पर हमला है। सपा का मौन क्या इस सोच की सहमति है कि अब मौलवी उनकी महिला सांसदों की गरिमा तय करेंगे? प्रयागराज में पूर्व मंत्री सिद्धार्थनाथ सिंह ने भी सपा पर तंज कसते हुए कहा, ‘अखिलेश तुष्टिकरण की नीति पर चलते हैं। चाहे उनके परिवार या पत्नी का अपमान हो, वे चुप रहते हैं। यह महिलाओं के लिए बड़ा संदेश है कि सपा में उनका सम्मान सुरक्षित नहीं है।
    अखिलेश यादव की चुप्पी को भाजपा ने वोट बैंक की राजनीति से जोड़ा है। लखनऊ में भाजपा एमएलसी सुभाष यदुवंश ने अटल चौक पर होर्डिंग लगाकर अखिलेश को मौन मुखिया करार दिया। होर्डिंग में लिखा था, पत्नी के अपमान पर चुप रहने वाले प्रदेश की बहन-बेटियों की सुरक्षा क्या करेंगे? धिक्कार है अखिलेश जी। यह होर्डिंग सोशल मीडिया पर वायरल हो गया जिससे सपा की मुश्किलें और बढ़ गईं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मामला सपा के लिए असहज स्थिति पैदा कर सकता है। खासकर तब जब सभी दल महिला वोटरों को साधने में जुटे हैं।
    बता दें कि उत्तर प्रदेश में महिला वोटरों की भूमिका हाल के चुनावों में निर्णायक रही है। महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश के विधानसभा चुनावों में भाजपा की जीत में महिला केंद्रित योजनाओं जैसे लाडली बहिन और लाड़ली लक्ष्मी का बड़ा योगदान रहा। सपा भी इस तथ्य से वाकिफ है और 2027 के चुनावों के लिए डिंपल यादव के नेतृत्व में महिला वोटरों को जोड़ने की रणनीति पर काम कर रही है। जून 2025 में लखनऊ में सपा की महिला सभा की बैठक में अखिलेश और डिम्पल ने बूथ स्तर पर महिला कार्यकर्ताओं को संगठित करने और घर-घर जाकर सम्पर्क करने की योजना बनाई थी लेकिन मौलाना की टिप्पणी और अखिलेश की चुप्पी ने इस रणनीति को झटका दिया है।
    राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि अखिलेश की चुप्पी को एक रणनीतिक कदम के रूप में देखा जा सकता है, ताकि मुस्लिम वोट बैंक नाराज न हो। अखिलेश ने इस मुद्दे पर सीमित प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि लोकसभा में क्या पहनकर आएं, बताओ। जो लोकसभा में पहनकर आएंगे, वह ही हमारी हर जगह ड्रेस होगी। यह बयान उनके आक्रामक रुख से इतर रहा जो आम तौर पर वे अन्य मुद्दों पर दिखाते हैं। सपा के एक वरिष्ठ नेता ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि पार्टी इस मुद्दे को तूल देकर धार्मिक ध्रुवीकरण से बचना चाहती है लेकिन यह चुप्पी महिला वोटरों को पार्टी से दूर कर सकती है।
    महिला वोटरों का सपा से मोहभंग होने का खतरा इसलिए भी गंभीर है, क्योंकि उत्तर प्रदेश में महिलाएं मतदान में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती हैं। 2022 के विधानसभा चुनाव में महिला मतदान प्रतिशत पुरुषों से अधिक था। ऐसे में डिंपल यादव पर अभद्र टिप्पणी और उस पर सपा की नरम प्रतिक्रिया से महिला वोटरों में नाराजगी फैल सकती है। खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में जहां डिंपल की सादगी और साड़ी पहनने की शैली को महिलाएं पसंद करती हैं, यह विवाद सपा की छवि को नुकसान पहुंचा सकता है।
    भाजपा ने इस मुद्दे को संसद से सड़क तक उठाकर सपा को घेरने की कोशिश की है। 28 जुलाई को एनडीए सांसदों ने संसद परिसर में प्रदर्शन किया और महिलाओं के सम्मान का मुद्दा उठाया। लखनऊ में भाजपा की महिला इकाई ने भी अखिलेश की चुप्पी पर रोष जताया। सपा के लिए यह स्थिति इसलिए भी नुकसानदायक है, क्योंकि पार्टी पहले से ही तुष्टिकरण के आरोपों से जूझ रही है। डिंपल यादव ने इस मामले में कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया है लेकिन उनके समर्थकों का कहना है कि उनकी गरिमा और सादगी ही उनकी ताकत है। इस पूरे प्रकरण में सपा की रणनीति अब तक संतुलन बनाए रखने की रही है लेकिन यह संतुलन उनकी महिला वोटरों को खोने की कीमत पर भारी पड़ सकता है। अगर सपा इस मुद्दे पर स्पष्ट और आक्रामक रुख नहीं अपनाती तो 2027 के चुनावों में उसे इसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। दूसरी ओर भाजपा इस मुद्दे को और भुनाने की कोशिश में है, ताकि वह महिला वोटरों को अपनी ओर आकर्षित कर सके। कुल मिलाकर यह विवाद सपा के लिए एक राजनीतिक संकट बन गया है जिसका असर आने वाले समय में स्पष्ट होगा।

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  • भगवा हुआ निर्दोष, सनातन की जीत!

    भगवा हुआ निर्दोष, सनातन की जीत!

    भगवा हुआ निर्दोष, सनातन की जीत!

    सुरेश गांधी
    ‘भगवा आतंकवाद’ शब्द एक अचानक उपजे विचार का परिणाम नहीं था। यह एक गहरी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा था। इस विचारधारा का उद्देश्य था बहुसंख्यक समाज की धार्मिक पहचान को ’संदिग्ध’ बनाना। राष्ट्रवादी संगठनों को ’कट्टरपंथी’ सिद्ध करना। चुनावी लाभ के लिए समाज में वैचारिक विभाजन पैदा करना। सिर्फ यही नहीं, जांच एजेंसियों पर भी राजनीतिक दबाव के आरोप लगे। अदालत में कई गवाहों ने कहा कि उन्हें बयान बदलने के लिए दबाव डाला गया था। मतलब साफ है मालेगांव विस्फोट से लेकर न्यायालय के फैसले तक एक वैचारिक युद्ध का अंत तो हो गया लेकिन भारत जानना चाहता है, “क्या उस समय सत्ता में बैठी सरकार ने आतंकवाद पर सच्चाई छिपाकर देश को धोखा दिया?” क्या उस समय की सत्ता ने आतंकियों को बचाने और भारत की सनातन पहचान को बदनाम करने के लिए ’भगवा आतंकवाद’ का झूठ गढ़ा? क्या यह एक सुनियोजित वैचारिक षड्यंत्र था? क्या कांग्रेस को देश से माफी मांगनी चाहिए? क्या ऐसे नेताओं की भूमिका की जांच होनी चाहिए जिन्होंने एक विचारधारा विशेष को निशाना बनाया? फिलहाल मालेगांव “भगवा हुआ निर्दोष“, यह वाक्य एक न्यायिक सत्य के साथ-साथ सांस्कृतिक पुनर्जागरण का उद्घोष है। “सनातन की जीत“, यह केवल कोर्ट का फैसला नहीं, यह करोड़ों भारतवासियों की आस्था, आत्मसम्मान और सभ्यता की पुनर्प्रतिष्ठा है. अब वक्त है, उन चेहरों को पहचानने का जिन्होंने राष्ट्रधर्म को कलंकित किया। अब वक्त है, न्याय की भावना को केवल निर्णय में नहीं, नीति में उतारने का।
    जब 2008 में मालेगांव विस्फोट की गूंज महाराष्ट्र के एक छोटे कस्बे से निकलकर राष्ट्रीय मीडिया की हेडलाइन बनी तो किसी ने अनुमान भी नहीं लगाया था कि यह महज एक आतंकी घटना की जांच नहीं, बल्कि भारत की सनातन पहचान और भगवा संस्कृति पर सबसे बड़ा वैचारिक हमला सिद्ध होगी और आज 16 वर्षों बाद जब न्यायालय ने स्पष्ट कहा, “कोई सबूत नहीं“, “कोई अपराध सिद्ध नहीं हुआ“, तब यह केवल न्याय की औपचारिक घोषणा नहीं रही, यह उस सुनियोजित प्रपंच का पूर्ण विघटन था जिसे “भगवा आतंकवाद“ के नाम से प्रचारित किया गया। या यूं कहे भारतीय राजनीति और सामाजिक विमर्श में ’भगवा आतंकवाद’ जैसा शब्द एक समय ऐसा बवंडर बनकर उभरा था, जिसने न केवल भारत की सनातन परंपरा, हिंदू पहचान और संस्कृति को कठघरे में खड़ा किया, बल्कि सच्चे राष्ट्रभक्तों के सम्मान को भी अपमानित किया। यह शब्द न केवल राजनीतिक ध्रुवीकरण का औजार बना, बल्कि सुनियोजित रूप से ’हिंदू’ को आतंक से जोड़ने की कवायद भी की गई लेकिन अब अदालत के एक ऐतिहासिक फैसले ने उस पूरी ’साजिश’ की परतें उधेड़ दी हैं। 2008 के मालेगांव बम विस्फोट मामले में अदालत ने एक बार फिर प्रज्ञा सिंह ठाकुर, लेफ्टिनेंट कर्नल श्रीकांत पुरोहित सहित सभी आरोपितों को बरी कर दिया। एनआईए (राष्ट्रीय जांच एजेंसी) को इस मामले में कोई ठोस सबूत नहीं मिले। इस निर्णय ने वर्षों से चल रहे उस ‘प्रोपेगेंडा’ को ध्वस्त कर दिया है जिसे ‘भगवा आतंकवाद’ के नाम पर गढ़ा गया था।
    बता दें कि 13 सितंबर 2008 मालेगांव (नासिक, महाराष्ट्र) में बम विस्फोट हुआ था जिसमें 6 की मौत, दर्जनों घायल हुए थे। इस मामले में अक्टूबर 2008 एटीएस (महाराष्ट्र) की जांच शुरू हुई, साध्वी प्रज्ञा ठाकुर, ले. कर्नल श्रीकांत पुरोहित सहित कई हिंदू कार्यकर्ता गिरफ्तार किये गये।
    नवम्बर 2008 में तत्कालीन कांग्रेस सरकार के वरिष्ठ नेताओं द्वारा “भगवा आतंकवाद“ और “हिंदू टेरर“ जैसे शब्दों का सार्वजनिक प्रयोग किया गया। एक साजिश के तहत 2009-2010 में चार्जशीट में ’अभिनव भारत’ और भगवा संगठनों का नाम, मीडिया ट्रायल तेज किया गया। 2011-2012 में आरोपी बार-बार कोर्ट में यातनाओं और बिना सबूत जेल में रखने की शिकायत करते रहे। आरोपितों के अनुसार उनसे जबरन कबूलनामे करवाए गए। साध्वी प्रज्ञा को लंबे समय तक बिना चार्जशीट जेल में रखा गया, मेडिकल उपचार से वंचित किया गया। 2014 में जब केंद्र में सत्ता परिवर्तन हुआ तो एनआईए द्वारा केस की दोबारा समीक्षा शुरू हुई। 2016 में एनआईए ने कहा कि साध्वी प्रज्ञा के खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं है, केस से हटाने की सिफारिश की गयी। 2017 में प्रज्ञा ठाकुर को जमानत मिली। कोर्ट ने एनआईए की रिपोर्ट पर संज्ञान लिया। 2019 में प्रज्ञा सिंह ठाकुर भोपाल से लोकसभा चुनाव जीतीं, संसद में पहुंचीं. 2023-24 में केस की सुनवाई अंतिम दौर में पहुंची, कई गवाह पलटे, एटीएस की जांच पर सवाल उठाये गये। 31 जुलाई 2025 में विशेष एनआईए कोर्ट ने सभी आरोपियों को बरी किया और कहा “कोई साक्ष्य नहीं” है आरोपियों को सजा देने के लिये। उनके पास न विस्फोट में साध्वी की कोई प्रत्यक्ष संलिप्तता का प्रमाण है और न ही कोई ठोस भौतिक साक्ष्य। न्यायालय ने कहा कि किसी को केवल किसी वैचारिक संगठन से जुड़ाव के आधार पर दोषी नहीं ठहराया जा सकता, जब तक कोई प्रत्यक्ष अपराध सिद्ध न हो। इतना ही नहीं, जांच अधिकारियों और पूर्व गृह मंत्रालय के कुछ अधिकारियों ने भी बाद में यह माना कि इस केस में ’राजनीतिक निर्देश’ काम कर रहे थे।
    फिलहाल अब जब अदालत ने पूरी थ्योरी को झूठा सिद्ध कर दिया है, यह देश के सामने एक नैतिक प्रश्न है. देश जानना चाहता है कि क्या ’भगवा आतंकवाद’: एक राजनीतिक जाल या विचारधारा पर हमला था? क्या अब कोई माफी मांगेगा? क्या अब कांग्रेस और ’हिंदू टेरर’ शब्द गढ़ने वाले नेता माफी मांगेंगे? क्या जांच एजेंसियों की भूमिका की जांच होगी जिन्होंने निर्दोषों को वर्षों तक जेल में डाला? क्या मीडिया आत्मावलोकन करेगा जिसने हेडलाइन बना दी, “हिंदू आतंक का चेहरा?“ यहां जिक्र करना जरुरी है कि ‘भगवा’ भारत में त्याग, बलिदान, धर्म और ज्ञान का प्रतीक रहा है। ऋषियों के वस्त्र हो, भगवान राम और कृष्ण की पताका हो या राष्ट्रध्वज का शीर्ष रंग। भगवा हमारी चेतना का सार रहा है लेकिन 2008 के बाद इसे एक विशेष षड्यंत्र के तहत ’आतंक’ से जोड़ा गया। तत्कालीन सरकार की प्रेरणा से कुछ अधिकारियों और बुद्धिजीवियों ने इस शब्द को मीडिया और मंचों पर प्रचारित किया। कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम ने खुले मंच से ’हिंदू टेरर’ शब्द का उपयोग कर दिया जिसने इस साजिश को वैचारिक आधार दे दिया।
    आखिरकार यह एक बड़ी रणनीति थी, देश के बहुसंख्यक समाज की सांस्कृतिक धारा को अपराधी साबित करने की। यह वही सोच थी जो ’हिंदुत्व’ को ’फासीवाद’, ’सांप्रदायिकता’ और अब ’आतंकवाद’ के रूप में परिभाषित करने पर तुली थी। “प्रज्ञा ठाकुर, कर्नल पुरोहित सहित अन्य आरोपियों के खिलाफ ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि वे विस्फोट की योजना या क्रियान्वयन में शामिल थे।” यह निर्णय एक कानूनी प्रक्रिया भर नहीं था, यह भारत की सांस्कृतिक चेतना की मुक्ति की घोषणा था। कहा जा सकता है भगवा सनातन का रंग, कभी आतंक का नहीं था, ’भगवा’ वह रंग है जो रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंद की वेशभूषा है। सन्यास और तपस्या का प्रतीक है। तिरंगे के शीर्ष पर प्रतिष्ठित है। राष्ट्र के बलिदान और सेवा का रंग है। इसी रंग को ’आतंकवाद’ से जोड़ देना भारत की आत्मा पर हमला था। अदालत का फैसला उस हमले का उत्तर है।

    साध्वी प्रज्ञा: अपमान से संसद तक की यात्रा
    एक महिला, एक साध्वी, एक सनातन विचारधारा की प्रतिनिधि, जिन्हें आतंकवादी कहा गया, प्रताड़ित किया गया, अपमानित किया गया लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। अब वे सांसद हैं और उन्होंने फैसले के बाद कहा, “यह मेरी नहीं, सनातन की विजय है। जो लोग सनातन धर्म को आतंक से जोड़ते हैं, वे पाप के भागी हैं। हम उन सभी को भगवान के न्याय से दंडित होते देखेंगे।“ भगवा पर लगा झूठा कलंक मिट गया जिन्होंने उसे कलंकित किया, वे अब सत्य से डरें।“ अब इतिहास पलटेगा, क्योंकि सत्य जाग गया है। यह वक्तव्य सिर्फ एक प्रतिक्रिया नहीं, एक चेतावनी है, उन तमाम ताकतों के लिए जो भारत की मूल सांस्कृतिक पहचान को दुष्प्रचार और वैचारिक हमले के जरिए मिटाने पर आमादा हैं। अफसोस है कि बिना जांच पड़ताल के जिस दिन साध्वी को गिरफ्तार किया गया था, उसी दिन मीडिया चैनलों पर ब्रेकिंग चली, “हिंदू आतंक का चेहरा?“ बहसें हुईं, व्यंग्य किए गए, नेताओं के बयान आए, “अब साफ हो गया कि हिंदू आतंक भी होता है“ लेकिन अब वही मीडिया इस बरी होने की खबर को प्रमुखता नहीं दे रहा। क्यों? ऐसे मामलों में तथाकथित सेक्युलर बुद्धिजीवी वर्ग की चुप्पी भी संदेहजनक है। वे जो वर्षों तक “भगवा से खतरा“ बताते रहे, आज मौन हैं। क्या उन्हें यह स्वीकार करना कठिन है कि उन्होंने बिना तथ्यों के पूरे समाज को बदनाम किया?

    भगवा: कोई रंग नहीं, बल्कि सनातन चेतना का प्रतीक
    भगवा कोई पार्टी का रंग नहीं है। यह वह चेतना है जो वेदों में प्रवाहित होती है जो गीता में अर्जुन के रथ के ऊपर लहराती है जो चित्तौड़ की रानी पद्मावती की ज्वाला में दिखाई देती है और जो हर सुबह मंदिरों में आरती की लौ में चमकती है। जिस रंग को आतंक से जोड़ा गया, उसी रंग ने हजारों वर्षों तक अहिंसा, ज्ञान और शौर्य की परंपरा को पोषित किया है। भगवा केवल वस्त्र नहीं, बल्कि एक संस्कार है।

    अब कौन देगा जवाब?
    क्या अब वे राजनेता देश से माफी मांगेंगे जिन्होंने ’हिंदू आतंक’ शब्द को स्थापित करने की कोशिश की? क्या वे अफसर सार्वजनिक रूप से सफाई देंगे जिनकी जांच ने निर्दोषों को सालों तक जेल में रखा? क्या मीडिया अपनी गलती स्वीकार करेगा? क्या न्याय पालिका अब इस पूरे प्रकरण की स्वतंत्र जांच की सिफारिश करेगी? मतलब साफ है मालेगांव ब्लास्ट केस केवल एक आतंकी हमले की कानूनी पड़ताल नहीं थी। यह एक पूरे समाज, संस्कृति और विचारधारा के ऊपर लगाए गए झूठे आरोपों की कसौटी थी। अब जब अदालत ने फैसला सुना दिया है, यह समय है कि हम आत्ममंथन करें, क्या हमने सिर्फ राजनीतिक लाभ के लिए अपने ही सभ्यता को ’आतंक’ कह दिया? भगवा झुका नहीं, बल्कि भगवा झूठा नहीं साबित हुआ, अब समय है कि भगवा को अपमानित करने वाले खुद कटघरे में खड़े हों। आज जब साध्वी प्रज्ञा, कर्नल पुरोहित और अन्य निर्दोष बरी हो गए, यह सिर्फ कानूनी राहत नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक पुनर्जागरण है। ’भगवा आतंकवाद’ का झूठ अब न्यायालय में असत्य सिद्ध हुआ लेकिन अब समय है कि देश उन लोगों की भी पहचान करे जिन्होंने इस झूठ को गढ़ा, फैलाया और वर्षों तक पोषित किया। यह ‘भगवा’ की नहीं, भारत की आत्मा की विजय है। अब वक्त है, सिर्फ केस बंद करने का नहीं, वैचारिक अपराधियों को बेनकाब करने का।

    पीड़ा, आक्रोश और सत्य की संतुष्टि
    भोपाल और उज्जैन से लेकर प्रयागराज, वाराणसी और लखनऊ तक साध्वी समर्थकों और हिंदू संगठनों में खुशी की लहर है। काशी में तपस्वी संत मंडल के अगुवा स्वामी जीतेन्द्रानंद सरस्वती महराज ने कहा, “सनातन को आतंक बताने वाले अब खुद कटघरे में हैं। अब मीडिया और नेताओं को माफी मांगनी चाहिए।” भोपाल में श्रद्धालुओं ने भगवा ध्वज फहराकर मनाया न्याय का पर्व। मालेगांव में भी स्थानीय लोग हैरान है, “इतने साल लगे और अंत में सब निर्दोष निकले… तो फिर असली दोषी कौन?”

    संदेह कैसे पनपा?
    2006 से 2008 के बीच भारत में एक के बाद एक आतंकवादी हमले हुये। मुंबई लोकल ट्रेन ब्लास्ट, मालेगांव (2006), समझौता एक्सप्रेस (2007), अजमेर दरगाह विस्फोट (2007), हैदराबाद, जयपुर, दिल्ली और अंततः मालेगांव (2008)। इनमें अधिकांश घटनाओं में लश्कर-ए-तैयबा, हूजी, इंडियन मुजाहिदीन जैसे इस्लामी आतंकी संगठनों की भूमिका प्रारंभिक जांच में सामने आई थी लेकिन अचानक 2008 के मालेगांव ब्लास्ट के बाद एटीएस ने दिशा बदली। हिदू साध्वी, पूर्व आर्मी अफसर और राष्ट्रवादी संगठनों से जुड़े लोगों को आरोपी बनाकर ‘भगवा आतंकवाद’ शब्द गढ़ा गया। कुछ अहम संकेत जो शक को जन्म देते हैं: समझौता एक्सप्रेस ब्लास्ट (2007) में अमेरिका की जांच एजेंसी एफबीआई ने पाकिस्तान स्थित आतंकी अज़हर, शाहिद और अऱशद की भूमिका बताई लेकिन भारत में यूपीए सरकार ने स्वामी असीमानंद को आरोपी बना दिया। अजमेर दरगाह विस्फोट में शुरुआती रिपोर्ट में इंडियन मुजाहिदीन का नाम था। बाद में एटीएस ने ’भगवा गुटों’ का नाम जोड़ दिया। तत्कालीन गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने 2010 में आधिकारिक तौर पर “सैफ्रन टेरर“ शब्द संसद में बोले, “भारत को अब भगवा आतंकवाद से भी नज़रें नहीं फेरनी चाहिए।“ सवाल यह है कि क्या ऐसा बयान देना न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने का प्रयास नहीं था? 26/11 के मुंबई हमले के बाद पाकिस्तानी विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने भी कहा था, “हमें तो भारत के ही मंत्री ने बताया कि हिन्दू आतंक भी है।” क्या भारत के एक आंतरिक राजनीतिक नैरेटिव को विदेशी शत्रु राष्ट्र ने अपने बचाव में इस्तेमाल किया? क्या कांग्रेस ‘हिंदू टेरर’ दिखाकर असली आतंकियों से ध्यान भटकाना चाहती थी? यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि लश्कर, जैश, इंडियन मुजाहिदीन जैसे संगठनों की जांच धीमी पड़ गई। आतंकी मामलों को ‘संप्रदाय आधारित’ दृष्टिकोण से देखा जाने लगा। सुरक्षा एजेंसियों पर एक वैचारिक दबाव बना कि वे “हिंदू संगठनों“ की जांच को तेज करें। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि निर्दोष जेल गये। आतंक की असली जड़ें समय पर नहीं काटी गईं, बल्कि राष्ट्र की सुरक्षा राजनीति की भेंट चढ़ गई।

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  • समय यात्रा: प्राचीन भारत और आधुनिक विज्ञान

    समय यात्रा: प्राचीन भारत और आधुनिक विज्ञान

    समय यात्रा: प्राचीन भारत और आधुनिक विज्ञान

    डा. दिलीप सिंह एडवोकेट
    इस अनंत विश्व में सब कुछ परम अद्भुत और समझ के परे हैं जितना ही बुद्धि और ज्ञान बढ़ता जायेगा, उतना ही आश्चर्य भी बढ़ता जाएगा, इसलिए हमारे परम ऋषियों और दार्शनिक लोगों ने आसमान ईश्वर और विश्व को नेति नेति कहा अर्थात जिनका कोई अंत नहीं है। इसी क्रम में समय भी है जो कोई इकाई ना होकर खुद में एक चौथा आयाम है जिसको हम देख नहीं सकते हैं। अभी तक हम लोग 3 आयाम जानते थे लेकिन अब 11 आयामों की खोज हो चुकी है। इसमें से केवल 3 आयाम लंबाई चौड़ाई और ऊंचाई है जिसे हम देख सुन और अनुभव कर सकते हैं, इसीलिए समय को हम देख नहीं सकते।
    बहुत से लोग सोचते हैं कि समय पूरे संसार पूरे विश्व में एक ही जैसा होगा और समय से सब कुछ आच्छादित है लेकिन यह उनकी सबसे बड़ी भूल है। समय हर जगह अलग-अलग होता है। कहीं यह बहुत तेज चलता है तो कहीं बहुत धीमा हो जाता है। उदाहरण के लिए कृष्ण नक्षत्र सहित उसके आस—पास समय बहुत ही धीमा हो जाता है जबकि श्वेत नक्षत्र से गुजरते समय यह समय बहुत ही तेज हो जाता है। हमारे उपग्रह चंद्रमा पर ही एक महीने का दिन और 1 महीने की रात होती है, इसीलिए वहां पर अंतरिक्ष यान या अंतरिक्ष यात्री उसे समय भेजे जाते हैं। जब वहां सूर्योदय का समय हो नहीं तो रात के समय में बर्फ से ठंड से सभी लोग और सभी यंत्र एवं उपकरण जम जाएंगे। चंद्रयान प्रक्षेपण के समय इसीलिए जब चंद्रमा पर रात हुई तो चंद्रयान गहरी शीत निद्रा में चला गया और फिर जाग नहीं पाया।
    बुध ग्रह पर केवल 88 दिनों में 1 वर्ष पृथ्वी का होता है। अर्थात बुद्ध पर समय बहुत तेजी से चलता है। है शुक्र पर 225 दिन का 1 वर्ष होता है जबकि बृहस्पति का 1 वर्ष पृथ्वी के 29 वर्ष के बराबर होता है। जब पीएम अर्थात प्लूटो का 1 वर्ष पृथ्वी के लगभग 500 वर्ष के बराबर होता है। इस प्रकार पृथ्वी पर जो जीव जंतु एक वर्ष जीवित रहता है, वह एम ग्रह पर जाते ही 500 वर्ष जीवित रहेगा। इसी को हम समय यात्रा अर्थात अंग्रेजी में टाइम ट्रेवल कहते हैं।
    आज यह व्यावहारिक रूप में संभव नहीं है लेकिन प्राचीन काल के भारत में सभी लोग इसे जानते थे और बहुत से लोग समय यात्राएं किया करते थे जिसमें रैवत नाम के राजा सनकादि, ऋषि नारद, अर्जुन, कृष्ण, इंद्रनील सहित तमाम लोग समय यात्राएं अनंत गति से या बहुत तेज गति से किया करते थे। रैवत नाम के राजा इसका उदाहरण है। वह अपनी पुत्री रेवती जो परम योग्य और परम सुंदरी थी, के लिए वर खोजना चाहते थे लेकिन पूरी धरती पर उसके योग्य कोई और नहीं मिला तब वह परमपिता ब्रह्मा के यहां गए जो हमारी आकाशगंगा के केंद्र भाग में रहते हैं और यह वैज्ञानिक सत्य है कि आकाशगंगा के केंद्र में 1 वर्ष धरती के 27 करोड़ वर्ष के बराबर होता है।
    जब राजा रैवत ब्रह्मलोक में पहुंचे तब ब्रह्मा जी कुछ काम कर रहे थे। 1 घंटे के बाद अपना काम करके उन्होंने राजा से आने का कारण और राजा ने उनको अपनी समस्या बताए तो ब्रह्मा जी हंसे और बोले— हे राजन, आप यहां पर एक दिन रह चुके हैं और इतने समय में धरती पर चार युग बीत चुके हैं जो 65 लाख वर्ष के बराबर होता है। हैरान परेशान जब राजा पृथ्वी के लोक भारत के अपने राज्य में आया तो उसे समय सारी धरती बदल चुकी थी, यह समय यात्रा का प्रामाणिक और सबसे वैज्ञानिक उदाहरण है।
    इस प्रकार समय संपूर्ण ब्रह्मांड में अलग-अलग होता है और यह गति पर आधारित होता है। यदि कोई व्यक्ति तेज गति से चलेगा तो समय उसके लिए धीमा होता चला जाएगा। उदाहरण के लिए कोई व्यक्ति अमेरिका जहाज से जाता है तो उसे दो दिन लगते हैं लेकिन अगर वह अंतरिक्ष यान से जाता है तो उसको आधा घंटा समय लगेगा। इस प्रकार दो दिन आधे घंटे के बराबर होगा और यदि व्यक्ति पूरा जीवन अंतरिक्ष यान में बिता दे तो वह हजारों वर्ष जीवित रह सकता है।
    यदि कोई व्यक्ति प्रकाश के वेग से चलेगा तो 1 वर्ष के बाद जब वह वापस आएगा तब तक धरती पर करोड़ों—अरबों वर्ष बीत जाएंगे, यह इतना कठिन प्रश्न है कि केवल सुनकर ही सामान्य व्यक्ति का दिमाग चकरा जाएगा। यदि कोई व्यक्ति अनंत वेग प्राप्त कर ले तो समय उसके लिए स्थिर हो जाएगा। वह अमर हो जाएगा और भारत के इतिहास में ऐसे तमाम ऋषि, मुनि, परमजानी, राजा, महाराजा और दार्शनिक हुए हैं जो प्रकाश की गति से भी अधिक अनंत गति से चलकर आकाशगंगा से कुछ समय में ही ब्रह्मा विष्णु और भगवान शिव से मिलकर वापस आ जाते थे।
    समय यात्रा का एक महत्वपूर्ण बिंदु है। समय को सीमित कर देना उदाहरण के रूप में अगर हम 100 करोड़ प्रकाश वर्ष दूर किसी अंजनी आकाशगंगा में जाना चाहते हैं तो उसी को गोलाकार कर देने पर दोनों बिंदु एक स्थान पर आ जाएंगे और 100 करोड़ प्रकाश वर्ष मुश्किल से एक प्रकाश वर्ष के बराबर रह जाएगा। इस तरह 100 करोड़ प्रकाश वर्ष की यात्रा केवल 1 लाख प्रकाश वर्ष में बदल जाएगी। ऐसे में बहुत लंबी संभव है, इसको वरम्होल या समय की सुरंग कहा जाता है। इस प्रकार समानांतर ब्रह्मांड अर्थात पैरेलल यूनिवर्स जो हमारे ऋषि मुनि खोज चुके थे और पहले उसे हंसी मात्रा समझा जाता था। वह आज विज्ञान के लिए सबसे कठिन पहेली बन चुका है। इतना ही नहीं, हमारे ऋषि, मुनि, वैज्ञानिक, एंटी यूनिवर्स, एंटी एनर्जी, एंटीमैटर, डार्क एनर्जी, डार्क मैटर जैसी चीज बहुत पहले ही खोज चुके थे। उन्होंने ऐसे विमान अंतरिक्ष यान बनाए थे जो देश कल को चीरते हुए संपूर्ण आकाशगंगा को कुछ घंटे में ही पार कर सकते थे। अर्थात् कुछ घंटे में एक लाख प्रकाश वर्ष जाकर वापस आ जाते थे।
    यह कोई हंसी मजाक नहीं, बल्कि सच्चाई है ब्रह्मा से भी अधिक लंबा विष्णु का और विष्णु से भी अधिक लंबा समय भगवान शिव का होता है और जब भगवान शिव प्रकृति में लीन होते हैं तो समय भी उन्हीं में समाहित हो जाता है और सब कुछ नष्ट हो जाता है जिसको महा प्रलय कहा जाता है। अपने देशकाल समय विद्युत चुंबकत्व सब कुछ परमाणु मात्र में समाहित हो जाता है। इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है, क्योंकि इस अनंत ब्रह्मांड में ऐसे सूर्य और पिंड है जहां मटर के दाने के बराबर द्रव्यमान का भर कई करोड़ किलोग्राम से भी अधिक होता है।
    ऐसी एक घटना का वर्णन महाभारत में भी है जब विजय यात्रा के लिए महाभारत युद्ध के समय में भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को लेकर महाश्वेत द्वीप में महा विष्णु से मिलने पहुंचे जो अपनी सैकड़ों आकाशगंगाओं के केंद्र में रहते थे जहां सारे परम तेजस्वी प्राणी प्रकाश रूप में रहते थे। उन्हें भोजन पानी या किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं होती थी। जब वे आकाश गंगा पार करके महान कृष्ण विवर अर्थात ब्लैक होल से गुजर रहे थे तो वहां इतना घना अंधेरा छा गया कि अर्जुन और श्री कृष्ण को अपना हाथ भी नहीं दिखाई दे रहा था। इसके बाद उन्होंने सुदर्शन चक्र को याद किया जो करोड़—अरबों सूर्य के बराबर तेजस्वी था लेकिन महाभारत में लिखा है कि उस सुदर्शन चक्र का तेज भी उस ब्लैक होल में समाप्त हो गया, उसे एक मोमबत्ती के बराबर प्रकाश जैसा दिख रहा था। न तत्र सूर्यो भाति न चंद्र तारकम्। नेमा विद्युतो भाति कुतोअ्यं अग्नि।# से यह बिल्कुल स्पष्ट हो जाता है।
    विज्ञान के गणित के दर्शन के और अन्य सभी ज्ञान विज्ञान के सारे सूत्र अरब अमेरिका और यूरोप के लोग भारत के धर्म ग्रंथ विज्ञान और ऋषि मुनियों से ही सीखे हैं। इसका प्रमाण है जब तक अरब के लोग और यूरोप के लोग भारत नहीं आए थे तब तक उनका ज्ञान विज्ञान शून्य था और वह चोरी डकैती से या पशुओं को चराकर या लूट मारकर नौका से मछली मारकर अपने जीवन का यापन करते थे। यही हाल यूनान, मिस्र, रोम, चीन, अफ्रीका तथा अमेरिका की सभ्यताओं का भी था। इसके लिए अभी बहुत अधिक खोज की आवश्यकता है।
    भारतीय धर्म दर्शन और ग्रंथों में कुछ ऐसे महान प्रसंग है जिसे देखकर अत्याधुनिक विज्ञान वैज्ञानिक और टेक्नोलॉजी स्वयं हैरान हो जाते हैं जहां समय समय यात्रा, एक ही समय में समय का अलग-अलग गति से चलना और एक ही व्यक्ति का अनेक ब्रह्मांड में एक ही समय पाया जाना लिखा गया है। भगवान श्री राम द्वारा बैकुंठ जाने के लिए जब अपने अंगूठी पाताल में गिराई गई तो वहां पर नागराज वासुकी में पाताल में हनुमान जी को बताया कि इस तरह अनंत ब्रह्मांड है और हर ब्रह्मांड में इस समय राम जी का अवतार हो रहा है और उन्होंने करोड़ों अंगूठी दिखाई जो श्री राम के ही थे। दूसरी घटना भगवान श्रीकृष्ण की है जब ब्रह्मा जी उनसे मिलने आए तो श्रीकृष्ण ने द्वारपालों से कहा कि पूछ कर आओ कौन से ब्रह्मा है और वह कि ब्रह्मांड से आये हैं। यह सुनकर ब्रह्मा आश्चर्यचकित हो गये, क्योंकि उनकी समझ में पूरे ब्रह्मांड में वही अकेले ब्रह्मा थे। बाद में श्रीकृष्ण ने उनको अनंत ब्रह्मांड दिखाए और हर एक ब्रह्मा ने झुककर भगवान श्रीकृष्ण को प्रणाम किया तब ब्रह्मा जी समझ गए कि श्री कृष्ण भगवान श्री विष्णु के अवतार हैं और एक ही साथ अनंत ब्रह्मांडों का संचालन करते हैं।
    इसी प्रकार जब राजा रैवतक अपनी पुत्री रेवती को लेकर ब्रह्मा जी के पास गए और उनसे योग्य वर के लिए पूछा तो ब्रह्मा जी हंसे और बोले, तुम्हारे कुछ पल जो ब्रह्म लोक में बीते हैं, वह धरती के 10 करोड़ वर्ष के बराबर है, इसलिए बहुत शीघ्र जाओ और आने वाले समय में बलराम से अपनी पुत्री का विवाह कर लो, वरना यह समय भी बीत जाएगा। यह सभी समय यात्रा, समय का हर ब्रह्मांड में अलग-अलग होना और 64 आयाम दिखाते हुए यह बताता है कि एक ही साथ में एक ही व्यक्ति कई कई ग्रह उपग्रह आकाशगंगा में समय यात्रा कर सकता है। अर्जुन और श्री कृष्ण की वह यात्रा भी महाभारत काल में विश्व विख्यात है जब वह अपनी आकाशगंगा पार करके ब्लैक होल व्हाइट होल पार करते हुए श्वेत द्वीप में महाविष्णु के पास पहुंचे जहां प्रत्येक जीव ऊर्जा के श्वेत बिंदु में चमक रहे थे वहां भूख प्यास भोजन भी नहीं लगता था।
    समय यात्रा अर्थात टाइम ट्रेवल अब केवल एक सपना नहीं, बल्कि सच्चाई बन चुका है। हो सकता है कि आने वाले समय में यह सपना साकार होकर सच्चाई के धरातल पर उतर सके। अभी बताना आवश्यक है कि लंबाई, चौड़ाई, ऊंचाई के अलावा समय चौथा आयाम है। इस तरह विज्ञान 10 से 11 और भारतीय दर्शन विज्ञान 64 आयामों की बात करता है और निश्चित रूप से अभी विज्ञान को बहुत आगे जाना पड़ेगा, क्योंकि प्राचीन काल में भारतीय ऋषि—मुनि वैज्ञानिक 84 लाख योनियों की बात करते थे। विज्ञान द्वारा अभी 20 लाख प्रकार के जीव जंतु की खोज हो चुकी है। तीन आयाम के अलावा अन्य आय में रहने वाले लोगों को साधारण मनुष्य देख सुन और समझ नहीं सकते।
    डा. दिलीप सिंह एडवोकेट

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  • अँखिया कै ओरिया चुवत दिन-रतिया…

    अँखिया कै ओरिया चुवत दिन-रतिया…

    अँखिया कै ओरिया चुवत दिन-रतिया…

    (बिरह गीत)

    अँखिया कै ओरिया चुअत दिन-रतिया,
    बुनियाँ गिरत रसधार हो।
    अइसे में सइयाँ मोर अउतै जव घरवाँ,
    जिनगी में आवत बहार हो।

    मनवाँ कै दुखड़ा हम केसे कहीं बदरा,
    बिजुरी से जियरा डरि जाए हो।
    दियना जलाई के बिताईल ई रतिया,
    मनवाँ बहुत अकुलाय हो।
    भेजी देता बलमू के विदेशवाँ से हमरे,
    गाईत हमहूँ मल्हार हो।
    अइसे में सइयाँ मोर अउतै जव घरवाँ,
    जिनगी में आवत बहार हो।

    भरि गयल पनियाँ से ताल-तलईया,
    नलिनी ओम्में मुसुकाय हो।
    सोना जस देहिया ऊ कई दिहलन माटी,
    सँसिया हमार कुम्मिहिलाय हो।
    बनिके बदरवा जब सइयाँ बरसतैं,
    चमकत ई हमरो लिलार हो।
    अइसे में सइयाँ मोर अउतै जव घरवाँ,
    जिनगी में आवत बहार हो।

    बोललै कोयलिया जब पत्तवा में छिपीके,
    मनवाँ बहुते ई दुखाय हो।
    पिया परदेशी मोर संदेशवा न लिहनै,
    गईने बिदेशवा में छाय हो।
    पैयड़ा निहारत बाटी अपने मुरहवा कै,
    कब हँसी हमरो दुआर हो।
    अइसे में सइयाँ मोर अउतै जव घरवाँ,
    जिनगी में आवत बहार हो।

    रामकेश एम. यादव
    ‘सरस’ मुम्बई

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    600 बीमारी का एक ही दवा RENATUS NOVA

  • मेरी पहचान…!

    मेरी पहचान…!

    मेरी पहचान…!

    कहते हैं दुनिया वाले कि…!
    नागपंचमी का नाग हूँ मैं…
    बिन सुर-लय-छन्द-ताल के…!
    एक बेसुरा सा राग हूँ मैं…
    संग इसी के अक्सर कहते…!
    उष्ण रुधिर और तप्त हृदय संग…
    बारिश में… जलती हुई सी आग हूँ मैं,
    और… चट्टानों से बहते निर्झर से…!
    मथकर उठता… गन्दा सा झाग हूँ मैं…
    अब कैसे बताऊँ उनको मैं… कि…
    जाने कितने अभागों का भाग हूँ मैं…
    खपरैले घर के छाजन पर…
    शुभ सूचना देने वाला… काग हूँ मैं…
    सुरती-चूना-कत्था-बीड़ी नहीं…!
    पान-सुपाड़ी-गरी-सौंफ… और…
    भोले बाबा ठण्डी भाँग हूँ मैं…
    गर्म ताप का गोल सूर्य नहीं मैं…!
    चन्द्र देव का शीतल सा पराग हूँ मैं…
    चौसर-जुए-पासे का मैं खेल नहीं,
    होली वाला सुन्दर सा फाग हूँ मैं…
    इसके अलावा सुन लो प्यारे…
    और नहीं कुछ बोल सकूँगा मैं…
    माँ के ममतामयी हाथों से…!
    बच्चे के माथे पर लगने वाला,
    काज़ल का गोला वाला दाग़ हूँ मैं…

    रचनाकार—— जितेन्द्र दुबे
    अपर पुलिस उपायुक्त, लखनऊ

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    600 बीमारी का एक ही दवा RENATUS NOVA

  • प्रभू की महिमा कितनी अद्भुत है…

    प्रभू की महिमा कितनी अद्भुत है…

    प्रभू की महिमा कितनी अद्भुत है…

    प्रभू की महिमा कितनी अद्भुत है,
    दुनिया बनाकर स्वयं अदृश्य हैं,
    आँख की ज्योति देखने को दी,
    परंतु दिखते बंद आँखों को ही हैं।

    भगवान होते ही बहुत सरल हैं,
    बस नाम जपो, हमारे हो जाते हैं,
    पर सुख में हम उन्हें भूल जाते हैं,
    दुःख में वही फिर याद आते हैं।

    सच्चे लोग बहुत ही सस्ते होते हैं,
    बस मीठा बोलो और ख़रीद लो,
    शायद इसीलिए जग के लोग,
    उनकी कीमत नहीं समझते हैं।

    गर्दिश में रिश्तों की परख होती है,
    बारिश में हर पत्ता हरा दिखता है,
    दुख में सोच सकारात्मक होती है,
    ख़ुशी में नकारात्मकता आती है।

    किसी को स्मरण रखने या उससे
    मिलने को मन बनाना पड़ता है,
    जब मन यह निश्चय कर लेता है,
    वक्त अपने आप निकल आता है।

    किसी की मदद का इरादा हो तो
    स्वयं का मन भी बनाना चाहिए,
    मन में जब दृढ़ निश्चय होता है,
    मदद का हाथ आगे बढ़ जाता है।

    कमजोरी पर नियंत्रण कर लें,
    तो असम्भव सम्भव बना सकते हैं,
    आदित्य दृढ़ निश्चय कर बढ़ें तो,
    बुलंदी से आसमाँ झुका सकते हैं।

    डा. कर्नल आदिशंकर मिश्र
    विद्या वाचस्पति, लखनऊ

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    600 बीमारी का एक ही दवा RENATUS NOVA

  • मालेगांव ब्लास्ट केस: 17 साल बाद न्याय या सवालों का अन्त?

    मालेगांव ब्लास्ट केस: 17 साल बाद न्याय या सवालों का अन्त?

    मालेगांव ब्लास्ट केस: 17 साल बाद न्याय या सवालों का अन्त?

    आत्माराम त्रिपाठी
    मालेगांव बम ब्लास्ट केस, जो 29 सितंबर 2008 को महाराष्ट्र के मालेगांव में हुए विस्फोट के बाद से सुर्खियों में रहा, आखिरकार 17 साल बाद एक नतीजे पर पहुंचा है। राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) की विशेष अदालत, मुंबई ने पूर्व भाजपा सांसद साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर, लेफ्टिनेंट कर्नल श्रीकांत प्रसाद पुरोहित सहित सभी सात आरोपियों को बरी कर दिया। इस फैसले को विशेष न्यायाधीश ए.के. लाहोटी ने सुनाया जिन्होंने अपने निर्णय में साफ कहा कि शक के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता और अभियोजन पक्ष ठोस सबूत पेश करने में विफल रहा। इस फैसले ने न केवल कानूनी हलकों में हलचल मचाई है, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर भी कई सवाल खड़े किए हैं।
    2008 में मालेगांव के भीकू चौक पर एक मोटरसाइकिल में हुए विस्फोट ने छह लोगों की जान ले ली थी और 100 से अधिक लोग घायल हुए थे। इस हमले ने न केवल स्थानीय समुदाय को झकझोर दिया, बल्कि देश भर में संवेदनशील बहस को जन्म दिया। शुरुआती जांच में महाराष्ट्र आतंकवाद निरोधी दस्ते (एटीएस) ने दावा किया था कि यह हमला ‘अभिनव भारत’ नामक संगठन से जुड़ा था और साध्वी प्रज्ञा की मोटरसाइकिल का इस्तेमाल विस्फोट में किया गया था। कर्नल पुरोहित पर कश्मीर से आरडीएक्स लाने का आरोप लगा। इन आरोपों ने “भगवा आतंकवाद” जैसे शब्दों को जन्म दिया जिसने देश में धार्मिक और वैचारिक ध्रुवीकरण को और गहरा किया।
    17 साल की लंबी कानूनी लड़ाई के बाद, मुंबई की विशेष एनआईए अदालत का यह फैसला कई मायनों में महत्वपूर्ण है। विशेष न्यायाधीश ए.के. लाहोटी ने अपने फैसले में कई खामियों को रेखांकित किया। न मोटरसाइकिल का चेसिस नंबर बरामद हुआ और न ही यह साबित हो सका कि वह साध्वी प्रज्ञा की थी। कर्नल पुरोहित के खिलाफ आरडीएक्स से संबंधित कोई ठोस सबूत नहीं मिला। इसके अलावा घटनास्थल से फिंगर प्रिंट या अन्य फॉरेंसिक साक्ष्य एकत्र नहीं किये गये और जांच में कई विसंगतियां पाई गईं। अभियोजन पक्ष के 323 गवाहों में से 34 अपने बयान से मुकर गये जिसने मामले को और कमजोर किया।
    यह फैसला उन लोगों के लिए राहत की सांस लेकर आया है जो मानते हैं कि यह मामला राजनीति से प्रेरित था। साध्वी प्रज्ञा और कर्नल पुरोहित के समर्थकों का तर्क है कि उन्हें गलत तरीके से फंसाया गया और यह फैसला उनके “न्याय” की जीत है। साध्वी प्रज्ञा के वकील जेपी मिश्रा ने कहा, “हमें पूरी उम्मीद है कि सत्य की जीत होगी। इस केस में झूठे सबूत पेश किये गये थे लेकिन सत्य को कभी छिपाया नहीं जा सकता।” दूसरी ओर पीड़ित परिवारों ने इस फैसले पर गहरी निराशा जताई है। एक पीड़ित के पिता ने कहा, “17 साल बाद भी हमें न्याय नहीं मिला। हम सुप्रीम कोर्ट जाएंगे।” उनका यह दर्द समझा जा सकता है, क्योंकि 6 लोगों की मौत और सैकड़ों घायलों के लिए जिम्मेदार अब तक कोई दोषी नहीं ठहराया गया है। यह सवाल उठता है कि अगर ये सात आरोपी बरी हो गये तो असली गुनहगार कौन हैं?
    इस मामले ने जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए हैं। एटीएस और एनआईए की चार्जशीट में विसंगतियां, सबूतों की कमी और गवाहों के बयान बदलने जैसे मुद्दों ने जांच की विश्वसनीयता को कटघरे में खड़ा किया है। साध्वी प्रज्ञा ने स्वयं एटीएस पर हिरासत में प्रताड़ना का आरोप लगाया था, और इस फैसले ने उन दावों को बल दिया है कि जांच में पक्षपात हुआ। यह भी विचारणीय है कि क्या इस मामले को सांप्रदायिक रंग देकर राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश की गई? एनआईए ने 2016 में मकोका की धाराएं हटाते हुए कहा था कि एटीएस ने इसका गलत इस्तेमाल किया और गवाहों पर दबाव डाला गया।
    मालेगांव ब्लास्ट केस का यह फैसला, जो मुंबई की विशेष एनआईए अदालत में विशेष न्यायाधीश ए.के. लाहोटी द्वारा सुनाया गया, न केवल कानूनी, बल्कि सामाजिक और नैतिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है। यह हमें याद दिलाता है कि न्याय प्रणाली में सबूतों की मजबूती और जांच की निष्पक्षता कितनी महत्वपूर्ण है। साथ ही यह सवाल छोड़ता है कि क्या 17 साल की लंबी प्रक्रिया के बाद भी पीड़ितों को सच्चा न्याय मिल पाया? क्या यह फैसला वाकई में सत्य की जीत है या फिर यह एक ऐसे घाव को फिर से हरा कर गया है जो अभी तक भरा नहीं है? सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की आगे की सुनवाई शायद इन सवालों के जवाब दे लेकिन तब तक यह फैसला बहस का केंद्र बना रहेगा।

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    600 बीमारी का एक ही दवा RENATUS NOVA

  • जौनपुर फिटनेस जिम का उद्घाटन करने आ रहे हैं द ग्रेट खली

    जौनपुर फिटनेस जिम का उद्घाटन करने आ रहे हैं द ग्रेट खली

    जौनपुर फिटनेस जिम का उद्घाटन करने आ रहे हैं द ग्रेट खली

    जौनपुर। नगर के वाजिदपुर तिराहा स्थित उत्सव मोटल में जौनपुर फिटनेस जिम का उद्घाटन 1 अगस्त 2025 को दोपहर 12 बजे से होगा। जिसमें डब्लूडब्लूई में पहले भारतीय मूल के विश्व चैम्पियन रहे पहलवान व अभिनेता द ग्रेट खली का आगमन होगा। जहां जौनपुर फिटनेस जिम का शुभारम्भ द ग्रेट खली, पूर्व सांसद धनंजय सिंह एवं एमएलसी बृजेश सिंह प्रिंशू करेंगे। आशुतोष सिंह एवं राहुल सिंह ने बताया कि जौनपुर फिटनेस जिम जनपद का अत्याधुनिक सुविधाओं वाला जिम है जिसमें जिम से सम्बन्धित लगभग सभी उपकरणों की सुविधा दी गई है। हमारे यहां कार्डियो एण्ड स्ट्रेंथ, ओपन एयर क्रासफीट, योगा क्लासेस, जुम्बा क्लासेस, डांस क्लासेस, सीसीडी कॉफी मशीन, कैफेटेरिया की व्यवस्था उपलब्ध है।

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    600 बीमारी का एक ही दवा RENATUS NOVA

  • योगी के ऊर्जा मंत्री के बयानों में बिजली से ज्यादा करेंट!

    योगी के ऊर्जा मंत्री के बयानों में बिजली से ज्यादा करेंट!

    योगी के ऊर्जा मंत्री के बयानों में बिजली से ज्यादा करेंट!

    उत्तर प्रदेश के ऊर्जा एवं नगर विकास मंत्री अरविंद शर्मा, जिन्हें एके शर्मा के नाम से जाना जाता है, कभी राजनेता नहीं रहे, बल्कि वह एक पूर्व ब्यूरोक्रेट्स हैं। इसी के चलते अक्सर वह ऐसा कुछ बोल जाते हैं जिससे विवाद खड़ा हो जाता है। अपनी इसी बढ़बोलेपन वाली कार्यशैली और विवादित बयानों के कारण हाल के दिनों में उर्जा मंत्री लगातार चर्चा में बने हुए हैं। कभी अपने प्रशासनिक अनुभव और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करीबी सहयोगी के रूप में पहचाने जाने वाले शर्मा अब बिजली विभाग में कथित लापरवाही, अधिकारियों पर सख्ती और अपने बयानों से उपजे विवादों के कारण सुर्खियों में हैं। उनकी कार्यशैली जहां कुछ लोगों के लिए सुधारवादी और सख्त प्रशासक की छवि बनाती है, वहीं दूसरों के लिए यह विवादों को जन्म देने वाली साबित हो रही है।
    एके शर्मा, 1988 बैच के गुजरात कैडर के पूर्व आईएएस अधिकारी, ने 2021 में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर यूपी की राजनीति में कदम रखा तो उन्हें तुरंत विधान परिषद का सदस्य बना दिया गया। कहा यह जाने लगा कि शर्मा को मंत्री भी बनाया जायेगा। ऐसा इसलिये सही भी लग रहा था, क्योंकि एके शर्मा मोदी के काफी करीबी थे लेकिन सीएम योगी ने उन्हें अपने पहले कार्यकाल में जबरदस्त दबाव के बाद भी मंत्री नहीं बनाया। शर्मा मंत्री तब बने जब दोबारा बीजेपी चुनाव जीत कर आई और योगी ने एक बार फिर से शपथ ली। उन्हें ऊर्जा और नगर विकास विभाग का मंत्री बनाया गया। ऊर्जा और नगर विकास जैसे महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी संभालने वाले शर्मा ने शुरू में अपनी कार्यकुशलता और अनुशासित दृष्टिकोण से सबका ध्यान भी खींचा। उन्होंने बिजली आपूर्ति में सुधार और विभागीय भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने की दिशा में कई कदम उठाए। हालांकि हाल के महीनों में उनकी कार्यशैली और बयानबाजी ने उन्हें विवादों के केंद्र में ला खड़ा किया है।
    हाल ही में एके शर्मा ने बिजली विभाग के अधिकारियों पर जमकर नाराजगी जताई। एक समीक्षा बैठक में उन्होंने अधिकारियों को फटकार लगाते हुए कहा कि बिजली विभाग कोई ‘बनिये की दुकान’ नहीं है, बल्कि जनसेवा का माध्यम है। इस बयान ने न केवल बिजली कर्मचारियों, बल्कि वैश्य समाज के बीच भी विवाद को जन्म दिया। कई संगठनों ने इसे अपने समुदाय पर कटाक्ष मानकर विरोध जताया। शर्मा को सोशल मीडिया पर स्पष्टीकरण देना पड़ा जिसमें उन्होंने कहा कि उनका इरादा किसी वर्ग को ठेस पहुंचाना नहीं था, बल्कि वे केवल जनसेवा और व्यापार के बीच अंतर रेखांकित करना चाहते थे। उन्होंने एक वीडियो भी साझा किया, ताकि उनकी बात को सही संदर्भ में समझा जाय।
    इसके अलावा एके शर्मा का बिहार में मुफ्त बिजली योजना पर दिया गया बयान भी खासा चर्चा में रहा। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि बिहार में बिजली फ्री है लेकिन जब बिजली आएगी ही नहीं तो बिल आएगा ही नहीं, हो गई फ्री। इस बयान ने न केवल बिहार सरकार, बल्कि विपक्षी दलों को भी हमला करने का मौका दे दिया। सोशल मीडिया पर यह बयान वायरल हो गया और शर्मा को फिर से सफाई देनी पड़ी। उनके इस बयान को कई लोगों ने उत्तर प्रदेश में बिजली आपूर्ति की कमियों को छिपाने की कोशिश के रूप में देखा।
    मुरादाबाद में एक कार्यक्रम के दौरान बिजली गुल होने की घटना ने भी शर्मा को असहज स्थिति में डाल दिया। उनके ही कार्यक्रम में 10 मिनट तक बिजली आपूर्ति बाधित रही जिसके बाद पांच वरिष्ठ अधिकारियों को निलंबित कर दिया गया। इस घटना को प्रशासनिक विफलता के रूप में देखा गया और शर्मा की सख्त कार्रवाई ने विभाग में हड़कंप मचा दिया। हालांकि इस कार्रवाई को कुछ लोगों ने उनकी सख्त प्रशासकीय छवि का हिस्सा माना तो कुछ ने इसे दिखावटी कदम करार दिया। शर्मा ने हाल ही में बस्ती जिले के एक अधीक्षण अभियंता का ऑडियो वायरल किया जिसमें अधिकारी एक उपभोक्ता के साथ अमर्यादित बातचीत करते सुनाई दिए। इस ऑडियो को शेयर कर शर्मा ने अधिकारियों को चेतावनी दी कि जनता के प्रति संवेदनशीलता जरूरी है। इस कदम से जहां कुछ लोग उनकी पारदर्शिता की सराहना कर रहे हैं, वहीं कुछ इसे विभागीय असफलताओं से ध्यान भटकाने की रणनीति मान रहे हैं।
    सोशल मीडिया पर शर्मा की सक्रियता भी चर्चा का विषय रही है। वे अक्सर अपनी उपलब्धियों और विभागीय सुधारों को एक्स पर साझा करते हैं लेकिन उनके कुछ बयानों और पोस्ट ने विवाद को हवा दी। उदाहरण के लिए जय श्री राम के नारे को लेकर उनकी टिप्पणी ने कुछ लोगों को नाराज किया जिन्होंने इसे धार्मिक ध्रुवीकरण की कोशिश माना। कुल मिलाकर शर्मा की कार्यशैली को लेकर मिली-जुली प्रतिक्रिया है। जहां कुछ लोग उनके सख्त रवैये को बिजली विभाग में सुधार की दिशा में जरूरी मानते हैं, वहीं अन्य इसे अनावश्यक रूप से आक्रामक और विवादास्पद मानते हैं। उनके बयानों और कार्रवाइयों ने न केवल विपक्ष बल्कि उनकी अपनी पार्टी के कुछ नेताओं को भी असहज किया है। वैसे एके शर्मा का कार्यकाल उपलब्धियों और विवादों का मिश्रण रहा है। उनकी सख्ती और सुधारवादी दृष्टिकोण ने बिजली विभाग में कुछ बदलाव जरूर लाए हैं लेकिन उनकी बयानबाजी और कार्यशैली ने उन्हें विवादों का केंद्र भी बनाया है। भविष्य में उनके कदम और बयान उत्तर प्रदेश की राजनीति और प्रशासन में उनकी स्थिति को और स्पष्ट करेंगे।
    अजय कुमार
    वरिष्ठ पत्रकार लखनऊ।

    आधुनिक तकनीक से करायें प्रचार, बिजनेस बढ़ाने पर करें विचार
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    600 बीमारी का एक ही दवा RENATUS NOVA

  • बिहार में पत्रकारों को पेंशन, यूपी के कलमकार क्यों रहें उपेक्षित?

    बिहार में पत्रकारों को पेंशन, यूपी के कलमकार क्यों रहें उपेक्षित?

    बिहार में पत्रकारों को पेंशन, यूपी के कलमकार क्यों रहें उपेक्षित?

    नीतीश सरकार ने पत्रकारों की सुध ली, 15 हजार की पेंशन का किया ऐलान
    सवाल यह कि उत्तर प्रदेश के कलमकार कब तक इंतजार करें?
    सुरेश गांधी
    बिहार की नीतीश कुमार सरकार ने पत्रकारों के लिए बड़ा ऐलान किया है। अब तक 6 हजार रुपये की मिलने वाली पत्रकार सम्मान पेंशन को बढ़ाकर 15 हजार रुपये प्रतिमाह कर दिया गया है। साथ ही मृतक पत्रकार के आश्रित पति व पत्नी को 3 हजार की जगह अब 10 हजार रुपये प्रतिमाह पेंशन देने के निर्देश जारी किए गए हैं। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने खुद इस फैसले की जानकारी ट्वीट कर सार्वजनिक की।
    इस निर्णय से बिहार के वरिष्ठ और वयोवृद्ध पत्रकारों को राहत मिलेगी। साथ ही पत्रकारिता को सामाजिक सुरक्षा का भाव भी मिलेगा लेकिन यूपी में आज तक कोई ऐसी सुनियोजित राज्य स्तरीय पत्रकार पेंशन योजना नहीं बन पाई जो बिहार या हरियाणा की तरह राहत दे सके। ऐसे में एक बड़ा सवाल उत्तर प्रदेश खासकर पूर्वांचल के पत्रकारों के मन में उठ रहा है, क्या काशी, गोरखपुर, प्रयागराज, लखनऊ जैसे पत्रकारिता के तीर्थस्थलों पर कार्यरत पत्रकारों को यह सम्मान और सुविधा कब मिलेगी? उत्तर प्रदेश में पत्रकारों की सुध कब ली जाएगी? जबकि बिहार सरकार ने पत्रकारों के सम्मान और सामाजिक सुरक्षा की दिशा में एक ऐतिहासिक और स्वागत योग्य फैसला लिया है।
    मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की यह घोषणा न केवल पत्रकारों के मनोबल को बढ़ाने वाली है, बल्कि अन्य राज्यों के लिए भी एक मिसाल है। खासकर वाराणसी, प्रयागराज, गोरखपुर जैसे पत्रकारिता के ऐतिहासिक केंद्रों में वर्षों से सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार, जो आज वृद्धावस्था, बीमारी और आर्थिक असुरक्षा से जूझ रहे हैं, उन्हें अब तक ऐसी कोई ठोस सुविधा या पेंशन योजना नहीं मिल सकी है। बिहार का यह कदम केवल पेंशन नहीं, बल्कि एक नैतिक जिम्मेदारी के निर्वहन का संकेत है। उत्तर प्रदेश में पत्रकारों ने हर संकट में जनपक्षीय भूमिका निभाई है। अब समय है कि सरकार भी कलमकारों की पीड़ा को सुने, समझे और उन्हें वह सामाजिक सुरक्षा दे जिसकी वे वर्षों से हक़दार हैं। हाशिए पर खड़े पत्रकारों को मुख्यधारा में लाना केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि लोकतंत्र की मजबूरी है।

    पत्रकार लोकतंत्र के प्रहरी मगर स्वयं असुरक्षित
    पत्रकारों को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है। खासकर उत्तर प्रदेश की पत्रकारिता परंपरा देश में सबसे सशक्त मानी जाती है। वे सत्ता, व्यवस्था और समाज के बीच सेतु बनकर न केवल सूचनाएं देते हैं, बल्कि जनहित के लिए जोखिम उठाते हैं, दबाव सहते हैं और कभी-कभी जान भी गंवाते हैं। बावजूद इसके बुज़ुर्ग हो चुके या दिवंगत पत्रकारों के परिवारों के लिए न सामाजिक सुरक्षा है और न ही कोई सुनिश्चित पेंशन योजना। वाराणसी जैसे शहर में अनेक वरिष्ठ पत्रकार, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पत्रकार, ग्रामीण संवाददाता और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के प्रतिनिधि हैं, जो वृद्धावस्था में आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं। जब हरियाणा, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और अब बिहार जैसे राज्य पत्रकारों के लिए पेंशन, आवास और चिकित्सा योजनाएं संचालित कर सकते हैं तो उत्तर प्रदेश क्यों पीछे?

    काशी के पत्रकारों का दर्द कौन सुनेगा?
    वाराणसी, जिसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने “भारत की आत्मा“ कहा है, वहां के पत्रकारों की स्थिति विडंबना से भरी है। यहां शहर से लेकर ग्रामीण अंचल तक कई ऐसे पत्रकार हैं जिन्होंने दशकों तक अपनी सेवा दी लेकिन आज न पेंशन है, न चिकित्सा सुविधा, न ही कोई सरकारी सहारा। काशी पत्रकार संघ, गोरखपुर प्रेस क्लब, बलिया-बस्ती के वरिष्ठ पत्रकारों ने बार-बार सरकार से आग्रह किया लेकिन अब तक नीतिगत निर्णय का इंतजार है।

    अब निर्णय की घड़ी है
    उत्तर प्रदेश सरकार ने ‘एक जिला एक उत्पाद’, ’मिशन शक्ति’, ‘नया नगर विकास’ जैसे कई नवाचार किए हैं। क्या अब वक्त नहीं है कि ‘एक पत्रकार एक सम्मान’ योजना पर भी विचार किया जाए? मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से यह अपेक्षा की जाती है कि वे भी अपने गृहक्षेत्र गोरखपुर और काशी जैसे सांस्कृतिक-राजनीतिक केंद्रों में वरिष्ठ पत्रकारों के लिए सम्मान पेंशन योजना, पत्रकार आवास, निःशुल्क चिकित्सा बीमा योजना और आकस्मिक सहायता कोष की घोषणा करें।

    ये हैं बिहार सरकार की नई घोषणाएं:
    वरिष्ठ पत्रकारों को अब 15,000 प्रति माह की सम्मान पेंशन। मृतक पत्रकार के आश्रित को 10,000 प्रति माह पेंशन। पति/पत्नी को 3,000 की जगह ₹10,000 प्रति माह। योजना के तहत स्वास्थ्य सुरक्षा व सामाजिक संरक्षण पर भी काम जारी है।
    क्या कहते हैं वाराणसी के वरिष्ठ पत्रकार

    क्या कहते हैं वाराणसी के वरिष्ठ पत्रकार
    वरिष्ठ पत्रकार पदमपति शर्मा, केपीएस के पूर्व अध्यक्ष योगेश गुप्ता, प्रेस क्लब के अध्यक्ष चंदन रुपानी आदि का कहना है कि बिहार सरकार ने सराहनीय कदम उठाया है। उत्तर प्रदेश में भी योगी सरकार को पत्रकारों के लिए विशेष पेंशन और स्वास्थ्य बीमा योजना पर ध्यान देना चाहिए। काशी पत्रकार संघ के पूर्व अध्यक्ष अत्री भारद्वाज ने कहा कि हम कई बार ज्ञापन दे चुके हैं। अब जरूरत है मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को सीधे संज्ञान लेने की। वरिष्ठ पत्रकार सुरेश गांधी का कहना है कि बिहार की यह पहल न केवल सराहनीय है, बल्कि उत्तर प्रदेश सरकार के लिए एक प्रेरणा भी है। जिस राज्य में पत्रकारों ने आजादी से लेकर आज तक सबसे सशक्त भूमिका निभाई, वहीं वे सम्मान और सुरक्षा के मोर्चे पर उपेक्षित क्यों रहें? अब वक्त है कि काशी से लखनऊ तक कलम के सिपाही भी सामाजिक सुरक्षा के हकदार बने।

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    600 बीमारी का एक ही दवा RENATUS NOVA

  • नाग पंचमी और सांप प्रजातियां

    नाग पंचमी और सांप प्रजातियां

    नाग पंचमी और सांप प्रजातियां

    डा. दिलीप सिंह एडवोकेट
    भारत, विश्व का सबसे प्राचीन और विश्वव्यापी फैला हुआ देश है और सनातन धर्म सारे संसार का सबसे प्राचीन धर्म है। यहां प्रत्येक दिन कोई ना कोई पर्व और उत्सव होता रहता है जिससे जीवन में नीरसता की जगह सरसता फैली रहती है। हर एक पर्व उत्सव त्यौहार का अपना एक विशिष्ट महत्व होता है जो मानव जीवन कृषि, कार्य, धर्म दर्शन, अध्यात्म के साथ प्रकृति और पर्यावरण से भी जुड़ा रहता है। ऐसा ही एक महान पर्व नाग पंचमी है जो नागों से जुड़ा हुआ है। भारत एक ऐसा देश है जहां पशु, पक्षी, ईद, पत्थर, आकाश, पाताल, दिशाओं की ग्राम देवी—ग्राम देवता तक की पूजा की जाती है, क्योंकि कालांतर में सिद्ध हो गया है कि प्रत्येक वस्तु परमाणु अथवा कोशिका से बनी है और हर एक परमाणु और कोशिका में ईश्वर का ही अंश होता है।
    नाग पंचमी का महान पर्व सावन महीने के शुक्ल पक्ष में पंचमी के दिन मनाया जाता है। जब लोग घर की साफ—सफाई करके लीप—पोत करके कपड़े पहनकर नाग देवता की पूजा करते हैं और उनका दूध चढ़ाते हैं। इस दिन नाग देवता का दर्शन करना शुभ माना जाता है संसार में कोई भी ऐसा धर्म नहीं है जिसके मानने वाले दुनिया में सबसे भयंकर माने जाने वाले नाग और सांपों की पूजा करते हैं जो स्वयं में काल का एक स्वरूप होता है। उसको देखकर बड़े से बड़े लोगों के मन में भय पैदा हो जाता है। आज इतनी अधिक वैज्ञानिक और चिकित्सा की उन्नति हो जाने के बाद भी प्रतिवर्ष भारत में और दुनिया में सांपों के काटने से लाखों लोग मरते हैं तो प्रश्न उठता है कि आखिर नाग पंचमी का त्यौहार क्यों मनाया गया और इनकी पूजा क्यों की जाती है।
    सभी प्रकार के सांपों में नाग का विश्व सबसे अधिक विषैला और प्रभावकारी होता है। यह न्यूरोटॉक्सिक होता है नाग अर्थात कोबरा की कई प्रजातियां होती हैं जिसमें शेषनाग सबसे लंबी और घातक प्रजाति है जो हर प्रकार के सांपों को जिंदा ही खा जाता है। इसके बाद काला नाग और भूरा नाग होता है और यही सांप की ऐसी प्रजाति है जिसमें बहुत पुराने कुछ नागों में नागमणि पाई जाती है। वैसे तो भारत में करैत वाईपर और रसेल वाइपर सांप भी बहुत जहरीले होते हैं लेकिन यह सभी नाग के भय से छिपे रहते हैं।
    वैसे तो कोई भी जहरीला नाग या सांप काट ले तो वर्तमान में प्राथमिक चिकित्सा करके अर्थात घाव को साबुन से यह स्वच्छ पानी से अच्छी तरह धोकर उसके ऊपर हल्का दबाव देते हुए पट्टी बांधकर तुरंत ही चिकित्सक के पास जाना चाहिए लेकिन जहां चिकित्सा सुविधा न हो या समय बहुत कम हो वहां पर तंत्र-मंत्र जड़ी बूटियां का प्रयोग करने में कोई हिचकिचाहट नहीं होनी चाहिए जिसमें अधिक मात्रा में काली मिर्च और घी को पिलाना नीम की पत्ती खिलाना और कुछ मित्रों का जाप करना शामिल है। ऐसा माना जाता है कि जरत् कारु, ऋषि कश्यप, ऋषि शंखचूड़, वासुकी का नाम लेने से सांप नहीं काटते हैं और वह रास्ता बदलकर चले जाते हैं। इनका नाम लेने से सांप का विश्व असर नहीं करता है। नाग कल का भला करने वाले कुछ ऐसे भी वंश हैं जिन पर सांपों के विश्व का असर नहीं पड़ता है। यह बात पूरी तरह सच है। इसके अलावा ‘ऊं कुरुकुल्ये हूं फट् स्वाहा’ मंत्र का जाप करने से भी सांप के विश्व का असर नहीं होता है।
    सांप एक ऐसा प्राणी है जो मनुष्य से सबसे अधिक डरता है। इसके अलावा यह नेवला, गरुड़, पक्षी, बाज प्रजातियां और गिलहरी मोर एवं बिल्ली से भी डरता है। नाग पंचमी को जिस प्रकार से पूजा पाठ और सफाई की जाती है और सावन महीने में जिस तरह से महारुद्र अभिषेक किया जाता है, उसे सांप मनुष्य का निवास छोड़कर बन बाग खेत और अन्य जगहों पर चले जाते हैं, इसीलिए नाग पंचमी त्यौहार मना कर नागों की पूजा की जाती है। इसके अलावा यह नाग जाति और मनुष्य जाति के बीच प्राचीन संबंधों का भी स्मरण दिलाता है। नाग एक प्राचीन काल में मानव की जाती थी जो जंगल गुफा कंधराओं में रहते थे। उनका नागों के साथ लंबे समय रहने से उनके बारे में पूरा ज्ञान हो गया था। वह जड़ी बूटियां और सांपों का जहर उतारने और उनको पकड़ने में सिद्ध हस्त थे। नागवंश एक प्रसिद्ध राजवंश भी था। अर्जुन घटोत्कच सहित अनेक लोगों का नाग कल में विवाह हुआ था। मेघनाथ की पत्नी सुलोचना नवांश से ही थी इस प्रकार नाग पंचमी को, इसलिए भी मनाया जाता है कि धीरे-धीरे नवांश आर्य वंश में घुल मिल गया था।
    सभी प्रकार के जहरीले नागो से मानव जाति को अपार लाभ होता है या मानव जाति के लिए विनाशकारी चूहा और अनेक जीव जंतुओं को खाकर मानव जाति का असीम कल्याण करते हैं। इसके अलावा यह वातावरण में फैले हुए भयंकर विश्व को धीरे-धीरे पीते रहते हैं। इसे जहर पूरी पृथ्वी पर फैल नहीं पता है। जहरीले सांपों से कैंसर इत्यादि की बहुत कीमती दवाएं भी बनती हैं और पूरी दुनिया में सांपों को बड़े चावल से खाया भी जाता है। अब रही सांपों के द्वारा मानव को काटने की तो यह स्वाभाविक सी बात है कि अगर सांपों को अपने प्राण संकट में दिखाते हैं तब वह आक्रमण कर देते हैं। वैसे सांप का विश्व उनकी सबसे कीमती धरोहर होता है। एक बार काट लेने के बाद फिर से जहर बनने में महीनों लग जाते हैं, इसलिए सांप जल्दी काटते नहीं और काटते भी हैं तो बहुत ज्यादा विष नहीं उगलते हैं, इसके अतिरिक्त सांप भगवान शिव के गले के आभूषण हैं जिनको वह बड़े चाव से अपने गले में पहनते हैं जब उन्होंने हलाहल विष का पान किया था तो उसे कुछ बूंदे धरती पर गिरी और उसी को पीकर सांप, बिच्छू सहित अन्य जीव जहरीले हो गए थे। शिव जी का आभूषण होने के कारण और उनके गले की शोभा होने के कारण भी सांपों की पूजा किया जाता है।
    सांप से जुड़ी अनेक कथा कहानी और क्यों बदलता है लाखों करोड़ों वर्षों से भारतीय जीवन में घुली मिली हैं जिसमें सांपों के द्वारा बदला लेना और कुछ विशेष प्रकार के नागों में नागमणि होना पूरी तरह सत्य है। इसके अलावा बहुत भ्रांत धारणाएं भी लोगों के मन में बस गई हैं। नाग पंचमी को सांपों के संरक्षण और उनसे सावधान रहने से भी जोड़कर देखा जाता है, क्योंकि वर्षा काल में सांपों के प्रजनन का महीना होता है, इसलिए वह बहुत अधिक उग्र होते हैं, उनसे बचकर रहना चाहिए और सभी प्राणी एक समान है। इस बात की धारणा भी नाग पूजा पूजा दिखती है।
    नाग पंचमी के दिन विद विधानसभा से नागों की पूजा होती है और उन्हें दूध खीर चढ़ाया जाता है। इसके अलावा लोक जीवन में इसे स्थाई बनाने के लिए इस दिन भारत के हर एक गांव शहर गली मोहल्ले में दंगल अर्थात कुश्ती होती है। कूड़ी अर्थात लंबी कूद का आयोजन किया जाता है। इसके बाद घरों में भारत-भारत के सुंदर पकवान बनते हैं इस प्रकार यह महान पर्व शारीरिक स्वास्थ्य से भी जुड़ा हुआ है। नाग पंचमी के दो दिन पहले हरियाली तीज या हरितालिका की जाती है जिसे अपना विशेष महत्व है। यह विशेष रूप से ध्यान देने की बात है कि सावन में चारों तरफ घने पेड़ पौधे हरियाली होने से और पानी भर जाने से सांप उन सब स्थान से मानव निवास की ओर दौड़ते हैं और नाग पंचमी के दिन पूजा से उत्पन्न विभिन्न प्रकार की रासायनिक गंध और सूक्ष्म ऊर्जा नाग और हर प्रकार के सांपों को आवाज से दूर ले जाती है। यही वजह है कि पहले हर तरफ घने जंगल झाड़ झंकार और हरियाली होने के बाद और घनघोर वर्षा होने के बाद भी प्राचीन काल में सांपों के काटने से शायद ही कोई मार हो अब ज्यादा लोग मर रहे हैं, क्योंकि सांप के आवास पर लोग जबरदस्ती कब्जा कर रहे हैं। आप आज से 50 वर्ष पहले अपने घर खानदान के लोगों से पता करेंगे तो पता लगेगा कि इतनी भयंकर स्थिति के बाद भी सांप के काटने से बहुत ही कम लोग मरे हैं और नाग तो बिना चेतावनी दिए काटते भी नहीं है। सबसे खतरनाक करत नाम का सांप होता है जो 1 से 2 फीट लंबा काला चित्तीदार होता है। अगर यह सोते समय काट लेता है तो लोग सोते ही रह जाते हैं, इसीलिए कहा जाता है कि करैत का काटा हुआ पानी भी नहीं मांगता है और पूजा पाठ भी नहीं करते हैं, इसलिए कहा जा सकता है कि नाग पंचमी एक पूर्ण वैज्ञानिक महापर्व है जो प्रकृति पर्यावरण और प्राणी मात्र की सुरक्षा से जुड़ा हुआ है।

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    600 बीमारी का एक ही दवा RENATUS NOVA

  • जीवन रंगमंच का अभिनय

    जीवन रंगमंच का अभिनय

    जीवन रंगमंच का अभिनय

    मन के अंदर संघर्ष-द्वन्द्व पर चेहरे
    पर छायी रहती है मुस्कान मधुर,
    जीवन जीने का सरल सहज पथ,
    जीवन रंगमंच का श्रेष्ठ अभिनय रथ।

    यह जीवन तो क्षण भंगुर है,
    कड़ी सुरक्षा भी तो बेमानी है,
    धन दौलत सब यहीं रह जाते हैं,
    जब प्राण पखेरू उड़ कर जाते हैं।

    बड़े बड़े राजे महाराजों को और
    देखा बड़े से बड़े तानाशाहों को,
    जब आन पड़ी उनके जीवन पर तो
    रुक न सके दुनिया में रह पाने को।

    लाखों और करोड़ों का हक़ छीने
    आगे पीछे लाव लश्कर लगवाने में,
    जब अंत समय आया तो कुछ न
    कर सके जीवित ही मारे जाने में।

    अपनों ने ही गोलियों से भून दिया,
    वे ज़िम्मेदार सुरक्षा करने वाले थे,
    माता पिता पुत्र पुत्री सब अपने और
    पराये भी, सब हो जाते हैं बेगाने से।

    इतनी कड़ी सुरक्षा में भी इनका है
    जीवन शंका व भय से भरा हुआ,
    जननायक कहलाते हैं यह सब,
    पर जनता से पूरा नाता कटा हुआ।

    गांधी को भी तो गोली मारी थी,
    जिन हाथों का मिला सहारा था,
    आदित्य मृत्यु होना निश्चित है,
    जन्म लेकर जीना बस नश्वर था।

    डा. कर्नल आदिशंकर मिश्र
    ‘विद्या वाचस्पति’ लखनऊ

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    600 बीमारी का एक ही दवा RENATUS NOVA

  • अच्छी राह दिखाएं उनको…!

    अच्छी राह दिखाएं उनको…!

    अच्छी राह दिखाएं उनको…!

    नहीं सुनाता है अब कोई…!
    कहनी-किस्सा अपने नाती-पोतों को
    नहीं सुनाता है कोई… लोरी…
    अपने ही बच्चे रोते को…
    शांत कहाँ कराता है कोई,
    बच्चों की प्यारी-प्यारी जिज्ञासा…
    परियों की तो उजड़ गई है दुनिया,
    ख़याल नहीं आता… इनका जरा सा…
    सपनों में भी दिखते नहीं हैं,
    नौकर-चाकर और रानी-राजा…
    ललचाने भर को भी नहीं दीखते,
    लड्डू-पेड़ा-बरफी-इमरती-खाजा…
    तृप्त कहाँ कराता है कोई,
    बच्चों की बाल सुलभ अभिलाषा…
    ढूँढे पर भी नहीं है मिलता,
    घर में गुड्डे-गुड़ियों वाला छोटा बक्शा
    गीत-संगीत, भजन-कीर्तन सब,
    अब तो हैं बीती बातें…
    ठूँस-ठूँस के भरी जा रही हैं,
    बस विज्ञान और तकनीक की बातें…
    अब इनको कोई नहीं बताता प्यारे,
    कि धवल चाँदनी और घुप्प अँधेरी…!
    दो ढंग की होती हैं यहाँ रातें…
    मोह-भंग हुआ है… हिन्दी से सबका
    अंग्रेजी अब करती है सब करतूतें…
    घर के बाहर शौच को जाने वाले…!
    देखो घर ही में अब चौड़े से मूतें…
    हुआ विकास है इतना कि…!
    पैदा होते ही… सन्तानों को…
    बना रहे हैं लोग कलक्टर…
    इसी चाह में जीवन बच्चों का,
    एकाकी सा बीत रहा…
    फ्लैट-अपार्टमेंट में ही अक्सर…
    गौरतलब है यह मित्रों…!
    इनको जग-जीवन की माया…
    जब हमने ही ना सिखलाया,
    फिर क्या जाने ये दीन-दुःखी को,
    क्या समझें ये जीवन के संघर्षों को…
    वह भी तब… जब देखा हो इन सब ने…
    जग के हर एक आभासी उत्कर्षो को…
    पले-बढ़े हो जब वे सब,
    बरगद की छाँव तले… फिर…
    खुद बरगद बन जाने को…!
    कैसे न वह… किसी को छले…
    नित रोज की है यह दुनियावी माया,
    इसीलिए तो… यह कहता हूँ प्यारे…!
    कि आने वाला दौर कठिन है…
    मानव का मानव से ही…!
    तगड़ा सा संघर्ष… मुमकिन है…
    फिर भलाई बस इसमें ही है…
    अच्छी राह दिखाएं उनको…!
    जिनके मन-मस्तिष्क मलिन है…
    अच्छी राह दिखाएं उनको…!
    जिनके मन-मस्तिष्क मलिन है…

    रचनाकार—— जितेन्द्र दुबे
    अपर पुलिस उपायुक्त, लखनऊ

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    600 बीमारी का एक ही दवा RENATUS NOVA

  • गजल

    गजल

    गजल

    मेरी खुद्दारी का तब अपमान किया।
    उसने जग जाहिर मुझ पर अहसान किया।
    इसमें हैरानें की कोई बात नहीं
    यह कह कर उसने सब को हैरान किया।
    दुख क्या है सुख की अगुआई है
    इस पहलू में दुख का सम्मान किया।
    तुझे अब भी लगता मै नालायक हूं
    आग समंदर दिल को रेगिस्तान किया।
    अब मुस्काकर मुझे ज्यादा दिन ढलने पर
    शाहीर ने ऐलान किया
    अपना ही बरना धीमा कर बैठा मैं
    रस्ते को मैने जितना आसान किया।
    पहले मेरे पैरों में पत्थर बांधे
    फिर दरिया को पार करो ऐलान किया

    अभिषेक अग्निहोत्री
    इण्टरनेशनल सिटी नारियावल रोड
    नियर आरटीओ ऑफिस बरेली, यूपी।

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    600 बीमारी का एक ही दवा RENATUS NOVA

  • नागपंचमी: श्रद्धा का उत्सव और प्रकृति संरक्षण का संदेश

    नागपंचमी: श्रद्धा का उत्सव और प्रकृति संरक्षण का संदेश

    नागपंचमी: श्रद्धा का उत्सव और प्रकृति संरक्षण का संदेश

    सुरेश गांधी
    जब सर्पों को पूजती है सभ्यता, तब संरक्षण ही संस्कृति बन जाती है। शिव के गले का वासुकी हो या खेतों का रक्षक नाग, हर फन में छुपा है सनातन का संदेश। नागपंचमी न सिर्फ पूजा है, बल्कि प्रकृति के प्रति हमारी जिम्मेदारी की याद भी है। नाग भय के नहीं, ब्रह्म के प्रतीक हैं, कुंडलिनी से लेकर कालसर्प दोष तक उनका महत्व है। पर्यावरण, परंपरा और परिपक्वता, नागपंचमी में समाहित है सनातन दर्शन का सार। सनातन धर्म में नागों को विशेष स्थान प्राप्त है। भगवान शिव के कंठ में वासुकि विराजमान हैं जो संयम, नियंत्रण और चेतना के प्रतीक हैं। भगवान विष्णु शेषनाग पर शयन करते हैं जो कालचक्र और सृष्टि के संतुलन का रूप माने जाते हैं। भगवान श्रीकृष्ण की बाललीला में कालिया नाग को परास्त करना, केवल जीत नहीं, सर्प को मार्ग देने का बोध भी है। ये कथाएं बताती हैं कि नाग कभी शत्रु नहीं रहे, बल्कि हमारे धार्मिक, दार्शनिक और प्रकृति संतुलन के प्रतीक रहे हैं। नाग पंचमी का पर्व इस साल 29 जुलाई दिन मंगलवार को है। सावन शुक्ल पंचमी के दिन नाग पंचमी मनाई जाती है। इस दिन लोग नाग देवता की पूजा करते हैं, ताकि उनकी कृपा से जीवन सुरक्षित रहे।
    भारत की सनातन संस्कृति केवल धर्म का ही प्रतीक नहीं, बल्कि प्रकृति और उसके समस्त जीव-जंतुओं के साथ सह-अस्तित्व का शाश्वत संकल्प भी है। नागपंचमी ऐसा ही एक पर्व है जो सर्पों के साथ मानव के रिश्ते को श्रद्धा, संरक्षण और आध्यात्मिक चेतना से जोड़ता है। यह केवल नागों की पूजा का पर्व नहीं, बल्कि उन तमाम परंपराओं का उत्सव है जो हमें यह सिखाती हैं कि हर प्राणी, चाहे वह कितना भी भयावह प्रतीत हो, उसका अस्तित्व हमारे जीवन और पर्यावरण के लिए अनिवार्य है। शास्त्रों में सर्पों को देवता के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। विशेष रूप से भगवान शिव के गले में वासुकी नाग और विष्णु के शेषशैय्या के रूप में शेषनाग को प्रतिष्ठा प्राप्त है। मान्यता है कि सर्प वायु पीते हैं अर्थात वायुमंडल की विषाक्तता को सोखकर अन्य प्राणियों के लिए शुद्ध वातावरण बनाते हैं। शिव के कंठ में समुद्र मंथन का विष और गले में नाग, यह केवल प्रतीक नहीं, बल्कि जगत कल्याण की भावना का साक्षात् दर्शन है।
    महाभारत के अनुसार नागों की उत्पत्ति महर्षि कश्यप और उनकी पत्नी कद्रू से हुई थी। शेषनाग, वासुकी, तक्षक आदि प्रमुख नागों में से हैं। शेषनाग को तो स्वयं ब्रह्मा ने पृथ्वी को फन पर धारण करने का आदेश दिया था। रामायण में सुरसा को नागों की माता माना गया है और नागकन्याओं की कथाएं भी प्रचुर हैं। बलराम और लक्ष्मण को भी शेषनाग का अवतार कहा गया है। नागपंचमी का संबंध परीक्षित की सर्पदंश से हुई मृत्यु और जनमेजय द्वारा किए गए सर्पयज्ञ से भी है। इस यज्ञ को रोकने और नाग-मानव के बीच सौहार्द्र स्थापित करने के लिए महर्षि आस्तिक द्वारा की गई पहल को इस पर्व की उत्पत्ति के रूप में स्वीकारा गया है। नागपंचमी के दिन घर-घर में नागदेवता का पूजन किया जाता है। महिलाएं नागों की चित्र-प्रतिमाएं दीवारों पर बनाकर पूजा करती हैं, उन्हें सिंदूर, फूल, दूध, लावा, गुड़ आदि अर्पित करती हैं।
    इस दिन तवा नहीं चढ़ाया जाता अर्थात अन्न नहीं पकाया जाता, बल्कि दाल-बाटी जैसी पारंपरिक वस्तुएं बनती हैं। खुदाई वर्जित होती है, धरती को खोदना निषेध होता है, ताकि नागों के निवास में विघ्न न आए। कैंची, चाकू आदि का प्रयोग वर्जित होता है यानी हिंसा से पूर्ण विराम। नागों की आकृति घर के मुख्य द्वार पर बनाना शुभ माना जाता है। यह धन, सुख और सुरक्षा का प्रतीक माना गया है। मतलब साफ है नाग केवल पूज्य नहीं, प्रकृति के रक्षक भी हैं। खेतों में चूहों व हानिकारक कीटों की संख्या को नियंत्रित कर सर्प फसलों की रक्षा करते हैं। यही कारण है कि उन्हें “क्षेत्रपाल“ या “खेतों के रक्षक“ कहा गया है। भारत में यह मान्यता रही है कि सर्पों के बिना खेती और पर्यावरण दोनों संकट में पड़ सकते हैं। नागपंचमी इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि यह प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का दिन है। नाग केवल भौतिक स्तर पर ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक रूप में भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। योग और तंत्रशास्त्र में नागों को कुंडलिनी शक्ति का प्रतीक माना गया है। वह ऊर्जा जो रीढ़ की हड्डी में सुप्त अवस्था में विद्यमान होती है। नागपंचमी का पूजन इस ऊर्जा के जागरण, आत्मबोध और आध्यात्मिक उत्कर्ष का प्रतीक है। इस दिन किया गया पूजा-पाठ, संयम और उपवास हमें हमारे अंदर की चेतना से जोड़ता है।

    शुभ मुहुर्त
    इस साल नाग पंचमी 29 जुलाई दिन मंगलवार को है। पूजा का शुभ मुहूर्त सुबह 5 बजकर 41 मिनट से लेकर 8 बजकर 23 मिनट तक रहेगा। कुल मिलाकर इस दिन पूजा करने की अवधि 2 घंटे 43 मिनट की है जबकि समापन 30 जुलाई 2025 को सुबह 12 बजकर 46 मिनट पर होगा। पंचांग के आधार पर इस साल यह पर्व 29 जुलाई को मनाया जाएगा।

    कालसर्प दोष से मुक्ति और उपाय
    ज्योतिष शास्त्र के अनुसार जिन व्यक्तियों की कुंडली में कालसर्प दोष होता है, उन्हें जीवन में अनेक बाधाओं का सामना करना पड़ता है। नागपंचमी का दिन इस दोष से मुक्ति के लिए विशेष शुभ माना जाता है। कुछ परंपरागत उपाय इस दिन किए जाते हैं, जैसे नागों को दूध पिलाना, चांदी की नाग-नागिन की मूर्ति लाकर पूजन कर शिव मंदिर में अर्पित करना, लावा, गुड़ और दूध का भोग, नागों की आकृति बनाकर उस पर हल्दी-सिंदूर चढ़ाना। कहते हैं कि इन उपायों से जीवन में सकारात्मकता आती है और दुर्भाग्य दूर होता है। कालसर्प दोष निवारण के लिए आज के दिन राहु काल में भगवान शिव की विधि विधान से पूजा करायें। रुद्राभिषेक कराने से भी लाभ मिलता है। इसके अलावा कालसर्प दोष से मुक्ति के लिए आप नाम जप करें। आपके जो भी इष्ट देव हैं, उनके नाम का जप करें। कालसर्प दोष, पितृ दोष आपको कुछ भी नहीं कर पाएंगे. प्रभु कृपा से आपका कल्याण होगा। नाग पंचमी पर तीर्थराज प्रयाग में पितरों के लिए तर्पण और श्राद्ध करें। इस उपाय से भी कालसर्प दोष का निवारण होता है। नाग पंचमी के दिन सफाईकर्मी को मसूर की दाल और कुछ रुपए दान करें। कुंडली के कालसर्प दोष का नाश होगा। नाग पंचमी पर भगवान शिव का अभिषेक करने से कालसर्प दोष दूर होता है। कालसर्प दोष के निवारण के लिए देवों के देव महादेव के शिव तांडव स्तोत्र का पाठ करें। महाकाल की कृपा आप पर होगी और इससे भय, दोष, रोग आदि का नाश होगा। नाग पंचमी को सोने या चांदी के बने नाग और नागिन के जोड़े की फूल, अक्षत्, धूप, दीप आदि से पूजा करें। फिर उन दोनों को बहते हुए जल में प्रवाहित कर दें. आपका कालसर्प दोष शांत हो जायेगा। कालसर्प दोष से मुक्ति के लिए भगवान श्रीकृष्ण की उस मूर्ति का पूजन करें जिसमें मोर पंख लगे हों। यह कार्य रोज कर सकते हैं। भगवान श्रीकृष्ण के आशीर्वाद से कालसर्प दोष दूर होगा। कालसर्प दोष निवारण के लिए महामृत्युंजय मंत्र का जाप करें। शिवलिंग का गंगाजल और गाय के दूध से अभिषेक करें। बहते पानी में कोयले के टुकड़े, मसूर की दाल और साबुत नारियल प्रवाहित करें, आपको लाभ होगा।

    श्रद्धा और संतुलन
    नागपंचमी हमें केवल धर्म नहीं सिखाती, बल्कि एक समग्र जीवनदर्शन देती है। जहां हिंसा नहीं, सह-अस्तित्व है। जहां भय नहीं, श्रद्धा है। जहां शोषण नहीं, संरक्षण है। सर्प की पूजा, वृक्ष की पूजा, गोमाता और धरतीमाता की संज्ञा कृ यह दर्शाता है कि सनातन संस्कृति में जीव-जगत और प्रकृति के प्रति प्रेम और संवेदनशीलता अंतर्निहित है। या यूं कहें नागपंचमी केवल एक पर्व नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की उन धरोहरों में से एक है जो धर्म, प्रकृति और विज्ञान को एक सूत्र में बांधती है। यह पर्व सिखाता है कि संसार के हर जीव का अस्तित्व महत्वपूर्ण है और मानव का धर्म है कि वह प्रकृति के हर घटक का सम्मान करे, उसे पूजे नहीं तो कम से कम उसका नाश तो न करे। जब तक हमारे पर्व नागों को दूध पिलाते रहेंगे और धरती की खुदाई रोकते रहेंगे, तब तक यह सभ्यता केवल बचेगी नहीं, बल्कि आगे भी पनपेगी। मतलब साफ है सर्पों की रक्षा, प्रकृति का सम्मान और श्रद्धा का विवेकपूर्ण प्रयोग ही इस पर्व की सच्ची पूजा होगी। वैसे भी भारत की संस्कृति में हर प्राणी, हर प्रतीक पूज्य है। कहीं वह शक्ति का रूप है तो कहीं संतुलन का आधार। नागपंचमी, ऐसा ही एक पर्व है जिसमें सर्प, जो सामान्यतः भय का प्रतीक माने जाते हैं, देवता के रूप में पूजे जाते हैं। नागपंचमी केवल परंपरा नहीं, बल्कि श्रद्धा, पर्यावरणीय चेतना और सांस्कृतिक विवेक का अद्भुत संगम है।

    जनमेजय यज्ञ और आस्तिक मुनि की कथा
    महाभारत काल में राजा जनमेजय ने अपने पिता परीक्षित की मृत्यु के प्रतिशोध में सर्प यज्ञ करवाया था। वह यज्ञ समस्त नागजाति के विनाश का कारण बनने वाला था परंतु आस्तिक मुनि ने उस यज्ञ को रोक दिया और नागों की रक्षा की। उसी दिन से श्रावण शुक्ल पंचमी को नागपंचमी के रूप में मनाने की परंपरा बनी। उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, झारखंड सहित कई राज्यों के ग्रामीण क्षेत्रों में यह पर्व विशेष श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। दीवारों पर गोबर से नाग बनाए जाते हैं, दूध चढ़ाया जाता है और खेतों की मेड़ों पर नागदेवता को प्रणाम किया जाता है। महिलाएं व्रत रखती हैं और नागगीत गाती हैं: “नागिनिया रानी गोदिया में सुत जनि देई, दूध-अंचरा देब हम, चिर जीवन लेबि।।
    इन गीतों में जीवन, सुरक्षा और आस्था का समन्वय होता है। नाग केवल पूज्य नहीं, पर्यावरण संतुलन के संरक्षक भी हैं। खेतों में चूहों की संख्या को नियंत्रित कर ये सर्प फसल रक्षा में सहायक होते हैं। नागपंचमी हमें यह याद दिलाती है कि प्रकृति के हर प्राणी का इस सृष्टि में स्थान है, चाहे वह भुजंग हो या भृंग। इस दिन कई जगह जीवित सर्पों को पकड़कर मंदिरों या मेलों में प्रदर्शित किया जाता है जो वन्यजीव संरक्षण कानून के खिलाफ है। विशेषज्ञ कहते हैं कि सर्पों को दूध पिलाना भी हानिकारक है, क्योंकि सांप लैक्टोज इंटोलरेंट होते हैं। आज ज़रूरत है कि पूजा प्रतीकात्मक हो और श्रद्धा के साथ संरक्षण की भावना भी जुड़ी हो।

    योग और आध्यात्म में नाग
    सर्प केवल बाह्य नहीं, बल्कि आंतरिक चेतना के भी प्रतीक हैं। कुंडलिनी शक्ति, जो योग में जाग्रत की जाती है, उसे सर्पाकार ऊर्जा कहा गया है। इसका जागरण आत्मविकास और ब्रह्मज्ञान की ओर ले जाता है। इस दृष्टि से नाग, अज्ञान को पराजित कर चेतना को उजागर करने वाले तत्व हैं। इस दिन भगवान शिव के गण माने जाने वाले नाग देवता की घर-घर में पूजा की जाती है। इस दिन नाग देवता की पूजा करने से आपका धन बढ़ता है. सर्पदंश का भय दूर होता है।

    कैसे बनता है कालसर्प दोष?
    ज्योतिष शास्त्र के अनुसार कुंडली में राहु और केतु से कालसर्प दोष बनता है। राहु को काल और केतु को सर्प का देवता माना जाता है। राहु और केतु की वजह से बना कालसर्प दोष व्यक्ति के शुभ प्रभावों को मिटा देता है और कई तरह से परेशान करता है। ज्योतिष के अनुसार किसी कुंडली में जब राहु और केतु 180 डिग्री पर आमने-सामने हों, बाकी 7 ग्रह उनके किसी भी एक तरफ हों तो कालसर्प दोष होता है। मुख्यतः कालसर्प दोष 12 प्रकार के होते हैं लेकिन 288 प्रकार के कालसर्प दोष बनाए गए हैं।

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  • अखिलेश का 2027 के लिये सोशल इंजीनियरिंग फार्मूला

    अखिलेश का 2027 के लिये सोशल इंजीनियरिंग फार्मूला

    अखिलेश का 2027 के लिये सोशल इंजीनियरिंग फार्मूला

    समाजवादी पार्टी के प्रमुख और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव, प्रदेश की राजनीति में एक प्रमुख चेहरा हैं। पार्टी की ताकत का एक प्रमुख आधार उसका पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूला है। अखिलेश ने इस रणनीति को 2024 के लोकसभा चुनावों में प्रभावी ढंग से लागू किया जहां उन्होंने गैर-यादव ओबीसी, दलित और मुस्लिम मतदाताओं को एकजुट करने में सफलता हासिल की। इस रणनीति ने उन्हें उत्तर प्रदेश में 37 लोकसभा सीटें दिलाईं जो उनकी अब तक की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है। गैर-यादव ओबीसी समुदायों, जैसे कुर्मी, राजभर और लोधी को टिकट देकर उन्होंने सामाजिक समीकरण को संतुलित करने की कोशिश की। उदाहरण के लिए कुर्मी और पटेल समुदायों को 10 टिकट दिए गए जिनमें से 7 पर जीत हासिल हुई। यह दर्शाता है कि अखिलेश ने गैर-यादव ओबीसी वोट बैंक को साधने में सफलता पाई है। इस रणनीति को और मजबूत करने के लिए अखिलेश ने छोटे-मझोले नेताओं को पार्टी में शामिल किया। जैसे महेंद्र राजभर, जिनका प्रभाव घोसी, बलिया, और गाजीपुर जैसे क्षेत्रों में है। इस तरह की सामाजिक इंजीनियरिंग 2027 में भी उनके लिए महत्वपूर्ण होगी।
    उधर दलित वोट बैंक को आकर्षित करना अखिलेश की रणनीति का एक और महत्वपूर्ण हिस्सा है। समाजवादी पार्टी ने परंपरागत रूप से बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के दलित वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश की है। इसके लिए उन्होंने 2021 में समाजवादी बाबा साहेब वाहिनी का गठन किया जिसका नेतृत्व बसपा से आए मिठाई लाल भारती को सौंपा गया। यह कदम दलित मतदाताओं, खासकर गैर-जाटव दलितों को अपनी ओर खींचने की रणनीति का हिस्सा था। अखिलेश ने आंबेडकर जयंती जैसे अवसरों का उपयोग कर संदेश दिया कि उनकी पार्टी संविधान और सामाजिक न्याय के प्रति प्रतिबद्ध है। 2024 के चुनावों में इस रणनीति का असर दिखा, जब दलित प्रत्याशियों को टिकट देकर सपा ने बसपा के वोट बैंक में सेंध लगाई। उदाहरण के लिए इंद्रजीत सरोज जैसे नेताओं को पार्टी में शामिल कर और उन्हें प्रमुख जिम्मेदारियां देकर अखिलेश ने दलित समुदाय को यह संदेश दिया कि उनकी पार्टी उनके हितों की रक्षा कर सकती है।
    अखिलेश की रणनीति का एक और आयाम गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यकों और अन्य सामाजिक समूहों को जोड़ना है। उन्होंने ब्राह्मण और क्षत्रिय समुदायों को साधने की कोशिश की है। 2025 में महाराणा प्रताप जयंती के अवसर पर अखिलेश ने क्षत्रिय नेताओं के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस की और उनके बलिदान को याद किया। इसी तरह ब्राह्मण नेताओं के साथ बैठक कर उन्होंने संदेश दिया कि उनकी पार्टी केवल एक विशेष समुदाय तक सीमित नहीं है। 2024 के लोकसभा चुनावों में सपा ने 4 ब्राह्मण और एक भूमिहार प्रत्याशी को टिकट दिया जिनमें से कुछ ने जीत हासिल की। यह दर्शाता है कि अखिलेश ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ और सामाजिक समावेश की रणनीति को अपनाकर अपने वोट बैंक का विस्तार कर रहे हैं।
    महिलाओं और युवाओं को आकर्षित करना भी अखिलेश की रणनीति का हिस्सा रहा है। उनके शासनकाल में शुरू की गई 1090 महिलाओं की हेल्पलाइन और कामधेनु योजना जैसी पहले महिलाओं और ग्रामीण मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए थीं। इसके अलावा अखिलेश ने डिजिटल और सोशल मीडिया का उपयोग कर युवा मतदाताओं को जोड़ने की कोशिश की है। उनकी सक्रिय ऑनलाइन उपस्थिति और सोशल मीडिया पर त्वरित प्रतिक्रियाएं युवाओं में उनकी छवि को मजबूत करती हैं। वे सामाजिक मुद्दों, जैसे बुलडोजर कार्रवाई के खिलाफ अनन्या यादव जैसे मामलों में समर्थन देकर सामाजिक न्याय के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को रेखांकित करते हैं। कांग्रेस सहित अन्य दलों के साथ गठबंधन की रणनीति भी अखिलेश के लिए महत्वपूर्ण है। हालांकि, 2024 के उपचुनावों में उन्होंने कांग्रेस को सीटें देने में सावधानी बरती, ताकि उनकी पार्टी का सेक्युलर आधार कमजोर न हो। यह दर्शाता है कि अखिलेश अपनी पार्टी को उत्तर प्रदेश में सेक्युलर राजनीति का प्रमुख चेहरा बनाए रखना चाहते हैं। साथ ही वे छोटे दलों और नेताओं को अपनी पार्टी में शामिल कर रहे हैं, ताकि स्थानीय स्तर पर प्रभाव बढ़ाया जा सके।
    हालांकि अखिलेश के सामने चुनौतियां भी कम नहीं हैं। कुछ मुस्लिम नेताओं, जैसे मौलाना शहाबुद्दीन ने उन पर मुस्लिम समस्याओं को नजरअंदाज करने का आरोप लगाया है। इसके अलावा बसपा और अन्य दल उनके वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश कर रहे हैं। फिर भी अखिलेश की रणनीति का केंद्र पीडीए फॉर्मूला है जिसे वे और मजबूत करने में जुटे हैं। गैर-यादव ओबीसी, दलित, ब्राह्मण, क्षत्रिय, और युवा-महिला मतदाताओं को जोड़कर वे एक व्यापक सामाजिक गठबंधन बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं। अखिलेश की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वे इन विभिन्न समुदायों के बीच संतुलन कैसे बनाते हैं। उनकी रणनीति में सामाजिक समावेश, क्षेत्रीय विकास, और डिजिटल उपस्थिति का मिश्रण है जो उन्हें 2027 के चुनावों में एक मजबूत दावेदार बना सकता है।
    अजय कुमार
    वरिष्ठ पत्रकार उत्तर प्रदेश
    मो.नं. 9335566111

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    600 बीमारी का एक ही दवा RENATUS NOVA

  • यूपी में कांग्रेस बयान बहादुरों नहीं, रणबांकुरों को आगे करें

    यूपी में कांग्रेस बयान बहादुरों नहीं, रणबांकुरों को आगे करें

    यूपी में कांग्रेस बयान बहादुरों नहीं, रणबांकुरों को आगे करें

    उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की दुर्दशा के दिन कम होने का नाम नहीं ले रहे हैं। यूपी में अपने उखड़ गये पॉव को फिर से जमाने के लिये पिछले करीब बीस वर्षो से कांग्रेस एड़ी चोटी का जोर लगा रही है लेकिन उसके दिन बहुरने का नाम नहीं ले रहे हैं। इन बीस वर्षो में कई दिग्गज आये और चले गये लेकिन पार्टी में जान नही फूंक पाये, यहां तक कि राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा गांधी भी पिटे हुए मोहरे साबित हुये लेकिन गांधी परिवार से लेकर कांग्रेस के छोटे-बड़े तमाम नेता बड़ी-बड़ी बातें और दावे करने से पीछे नहीं हटते हैं। जबकि यूपी में कांग्रेस की स्थिति सपा-बसपा जैसे दलों की बी टीम बनकर रह गई है। अब फिर कांग्रेस के कुछ नेता यूपी की ‘बासी कढ़ी में उबाल’ लाने का सपना देख रहे हैं। कांग्रेस के नेता अब यूपी में अगले वर्ष होने वाले पंचायत चुनाव को लेकर बड़े-बड़े दावे करने में लगे हैं।
    गौरतलब हो कि 1952 से 1985 तक पार्टी ने उत्तर प्रदेश विधानसभा और लोकसभा चुनावों में निर्विवाद प्रभुत्व बनाए रखा जिसमें 1985 में उसने 425 में से 269 विधानसभा सीटें जीतकर अपनी बादशाहत साबित की थी। लेकिन बीते करीब साढ़े 3 दशक में कांग्रेस अर्श से फर्श पर आ चुकी है। भारतीय जनता पार्टी, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के उभार ने कांग्रेस को हाशिए पर धकेल दिया है लेकिन आज तक उसकी सियासत में कोई पैनापन नहीं दिखाई दे रहा है। हाल ही में उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष अजय राय ने सनसनीखेज ऐलान किया कि पार्टी 2026 के पंचायत चुनाव अकेले दम पर लड़ेगी। उन्होंने साफ किया कि 2027 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी या बहुजन समाज पार्टी के साथ गठबंधन का फैसला केंद्रीय नेतृत्व पंचायत चुनाव के नतीजों के बाद लेगा। अजय राय का दावा है कि अगर कार्यकर्ता मज़बूत हुए तो गठबंधन की कोई ज़रूरत नहीं पड़ेगी। इस बयान को कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव और यूपी प्रभारी अविनाश पांडे ने प्रयागराज में दोहराया जहाँ उन्होंने जोर देकर कहा कि पार्टी सभी 403 विधानसभा सीटों पर दमदार तरीके से खड़ी है।वैसे अक्सर ऐसी ही बातें राहुल गांधी भी करते रहते हैं। कांग्रेस की तरफ से पिछले कुछ महीनों से जिस तरह के बयान आ रहे हैं उसने समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के गठबंधन में तनाव की अटकलों को हवा दी है। राजनीति के जानकार सवाल खड़ा कर रहे हैं कि क्या कांग्रेस वही भूल कर रही है जो 2019 में बहुजन समाज पार्टी ने की थी, जब उसने गठबंधन तोड़कर अपनी ताकत को गलत आँका? यह रणनीति कांग्रेस के लिए कितनी कारगर होगी और क्या यह आत्मविश्वास ज़मीनी हकीकत से मेल खाता है?
    यूपी की सियासत में कांग्रेस के पतन की कहानी दो दशक पूर्व 2014 से शुरू हुई थी जब लोकसभा चुनाव में मोदी लहर ने कांग्रेस को हाशिए पर धकेल दिया था। इसके बाद 2022 के विधानसभा चुनाव में पार्टी सिर्फ़ दो सीटों पर सिमट गई और विधान परिषद में उसका कोई प्रतिनिधित्व नहीं बचा। फिर 2024 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन ने कांग्रेस को नई उम्मीद दी। इस गठबंधन में कांग्रेस ने 17 सीटों पर उम्मीदवार उतारे और 6 सीटें जीतीं रायबरेली, अमेठी, सहारनपुर, सीतापुर, बाराबंकी और प्रयागराज। समाजवादी पार्टी ने 37 सीटें जीतकर भारतीय जनता पार्टी को कड़ी टक्कर दी। लेकिन इन जीतों की ज़मीनी हकीकत उतनी सहज नहीं थी।क्योंकि प्रयागराज से कांग्रेस के टिकट पर जीते उज्ज्वल रमन सिंह समाजवादी पार्टी के नेता थे जो कांग्रेस के टिकट पर लड़े। सहारनपुर से इमरान मसूद की जीत में भारतीय जनता पार्टी की रणनीतिक चूक का बड़ा हाथ था। रायबरेली और अमेठी को छोड़ दें तो कांग्रेस का संगठन यूपी में कमज़ोर है। 2022 में पार्टी का वोट शेयर सिर्फ़ 2.33 फीसदी था। फिर भी अजय राय और अविनाश पांडे जैसे नेता दावा कर रहे हैं कि पार्टी को किसी सहारे की ज़रूरत नहीं है। कई सवाल खड़े करता है।
    पंचायत चुनाव यूपी की सियासत में हमेशा बड़ी कसौटी रहे हैं। 2026 में होने वाले त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव, जिसमें 57,691 ग्राम प्रधान, 826 ब्लॉक प्रमुख, और 75 जिला पंचायत अध्यक्ष चुने जाएँगे, 2027 के विधानसभा चुनाव का माहौल तय करेंगे। ये चुनाव पार्टियों की ज़मीनी ताकत, कार्यकर्ताओं की मेहनत और जनता के बीच प्रभाव को परखते हैं। अजय राय का पंचायत चुनाव अकेले लड़ने का ऐलान कांग्रेस की ताकत को आजमाने की रणनीति है। पार्टी का मानना है कि अगर कार्यकर्ता मज़बूत हुए तो वह 2027 में अकेले दम पर बेहतर प्रदर्शन कर सकती है। अविनाश पांडेय ने संगठन को बूथ स्तर तक मज़बूत करने की बात कही है। इसके लिए पार्टी ने 5 स्तरीय संगठन की योजना बनाई है जिसमें मंडल अध्यक्षों के रूप में युवा और ऊर्जावान नेताओं को मौका दिया जाएगा। जुलाई 2025 में जिला और शहर कार्यकारिणी के शपथ ग्रहण समारोह शुरू हुए और 15 अगस्त तक सभी बूथ कमेटियों का गठन पूरा करने का लक्ष्य है। लेकिन यह रणनीति कितनी कारगर होगी? 2021 के पंचायत चुनाव में कांग्रेस ने सिर्फ़ 76 जिला पंचायत वार्ड जीते थे जबकि भारतीय जनता पार्टी ने 720 और समाजवादी पार्टी ने 760 वार्ड हासिल किए थे। निर्दलीय उम्मीदवारों ने 1,114 वार्ड जीतकर सभी दलों को चौंकाया था।
    कांग्रेस की इस रणनीति के पीछे 2024 के लोकसभा चुनाव में मिली सफलता का आत्मविश्वास है लेकिन यह आत्मविश्वास कितना टिकाऊ है? समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन में कांग्रेस की जीत का बड़ा हिस्सा समाजवादी पार्टी के सामाजिक आधार खासकर पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक समुदायों पर टिका था। समाजवादी पार्टी ने 2024 में अपने पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक फॉर्मूले से भारतीय जनता पार्टी को कड़ी टक्कर दी लेकिन 2024 में नौ विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनावों में गठबंधन में तनाव की खबरें सामने आईं। कांग्रेस ने समाजवादी पार्टी के उम्मीदवारों का समर्थन किया लेकिन वह गाजियाबाद और फूलपुर समेत पाँच सीटों पर लड़ना चाहती थी। समाजवादी पार्टी के साथ बातचीत अंतिम दौर में थी लेकिन सहमति नहीं बनी। अजय राय और अविनाश पांडे ने दिल्ली में केंद्रीय नेतृत्व से चर्चा की लेकिन फैसला समाजवादी पार्टी के पक्ष में गया। इन उपचुनावों में भारतीय जनता पार्टी ने सात सीटें जीतीं जबकि समाजवादी पार्टी को दो सीटें मिलीं। इससे गठबंधन में खटास की बातें सामने आईं। समाजवादी पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने संकेत दिया कि अगर कांग्रेस ज़्यादा सीटों की माँग करेगी तो समाजवादी पार्टी अकेले लड़ सकती है।
    कांग्रेस की रणनीति में संगठन का पुनर्गठन और युवा नेतृत्व को बढ़ावा देना शामिल है। दिसंबर 2024 में पार्टी ने अपनी प्रदेश, जिला, शहर, और ब्लॉक कमेटियों को भंग कर दिया और 100 दिनों में नई कमेटियों के गठन का लक्ष्य रखा। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने इस प्रक्रिया की निगरानी की जिसमें सलमान खुर्शीद, राज बब्बर, पीएल पुनिया जैसे वरिष्ठ नेताओं को शामिल किया गया। पार्टी ने छह जोन अवध, पूर्वी यूपी, पश्चिमी यूपी, प्रयागराज, ब्रज और बुंदेलखंड में संगठन को मज़बूत करने की योजना बनाई है। मेरठ, अलीगढ़, झांसी, अयोध्या और लखनऊ में कार्यकर्ता सम्मेलन आयोजित किये गये जिनका खर्च कार्यकर्ताओं ने खुद उठाया। यह दिखाता है कि कांग्रेस में जोश है लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि रायबरेली और अमेठी के बाहर उसका प्रभाव सीमित है।
    यूपी की सियासत में गठबंधन का इतिहास सबक से भरा है। 2019 में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने गठबंधन किया था। मोदी लहर के बावजूद दोनों ने 15 सीटें जीतीं बहुजन समाज पार्टी को 10 और समाजवादी पार्टी को 5 लेकिन इस जीत के बाद बहुजन समाज पार्टी ने गठबंधन तोड़ दिया। 2022 के विधानसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी सिर्फ़ एक सीट जीत पाई और 2024 में उसका खाता भी नहीं खुला। बहुजन समाज पार्टी की इस गलती का कारण उसका अतिआत्मविश्वास और संगठन की कमज़ोरी थी। यह कांग्रेस के लिए चेतावनी है। 2024 में समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन ने कांग्रेस को 6 सीटें दिलाईं लेकिन अतिआत्मविश्वास उसे भारी पड़ सकता है। समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ने हाल ही में कहा कि गठबंधन बरकरार है और दोनों दल 2027 में साथ मिलकर चुनाव लड़ेंगे। लेकिन समाजवादी पार्टी के सूत्रों ने संकेत दिया कि अगर कांग्रेस ज़्यादा सीटों की माँग करेगी तो समाजवादी पार्टी अकेले लड़ने का विकल्प चुन सकती है।
    कांग्रेस की रणनीति में दलित मतदाताओं को लुभाना भी शामिल है। 2024 में दलित वोटरों का एक हिस्सा भारतीय जनता पार्टी से हटकर कांग्रेस और समाजवादी पार्टी की ओर गया। कांग्रेस ने दलित सम्मेलनों और चौपालों का आयोजन शुरू किया है और राहुल गांधी की संविधान बचाने की मुहिम ने दलित समुदाय में विश्वास जगाया लेकिन समाजवादी पार्टी भी अपने पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक फॉर्मूले के तहत इन समुदायों को साध रही है। समाजवादी पार्टी ने ग्रामीण क्षेत्रों में पंचायतों का आयोजन शुरू किया है, जिसका मकसद जातिगत गणना और सामाजिक न्याय का मुद्दा उठाना है। दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी ने 2021 के पंचायत चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवारों को साधकर 67 जिला पंचायत अध्यक्ष सीटें जीती थीं और 2026 में भी यही रणनीति अपनाने की तैयारी में है।
    कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती संगठन को मज़बूत करना है। अजय राय और अविनाश पांडे के बयान भले ही हौसला बढ़ाने वाले हों लेकिन ज़मीनी स्तर पर मेहनत की जरूरत है। पंचायत चुनाव में अकेले लड़ने का फैसला एक जोखिम भरा दाँव है। अगर कांग्रेस अच्छा प्रदर्शन करती है तो यह 2027 के लिए उसका आत्मविश्वास बढ़ाएगा लेकिन अगर नतीजे खराब रहे तो गठबंधन के बिना उसकी राह मुश्किल हो सकती है। समाजवादी पार्टी भी 2027 में सत्ता में वापसी की आस में है। भारतीय जनता पार्टी, जिसने 2022 में अपने गठबंधन के साथ 273 सीटें जीती थीं, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में 2027 में 80 फीसदी सीटें जीतने का दावा कर रही है। 2027 का विधानसभा चुनाव यूपी की सियासत में टर्निंग पॉइंट हो सकता है। कांग्रेस के लिए यह मौका है कि वह बड़ी—बड़ी बातें करने की बजाये अपनी खोई ज़मीन वापस हासिल करे। इसके लिए उसे बयान बहादुरों से बचना होगा। कार्यकर्ताओं में जोश भरना होगा, संगठन को बूथ स्तर तक मज़बूत करना होगा और गठबंधन की रणनीति पर सावधानी से विचार करना होगा। विशेष रूप से राहुल गांधी और प्रियंका गांधी को यूपी को लेकर ठोस रणनीति बनानी होगी और यूपी में ज्यादा समय भी देना होगा।
    संजय सक्सेना
    वरिष्ठ पत्रकार लखनऊ
    9454105568

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  • नशा मुक्त भारत: संकल्प से सिद्धि की ओर एक जनान्दोलन

    नशा मुक्त भारत: संकल्प से सिद्धि की ओर एक जनान्दोलन

    नशा मुक्त भारत: संकल्प से सिद्धि की ओर एक जनान्दोलन

    सुरेश गांधी
    यह केवल अभियान नहीं, यह एक राष्ट्रीय चेतना है। ‘नशा मुक्त भारत’ कोई नारा नहीं, यह राष्ट्र निर्माण की आधारशिला है। यदि भारत को भविष्य में एक समर्थ, समरस और संस्कारित राष्ट्र बनाना है तो आज ही हमें यह संकल्प लेना होगा। “हम नशा नहीं करेंगे, नशे को सहन नहीं करेंगे और अगली पीढ़ी को बचाएंगे।” यह अभियान अधिकारियों का नहीं, हमारे अंतःकरण का है। जब नशे को सामाजिक अपराध की तरह देखा जाएगा, जब संस्कार को सम्मान और नशे को तिरस्कार मिलेगा, तब जाकर यह देश वास्तव में स्वतंत्र होगा, क्योंकि असली आजादी तब होती है जब आत्मा नशे की गुलामी से मुक्त हो. काशी से ‘नशा मुक्त भारत’ की नई शुरुआत, आध्यात्मिक चेतना से युवाओं को मिला दिशा-संकेत है। ‘काशी घोषणा पत्र’ ने युवाओं के नेतृत्व में नशामुक्ति आंदोलन का 5 वर्षीय खाका प्रस्तुत किया।
    जब राष्ट्र के भविष्य को नशे की लत निगलने लगे तब किसी सरकार की नहीं, समाज की जिम्मेदारी बनती है कि वह चेतना का दीप जलाए। आज भारत, विशेषकर उसका युवा वर्ग, मादक पदार्थों की गिरफ्त में आता जा रहा है। यह न सिर्फ स्वास्थ्य और शिक्षा की हानि है, बल्कि सामाजिक ताने-बाने को भी छिन्न-भिन्न करने वाली स्थिति है। ऐसे में केंद्र सरकार द्वारा चलाया गया ‘नशा मुक्त भारत अभियान’, अब मात्र एक सरकारी कार्यक्रम नहीं रहा, बल्कि यह एक राष्ट्रीय जनचेतना आंदोलन का रूप लेता जा रहा है। हाल ही में देशभर की 113 सामाजिक और आध्यात्मिक संस्थाओं, जनप्रतिनिधियों और शिक्षाविदों ने मिलकर एक राष्ट्रीय नशा मुक्ति संवाद आयोजित किया जिसने देश के नीति-निर्माताओं से लेकर पंचायत स्तर तक एक नया दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। इस संवाद में हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल श्री शिव प्रताप शुक्ल की भूमिका विशेष उल्लेखनीय रही जिन्होंने अपने प्रदेश में ‘हिमाचल मॉडल’ के रूप में जो अभियान खड़ा किया, वह अब राष्ट्र को राह दिखा रहा है।
    आज सबसे बड़ा संकट यह है कि नशा अब महज युवाओं तक सीमित नहीं रहा, बल्कि 8 से 14 वर्ष के स्कूली बच्चे भी इसकी चपेट में आ चुके हैं। यह आंकड़ा केवल भयावह नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आत्मा को झकझोरने वाला है। क्या यह केवल कानून से रोका जा सकता है? नहीं। यह एक संस्कार की लड़ाई है जिसका आधार बनेगा शिक्षा, ध्यान, आत्मबोध और सामाजिक सहभागिता। विद्यालयों में बच्चों को नशा न करने की शपथ दिलाना, नशा मुक्त छात्र प्रमाण-पत्र देना, खेल एवं ध्यान केंद्रों की स्थापना करना, जैसे कदम आज बेहद आवश्यक हैं। यह लड़ाई स्कूल से शुरू होनी चाहिए तभी समाज में सार्थक परिवर्तन आएगा। राज्यपाल शिव प्रताप शुक्ल ने यह स्पष्ट किया कि नशे की रोकथाम तभी संभव है, जब समाज मांग करना बंद कर दे। आपूर्ति रोकना पुलिस का काम हो सकता है लेकिन मांग को समाप्त करना समाज और परिवार का दायित्व है। उन्होंने हिमाचल प्रदेश में जो पहल की, वह अब एक राष्ट्रीय उदाहरण बन रहा है। हर पंचायत को जागरूक कर, युवाओं को जोड़कर, नशा विरोधी समितियाँ गठित की गईं। विद्यालयों में नशा मुक्त प्रवेश शपथ, सामाजिक बहिष्कार के जरिए ड्रग पेडलर्स पर नियंत्रण और सांस्कृतिक गतिविधियों से युवाओं को जोड़ना, यह सब उसी प्रयास का परिणाम है। भारत की हर राज्य सरकार को इस ’हिमाचल मॉडल’ से प्रेरणा लेकर अपनी स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार रणनीति बनानी होगी।
    ब्रह्माकुमारी, जीवन विद्या मिशन, रामकृष्ण मिशन, गायत्री परिवार, निरंकारी मिशन जैसे संगठनों की सक्रिय भागीदारी इस अभियान को एक गहरी आत्मिक और मनोवैज्ञानिक दिशा दे रही है। नशा केवल एक रासायनिक लत नहीं, बल्कि यह आत्मा की रिक्तता का परिणाम

    है। जब व्यक्ति भीतर से खाली होता है, तब वह बाहरी उत्तेजनाओं में अर्थ तलाशता है और वही नशा बन जाता है। ध्यान, योग, सत्संग और सेवा की भावना के माध्यम से जो आत्मबोध उत्पन्न होता है, वह किसी भी नशे से कहीं अधिक शक्तिशाली आनंद प्रदान करता है। यही वह राह है जो इस अभियान को स्थायी सफलता की ओर ले जा सकती है। इस संवाद में एक महत्वपूर्ण बिंदु यह भी था कि पंचायत निधि, मनरेगा और बजट का एक हिस्सा अब नशा मुक्ति अभियान और युवा संस्कार केंद्रों में निवेश किया जाए। यदि हर ग्राम पंचायत अपने क्षेत्र में एक नशा जागरूकता दीवार, एक खेल मैदान और एक ध्यान/संस्कार केंद्र स्थापित कर दे तो नशा के विरुद्ध लड़ाई की मजबूत नींव गाँव से ही तैयार हो जाएगी। इसके साथ मीडिया, सिनेमा, डिजिटल प्लेटफार्म पर भी जागरूकता बढ़ाने की ज़रूरत है। हर प्रभावशाली व्यक्ति, नेता, अभिनेता, संत, शिक्षक, यदि एक स्वर में यह कहे : “नशा नहीं करेंगे, और नशा करने वालों को रोकेंगे,” तो एक नैतिक क्रांति संभव है। भारत दुनिया का सबसे युवा देश है। यदि यह युवा वर्ग ही नशे की गिरफ्त में आ जाय तो न राष्ट्र की प्रगति संभव है और न ही सभ्यता की रक्षा, इसलिए यह आवश्यक है कि इस अभियान को मात्र प्रशासनिक आदेश या भाषणों तक सीमित न रखा जाए, बल्कि इसे युवाओं के नेतृत्व में एक जनांदोलन के रूप में विकसित किया जाए। कॉलेजों में ‘नशा मुक्त छात्र संघ’, गांवों में ‘युवा नशा विरोधी समिति’ और जिलों में ‘सामाजिक न्याय मंच’ बनाकर इस लड़ाई को जन-जन तक पहुंचाना होगा।
    राष्ट्र निर्माण की दिशा में एक ऐतिहासिक क्षण की साक्षी बनी काशी। रुद्राक्ष अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन केंद्र में आयोजित युवा आध्यात्मिक शिखर सम्मेलन के समापन अवसर पर ‘काशी घोषणापत्र’ को औपचारिक रूप से स्वीकार कर लिया गया। यह घोषणा पत्र 2047 तक नशा मुक्त भारत की संकल्पना को मूर्त रूप देने वाला दस्तावेज है जिसमें युवाओं को इस महाअभियान का अग्रदूत माना गया है। यह सम्मेलन न केवल युवाओं की शक्ति और आध्यात्मिक चेतना का संगम था, बल्कि भारत की सामाजिक संरचना में सकारात्मक परिवर्तन का बीज बोने वाला आयोजन भी। 600 से अधिक युवा नेता और 120 से अधिक आध्यात्मिक-सांस्कृतिक संगठनों के प्रतिनिधि इस समागम में शामिल हुए। सम्मेलन के 4 सत्रों में मादक पदार्थों की तस्करी, मानसिक प्रभाव, पुनर्वास और जन-जागरूकता अभियानों पर गंभीर विमर्श हुआ। डॉ. मनसुख मांडविया, केंद्रीय युवा कार्यक्रम एवं खेल मंत्री ने स्पष्ट शब्दों में कहा, “यह केवल घोषणा नहीं, बल्कि भारत की युवा शक्ति का साझा संकल्प है। भारत की आध्यात्मिक शक्ति अब इस नशा मुक्ति अभियान की रीढ़ बनेगी।“ उन्होंने इस अभियान को जन आंदोलन बनाने पर बल दिया और कहा कि यह केवल सरकारी प्रयास नहीं, बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक संस्थाओं की साझेदारी से ही सफल होगा।
    काशी घोषणा पत्र में प्रमुख रूप से इन बातों को रेखांकित किया गया: नशे को एक बहुआयामी सार्वजनिक स्वास्थ्य और सामाजिक संकट मानते हुए नीति निर्माण। आध्यात्मिक, शैक्षिक, तकनीकी और सांस्कृतिक पहलुओं का समावेश। संयुक्त राष्ट्रीय समिति, वार्षिक प्रगति रिपोर्ट और पुनर्वास सेवाओं हेतु राष्ट्रीय मंच का गठन। युवाओं के नेतृत्व में ‘माय भारत’ के अंतर्गत जनजागरूकता व शपथ अभियानों की शुरुआत। घोषणा पत्र की समीक्षा वर्ष 2026 के ‘विकसित भारत यंग लीडर्स डायलॉग’ में हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल श्री शिव प्रताप शुक्ला ने कहा, “काशी सनातन चेतना का केंद्र है। हम केवल एकत्र नहीं हो रहे हैं, बल्कि एक राष्ट्रीय परिवर्तन के बीज बो रहे हैं।“ उन्होंने चेताया कि यदि भारत जैसे युवा राष्ट्र में 65 फीसदी आबादी मादक द्रव्यों की चपेट में आ गई तो केवल वही युवा भविष्य का निर्माता होगा जो इससे मुक्त होगा।

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    600 बीमारी का एक ही दवा RENATUS NOVA

  • द्वादश ज्योतिर्लिंग में एक वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग महादेव की कथा

    द्वादश ज्योतिर्लिंग में एक वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग महादेव की कथा

    द्वादश ज्योतिर्लिंग में एक वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग महादेव की कथा

    पौराणिक कथा के अनुसार एक बार राक्षसराज रावण ने हिमालय पर स्थिर होकर भगवान शिव की घोर तपस्या की। महादेव जी का भक्त होने के कारण रावण अपना एक-एक सिर काट-काटकर शिवलिंग पर चढ़ा दिये। इस प्रकिया में उसने अपने नौ सिर चढ़ा दिया तथा 10वें सिर को काटने के लिए जब वह उद्यत (तैयार) हुआ, तब तक भगवान शंकर प्रसन्न हो उठे। प्रकट होकर भगवान शिव ने रावण के दसों सिरों को पहले की ही भाँति जोड़ दिया। उन्होंने रावण से वर माँगने के लिए कहा। रावण ने भगवान शिव से कहा कि मुझे इस शिवलिंग को ले जाकर लंका में स्थापित करने की अनुमति प्रदान करें। शंकरजी ने रावण को इस शर्त के साथ अनुमति प्रदान कर दी कि यदि इस लिंग को ले जाते समय रास्ते में धरती पर रखोगे तो यह वहीं स्थापित (अचल) हो जाएगा। जब रावण शिवलिंग को लेकर लंका की ओर प्रस्थान किया तो मार्ग में ‘चिताभूमि’ में ही उसे लघुशंका (पेशाब) करने की प्रवृत्ति हुई। उसने उस लिंग को पास ही में खड़े एक बैजू अहीर बालक के हाथ में पकड़ा दिया और लघुशंका से निवृत्त होने चला गया। इधर शिवलिंग भारी होने के कारण उस बैजू अहीर ने उसे भूमि पर रख दिया। वह लिंग वहीं अचल हो गया। वापस आकर रावण ने काफ़ी ज़ोर लगाकर उस शिवलिंग को उखाड़ना चाहा किन्तु वह असफल रहा। अन्त में वह निराश हो गया और उस शिवलिंग पर अपने अँगूठे को गड़ाकर (अँगूठे से दबाकर) लंका के लिए ख़ाली हाथ ही चल दिया। इधर ब्रह्मा, विष्णु इन्द्र आदि देवताओं ने वहाँ पहुँच कर उस शिवलिंग की विधिवत पूजा की। उन्होंने शिव जी का दर्शन किया और लिंग की प्रतिष्ठा करके स्तुति की। उसके बाद वे स्वर्गलोक को चले गये।
    यह वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग मनुष्य को उसकी इच्छा के अनुकूल फल देने वाला है। इस वैद्यनाथ धाम में मन्दिर से थोड़ी ही दूरी पर एक विशाल सरोवर है जिस पर पक्के घाट बने हुए हैं। भक्तगण इस सरोवर में स्नान करते हैं। यहाँ तीर्थपुरोहितों (पण्डों) के हज़ारों घाट हैं जिनकी आजीविका मन्दिर से ही चलती है। परम्परा के अनुसार पण्डा लोग एक गहरे कुएँ से जल भरकर ज्योतिर्लिंग को स्नान कराते हैं। अभिषेक के लिए सैकड़ों घड़े जल निकाला जाता हैं। उनकी पूजा काफ़ी लम्बी चलती है। उसके बाद ही आम जनता को दर्शन-पूजन करने का अवसर प्राप्त होता है। यह ज्योतिर्लिंग रावण के द्वारा दबाये जाने के कारण भूमि में दबा है तथा उसके ऊपरी सिरे में कुछ गड्ढा सा बन गया है। फिर भी इस शिवलिंग मूर्ति की ऊँचाई लगभग 11 अंगुल है। सावन के महीने में यहाँ मेला लगता है और भक्तगण दूर-दूर से काँवर में जल लेकर बाबा वैद्यनाथ धाम (देवघर) आते हैं। वैद्यनाथ धाम में अनेक रोगों से छुटकारा पाने हेतु भी बाबा का दर्शन करने श्रद्धालु आते हैं। ऐसी प्रसिद्धि है कि श्री वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग की लगातार आरती-दर्शन करने से लोगों को रोगों से मुक्ति मिलती है।
    कोटि रुद्र संहिता के अनुसार श्री शिव महापुराण के कोटि रुद्र संहिता में श्री वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग की कथा इस प्रकार लिखी गई है। राक्षसराज रावण अभिमानी तो था ही, वह अपने अहंकार को भी शीघ्र प्रकट करने वाला था। एक समय वह कैलास पर्वत पर भक्तिभावपूर्वक भगवान शिव की आराधना कर रहा था। बहुत दिनों तक आराधना करने पर भी जब भगवान शिव उस पर प्रसन्न नहीं हुए तब वह पुन: दूसरी विधि से तप-साधना करने लगा। उसने सिद्धिस्थल हिमालय पर्वत से दक्षिण की ओर सघन वृक्षों से भरे जंगल में पृथ्वी को खोदकर एक गड्ढा तैयार किया। राक्षस कुल भूषण उस रावण ने गड्ढे में अग्नि की स्थापना करके हवन (आहुतियाँ) प्रारम्भ कर दिया। उसने महादेव शिव को भी वहीं अपने पास ही स्थापित किया था। तप के लिए उसने कठोर संयम-नियम को धारण किया।
    वह गर्मी के दिनों में 5 अग्नियों के बीच में बैठकर पंचाग्नि सेवन करता था तो वर्षाकाल में खुले मैदान में चबूतरे पर सोता था और शीतकाल (सर्दियों के दिनों में) में आकण्ठ (गले के बराबर) जल के भीतर खड़े होकर साधना करता था। इन तीन विधियों द्वारा रावण की तपस्या चल रही थी। इतने कठोर तप करने पर भी महादेव महेश्वर उस पर प्रसन्न नहीं हुए। ऐसा कहा जाता है कि दुष्ट आत्माओं द्वारा भगवान को रिझाना बड़ा कठिन होता है। कठिन तपस्या से जब रावण को सिद्धि नहीं प्राप्त हुई तब रावण अपना एक-एक सिर काटकर शिव जी की पूजा करने लगा। वह शास्त्र विधि से भगवान की पूजा करता और उस पूजन के बाद अपना एक मस्तक रखा काटता तथा भगवान को समर्पित कर देता था। इस प्रकार क्रमश: उसने अपने नौ मस्तक काट डाले। जब वह अपना अन्तिम दसवाँ मस्तक काटना ही चाहता था, तब तक भक्त वत्सल भगवान महेश्वर उस पर सन्तुष्ट और प्रसन्न हो गये। उन्होंने साक्षात प्रकट होकर रावण के सभी मस्तकों को स्वस्थ करते हुए उन्हें पूर्ववत जोड़ दिया।
    महादेव जी ने राक्षसराज रावण को उसकी इच्छा के अनुसार अनुपम बल और पराक्रम प्रदान किया। भगवान शिव का कृपा-प्रसाद ग्रहण करने के बाद नतमस्तक होकर विनम्रभाव से उसने हाथ जोड़कर कहा– ‘देवेश्वर! आप मुझ पर प्रसन्न होइए। मैं आपकी शरण में आया हूँ और आपको लंका में ले चलता हूँ। आप मेरा मनोरथ सिद्ध कीजिए।’ इस प्रकार रावण के कथन को सुनकर भगवान शंकर असमंजस की स्थिति में पड़ गये। उन्होंने उपस्थित धर्मसंकट को टालने के लिए अनमने होकर कहा– ‘राक्षसराज! तुम मेरे इस उत्तम लिंग को भक्तिभावपूर्वक अपनी राजधानी में ले जाओ, किन्तु यह ध्यान रखना- रास्ते में तुम इसे यदि पृथ्वी पर रखोगे तो यह वहीं अचल हो जाएगा। अब तुम्हारी जैसी इच्छा हो वैसा करो’
    प्रसन्नोभव देवेश लंकां च त्वां नयाम्यहम्। सफलं कुरू मे कामं त्वामहं शरणं गत:।। इत्युक्तश्च तदा तेन शम्भुर्वै रावणेन स:। प्रत्युवाच विचेतस्क: संकटं परमं गत:।। श्रूयतां राक्षसश्रेष्ठ वचो मे सारवत्तया। नीयतां स्वगृहे मे हि सदभक्त्या लिंगमुत्तमम्।। भूमौ लिंगं यदा त्वं च स्थापयिष्यसि यत्र वै। स्थास्यत्यत्र न सन्देहो यथेच्छसि तथा कुरू।।
    भगवान शिव द्वारा ऐसा कहने पर ‘बहुत अच्छा’ ऐसा कहता हुआ राक्षसराज रावण उस शिवलिंग को साथ लेकर अपनी राजधानी लंका की ओर चल दिया। भगवान शंकर की मायाशक्ति के प्रभाव से उसे रास्ते में जाते हुए मूत्रोत्सर्ग (पेशाब करने) की प्रबल इच्छा हुई। सामर्थ्यशाली रावण मूत्र के वेग को रोकने में असमर्थ रहा और शिवलिंग को एक ग्वाल के हाथ में पकड़ा कर स्वयं पेशाब करने के लिए बैठ गया। एक मुहूर्त बीतने के बाद वह ग्वाला शिवलिंग के भार से पीड़ित हो उठा और उसने लिंग को पृथ्वी पर रख दिया। पृथ्वी पर रखते ही वह मणिमय शिवलिंग वहीं पृथ्वी में स्थिर हो गया। जो आज वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग के नाम से प्रसिद्ध है।
    जब शिवलिंग लोक-कल्याण की भावना से वहीं स्थिर हो गया तब निराश होकर रावण अपनी राजधानी की ओर चल दिया। उसने राजधानी में पहुँचकर शिवलिंग की सारी घटना अपनी पत्नी मंदोदरी से बतायी। देवपुर के इन्द्र आदि देवताओं और ऋषियों ने लिंग सम्बन्धी समाचार को सुनकर आपस में परामर्श किया और वहाँ पहुँच गये। भगवान शिव में अटूट भक्ति होने के कारण उन लोगों ने अतिशय प्रसन्नता के साथ शास्त्र विधि से उस लिंग की पूजा की। सभी ने भगवान शंकर का प्रत्यक्ष दर्शन किया– तस्मिँल्लिंगे स्थिते तत्र सर्वलोकहिताय वै। रावण: स्वगृहं गत्वा वरं प्राप्य महोत्तमम्।। तच्छुत्वा सकला देवा: शक्राद्या मुनयस्तथा। परस्परं समामन्त्र्य शिवसक्तधियोऽमला:।। तस्मिन् काले सुरा: सर्वे हरिब्रह्मदयो मुने। आजग्मुस्तत्र सुप्रीत्या पूजां चक्रुर्विशेषत:।। प्रत्यक्षं तं तदा दृष्टवा प्रतिष्ठाप्य च ते सुरा:। वैद्यनाथेति संप्रोच्य नत्वा – नत्वा दिवं ययु:।।
    इस प्रकार रावण की तपस्या के फलस्वरूप श्री वैद्यनाथेश्वर ज्योतिर्लिंग का प्रादुर्भाव हुआ जिसे देवताओं ने स्वयं प्रतिष्ठित कर पूजन किया जो मनुष्य श्रद्धा भक्तिपूर्वक भगवान श्री वैद्यनाथ का अभिषेक करता है, उसका शारीरिक और मानसिक रोग अतिशीघ्र नष्ट हो जाता है, इसलिए वैद्यनाथ धाम में रोगियों व दर्शनार्थियों की विशेष भीड़ दिखाई पड़ती है। एक अन्य प्रसंग के अनुसार ब्रह्मा के पुत्र पुलस्त्य (सप्त ऋषियों में से एक) की 3 पत्नियां थीं। पहली से कुबेर, दूसरी से रावण और कुंभकर्ण, तीसरी से विभीषण का जन्म हुआ। रावण ने बल प्राप्ति के निमित्त घोर तपस्या की। शिव ने प्रकट होकर रावण को शिवलिंग अपने नगर तक ले जाने की अनुमति दी। साथ ही कहा कि मार्ग में पृथ्वी पर रख देने पर लिंग वहीं स्थापित हो जाएगा। रावण शिव के दिये दो लिंग ‘कांवरी’ में लेकर चला। मार्ग में लघुशंका के कारण उसने कांवरी किसी ‘बैजू’ नामक चरवाहे को पकड़ा दी। शिवलिंग इतने भारी हो गए कि उन्हें वहीं पृथ्वी पर रख देना पड़ा। वे वहीं पर स्थापित हो गए। रावण उन्हें अपनी नगरी तक नहीं ले जाया पाया।जो लिंग कांवरी के अगले भाग में था, चन्द्रभाल नाम से प्रसिद्ध हुआ तथा जो पिछले भाग में था, वैद्यनाथ कहलाया। चरवाहा बैजू प्रतिदिन वैद्यनाथ की पूजा करने लगा। एक दिन उसके घर में उत्सव था। वह भोजन करने के लिए बैठा तभी स्मरण आया कि शिवलिंग पूजा नहीं की है।] सो वह वैद्यनाथ की पूजा के लिए गया। सब लोग उससे रुष्ट हो गए। शिव और पार्वती ने प्रसन्न होकर उसकी इच्छानुसार वर दिया कि वह नित्य पूजा में लगा रहे तथा उसके नाम के आधार पर वह शिवलिंग भी ‘बैजनाथ’ कहलाया।
    शिव पुराण में कई ऐसे आख्यान हैं जो बताते हैं कि शिव वैद्यों के नाथ हैं। कहा गया है कि शिव ने रौद्र रूप धारण कर अपने ससुर दक्ष का सिर त्रिशुल से अलग कर दिया। बाद में जब काफ़ी विनती हुई तो बाबा बैद्यनाथ ने तीनों लोकों में खोजा पर वह मुंड नहीं मिला। इसके बाद एक बकरे का सिर काट कर दक्ष के धड़ पर प्रत्यारोपित कर दिया। इसी के चलते बकरे की ध्वनि – ब.ब.ब. के उच्चरण से महादेव की पूजा करते हैं। इसे गाल बजाकर उक्त ध्वनि को श्रद्धालु बाबा को खुश करते हैं। पौराणिक कथा है कि कैलाश से लाकर भगवान शंकर को पंडित रावण ने स्थापित किया है। इसी के चलते इसे रावणोश्वर बैद्यनाथ कहा जाता है। यहां के दरबार की कथा काफ़ी निराली है।

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    600 बीमारी का एक ही दवा RENATUS NOVA

  • पेड़, पौधे हैं हमारी औषधि भी

    पेड़, पौधे हैं हमारी औषधि भी

    पेड़, पौधे हैं हमारी औषधि भी

    हरित धरा से पर्यावरण सुधार,
    हरे भरे पौधे पेड़ों की जय कार,
    प्राणियों को ऑक्सीजन दरकार,
    पौधे पेड़ों से मिले जीवन आधार।

    पर्यावरण संरक्षण, जल संरक्षण,
    ऊर्जा की बचत और संरक्षण,
    जल और ऊर्जा के उत्पादन हैं,
    यही बचत पर्यावरण संरक्षण हैं।

    प्रकृति और पर्यावरण निर्भर है,
    पेड़, पौधों की जय जय कार है,
    साग, सब्ज़ी, फूल और फल भी,
    पेड़, पौधे हैं हमारी औषधि भी।

    पेड़ पौधे और समस्त वनस्पति,
    प्रकृति की हैं अथाह सम्पत्ति,
    इस संपदा का संरक्षण करना है,
    प्राणिमात्र की हितरक्षा करना है।

    आदित्य पेड़ पौधे काटना नहीं है,
    एक पेड़ दस पुत्रों के समान है,
    पेड़ लगाइये, पर्यावरण बचाइये,
    धरती को उजाड़ न होने दीजिये।

    डा. कर्नल आदिशंकर मिश्र
    विद्या वाचस्पति, लखनऊ।

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    600 बीमारी का एक ही दवा RENATUS NOVA

  • तुम जैसी…!

    तुम जैसी…!

    तुम जैसी…!

    मेरे आने की आहट सुनकर…!
    तेरा… घूँघट में… ख़ुद ही शरमाकर…
    दरवाजे के पीछे छुप जाना…
    लाख ललक के बाद भी…!
    सबसे बाद में ही मिल पाना…
    वह भी सबकी चोरी से…
    आज भी मुझे याद है…
    बदन में लेकर उष्ण प्रवाह…!
    तप्त सांस, सजल आँखें गहरी अथाह
    दिखाने पर जिनको…!
    डॉक्टर जरूर यही कहता,
    बढ़ा हुआ है ब्लड प्रेशर…
    मानता तो था मैं भी यही… पर…
    मुझे याद है… तू कहती थी न…
    समाज में हुआ नहीं जाता है थेथर…
    किसी अजनबी के आने पर…!
    ननद या देवर को बुलाने का,
    तुम्हारा वह निराला अंदाज…
    कभी रसोई वाले चमचे से,
    कभी दरवाजे की कुण्डी से…
    कितना सुंदर सा… बनाया था रिवाज
    खो ही गया है प्यारी…!
    तुम्हारे बाद से… यह अद्भुत रिवाज…
    पर… मुझे तो अब भी याद है…
    तुम्हारे सहज-सुंदर श्रृंगार पर…!
    हमेशा लज्जा रही जो भारी…
    बस इसी कारण ही तो…
    हमने करी थी हमेशा मनुहारी…
    तुम्हारी पायल के घुँघरू से,
    होती थी जो सुबह शुरू…
    सच मानो… मुझे अब भी याद है…
    रात में तुम्हारा इंतजार भी…!
    खत्म कराते थे न… यही घुँघरू…
    मर्जी तुम्हारी… मानो या ना मानो…
    चली गई है… रोटी की मिठास,
    चूल्हे-चौके के संग-संग…!
    फुकनी भी अब दिखती है उदास…
    देखने को अब कभी नहीं मिलता…
    घूँघट में चूल्हे के पास,
    आग जलाने को परेशान…!
    तेरा वह चेहरा हताश-निराश… पर…
    लिए मुख पर अद्भुत मुस्कान-प्रकाश
    अब तो… देखकर सूप-चलनी… और…
    ओखल-मूसर,जाता-चक्की…!
    नई बहुरिया… सौ फ़ीसदी पक्की…
    हो जाती है हक्की-बक्की…
    तब तो तुम थी और तेरी फितरत थी
    जिसे इन सब की जरूरत थी…
    इसी बहाने सुनने को मिल जाता था
    सोहर,कजरी,चैता जैसा गीत-संगीत
    मुझे आज भी बख़ूबी याद है…
    तुम्हारे लिए तो होती थी,
    बच्चों में अकसर मारामारी
    अब तो… नहीं दिखती है…
    किसी के भी आगे-पीछे…!
    सजती हुई… बच्चों की फुलवारी…
    नहीं मिलती है… किसी के बक्शे में…
    किशमिश-मिसरी-बतासा… या फिर…
    गुड़ही-गुड़िया प्यारी-प्यारी…
    मुझे तो अब तक याद है सब कुछ…
    पर… गज़ब का परिवर्तन…
    ज़माने में हुआ है प्यारी….
    सच क्या है… पता नहीं मुझको…!
    पर…. अब के दौर में…
    तुम जैसी… नहीं दिखती है नारी…!
    तुम जैसी… नहीं दिखती है नारी…!

    रचनाकार—— जितेन्द्र दुबे
    अपर पुलिस उपायुक्त, लखनऊ।

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    600 बीमारी का एक ही दवा RENATUS NOVA

  • बाजार दिखा बड़ा मगर खरीददार है छोटा, क्या टिक पायेगी टेस्ला इंडिया में?

    बाजार दिखा बड़ा मगर खरीददार है छोटा, क्या टिक पायेगी टेस्ला इंडिया में?

    बाजार दिखा बड़ा मगर खरीददार है छोटा, क्या टिक पायेगी टेस्ला इंडिया में?

    मुम्बई के बांद्रा-कुर्ला कॉम्प्लेक्स की चमचमाती सड़कें, शीशे के भव्य शोरूम में खड़ी एक कार और बाहर भीड़ का उत्साह 15 जुलाई की सुबह कुछ ऐसी ही थी, जब भारत में टेस्ला ने आधिकारिक तौर पर कदम रखा। टेस्ला यानी उस सपने का नाम, जो अमेरिका में नवाचार की पहचान बन चुका है लेकिन भारत में यह सपना साकार होगा या फिर वही हश्र होगा जो पहले भी कई विदेशी कंपनियों का हुआ, यही सवाल आज देश का हर गंभीर ऑटो विशेषज्ञ पूछ रहा है। टेस्ला की Model Y भारत में लॉन्च हुई है जिसकी कीमत 60 लाख से 70 लाख के बीच है। यह गाड़ी आम आदमी के सपनों से कहीं दूर है और इसीलिए यह चर्चा का विषय बन गई है। भारत में जहां कारों की औसत कीमत 11.5 लाख है, वहीं टेस्ला की शुरुआती कीमत छह गुना अधिक है। सवाल यह नहीं कि टेस्ला महंगी क्यों है, सवाल यह है कि भारत जैसे मूल्य-संवेदनशील बाजार में क्या वह टिक पाएगी?
    भारत में गाड़ी खरीदना केवल यात्रा का जरिया नहीं, बल्कि यह स्टेटस सिंबल भी है। लेकिन स्टेटस के साथ भारतीय ग्राहक “वैल्यू फॉर मनी” भी चाहता है। भारत में आज भी SUV सेक्टर में 20-30 लाख की रेंज में टाटा, महिंद्रा और हुंडई जैसी कंपनियों का बोलबाला है। टेस्ला अगर इस रेंज में आती तो शायद बड़ी हलचल मचती लेकिन 60 लाख से ऊपर की रेंज में वो खरीदारों का एक सीमित तबका ही पकड़ सकती है। यह सीमित तबका भी टेस्ला के लिए आसान नहीं होगा। भारत में मर्सिडीज-बेंज, बीएमडब्ल्यू और पोर्शे पहले से इस प्रीमियम सेगमेंट में मौजूद हैं। साल 2024 में भारत में 50 लाख से ऊपर की गाड़ियों की हिस्सेदारी मात्र 1 से 1.5% थी। यानी 100 में से सिर्फ एक या दो खरीदार ही इस रेंज में खर्च करते हैं। टेस्ला को इन्हीं के बीच अपनी जगह बनानी होगी।
    यही नहीं, भारत की EV नीति और इंपोर्ट टैक्स भी टेस्ला के लिए बड़ी चुनौती हैं। फिलहाल जो मॉडल लॉन्च किए गए हैं, वे चीन की शंघाई फैक्ट्री से आयातित हैं। भारत में इलेक्ट्रिक गाड़ियों पर 70% से ज्यादा इंपोर्ट ड्यूटी लगती है। यही कारण है कि टेस्ला की कीमतें भारत में दो गुना हो जाती हैं। अगर कंपनी भारत में मैन्युफैक्चरिंग शुरू करती है और सरकार की नई EV नीति के तहत 4,150 करोड़ का निवेश करती है तो उसे इंपोर्ट ड्यूटी में राहत मिल सकती है लेकिन मस्क इस पर अब तक कोई साफ संकेत नहीं दे पाए हैं।अब बात करें ब्रांड के भावनात्मक पक्ष की। भारत में आईफोन जैसे महंगे ब्रांड्स की भी सीमित पहुंच है। आज भी भारत में एप्पल की बाजार हिस्सेदारी केवल 7–12% है जबकि अमेरिका में यह 40% के आसपास है। इसका सीधा अर्थ है कि भारत के मध्यम वर्ग में महंगे ब्रांड्स का क्रेज तो है लेकिन जेब उतनी मजबूत नहीं। ऐसे में टेस्ला को भी वही चुनौती झेलनी होगी जो एप्पल झेल रही है “ब्रांड दिखे, पर बिके नहीं।”
    उद्योग जगत भी इस एंट्री को लेकर सतर्क है। एक प्रमुख भारतीय ऑटो मोबाइल ग्रुप के अध्यक्ष ने तो एलन मस्क को सोशल मीडिया पर चुनौती देते हुए लिखा “चार्जिंग स्टेशन पर मिलते हैं!” यह सिर्फ एक मजाक नहीं, बल्कि एक सीधा संदेश है कि टेस्ला को भारतीय ब्रांड्स हल्के में नहीं लेने वाले। टाटा मोटर्स और महिंद्रा जैसी कंपनियां पहले ही 10 से 25 लाख की रेंज में EV गाड़ियाँ उपलब्ध करा रही हैं जो आम भारतीयों की जरूरत और बजट दोनों से मेल खाती हैं। अब सवाल यह भी है कि क्या भारत का चार्जिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर टेस्ला जैसे ब्रांड को सपोर्ट करने के लिए तैयार है? फिलहाल नहीं। टेस्ला ने भले ही मुंबई और दिल्ली में सुपरचार्जिंग स्टेशन लगाने की योजना बनाई हो लेकिन पूरे देश में नेटवर्क बनाना एक लंबी प्रक्रिया है। जब तक यह नेटवर्क तैयार नहीं होता, तब तक टेस्ला का बाजार केवल दिखावे तक सीमित रहेगा। टेस्ला का भविष्य इस पर भी निर्भर करेगा कि वह भारतीय ग्राहकों के लिए क्या पेशकश करती है। अगर टेस्ला भविष्य में 40–45 लाख की रेंज में कोई मॉडल लाती है तो वह मिड प्रीमियम ग्राहकों को आकर्षित कर सकती है। ये वही ग्राहक हैं जो 30 लाख की गाड़ी खरीदने की हैसियत रखते हैं और ब्रांड वैल्यू के लिए थोड़ा और खर्च करने को तैयार रहते हैं लेकिन जब सामने टाटा, महिंद्रा, हुंडई जैसे भरोसेमंद ब्रांड हों तो टेस्ला को केवल ब्रांड इमेज के सहारे सफलता नहीं मिलेगी।
    इतिहास भी यही कहता है। हर्ले डेविडसन, शेव्रले और फोर्ड जैसी कंपनियों ने भी भारत में धमाकेदार एंट्री की थी लेकिन कुछ वर्षों बाद उन्हें भारत छोड़ना पड़ा। वजह साफ थी भारतीय बाजार को समझने में चूक। सिर्फ नाम और टेक्नोलॉजी से भारत में गाड़ी नहीं बिकती, यहां लोगों की जरूरत, खर्च की सीमा और सेवा नेटवर्क की अहम भूमिका होती है।भारत में EV का भविष्य उज्ज्वल है लेकिन अभी शुरुआती दौर में है। 2025 तक कुल गाड़ियों की बिक्री में EV की हिस्सेदारी केवल 4% रहने का अनुमान है। ऐसे में टेस्ला को जल्दबाजी नहीं, बल्कि रणनीति से काम लेना होगा। उसे भारत के लिए खास मॉडल, कीमत और सर्विस नीति बनानी होगी। टेस्ला की भारत में एंट्री एक नई शुरुआत है लेकिन इसका भविष्य इस पर निर्भर करेगा कि क्या एलन मस्क भारत को सिर्फ एक बाजार नहीं, बल्कि एक साझेदार मानते हैं। अगर वह भारत में उत्पादन, रोजगार और तकनीक साझा करते हैं तो उन्हें भारत का दिल भी मिलेगा और बाजार भी। वरना यह एंट्री भी एक शानदार लेकिन अल्पकालिक तमाशा बनकर रह जायेगी।
    अजय कुमार
    वरिष्ठ पत्रकार उत्तर प्रदेश
    मो.नं. 9335566111

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  • मैं आजाद कलम का सिपाही हूं…!

    मैं आजाद कलम का सिपाही हूं…!

    मैं आजाद कलम का सिपाही हूं…!

    सुरेश गांधी
    आज, जब ’पत्रकार’ और ’प्रोपगैंडा’ के बीच की रेखा धुंधली होती जा रही है तब यह और भी ज़रूरी हो गया है कि हम कलम को वैचारिक ईमानदारी, संवैधानिक निष्ठा और नैतिक साहस से भरें। मेरी यही आकांक्षा है कि मैं आज़ाद कलम का वह सिपाही बन सकूं जो सत्ता से नहीं, बल्कि सत्य से संचालित हो। पत्रकार एक ऐसा शब्द है जिसकी रक्षा करना हर कलम के जादूगर का फर्ज है। यही सोच ले बहुत से कलम के हुनरदारों ने पत्रकारिता जगत में धूम-धड़ाके से प्रवेश किया परन्तु समाज ने उन्हें उनका फर्ज भुलाकर अपनी मुट्ठी में कैद करने की कोशिश शुरू कर दी। पत्रकार को मुट्ठी में कैद करने की चालें देश के गद्दारों, भ्रष्टाचारियों, अवैध धंधे करने वालों ने करके पत्रकारिता की गरिमा को ठेस पहुंचाकर कलम के हुनर को दबाने की कोशिश की और हरदम उनका प्रयास और तेज है जबकि सभी स्वार्थों का त्यागकर पत्रकारिता जगत में बेखौफ कलम चलाकर भ्रष्टाचारियों के चेहरे बेनकाब करने चाहिये।
    पत्रकारिता को अक्सर सत्ता का चौथा स्तंभ कहा जाता है लेकिन जब यह स्तंभ अपने मूल स्वरूप से डगमगाने लगे तो समाज का संतुलन भी टूटने लगता है। आज जब सूचनाओं की बाढ़ है, मगर सच्चाई की प्यास बुझती नहीं, तब पत्रकार की भूमिका केवल समाचार संकलक की नहीं, बल्कि लोकस्वर के संवाहक की होती है। मतलब साफ है पत्रकारिता केवल समाचारों का संकलन या प्रसारण भर नहीं है। यह समाज की आत्मा से संवाद है। यह लोकजीवन की धड़कनों को सुनने, समझने और उसे शब्द देने की तपस्वी प्रक्रिया है। इसी भावना से मैं अपनी पत्रकारिता को परिभाषित करता हूं। यह किसी को डराने, धमकाने या ब्लैकमेल करने का औजार नहीं, बल्कि अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति की आवाज़ को मंच देने का माध्यम है।
    मैं जब पत्रकारिता के क्षेत्र में आया तो मैंने इसे न तो व्यवसाय की दृष्टि से देखा, न ही सत्ता या प्रसिद्धि की सीढ़ी के रूप में। मैंने इसे अपने विचारधारा और संवैधानिक चेतना के विस्तार के रूप में अपनाया, एक ऐसा माध्यम, जिससे मैं समाज के अंतिम व्यक्ति की आवाज़ बन सकूं। मेरी कलम न सत्ता से संचालित है, न किसी संस्था से निर्देशित। यह कलम उस विचारधारा की अंतिम स्याही है जो सामाजिक न्याय, संवैधानिक अधिकार और मानवीय गरिमा के लिए बहती है। मैं पत्रकारिता को सिर्फ एक पेशा नहीं मानता, यह मेरे लिए एक नैतिक दायित्व है। एक ऐसी प्रक्रिया, जिसके माध्यम से लोकतंत्र की आत्मा जीवंत रह सके। आज जब मीडिया पर बाज़ार, विज्ञापन और राजनीतिक दबावों का शिकंजा कसता जा रहा है तब पत्रकार का विवेक, उसकी प्रतिबद्धता और उसका साहस सबसे बड़ी पूंजी बन जाती है और मैं स्वयं को इसी चुनौती से जूझता पत्रकार मानता हूं जो न बिकने को तैयार है, न झुकने को।
    मेरी कलम न किसी दल की भोंपू है, न ही किसी कारपोरेट एजेंडे का औजार। मेरी पत्रकारिता का उद्देश्य किसी को डराना, धमकाना या लज्जित करना नहीं है। यह क़लम किसी को गिराने के लिए नहीं, बल्कि गिराए गए को उठाने के लिए उठती है। मैं यह मानता हूं कि पत्रकारिता का धर्म है, बोलना वहां, जहां चुप्पी सहमति बन जाए और लिखना वहां, जहां सच दबा दिया जाए। जब कोई किसान आत्महत्या करता है, कोई मज़दूर विस्थापित होता है, कोई दलित न्याय से वंचित रह जाता है, कोई महिला उत्पीड़न की शिकार होती है या कोई आदिवासी जंगल से बेदखल कर दिया जाता है या कोई प्रताड़ना से ग्रसित बुनकर तब मुख्य धारा की मीडिया अक्सर खामोश हो जाती है। मेरी लेखनी उन्हीं आवाज़ों की साझेदार बनना चाहती है जो ’टीआरपी’ की दुनिया में गुम हो जाती हैं। मेरी कलम विचारधारा की स्याही से भीगती है लेकिन किसी ’वाद’ की दास नहीं है। यह कलम लोकतंत्र के मूल्यों, संविधान की आत्मा और जन-जन के हक की पक्षधर है।
    मैं चाहता हूं कि मेरी पत्रकारिता सामाजिक न्याय, समानता और मानव गरिमा की पुनर्स्थापना का औजार बने। यह राह आसान नहीं है, यह राह अकेलेपन की भी है, आलोचना की भी और संघर्ष की भी लेकिन अगर यह राह किसी पीड़ित को न्याय दिला सके, किसी निर्बल को बल दे सके तो यही मेरी सबसे बड़ी उपलब्धि होगी। मैं उस राह का राही हूं जो लोकप्रियता की होड़ से परे है जो सत्ता की प्रशंसा से दूर है लेकिन जो जन-आवाज़ के सबसे निकट है। मैं उस स्वराज की कल्पना में विश्वास करता हूं, जिसमें हर व्यक्ति को अपने विचार रखने, विरोध दर्ज करने और न्याय मांगने का अधिकार हो। मेरी पत्रकारिता उसी स्वराज की परिकल्पना का विस्तार है जहां लेखनी एक आंदोलन है और पत्रकार एक जनपक्षधर सैनिक। जब कलम बिकने लगती है तो सत्य गिरवी हो जाता है। और जब कलम चुप हो जाती है तब अन्याय बोलने लगता है। मैं नहीं चाहता कि मेरी कलम किसी के लिए हथियार बने, मैं चाहता हूं कि यह समाज के लिए दीपशिखा बने जो अंधेरे में दिशा दिखाये।
    मैं चाहता हूं कि मेरी पत्रकारिता से निकली हर पंक्ति किसी मूक चीख को स्वर दे, किसी पीड़ित की पीड़ा को मंच मिले। मैं चाहता हूं कि जब सत्ता मद में चूर हो जाय तब मेरी कलम उसका आईना बने। जब व्यवस्था विकृत हो जाए, तब मेरी लेखनी उसका विवेक बने। और जब समाज थक जाए, टूट जाए, तब मेरी आवाज़ उसे फिर से उठ खड़ा होने की हिम्मत दे। मुझे गर्व हो। यदि आने वाली पीढ़ियां कहें कि “यह पत्रकार सबका था लेकिन किसी का गुलाम नहीं था।” मैं आज़ाद कलम का वह सिपाही बनना चाहता हूं जो सबका है लेकिन किसी का नहीं। जिसका कोई निजी स्वार्थ नहीं परंतु जिसकी निष्ठा जनहित में अडिग है। पत्रकारिता का यह आदर्श भले ही कठिन हो लेकिन यही उसका असली रूप है। इस कलम को बिकने नहीं दूंगा। इसे झुकने नहीं दूंगा। इसे उस हर व्यक्ति के लिए चलने दूंगा जिसकी आवाज़ कोई नहीं सुनता।
    खास तौर से तब जब पत्रकारिता एक व्यवसाय का रूप ले चुकी है। इस समय भारत में देशभक्ति से पूर्ण पत्रकारिता की जरूरत है जो आजादी से पहले हुआ करती थी। आज सस्ती टीआरपी की होड़ लगी है। समाज में व्याप्त बुराइयां इस पवित्र पेशे को भी दागदार बना चुकी हैं। जब दर्पण ही दागदार हो गया तो वह भला कैसे बता सकेगा, समाज की सच्ची तस्वीर। पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है। जब न्याय पालिका को छोड़कर लोकतंत्र के बाकी स्तंभ भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद की समस्याओं से जूझ रहे हैं तो ऐसे समय पत्रकारिता की सामाजिक जिम्मेदारी कहीं अधिक बढ़ जाती है लेकिन दुखद बात तो यह है कि अब तो समाचारों की विश्वसनीयता पर भी संदेह होने लगा है। पत्रकारों का यह दायित्व है कि वे लोगों को सही खबरों से अवगत कराएं और उनमें लोकतंत्र की आस्था को मजबूत करें।
    इससे बड़ी बिडम्बना और क्या हो सकती है जब अखबारों के मालिक ही राजनीतिक दलों से डील कर पैसे लेकर उनके पक्ष में समाचार छापते हैं, तब फिर मातहत अधिकारी और कर्मी भी तो यही करेंगे। गंगा गंगोत्री से ही मैली हो रही है। सफाई की शुरुआत भी वहीं से करनी होगी लेकिन बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधेगा? लोग पत्रकार क्यों बनते हैं-जन सेवा के लिए या फिर जैसे-तैसे पैसा कमाने के लिए। माना अब पत्रकारिता अब मिशन नहीं रहा लेकिन इसको मिशन बनाया जा सकता है। तेज सफर में पत्रकारों को पत्रकारिता जगत के लिए शहीद भी होना पड़ा परन्तु इन कलम के रखवालों ने अपनी कलम की रोशनी को कम नहीं होने दिया और भ्रष्टाचार जैसे कुकुरमुत्ते का विनाश किया लेकिन समय बदलते ही कलम की रोशनी पर भी तेज आंच आयी जो आज भी बदस्तूर जारी है। पत्रकारिता जगत में पत्रकारों को हर पल अपने जान-माल का खतरा भी रहा है लेकिन कलम के रखवालों ने अपनी कलम की रोशनी को यूं ही जाय नहीं होने दिया और अपनी कलम की रोशनी को पूरे पत्रकारिता जगत पर बिखेर कर रोशन कर दिया।
    पत्रकार एक ऐसा शब्द है जिसकी रक्षा करना हर कलम के जादूगर का फर्ज है और यही सोच ले बहुत से कलम के हुनरदारों ने पत्रकारिता जगत में धूम-धड़ाके से प्रवेश किया परन्तु समाज ने उन्हें उनका फर्ज भुलाकर अपनी मुट्ठी में कैद करने की कोशिश शुरू कर दी। पत्रकार को मुट्ठी में कैद करने की चालें देश के गद्दारों, भ्रष्टाचारियों, अवैध धंधे करने वालों ने करके पत्रकारिता की गरिमा को ठेस पहुंचाकर कलम के हुनर को दबाने की कोशिश की और हरदम उनका प्रयास और तेज है जबकि सभी स्वार्थों का त्यागकर पत्रकारिता जगत में बेखौफ कलम चलाकर भ्रष्टाचारियों के चेहरे बेनकाब करने चाहिए। वह दौर-ए-गुलामी था, यह दौर-ए-गुलामां है-पत्रकारिता के संघर्ष की इससे दो दिशाएं साफ होती हैं। तब ‘मिशन’ था अंग्रेजों की गुलामी से मुक्ति का और अब दौर है। आर्थिक-सामाजिक-राजनीतिक दासता से मुक्ति का। इसी ‘मुक्ति’ की चाहत के साथ समर्पित भाव से काम करने वाले दुनिया के 29 देशों में 141 पत्रकारों ने अपनी जानें गंवा दीं। भारतीय पत्रकारिता के बारे में भी कहा गया-‘तलवार की धार पे धावनो है’- पत्रकारिता तलवार की धार पर दौड़ने के समान है। हमें पत्रकारिता में सच्चाई के लिए लड़ना सिखाया गया था और मेरा भी वही उद्देश्य था और इसीलिए मैं मीडिया से जुड़ा भी लेकिन सच्चाई वो नहीं थी, वह तो सिर्फ एक परछाई थी जिसे मैं पकड़ने की कोशिश कर रहा था।

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    600 बीमारी का एक ही दवा RENATUS NOVA

  • विश्व का सबसे डरावना प्राणी सांप

    विश्व का सबसे डरावना प्राणी सांप

    विश्व का सबसे डरावना प्राणी सांप

    सांप विश्व का एक ऐसा भयानक डरावना प्राणी है जिसका नाम सुनकर ही पूरे शरीर में भय की एक लहर दौड़ जाती है। यद्यपि संसार में एक से बढ़कर एक जीव जंतु और डरावनी चीज हैं जिनका नाम सुनकर शरीर में सिहरन दौड़ जाती है। जैसे भूत-प्रेत, पिशाच, चुड़ैल, डायन, शैतान, शेर, भेड़िया, लकड़बग्घा, बिच्छू लेकिन इन सभी से डरावना और घातक प्राणी मानव जाति के लिए सर्प ही है। सांप पूरी दुनिया में अंटार्कटिका और न्यूजीलैंड को छोड़कर हर जगह पाए जाते हैं। यह पानी और जमीन में पेड़ों पर जंगल और गुफाओं में निवास करते हैं और हर एक वातावरण के प्रति स्वयं को अनुकूलित कर लिया है, इसलिए यह सृष्टि के सबसे सफल प्राणियों में से एक है।
    पूरी दुनिया में सांपों की 3900 के लगभग प्रजातियां पाई जाती हैं जिसमें 20% विषैली और 80% विषहीन होती हैं। इसी तरह भारत में भी 69 प्रजातियां सांप की पाई जाती हैं जिसमें 29 समुद्र में और 40 जमीन पर मिलती हैं और इसमें से केवल 10% सांप विषैले और जानलेवा होते हैं पूरी दुनिया में सांपों की अधिकांश प्रजातियां जहरीली नहीं होती हैं
    सांप के पैर नहीं होते यह सरीसृप अर्थात रेंग कर चलने वाले प्राणियों में से आते हैं इनके पैर की जगह शल्क होते हैं जिनकी सहायता से वे चलते हैं इनके बाहरी कान नहीं होते लेकिन आंतरिक कान होते हैं जिनमें हड्डियों की सहायता से जमीन से आने वाली आवाज को सुनते हैं। इसके अलावा मस्तिष्क की विशेष ग्रहण की सहायता से हवा से आई हुई आवाजों को भी पकड़ लेते हैं। इनकी श्वांस नली में एक फेफड़ा होता है और यह हर वर्ष अपना केंचुल उतारने रहते हैं जिसे कायांतरण या नवीनीकरण कहते हैं। इनके नीचे का जबड़ा बहुत ही लचीला होता है जिसकी सहायता से अपने से बड़े शिकार को भी निगल जाते हैं। सभी सांप मांसाहारी होते हैं यह विषैले और विषहीन दोनों प्रकार के होते हैं जो घात लगाकर या पीछा करके अपने शिकार को पकड़ते हैं।
    सांप एक शीत रुधिर का प्राणी होता है अर्थात इसका शरीर अपने को मनुष्य की तरह वातावरण के अनुकूल नहीं कर सकता, इसीलिए जाड़ों में बिल के अंदर चले जाते हैं और गर्मियों में बाहर आ जाते हैं जिससे उनका शरीर सर्दी गर्मी के प्रति अनुकूलित रहे, इनका हृदय तीन खानों में विभक्त रहता है। इनका पाचन तंत्र बहुत ही विकसित और संतुलित रहता है। आंखों में पलक नहीं होता है। इनके तेज और खोखले दांत होते हैं तो केवल खांच या अर्धचंद्र की तरह दो निशान पड़ते हैं जबकि विषहीन सांप के काटने पर छोटे-छोटे कई निशान पड़ जाते हैं। सभी परिवार के साथ लंबे समय तक कभी-कभी 6 महीने से एक वर्ष तक बिना खाए पिए रह सकते हैं, इसलिए महीने में एक बार भोजन उनके लिए पर्याप्त होता है।
    गर्मी और वर्षा ऋतु में सभी सांप बहुत ही भयानक और उत्तेजित रहते हैं और इसी समय में सबसे अधिक लोगों को काटते हैं। जाड़े में वह लगभग निष्क्रिय रहते हैं, क्योंकि ठंड में स्वयं को अनुकूलित न कर पाने के कारण धरती के अंदर या बिल में छुप जाते हैं। वर्षा काल में सांपों का प्रजनन काल भी होता है, इसलिए उस समय यह बहुत ही उग्र और भयानक होते हैं। उसे समय उनसे बचना चाहिए। इस समय सांप क्रोध में काटते हैं और पूरा जहर शरीर में छोड़ देते हैं जिससे व्यक्तियों के मरने की संभावनाएं बहुत अधिक बढ़ जाती हैं। इसके अलावा वर्षा काल में हर जगह पानी भर जाने से अपने शिकार को पकड़ने के लिए वह प्राय घर गांव बस्ती में आ जाते हैं, इसलिए भी वर्षा काल में सांपों की घटनाएं काटने की बहुत अधिक हो जाती हैं, इसलिए हमेशा जूते चप्पल पहन कर टॉर्च लेकर लाठी के साथ निकालना चाहिए।
    दुनिया में सभी रंग रूप के सांप पाए जाते हैं। लाल, पीला, काला, सफेद, नीला, हीरे, सोने जैसे होते हैं। सबसे छोटा सांप 10 सेंटीमीटर का थ्रेड नाग होता है जबकि सबसे बड़ा 10 मीटर का अफ्रीकी अजगर होता है। किंग कोबरा भी काफी लंबा सांप होता है जो 18 से 20 फीट लंबा हो सकता है। प्रमुख विषैले सांपों में नाग काला, नाग भूरा नाग, करैत, वाइपर, रसल वाइपर, स्किल्ड वाइपर, नागराज या किंग कोबरा, बांस पिट, वाईपर मांबा, ब्लैक मांबा, टाइपेन प्रमुख है जबकि विषहीन आंखों में अजगर, ओलिव, कीलबैक, चेकर्ड, कील, बैक, बेडडोम, डोड़हा, अषढ़िया, धामिन, घोड़ा पछाड़ जैसे सांप प्रमुख है। अजगर और अमेज़न नदी में पाए जाने वाले सांप सबसे लंबे होते हैं।
    सांप का जहर दो प्रकार का होता है। एक हीमोटोक्सिन और दूसरा न्यूरोटोक्सीन। हीमोटोएक्सइन में बेहोशी और लकवा जैसी चीज हो जाती हैं जबकि न्यूरोटोक्सीन में खून का जाम जाना अंदर खून का रक्त स्राव होना जैसी घटनाएं होती हैं। सांप अंडे और बच्चे दोनों देते हैं। यह बहुत अद्भुत प्राणी है जो आदिकाल से लोगों के लिए भय और जिज्ञासा का कारण बने हुए हैं। माना जाता है कि जब हलाहल विष का पान भगवान शिव कर रहे थे तब उसे जहर की कुछ बूंदें धरती पर गिरीं और उसको पीने वाले सांप सहित अन्य प्राणी विषैले हो गये थे। सांप का जहर इतना घातक होता है कि एक सांप सैकड़ों लोगों को मार सकता है। सबसे अधिक जहर नागराज अर्थात किंग कोबरा में होता है और सबसे कम टाइपेन, करेत जैसे सांपों में होता है लेकिन जिस सांप में जितना ही मम जहर होता है, वह उतना ही अधिक भयानक और घातक होता है।
    प्राचीन काल में नाग और सांप जातियां रहा करती थीं और नाग कन्याएं भी होती थीं। याद रहे कि सांप या नाग नहीं होते थे, बल्कि इनके बीच रहने वाले जो इनके विशेषज्ञ होते थे और सांपों से संबंधित झाड़ फूंक और उनके जहर से संबंधित काम करते थे। उन्हें सांप और नाग जातियां कहा जाता था और वह सर्प और नाग बाहुल्य क्षेत्र में रहा करते थे। नाग और सांपों की बहुत सी जातियां हुआ करती थीं। प्राचीन भारत के प्रसिद्ध और चर्चित नागों में वासुकी, कर्कोटक, तक्षक, कुलक, पद्म, महापद्म, शंखचूण, धर्मचक्र, अश्वसेन, शेषनाग जैसे प्रसिद्ध नाग सरदार थे तो वहीं प्रमुख नाग कन्याओं में उलूपी, कद्रू, अहिलवती, सुलोचना, मनसा, जया, विषहर, शामिलबारी, देव, दोतली, नागकन्याएं प्रमुख थीं। भगवान शिव की 5 नागकन्याएं थीं और उन्हीं पंच कन्याएं जो श्रावण महीने की शुक्ल पक्ष पंचमी को हुई थीं, के नाम पर नागपंचमी आज भी मनाई जाती है कद्रू से नाग और क्रोधवशा से सांपों की प्रजातियां उत्पन्न हुई।
    यह तो है नाग और सांप प्रजातियों की बात अब सीधे आते हैं कि सांपों से बचने के लिए क्या किया जाय, इसके लिए कुछ ऐसे पेड़, पौधे, जड़ी, बूटियां जैसे सर्प बूटी सर्पगंधा हैं, को लगाने पर सांप भाग जाते हैं और घर में प्रवेश नहीं करते हैं। मिट्टी का तेल का प्रयोग करने पर भी सांप और जहरीले जीव जंतु घर में प्रवेश नहीं करते। अंधेरी और नम जगह घर में नहीं होनी चाहिए, क्योंकि सांप गर्मी में वहीं पर छिप जाते हैं। जैसे अंधेरा, कोना, भूसा, खर पतवार, उपली रखने का स्थान पर बहुत सावधानी रखना चाहिए। हमेशा नाजा नाम की होम्योपैथिक दवा घर में रखना चाहिए।
    अगर सांप काट ले तो बिल्कुल घबराए नहीं। पहले देख कि विषैला सांप है या विषहीन। बिना समय गंवाये सबसे पास के सुविधाओं वाले अस्पताल में जायं। ध्यान रहे कि जितना ही शांत रहेंगे और स्थिर रहेंगे, सांप का विष उतना ही कम चढ़ेगा। अगर तेजी से भागेंगे एवं घबरा जाएंगे तो रक्त संचार बहुत तेज हो जाएगा जिसके साथ सांप का विष भी शरीर में तेजी से चढ़ेगा। पहले का मरीज को सोने न दें और तुरंत विषरोधी इंजेक्शन दिलायें। जब तक डॉक्टर के यहां न पहुंचे तब तक घाव को साबुन से साफ करें। घाव के ऊपर पट्टी बांधना एवं घी पिलाना भी लाभदायक होता है।
    अगर किसी ऐसे स्थान पर हैं जहां कोई भी चिकित्सा सुविधा उपलब्ध नहीं है तो झाड़—फूंक, देशी जड़ी बूटियां का और घी तथा काली मिर्च का नीम की पत्ती का और इस तरह किसी भी अन्य उपाय का प्रयोग कर सकते हैं। अगर मुंह में कोई घाव न हो तो उसको चूस कर निकल भी सकते हैं लेकिन इसमें बहुत सावधानी आवश्यक है। इससे व्यक्ति को मनोवैज्ञानिक मनोबल भी मिलता है। अधिकांश बार सांप हल्के से काटते हैं जिससे व्यक्ति मरता नहीं है। इन सब बातों का ध्यान रखना चाहिये नहीं तो कई बार घबराकर व्यक्ति विषहीन सांप के काटने से भी मर जाते हैं।
    सांपों के बारे में कुछ सच्चाई और किंवदंती जान लेना भी आवश्यक है। जैसे कि क्या सचमुच नाग कन्या होती है। विज्ञान इसको नहीं मानता लेकिन सच यही है कि नागकन्या होती हैं। जैसे अर्जुन ने उलूपी नाम की नाग कन्या और घटोत्कच ने अहिल्यावती नाम की नाग कन्या से विवाह किया था। अगला प्रश्न है— क्या नागों में मणि होती है। इस पर भी विज्ञान सही उत्तर नहीं देता है लेकिन सही उत्तर यही है कि नागों में मणि होती है जो हल्के नीले—श्वेत रंग की चमकदार होती है। मैंने स्वयं दो बार बांदा के जंगलों और एक बार जौनपुर में नाग की मणि देखी है लेकिन लाखों नागों में किसी एक में नागमणि होती है जो बहुत अधिक आयु के हो जाते हैं।
    नागमणि बहुत अधिक शक्तिशाली और धन संपदा देने वाला होता है। अगला प्रश्न है। क्या सांप बदला लेते हैं विज्ञान इसके बारे में नकारात्मक उत्तर देता है लेकिन यह सच है कि अनेक प्रत्यक्ष प्रमाण है कि नाग बदला लेते हैं। मैं खुद एक बार गांव में नाग मारा था तो उसकी नागिन कई दिनों तक मेरे पीछे पड़ी रही और एक बार पेड़ से कूदकर मेरे ऊपर आक्रमण कर दिया लेकिन मेरे पीछे चल रहे हैं। लोगों के चिल्लाने पर मैं बच गया और उसे मार डाला। अगला प्रश्न है— क्या सचमुच मंत्र शक्ति और जड़ी बूटियां से सांप का भी सुधर जाता है। इसका उत्तर निश्चित रूप से हां में है लेकिन सच्ची जानकारी होना चाहिये।
    एक प्रश्न यह भी है कि अगर सांप से आमना सामना हो तो उसको मार दें या छोड़ दें। मेरा मानना है कि सांप साक्षात काल के स्वरूप हैं और दुश्मन या काल को कभी भी छोड़ना नहीं चाहिए और मार देना चाहिए। हां अगर फण वाले नाग अर्थात कोबरा है तो उसको छोड़ा जा सकता है। अगला प्रश्न है— क्या राजा जन्मेजय आस्तिक मुनि और कश्यप का नाम लेने से सांप भाग जाते हैं तो इसका उत्तर है बिल्कुल। इसको करके आप देख सकते हैं। इन तीनों का नाम लेकर अगर नाग को भागने को कहते हैं तो वह भाग जाता है, कारण चाहे जो हो।
    वैसे एक बात जान लीजिए सांप साक्षात काल के रूप हैं, इसलिए जिसका काल आ जाता है, उसी को यह काटते हैं, इसीलिए महाकाल भगवान शिव ने इन्हें अपना आभूषण बना रखा है। नाग अर्थात कोबरा जल्दी बिना गलती के किसी को नहीं काटते और काटने के पहले फुफकार कर चेतावनी देते हैं लेकिन वाइपर करेत और रसल वाइपर कहीं भी किसी को भी बिना गलती के भी काट लेते हैं और कोई चेतावनी भी नहीं देते हैं।
    एक बात और है कि सभी सर्प प्रजातियां सारे संसार के विष को हवा द्वारा सोचती रहती हैं और संसार विषैला होने से बचा रहता है। इसके अलावा खेती बागवानी और मनुष्य के तमाम शत्रुओं को मारकर खा जाती हैं, अन्यथा अन्य जानवर जैसे चूहे इत्यादि बेकाबू हो जाते हैं। अगर विषैले सांप ने काट लिया है तो नीम की पत्ती कड़वी नहीं लगती और व्यक्ति दांत से जौ का दाना तोड़ नहीं पाता। यह पक्की पहचान है। सभी सांपों को जहर भगवान ने उनकी सुरक्षा के लिए दिया है, अन्यथा कब के वे समाप्त हो गए होते। दुनिया में कुछ ऐसे भी सांप होते हैं जो पेड़ों से छलांग दूर-दूर तक लगाते हैं तो लगता है कि वह उड़ रहे हैं। सांप की आंखों में लगातार नहीं देखना चाहिए, वरना व्यक्ति सम्मोहित हो जाता है।
    नाग पंचमी को विधि विधान से जो पूजा की जाती है। उसके द्वारा एक विचित्र सुगंध उत्पन्न होती है जिसकी सुगंध से सभी जहरीली सांप प्रजातियां घर और समाज से दूर खेतों और जंगलों में भाग जाती है यही नाग पंचमी की पूजा का महत्व है। किस प्रकार सर्प प्रजाति ने संपूर्ण दुनिया पर अपना अधिकार जमा रखा है और प्रकृति में अपने को बखूबी सुंदर ढंग से जल थल जंगली पेड़ पौधे हर जगह के लिए अनुकूलित कर लिया है। यह विश्व का सबसे आश्चर्यजनक प्राणी भी है। वहीं यह दुनिया का सबसे भयंकर प्राणी भी है जिसका प्रमाण यह है कि अचानक सांप के आगे आ जाने से व्यक्ति हक्का-बक्का हो जाता है। मैंने तो अपने जीवन में सैकड़ों विषैले सांपों को मारा है। सांप को मारने का सबसे अच्छा तरीका उसके सिर पर प्रहार करना होता है। अगर हल्का तेज प्रहार भी सिर पर पड़ गया तो सांप बेहोश हो जाता है या मर जाता है। अगर आप तेज दौड़ते हैं तो कोई सांप आपको पकड़ नहीं पाएगा, क्योंकि सांप के अधिकतम गति 15 से 25 किलोमीटर प्रति घंटा होती है और संकट पड़ने पर कोई भी व्यक्ति 30 से 35 किलोमीटर प्रति घंटे की गति से भाग लेता है। इस प्रकार सांप दुनिया का सबसे अद्भुत और डरावना जीव है।
    डा. दिलीप सिंह
    मौसम विज्ञानी/ज्योतिष शिरोमणि

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    600 बीमारी का एक ही दवा RENATUS NOVA

  • केशव मौर्य के सहारे भाजपा का ओबीसी दांव!

    केशव मौर्य के सहारे भाजपा का ओबीसी दांव!

    केशव मौर्य के सहारे भाजपा का ओबीसी दांव!

    गठन एवं सत्ता के संतुलन से 2027 की तैयारी
    भारतीय जनता पार्टी में उत्तर प्रदेश प्रदेश अध्यक्ष पद को लेकर पिछले कई महीनों से चल रहा मंथन अब निर्णायक मोड़ पर पहुंचता नजर आ रहा है। लोकसभा चुनाव 2024 में उत्तर प्रदेश में पार्टी को मिले अपेक्षाकृत कमजोर जनादेश के बाद संगठन के पुनर्गठन की जरूरत महसूस की जा रही है। राज्य में अब तक भूपेंद्र चौधरी के बाद किसी नए प्रदेश अध्यक्ष की घोषणा नहीं हो सकी है और इस विलंब को लेकर भाजपा कार्यकर्ताओं में सवाल भी उठने लगे हैं। इस बीच उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य की बढ़ती सक्रियता, दिल्ली में लगातार शीर्ष नेताओं से मुलाकातें और ओबीसी समीकरण को लेकर उनका नाम चर्चा के केंद्र में आ गया है। उत्तर प्रदेश में भाजपा का प्रदर्शन लोकसभा चुनाव में चिंताजनक रहा। जहां 2019 में भाजपा ने सहयोगियों सहित 64 सीटें जीती थीं, वहीं 2024 में यह संख्या घटकर 36 रह गई। इसमें भी भाजपा अकेले 33 सीटें जीत पायी जबकि सपा-कांग्रेस गठबंधन ने 43 सीटों पर कब्जा जमाकर स्पष्ट संकेत दे दिया कि विपक्ष की सामाजिक रणनीति ने भाजपा के परंपरागत वोट बैंक में सेंध लगाई है। खास तौर पर ओबीसी और दलित समुदाय के मतदाताओं का झुकाव सपा के पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फार्मूले की ओर गया।
    ऐसे में भाजपा के रणनीतिकारों को यह समझ में आ गया है कि यदि 2027 के विधानसभा चुनाव में पार्टी को जीत की हैट्रिक बनानी है तो संगठन को फिर से सशक्त करना होगा। यही वजह है कि पार्टी अब ऐसा चेहरा तलाश रही है जो न सिर्फ संगठनात्मक अनुभव रखता हो, बल्कि सामाजिक समीकरणों को साधने में भी सक्षम हो। इस समीकरण में सबसे उपयुक्त नाम एक बार फिर उभरकर आया है केशव प्रसाद मौर्य का। 8 जुलाई को केशव प्रसाद मौर्य की दिल्ली में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह से मुलाकातों ने चर्चाओं को हवा दी। यह मुलाकातें केवल शिष्टाचार नहीं मानी जा रही हैं, बल्कि इन्हें संगठन के पुनर्गठन और आगामी चुनावी रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है। खुद केशव मौर्य ने इस बात की पुष्टि की है कि इन बैठकों में 2027 की जीत की रणनीति पर चर्चा हुई। यह वही केशव मौर्य हैं जिनके नेतृत्व में 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 403 में से 312 सीटें जीतकर इतिहास रचा था। उस समय वे प्रदेश अध्यक्ष थे और उन्होंने पार्टी को जमीनी स्तर पर मजबूत करने का काम किया था।
    मौर्य की सबसे बड़ी ताकत यह है कि वे भाजपा के मूल कार्यकर्ता रहे हैं जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विश्व हिंदू परिषद से होते हुए पार्टी की मुख्यधारा में आए। उनका व्यक्तित्व एक साधारण कार्यकर्ता से लेकर उप मुख्यमंत्री तक का सफर तय करने वाले नेता का है जो पार्टी के जमीनी कार्यकर्ताओं के बीच बेहद लोकप्रिय हैं। यही वजह है कि संगठन को फिर से सक्रिय और ऊर्जावान बनाने के लिए उनके नाम पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है। केशव मौर्य का नाम भाजपा के लिए इस समय और भी ज्यादा प्रासंगिक हो जाता है, क्योंकि पार्टी को एक बार फिर ओबीसी समुदाय को अपने साथ मजबूती से जोड़ना है। भाजपा को अच्छी तरह से यह एहसास हो चुका है कि विपक्ष, खासकर सपा, ओबीसी वोट बैंक को खींचने की पूरी कोशिश में है। अखिलेश यादव ने पीडीए फार्मूले को जिस तरीके से पेश किया है, उसमें ओबीसी और दलित वर्ग को प्रमुखता दी गई है। ऐसे में भाजपा को जवाब उसी अंदाज में देना होगा और यह काम केशव मौर्य जैसे कद्दावर ओबीसी नेता ही कर सकते हैं जिनकी सामाजिक स्वीकार्यता व्यापक है।
    हालांकि प्रदेश अध्यक्ष पद पर फैसला केवल सामाजिक समीकरणों के आधार पर नहीं लिया जाएगा। इसके पीछे संगठन और सत्ता के बीच संतुलन की भी बड़ी भूमिका है। पार्टी सूत्रों का कहना है कि योगी आदित्यनाथ को 2027 में मुख्यमंत्री चेहरे के रूप में दोबारा प्रोजेक्ट किया जाना तय है लेकिन समय-समय पर पार्टी के अंदर से ऐसी आवाजें उठती रही हैं कि केशव मौर्य को भी सीएम पद का दावेदार घोषित किया जाना चाहिए। ऐसे में पार्टी के लिए यह जरूरी हो जाता है कि मौर्य को संगठन में लाकर उन्हें सत्ता की दौड़ से बाहर रखा जाय, ताकि योगी आदित्यनाथ का रास्ता साफ रहे। इस पूरी रणनीति के पीछे केंद्रीय नेतृत्व की सोच यह है कि पार्टी को एक ऐसा चेहरा चाहिये जो न सिर्फ सामाजिक समीकरणों को साधे बल्कि संगठन को भी धार दे। इस पैमाने पर केशव मौर्य खरे उतरते हैं। यही कारण है कि अमित शाह ने हाल ही में एक कार्यक्रम में मौर्य को ‘प्रिय मित्र’ कहकर संबोधित किया जबकि योगी आदित्यनाथ को ‘लोकप्रिय मुख्यमंत्री’ बताया। यह संकेत है कि पार्टी नेतृत्व दोनों नेताओं को संतुलित रूप से आगे बढ़ाना चाहता है।
    इस बीच भाजपा के भीतर और भी कई नामों पर विचार किया जा रहा है। ओबीसी वर्ग से स्वतंत्र देव सिंह, अमर पाल मौर्य, धर्मपाल सिंह लोधी, बीएल मौर्य और बाबूराम निषाद के नाम चर्चा में हैं। वहीं दलित समुदाय से बेबी रानी मौर्य का नाम भी सामने आया है। ब्राह्मण चेहरे के तौर पर पूर्व उप मुख्यमंत्री डॉ. दिनेश शर्मा, लक्ष्मीकांत वाजपेयी और केंद्रीय मंत्री जितिन प्रसाद के नामों पर विचार हो रहा है। यदि पार्टी पश्चिमी उत्तर प्रदेश को साधना चाहती है तो जितिन प्रसाद और महेश शर्मा जैसे नेता विकल्प हो सकते हैं।
    हालांकि भाजपा की रणनीति यह भी रही है कि पार्टी आम तौर पर उन नेताओं को अहम पद देती है जिनका नाम सार्वजनिक रूप से ज्यादा चर्चा में नहीं होता। हाल ही में राजस्थान, मध्य प्रदेश और दिल्ली में मुख्यमंत्री पद की नियुक्तियों ने यही साबित किया है। ऐसे में यह कहना जल्दबाजी होगी कि मौर्य का नाम ही फाइनल है लेकिन यह जरूर है कि वे इस रेस में सबसे आगे हैं।प्रदेश अध्यक्ष की नियुक्ति को लेकर भाजपा के वरिष्ठ नेता डॉ. दिनेश शर्मा ने स्पष्ट किया है कि पार्टी की एक तय प्रक्रिया होती है। पहले सभी प्रदेश इकाइयों के चुनाव कराए जाते हैं, फिर राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव होता है और उसके बाद प्रदेश अध्यक्षों की नियुक्ति होती है। हालांकि उन्होंने यह भी जोड़ा कि अब प्रदेशों में लगभग चुनाव हो चुके हैं, इसलिए राष्ट्रीय अध्यक्ष और प्रदेश अध्यक्षों की नियुक्ति किसी भी समय हो सकती है।
    उत्तर प्रदेश में प्रदेश अध्यक्ष पद को लेकर देरी के पीछे चार प्रमुख कारण माने जा रहे हैं पहला, नया अध्यक्ष किस जाति या वर्ग से होगा। दूसरा, क्या वह पूर्वांचल से होगा या पश्चिम यूपी से। तीसरा, क्या वह विपक्ष के पीडीए समीकरण को तोड़ पाएगा और चौथा, क्या मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ उस नाम से सहज होंगे। सूत्रों की मानें तो पार्टी इन चारों सवालों पर गहन मंथन कर रही है और जल्द ही निर्णय लिया जाएगा। अभी तक पार्टी की रणनीति यही रही है कि 2026 के पंचायत चुनाव और 2027 के विधानसभा चुनावों के लिए संगठन को पहले से तैयार किया जाय, इसीलिये प्रदेश अध्यक्ष की नियुक्ति को लेकर पार्टी जल्दबाजी नहीं दिखा रही है लेकिन यह भी सच है कि संगठनात्मक स्तर पर खालीपन लंबे समय तक नहीं चल सकता। कार्यकर्ताओं को दिशा देने के लिए प्रदेश अध्यक्ष की भूमिका बेहद अहम होती है। यही वजह है कि अब पार्टी पर दबाव बढ़ता जा रहा है कि वह जल्द से जल्द इस नियुक्ति को अंतिम रूप दे।
    अगर केशव मौर्य को दोबारा प्रदेश अध्यक्ष बनाया जाता है तो भाजपा एक साथ कई निशाने साध सकेगी एक, संगठन को अनुभव और जनाधार से लैस नेतृत्व मिलेगा। दो, ओबीसी समाज को संदेश जाएगा कि पार्टी उनके भरोसे पर कायम है और तीन, सत्ता और संगठन के बीच संतुलन बना रहेगा जिससे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व को चुनौती नहीं मिलेगी। अब सबकी निगाहें दिल्ली पर हैं जहां से भाजपा के बड़े फैसले होते हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या भाजपा एक बार फिर केशव मौर्य पर भरोसा जताएगी या किसी नए चेहरे को सामने लाकर चौंकाएगी लेकिन इतना तय है कि प्रदेश अध्यक्ष की नियुक्ति भाजपा की 2027 की रणनीति का पहला बड़ा संकेत होगी। संभव है कि यह संकेत संगठन में नई ऊर्जा और विपक्ष को सीधी चुनौती देने की दिशा में पहला कदम हो।
    अजय कुमार
    वरिष्ठ पत्रकार उत्तर प्रदेश
    मो.नं. 9335566111

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  • विश्व की सम्पूर्ण ऊर्जा ही शिवलिंग की प्रतीक

    विश्व की सम्पूर्ण ऊर्जा ही शिवलिंग की प्रतीक

    विश्व की सम्पूर्ण ऊर्जा ही शिवलिंग की प्रतीक

    इं. शांडिल्य दुर्गेश
    सनातन धर्म में आस्था, विश्वास तथा गूढ़ व विज्ञान सम्मत जानकारी रखने वाले इं. शांडिल्य दुर्गेश ने शिवलिंग के आध्यात्मिक व वैज्ञानिक पहलू में प्रभावी साम्य स्थापित करने का एक स्पष्ट प्रयास किया है। उनके अनुसार वास्तव में यह सम्पूर्ण सृष्टि बिंदु-नाद स्वरूप है।बिंदु शक्ति है और नाद शिव। यही सब का आधार है- बिंदु एवं नाद अर्थात ऊर्जा (एनर्जी) और ध्वनि (साउंड) यह दो सम्पूर्ण ब्रह्मांड का आधार है। शिवलिंग भगवान शिव की निराकार और साकार प्रकृति को दर्शाता है। शिवलिंग की बनावट और पूजा पद्धति प्राचीन भारतीय ज्ञान व आस्था को आधुनिक विज्ञान के साथ जोड़ती है। शिवलिंग पंचमहाभूत—पृथ्वी,जल,अग्नि,वायु और आकाश का प्रतीक है। लिंग पुराण में शिवलिंग को “परं ज्योतिः” कहा गया है जो सृष्टि के मूल और पंचमहाभूतों के संनादन को दर्शाता है। शिवलिंग का अंडाकार आकार ब्रह्मांड की संरचना से मेल खाता है। जैसा कि वैज्ञानिक अध्ययनों में “कॉस्मिक एग” के रूप में वर्णित है। शिवलिंग की ज्योति और निराकार प्रकृति ब्रह्मांडीय ऊर्जा (डार्क एनर्जी) से मेल खाती है। यह क्वांटम स्तर पर ऊर्जा के संनादन को दर्शाता है।आइंस्टीन का सिद्धांत और प्लांक की क्वांटम थ्योरी शिवलिंग को ऊर्जा और पदार्थ के संनादन के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत करते हैं। शिवलिंग का शीर्ष ऊर्जा (तरंग) और आधार, पदार्थ (कण) को दर्शाता है जो क्वांटम भौतिकी की “वेव-पार्टिकल ड्यूएलिटी” (हाइजेनबर्ग) से मेल खाता है। शिवलिंग अद्वैत वेदांत में शिव (चेतना) और शक्ति (प्रकृति) के अभेद को दर्शाता है।यह ध्यान और कुंडलिनी जागरण का माध्यम है जो मन को समाधि की ओर ले जाता है।शिव पुराण (विद्येश्वर संहिता) में इसे “सर्वं विश्वं समाहितम्” कहा गया है। आदि शंकराचार्य के अद्वैत वेदांत में शिवलिंग ब्रह्म का प्रतीक है जो निर्गुण और सगुण दोनों रूपों में मौजूद है।सांख्य दर्शन में यह पुरुष (शिव) और प्रकृति के संतुलन को दर्शाता है।
    शिवलिंग का गोलाकार शीर्ष समय की चक्रीय प्रकृति को व्यक्त करता है जो भारतीय दर्शन में कालचक्र के रूप में वर्णित है।शिवलिंग पूजा में “ॐ” और मंत्रों का उच्चारण 432 हर्ट्ज़ की आवृत्ति उत्पन्न करता है जो प्रकृति की मूल आवृत्ति मानी जाती है। यह मस्तिष्क में अल्फा तरंगों को बढ़ाता है जिससे शांति और एकाग्रता बढ़ती है। घंटियों का उपयोग रेजोनेंस पैदा करता है जो पर्यावरण और शरीर में ऊर्जा संतुलन को प्रोत्साहित करता है। कार्ल जंग के अनुसार शिवलिंग जैसे प्रतीक अवचेतन मन को प्रभावित करते हैं। मंत्र जाप और ध्यान से डोपामाइन और सेरोटोनिन का स्तर बढ़ता है जो मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाता है। मस्तिष्क में शांति और एकाग्रता बढ़ती है जो न्यूरोसाइंस में सिद्ध है। महाशिवरात्रि, श्रावण मास, सोमवार आदि जैसे शुभ अवसरों पर सामूहिक पूजा सामाजिक एकता को बढ़ावा देती है जो सामूहिक चेतना का प्रतीक है। शिवलिंग पर जल चढ़ाना जल की पवित्रता और संरक्षण के महत्व को दर्शाता है। प्राचीन भारत में शिव मंदिर जलाशयों के पास बनाए जाते थे जो जल के महत्व को प्रदर्शित करते हैं। शिवलिंग का आधार प्रकृति का प्रतीक है जो पर्यावरण संरक्षण के प्रति भारतीय दर्शन की गहरी समझ को दर्शाता है।
    गोस्वामी तुलसीदास ने भी रामेश्वरम में प्रभु श्रीराम द्वारा शिवलिंग स्थापना का वर्णन किया है जो शिवलिंग पूजन के महत्ता को स्पष्ट करता है। भारत के 12 ज्योतिर्लिंग शिव की दिव्य ऊर्जा के केंद्र हैं जो आध्यात्मिक ऊर्जा क्षेत्र के प्रतीक हैं।इससे भक्तों को ईश्वर के साथ एकात्मकता का अनुभव होता है। “लिंगं विश्वस्य संनादति यत्र सर्वं प्रतिष्ठितम्। शिवलिंगं परं ज्योतिः सर्वं तस्मिन् समाहितम्।” (लिंग पुराण)।वास्तव में शिवलिंग प्राचीन भारतीय दर्शन और आधुनिक विज्ञान का अनूठा संगम है। आध्यात्मिक और दार्शनिक रूप से यह अनंतता और सृष्टि के रहस्य को व्यक्त करता है जबकि मनोवैज्ञानिक रूप से यह शांति और एकाग्रता प्रदान करता है। शिवलिंग हमें प्रकृति,विज्ञान और अध्यात्म के बीच संतुलन की सीख देता है जो आज के इस तकनीकी और आधुनिक युग में भी प्रासंगिक है।

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  • फिल्म “खेल पासपोर्ट का” अगस्त में रिलीज़ होगी, ट्रेलर के व्यूज़ 1 मिलियन पार

    फिल्म “खेल पासपोर्ट का” अगस्त में रिलीज़ होगी, ट्रेलर के व्यूज़ 1 मिलियन पार

    फिल्म “खेल पासपोर्ट का” अगस्त में रिलीज़ होगी, ट्रेलर के व्यूज़ 1 मिलियन पार

    मुंबई। बॉलीवुड के जाने माने फिल्म निर्देशक अर्जुन राज की फिल्म “खेल पासपोर्ट का” का ट्रेलर हाल ही में रिलीज़ हुआ है और इसे 1 मिलियन से अधिक व्यूज़ मिल चुके हैं।

    फिल्म की कहानी
    फिल्म की कहानी आम आदमी के जीवन से जुड़ी हुई है। एक लड़का इंडिया से बाहर जाना चाहता है नौकरी करने के लिए और मुंबई आकर पासपोर्ट ट्रैप में फंस जाता है। इस पासपोर्ट ट्रैप से जुड़ी कहानी पर आधारित है फिल्म “खेल पासपोर्ट का”।
    निर्देशक अर्जुन राज, मुख्य कलाकार हेरम्ब त्रिपाठी, राजवंत शर्मा, गौरी शंकर, आरिफ शहडोल, संगीत हृजु रॉय, गीत रवि बॉसनेट, पीआरओ संजय भूषण पटियाला, रिलीज़ तिथि अगस्त 2025।

    अर्जुन राज का स्टेटमेंट
    “हमें खुशी है कि फिल्म “खेल पासपोर्ट का” का ट्रेलर दर्शकों को पसंद आया है और इसे 1 मिलियन से अधिक व्यूज़ मिल चुके हैं। हमें उम्मीद है कि फिल्म अगस्त में रिलीज़ होने पर दर्शकों को आकर्षित करेगी।”
    फिल्म “खेल पासपोर्ट का” एक क्राइम थ्रिलर है जो दर्शकों को आकर्षित करने के लिए तैयार है।

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  • संघ प्रमुख 75 में ‘सेवानिवृत्ति’ के पक्ष में तो मोदी क्यों अपवाद?

    संघ प्रमुख 75 में ‘सेवानिवृत्ति’ के पक्ष में तो मोदी क्यों अपवाद?

    संघ प्रमुख 75 में ‘सेवानिवृत्ति’ के पक्ष में तो मोदी क्यों अपवाद?

    राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने हाल ही में नागपुर में एक पुस्तक विमोचन समारोह के दौरान तल्ख टिप्पणी किया कि 75 वर्ष की आयु पूरी होने पर नेताओं को सेवानिवृत्त हो जाना चाहिए और नई पीढ़ी को अवसर देना चाहिए। यह बयान उन्होंने दिवंगत आरएसएस विचारक मोरोपंत पिंगले के हवाले से दिया जिन्होंने कथित तौर पर कहा था कि 75 वर्ष की आयु में शॉल ओढ़ाए जाने का अर्थ है कि व्यक्ति को अब रुक जाना चाहिए और दूसरों को आगे आने देना चाहिए। भागवत का यह बयान, जो सामान्य प्रतीत होता है, ने भारतीय राजनीति में तीव्र चर्चा को जन्म दिया है, विशेष रूप से इसलिए क्योंकि यह बयान ऐसे समय में आया है जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और स्वयं भागवत, दोनों सितंबर 2025 में 75 वर्ष के हो जाएंगे। इस बयान ने विपक्षी दलों को यह सवाल उठाने का अवसर दिया कि क्या यह टिप्पणी मोदी के लिए एक सूक्ष्म संदेश है या यह केवल एक सामान्य वैचारिक सिद्धांत की पुनरावृत्ति है।
    सबसे पहले बता दें कि भागवत का यह बयान कोई नया नहीं है। 2019 में भी उन्होंने इसी तरह की टिप्पणी की थी लेकिन तब उन्होंने स्पष्ट किया था कि नरेंद्र मोदी इस नियम से अपवाद हैं, क्योंकि उनकी नेतृत्व क्षमता और प्रासंगिकता असाधारण है। इस बार हालांकि भागवत ने ऐसा कोई अपवाद स्पष्ट नहीं किया, जिससे यह सवाल उठता है कि क्या उनका दृष्टिकोण बदल गया है। यह बयान इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और आरएसएस के बीच संबंधों को लेकर चर्चा को हवा देता है। बीजेपी जो आरएसएस की वैचारिक शाखा मानी जाती है, में पहले भी 75 वर्ष की आयु सीमा का अनौपचारिक नियम रहा है जिसके तहत लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, जसवंत सिंह जैसे वरिष्ठ नेताओं को सक्रिय राजनीति से हटाकर मार्गदर्शक मंडल में शामिल किया गया था लेकिन नरेंद्र मोदी के मामले में इस नियम को लागू करने की संभावना पर सवाल उठ रहे हैं, क्योंकि उनकी लोकप्रियता, वैश्विक कद और पार्टी पर पकड़ अभी भी मजबूत है।
    भागवत का यह बयान विपक्षी दलों के लिए एक सुनहरा अवसर बन गया है। कांग्रेस के नेता जयराम रमेश ने तंज कसते हुए कहा कि यह बयान मोदी के लिए एक ‘घर वापसी’ का संदेश है और शिवसेना (यूबीटी) के संजय राउत ने इसे सीधे तौर पर मोदी के लिए संदेश के रूप में व्याख्या की। राउत ने यह भी उल्लेख किया कि मोदी ने स्वयं इस आयु सीमा के नियम को लागू किया था और अब यह देखना बाकी है कि क्या वह इसे स्वयं पर लागू करेंगे। आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल ने भी पिछले साल इस मुद्दे को उठाया था, जब उन्होंने भागवत को पत्र लिखकर पूछा था कि क्या वह बीजेपी के इस नियम से सहमत हैं, जिसके तहत 75 वर्ष से अधिक आयु के नेताओं को सेवानिवृत्त किया जाता है। विपक्ष की यह रणनीति स्पष्ट रूप से बीजेपी और आरएसएस के बीच संभावित मतभेदों को उजागर करने की कोशिश है, ताकि सत्तारूढ़ गठबंधन में दरार पैदा की जा सके।
    हालांकि बीजेपी ने इस बयान को खारिज करते हुए कहा है कि पार्टी के संविधान में 75 वर्ष की आयु सीमा का कोई औपचारिक नियम नहीं है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने मई 2023 में स्पष्ट किया था कि मोदी 2029 तक नेतृत्व करते रहेंगे और सेवानिवृत्ति की अफवाहों में कोई सच्चाई नहीं है। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने भी इस दावे का खंडन किया कि भागवत का बयान मोदी के लिए था और इसे सामान्य टिप्पणी बताया। यह स्पष्ट है कि बीजेपी इस मुद्दे को दबाने की कोशिश कर रही है, क्योंकि मोदी की लोकप्रियता और नेतृत्व पार्टी के लिए अभी भी अपरिहार्य हैं।
    दूसरी ओर भागवत का बयान स्वयं उनके लिए भी प्रासंगिक है, क्योंकि वह भी 75 वर्ष के हो रहे हैं। आरएसएस में कोई औपचारिक सेवानिवृत्ति की आयु सीमा नहीं है और पिछले सर संघचालकों ने तब तक पद संभाला, जब तक उनकी शारीरिक स्थिति अनुमति देती थी। उदाहरण के लिए राज्जू भैया और के.एस. सुदर्शन ने 78 वर्ष की आयु में स्वास्थ्य कारणों से पद छोड़ा जबकि बालासाहेब देवरस 79 वर्ष तक सर संघचालक रहे। इस संदर्भ में भागवत का बयान उनके अपने भविष्य के बारे में भी सवाल उठाता है। क्या वह स्वयं इस सिद्धांत का पालन करेंगे या यह केवल एक वैचारिक टिप्पणी थी? आरएसएस के सूत्रों ने इस बयान को हल्का करने की कोशिश की है, यह कहते हुए कि यह केवल पिंगले के हास्यप्रिय स्वभाव को दर्शाने वाली कहानी थी, न कि कोई नीतिगत सुझाव।
    इस बयान का समय भी महत्वपूर्ण है। यह बयान ऐसे समय में आया है, जब आरएसएस अपनी स्थापना का शताब्दी वर्ष मना रहा है और बीजेपी 2024 के लोकसभा चुनावों के बाद अपनी स्थिति को मजबूत करने में जुटी है। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि यह बयान आरएसएस और बीजेपी के बीच शक्ति संतुलन को लेकर एक सूक्ष्म संदेश हो सकता है। 2024 के चुनावों से पहले भी दोनों संगठनों के बीच कुछ तनाव की खबरें थीं, विशेष रूप से जब बीजेपी अध्यक्ष जे.पी. नड्डा ने कहा था कि बीजेपी को अब आरएसएस की जरूरत नहीं है। भागवत के इस बयान को कुछ लोग आरएसएस की वैचारिक प्रभुता को पुनः स्थापित करने की कोशिश के रूप में देख रहे हैं।
    इसके अलावा यह बयान भारतीय राजनीति में नेतृत्व परिवर्तन और उत्तराधिकार के व्यापक सवाल को भी उठाता है। बीजेपी में मोदी के बाद नेतृत्व की दौड़ में अमित शाह, नितिन गडकरी और देवेंद्र फडणवीस जैसे नाम उभर रहे हैं। भागवत का बयान, चाहे वह सामान्य हो या लक्षित, इस चर्चा को और हवा देता है कि क्या बीजेपी में अब एक नई पीढ़ी को तैयार करने का समय आ गया है। हालांकि मोदी की वैश्विक छवि और पार्टी पर उनकी मजबूत पकड़ को देखते हुये उनके सेवानिवृत्त होने की संभावना कम लगती है, जब तक कि वह स्वयं इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाते।
    लब्बोलुआब यह है कि मोहन भागवत का यह बयान एक साधारण वैचारिक टिप्पणी से कहीं अधिक है। यह न केवल बीजेपी और आरएसएस के बीच संबंधों की जटिलता को दर्शाता है, बल्कि भारतीय राजनीति में उम्र, नेतृत्व, और उत्तराधिकार जैसे मुद्दों पर भी प्रकाश डालता है। विपक्ष इसे एक अवसर के रूप में देख रहा है जबकि बीजेपी इसे खारिज करने की कोशिश कर रही है। भागवत का यह बयान, चाहे वह सामान्य हो या लक्षित, भारतीय राजनीति में एक नए विमर्श को जन्म दे चुका है और इसका प्रभाव आने वाले महीनों में और स्पष्ट होगा।
    अजय कुमार
    वरिष्ठ पत्रकार उत्तर प्रदेश
    मो.नं. 9335566111

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  • यमन में फंसी निमिषा प्रिया फांसी नहीं, हमदर्दी की हकदार

    यमन में फंसी निमिषा प्रिया फांसी नहीं, हमदर्दी की हकदार

    यमन में फंसी निमिषा प्रिया फांसी नहीं, हमदर्दी की हकदार

    केरल के पलक्कड़ जिले के कोल्लेंगोडे की रहने वाली निमिषा प्रिया की कहानी उन सपनों से शुरू होती है जो गरीबी और मजबूरी के बीच पलते हैं। 19 साल की उम्र में, 2008 में निमिषा ने अपने परिवार की आर्थिक स्थिति सुधारने का सपना देखा। उनकी मां, प्रेमा कुमारी, कोच्चि में घरेलू सहायिका थीं और परिवार की माली हालत इतनी कमजोर थी कि निमिषा की पढ़ाई का खर्च उठाना भी मुश्किल था। नर्सिंग कोर्स पूरा करने के बाद निमिषा को यमन में नर्सों के लिए अच्छे अवसरों की जानकारी मिली। यमन उस समय गृहयुद्ध की चपेट में नहीं था और वहां नौकरी की संभावनाएं थीं। सुनहरे भविष्य की उम्मीद लिए निमिषा ने यमन की राजधानी सना का रुख किया।
    सना के एक सरकारी अस्पताल में निमिषा को नर्स की नौकरी मिल गई। मेहनत और लगन से उन्होंने अपने काम में जगह बनाई। 2011 में वे भारत लौटीं और टॉमी थॉमस, एक ऑटो ड्राइवर, से शादी की। शादी के बाद निमिषा और टॉमी यमन लौट गए। निमिषा ने नर्सिंग जारी रखी जबकि टॉमी को एक इलेक्ट्रिशियन के असिस्टेंट की नौकरी मिली। 2012 में, उनकी एक बेटी हुई। सब कुछ ठीक चल रहा था लेकिन 2014 में यमन में गृहयुद्ध शुरू हो गया। आर्थिक तंगी और वीजा प्रतिबंधों के कारण टॉमी अपनी बेटी के साथ भारत लौट आये लेकिन निमिषा यमन में रह गईं ताकि परिवार को आर्थिक सहारा दे सकें।
    यमन में रहते हुये निमिषा ने अपना क्लिनिक खोलने का सपना देखा। यमनी कानून के अनुसार विदेशी नागरिक को क्लिनिक खोलने के लिए स्थानीय साझेदार की जरूरत थी। यहीं उनकी जिंदगी में तलाल अब्दो महदी की एंट्री हुई। तलाल एक यमनी नागरिक था जो निमिषा के अस्पताल में अक्सर आता था। उसने निमिषा की मदद करने का वादा किया। निमिषा ने उसे 6 लाख यमनी रियाल दिए ताकि क्लिनिक के लिए परमिट और जगह का इंतजाम हो सके। शुरू में सब ठीक रहा। क्लिनिक चल निकला और निमिषा को अच्छी कमाई होने लगी लेकिन जल्द ही तलाल का रवैया बदल गया।
    2015 में यमन में गृहयुद्ध की स्थिति बिगड़ने के साथ तलाल ने निमिषा को प्रताड़ित करना शुरू कर दिया। उसने क्लिनिक के शेयरहोल्डर के रूप में अपना नाम जोड़ लिया और आय का बड़ा हिस्सा हड़पने की कोशिश की। निमिषा का आरोप था कि तलाल ने फर्जी दस्तावेजों के जरिए खुद को उनका पति बताना शुरू किया। उसने निमिषा का पासपोर्ट जब्त कर लिया, उन्हें धमकाया और शारीरिक व मानसिक शोषण किया। निमिषा ने बताया कि तलाल नशे में उन्हें मारता-पीटता था, क्लीनिक के कर्मचारियों के सामने अपमानित करता था और रात में अपने दोस्तों को घर लाकर उनसे यौन संबंध बनाने के लिए मजबूर करता था। निमिषा ने कई बार यमन की सड़कों पर रात बिताई, क्योंकि वहां महिलाओं का रात में अकेले बाहर रहना असामान्य था।
    2016 में निमिषा ने हिम्मत जुटाकर सना पुलिस में तलाल की शिकायत की लेकिन पुलिस ने उल्टा उन्हें ही 6 दिन के लिए जेल में डाल दिया। जेल से छूटने के बाद, एक जेल वार्डन ने निमिषा को सलाह दी कि वे तलाल को बेहोशी का इंजेक्शन देकर अपना पासपोर्ट वापस ले सकती हैं। जुलाई 2017 में निमिषा ने ऐसा ही किया। उनकी मंशा तलाल को मारने की नहीं थी, वे बस अपना पासपोर्ट वापस चाहती थीं ताकि यमन छोड़कर भारत लौट सकें। लेकिन गलती से दवा की खुराक ज्यादा हो गई और तलाल की मौत हो गई।
    तनाव में निमिषा ने एक स्थानीय महिला, हनान की मदद मांगी। हनान ने सुझाव दिया कि शव के टुकड़े करके पानी की टंकी में फेंक दिया जाय। अगस्त 2017 में, पुलिस ने निमिषा और हनान को गिरफ्तार कर लिया। यमनी अदालत ने 2018 में निमिषा को हत्या का दोषी ठहराया और 2020 में मौत की सजा सुनाई। हनान को उम्रकैद की सजा मिली। 2023 में हूती विद्रोहियों की सर्वोच्च न्यायिक परिषद ने सजा को बरकरार रखा। यमन के राष्ट्रपति रशद अल-अलीमी ने 2024 में सजा को मंजूरी दी। हालांकि कुछ रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि हूती विद्रोहियों ने यह फैसला लिया।
    निमिषा की सजा के बाद उनके परिवार और ‘सेव निमिषा प्रिया इंटरनेशनल एक्शन काउंसिल’ ने उन्हें बचाने की हरसंभव कोशिश की। यमन में शरिया कानून के तहत ‘ब्लड मनी’ (दियात) का प्रावधान है जिसमें मृतक के परिवार को मुआवजा देकर सजा माफ कराई जा सकती है। तलाल के परिवार ने 5 करोड़ यमनी रियाल (लगभग 1.52 करोड़ रुपये) की मांग किया लेकिन बातचीत सफल नहीं हुई। भारत सरकार ने भी यमनी प्रशासन से संपर्क साधा लेकिन हूती विद्रोहियों के साथ औपचारिक राजनयिक संबंधों की कमी और यमन में गृहयुद्ध ने राह मुश्किल कर दी।
    निमिषा की मां, प्रेमा कुमारी पिछले एक साल से यमन में अपनी बेटी को बचाने की कोशिश कर रही हैं। भारत के सुप्रीम कोर्ट में 14 जुलाई 2025 को एक याचिका पर सुनवाई होनी है जिसमें केंद्र सरकार से हस्तक्षेप की मांग की गई है लेकिन 16 जुलाई 2025 को निमिषा को फांसी दी जानी है। यमन में फांसी का तरीका गोली मारना है जिसमें दोषी को कंबल में लपेटकर पीठ पर गोलियां चलाई जाती हैं।
    निमिषा की कहानी केवल एक हत्या की नहीं, बल्कि एक ऐसी महिला की है जो अपने सपनों को पूरा करने निकली लेकिन धोखे, शोषण और परिस्थितियों के जाल में फंस गई। उनके परिवार, मानवाधिकार कार्यकर्ता और भारत सरकार अब भी उनकी जान बचाने की आखिरी कोशिश में जुटे हैं।
    संजय सक्सेना
    वरिष्ठ पत्रकार लखनऊ
    9454105568

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    600 बीमारी का एक ही दवा RENATUS NOVA

  • विपक्ष की सियासत का अखाड़ा बनतीं अदालतें

    विपक्ष की सियासत का अखाड़ा बनतीं अदालतें

    विपक्ष की सियासत का अखाड़ा बनतीं अदालतें

    भारत का सर्वोच्च न्यायालय, जिसे संविधान का रक्षक और न्याय का अंतिम गढ़ माना जाता है, अक्सर विपक्षी दलों की याचिकाओं को गंभीरता से लेता है। यह सवाल बार-बार उठता है कि आखिर क्यों अदालत ऐसी याचिकाओं को इतना महत्व देती है जिनमें कई बार सियासत की बू आती है। जनता द्वारा चुनावों में ठुकराए गए नेता और राजनीतिक दल अदालतों के जरिए अपनी खोई हुई साख को पुनर्जनन देने की कोशिश करते हैं। यह एक ऐसा जटिल मसला है जिसमें न्याय, लोकतंत्र और राजनीति का त्रिकोण उभरकर सामने आता है। सर्वोच्च न्यायालय का मूल उद्देश्य संविधान की रक्षा करना और नागरिकों के मौलिक अधिकारों को सुनिश्चित करना है। संविधान का अनुच्छेद 32 अदालत को मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के मामलों में रिट याचिकाओं के जरिये हस्तक्षेप करने की शक्ति देता है। इसके अलावा जनहित याचिकाओं (पीआईएल) ने अदालत को एक व्यापक मंच प्रदान किया है जहां न केवल व्यक्ति, बल्कि समूह या संगठन भी सार्वजनिक महत्व के मुद्दों को उठा सकते हैं। विपक्षी दल, जो अक्सर सत्ता से बाहर होते हैं, इन प्रावधानों का उपयोग करके अपनी बात को जनता और सरकार तक पहुंचाने की कोशिश करते हैं। लेकिन क्या यह सिर्फ सियासत है या इसके पीछे कोई गहरा लोकतांत्रिक मकसद भी छिपा है?
    विपक्षी दलों की याचिकाएं कई बार उन मुद्दों पर केंद्रित होती हैं, जो जनता के व्यापक हित से जुड़े होते हैं। उदाहरण के लिए, चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता, सरकारी नीतियों में जवाबदेही या मौलिक अधिकारों का उल्लंघन जैसे विषयों पर याचिकाएं दायर की जाती हैं। ये याचिकाएं भले ही राजनीति से प्रेरित दिखें लेकिन कई बार ये सरकार की जवाबदेही को सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। मिसाल के तौर पर सर्वोच्च न्यायालय ने हाल के वर्षों में कई ऐसे मामलों में हस्तक्षेप किया है जहां विपक्षी दलों ने चुनावी बांड योजना, मतदाता सूची में गड़बड़ी या सरकारी योजनाओं में भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों को उठाया। इनमें से कुछ याचिकाओं ने सरकार को नीतिगत बदलाव करने के लिए मजबूर किया जिससे लोकतंत्र को मजबूती मिली।
    हालांकि यह भी सच है कि कई बार विपक्षी दल ऐसी याचिकाओं का इस्तेमाल अपनी राजनीतिक छवि को चमकाने के लिए करते हैं। जनता द्वारा चुनावों में हारने के बाद ये दल अदालतों को एक मंच के रूप में देखते हैं जहां वे अपनी प्रासंगिकता साबित कर सकते हैं। उदाहरण के लिये अगर कोई विपक्षी दल किसी नीति के खिलाफ याचिका दायर करता है और सर्वोच्च न्यायालय उस पर सुनवाई करता है तो यह दल मीडिया और जनता के बीच यह संदेश देने में सफल हो जाता है कि उनकी बात में दम है। भले ही याचिका खारिज हो जाय लेकिन सुनवाई की प्रक्रिया ही उनके लिए एक नैतिक जीत बन जाती है। यह एक तरह से सियासत का नया अखाड़ा बन गया है जहां अदालतें अनजाने में राजनीतिक दलों के लिए एक मंच प्रदान कर देती हैं।
    सर्वोच्च न्यायालय का रुख भी इस मामले में विचारणीय है। अदालत का यह दायित्व है कि वह हर उस याचिका पर विचार करें जिसमें संवैधानिक या सार्वजनिक महत्व का प्रश्न उठाया गया हो। कई बार ऐसी याचिकाएं, जो सतह पर सियासी लगती हैं, वास्तव में संवैधानिक सिद्धांतों या कानूनी प्रक्रियाओं से जुड़ी होती हैं। उदाहरण के लिये 2018 में सर्वोच्च न्यायालय ने राजनीति के अपराधीकरण पर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया जिसमें राजनीतिक दलों को अपने प्रत्याशियों के आपराधिक रिकॉर्ड को सार्वजनिक करने का आदेश दिया गया। यह आदेश एक विपक्षी दल की याचिका के आधार पर आया था लेकिन इसका प्रभाव पूरे राजनीतिक तंत्र पर पड़ा। ऐसे में, यह कहना गलत होगा कि हर याचिका सिर्फ सियासत से प्रेरित होती है।
    दूसरी ओर यह भी देखा गया है कि कुछ याचिकाएं केवल प्रचार के लिए दायर की जाती हैं। ऐसी याचिकाएं, जिनमें कोई ठोस कानूनी आधार नहीं होता, अदालत का समय और संसाधन बर्बाद करती हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने कई बार ऐसी याचिकाओं को खारिज करते हुए याचिकाकर्ताओं पर जुर्माना भी लगाया है। फिर भी अदालत की उदारता और पीआईएल की सुगम प्रक्रिया के चलते ऐसी याचिकाओं की बाढ़ नहीं रुकती। यह एक दोधारी तलवार है। एक ओर अदालत का दरवाजा हर नागरिक के लिए खुला रखना जरूरी है, ताकि वास्तविक अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई जा सके; दूसरी ओर इस प्रक्रिया का दुरुपयोग सियासी मकसदों के लिए हो रहा है।
    विपक्षी दलों के लिए अदालतें एक तरह से वैकल्पिक मंच बन गई हैं जहां वे सरकार को कठघरे में खड़ा कर सकते हैं। खासकर तब, जब संसद में उनकी आवाज दब रही हो या जनता का समर्थन कम हो। लेकिन यह प्रक्रिया हमेशा नकारात्मक नहीं होती। कई बार ऐसी याचिकाओं ने सरकार को जवाबदेह बनाया है। मिसाल के तौर पर पर्यावरण, शिक्षा या स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर विपक्षी दलों की याचिकाओं ने नीतिगत बदलावों को प्रेरित किया है। फिर भी यह सवाल बना रहता है कि क्या अदालतों को इतनी आसानी से सियासी खेल का हिस्सा बनने देना चाहिए?
    सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका न केवल कानून की व्याख्या करना है, बल्कि लोकतंत्र के संतुलन को बनाए रखना भी है। अगर अदालत हर याचिका को खारिज करने लगे तो यह संवैधानिक अधिकारों के हनन का रास्ता खोल सकता है लेकिन अगर वह हर याचिका को गंभीरता से लेती रहे तो सियासी दलों को अपनी राजनीति चमकाने का एक आसान रास्ता मिल जाता है। इस स्थिति में अदालत को एक संतुलन बनाना होगा। शायद याचिकाओं की जांच के लिए और सख्त मानदंड तय करने की जरूरत है, ताकि केवल वही मामले सुनवाई के लिए स्वीकार हों जो वास्तव में सार्वजनिक हित से जुड़े हों।
    यह कहना उचित होगा कि सर्वोच्च न्यायालय की उदारता और उसका हर आवाज को सुनने का रवैया ही उसे लोकतंत्र का मजबूत स्तंभ बनाता है। लेकिन इस उदारता का दुरुपयोग रोकने के लिए भी कदम उठाने होंगे। विपक्षी दलों की याचिकाएं भले ही सियासत से प्रेरित हों लेकिन कई बार यही याचिकाएं लोकतंत्र को मजबूत करने का काम करती हैं। यह एक ऐसा विरोधाभास है जो भारत के लोकतंत्र और न्यायिक व्यवस्था को और भी जटिल और रोचक बनाता है।
    अजय कुमार
    वरिष्ठ पत्रकार उत्तर प्रदेश
    मो.नं. 9335566111

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    600 बीमारी का एक ही दवा RENATUS NOVA

  • सुप्रीम कोर्ट ने बिहार वोटिंग लिस्ट पुनरीक्षण की टाइमिंग पर उठाया सवाल

    सुप्रीम कोर्ट ने बिहार वोटिंग लिस्ट पुनरीक्षण की टाइमिंग पर उठाया सवाल

    सुप्रीम कोर्ट ने बिहार वोटिंग लिस्ट पुनरीक्षण की टाइमिंग पर उठाया सवाल

    बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर सुप्रीम कोर्ट में आज 10 जुलाई 2025 को महत्वपूर्ण सुनवाई हुई। यह मामला बिहार विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची के संशोधन की प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिकाओं से जुड़ा था जिसमें विपक्षी दलों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और संगठनों ने इसे असंवैधानिक और मनमाना बताया। सुनवाई जस्टिस सुधांशु धूलिया और जस्टिस जोयमाल्या बागची की खंडपीठ के समक्ष हुई जहां याचिकाकर्ताओं और चुनाव आयोग ने अपने तर्क पेश किये। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चुनाव आयोग जो कर रहा है वह संविधान के तहत अनिवार्य है। सत्यापन के लिए जरूरी दस्तावेजों से आधार कार्ड को बाहर रखने पर चुनाव आयोग ने कहा कि आधार कार्ड नागरिकता का प्रमाण नहीं है। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से पूछा कि आप मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण में नागरिकता के मुद्दे को क्यों उठा रहे हैं? यह गृह मंत्रालय का अधिकार क्षेत्र है। अगर आपको पुनरीक्षण के जरिये नागरिकता की जांच करनी थी तो आपको यह पहले करना चाहिए था। इसमें अब बहुत देर हो चुकी है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि परेशानी पुनरीक्षण प्रक्रिया से नहीं है, बल्कि दिक्कत इसके लिए चुने गए समय से है।
    सर्वाेच्च न्यायालय ने चुनाव आयोग से 3 मुद्दों पर जवाब मांगा है। सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग के वकील से कहा कि इसमें कोई संदेह नहीं है कि अदालत के समक्ष जो मुद्दा है वह लोकतंत्र की जड़ और मतदान के अधिकार से जुड़ा है। याचिकाकर्ता न केवल चुनाव आयोग के मतदान करने के अधिकार को चुनौती दे रहे हैं, बल्कि इसकी प्रक्रिया और समय को भी चुनौती दे रहे हैं। इन तीन मुद्दों पर जवाब देने की जरूरत है। याचिकाकर्ताओं में लोकसभा सांसद महुआ मोइत्रा, सामाजिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव और एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) जैसे संगठन शामिल थे। इनका कहना था कि एसआईआर प्रक्रिया के तहत मतदाताओं से नए सिरे से पात्रता साबित करने की मांग की जा रही है जिससे करीब 3 से 4 करोड़ मतदाताओं के नाम कटने का खतरा है। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि यह प्रक्रिया न केवल अव्यवहारिक है, बल्कि यह मतदाताओं के अधिकारों का हनन भी करती है। उन्होंने कहा कि जिन लोगों ने पहले कई बार मतदान किया, उन्हें भी अब दस्तावेज जमा करने पड़ रहे हैं जो विशेष रूप से ग्रामीण और गरीब तबके के लिए मुश्किल है। एडीआर के सह-संस्थापक जगदीप छोकर ने कहा कि हालांकि चुनाव आयोग को मतदाता सूची संशोधन का अधिकार है लेकिन यह मौजूदा कानूनों का उल्लंघन नहीं कर सकता।
    वहीं चुनाव आयोग ने अपने बचाव में कहा कि यह प्रक्रिया संवैधानिक रूप से अनिवार्य है और इसका उद्देश्य मतदाता सूची को शुद्ध करना है। आयोग ने बताया कि बिहार में तेजी से शहरीकरण, असूचित मृत्यु, नए मतदाता और गैर-नागरिकों, खासकर रोहिंग्या और बांग्लादेशी घुसपैठियों, की संभावित मौजूदगी जैसे मुद्दों को संबोधित करने के लिए यह कदम उठाया गया है। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि प्रक्रिया में पारदर्शिता बरती जा रही है और इसे समयबद्ध तरीके से पूरा किया जाएगा। मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने जोर देकर कहा कि यह प्रक्रिया निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए जरूरी है।
    सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कई अहम सवाल उठाए। कोर्ट ने पूछा कि क्या एसआईआर प्रक्रिया का समय नियमों में निर्धारित है और क्या यह प्रक्रिया गैर-नागरिकों को हटाने के लिए है जो गृह मंत्रालय का अधिकार क्षेत्र है। कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं से कहा कि वे इस प्रक्रिया को कृत्रिम न कहें, क्योंकि इसके पीछे एक तर्क है। हालांकि कोर्ट ने यह भी जोड़ा कि इसकी वैधता और पारदर्शिता सुनिश्चित करना जरूरी है, क्योंकि यह 7.9 करोड़ मतदाताओं को प्रभावित करेगा।
    विपक्षी दलों, विशेष रूप से इंडिया ब्लॉक ने इस प्रक्रिया को वोट बंदी करार दिया और इसके खिलाफ बिहार बंद का आयोजन किया। राहुल गांधी ने इसे संविधान-विरोधी साजिश बताया। दूसरी ओर आयोग ने विपक्ष के दावों को आधारहीन करार देते हुए कहा कि लाखों फॉर्म पहले ही प्राप्त हो चुके हैं। सुनवाई अभी जारी है और कोर्ट का अंतिम फैसला इस प्रक्रिया की दिशा तय करेगा। यह मामला बिहार में निष्पक्ष चुनाव और मतदाता अधिकारों को लेकर एक बड़ी बहस का केंद्र बन गया है।
    संजय सक्सेना
    वरिष्ठ पत्रकार लखनऊ
    9454105568, 82990505

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    600 बीमारी का एक ही दवा RENATUS NOVA

  • सावन महीना एवं आदिदेव भगवान शिव—माता पार्वती

    सावन महीना एवं आदिदेव भगवान शिव—माता पार्वती

    सावन महीना एवं आदिदेव भगवान शिव—माता पार्वती

    भारतीय ग्रंथों के अनुसार मानव सभ्यता का उदय अब से लगभग 2 अरब वर्ष पहले हुआ था और भारतीय ऋषि मुनियों ने देश काल समय परिस्थिति ऋतु सौरमंडल और ब्रह्मांड सहित 200 खरब ब्रह्मांडों के हिसाब से एक अद्भुत जीवनशैली का विकास किया, इसीलिए दुनिया की सारी सभ्यताएं पर्व त्योहार उत्सव मिट गये लेकिन भारत की संस्कृति सभ्यता ज्यों की त्यों है। दुनिया की कोई भी अन्य सभ्यता 2000 वर्ष से ज्यादा नहीं चली है। यहां तक कि नई इस्लामी सभ्यता भी विनाश होने के कगार पर है।
    सावन महीना हरा-भरा वनस्पतियों हरियाली जल और वर्षा का मौसम होता है स्वाभाविक रूप से इस मौसम में जीवाणु, कीटाणु, विषाणु, रोगाणु, सांप, बिच्छू, विषैले, जीव, जंतु बहुत संख्या में होते हैं और आसानी से हर जगह छिप जाते हैं, इसीलिए सावन में पत्तेदार हरी सब्जियां और साग—गुड़ खाने का निषेध है और मांस—मछली खाना पूरी तरह से वर्जित है, क्योंकि इसी महीने मछलियों के बीज विकसित होते हैं और यह मछलियों के प्रजनन का सर्वश्रेष्ठ समय होता है, इसलिए सावन भर मछली खाने और मारने का भी निषेध है।
    पूरे सावन महीने भर भगवान शिव माता पार्वती का महीना माना जाता है और धर्म-कर्म कांवड़ यात्रा शिवजी का जलाभिषेक एवं महारुद्राभिषेक चलता रहता है। इस बार सावन महीना शुक्रवार को शुरू हो रहा है और 9 अगस्त को सोमवार के दिन ही समाप्त हो रहा है जो विस्मयकारी है। सोमवार—शुक्रवार वैसे भी भगवान शिव का दिन है और इस बार केवल 4 सोमवार सावन में पड़ रहे हैं। इसमें तमाम योग ग्रह नक्षत्र मिलकर इस सावन महीने को बहुत ही उत्तम बना दे रहे हैं। इस बार सावन महीने भर जमकर बारिश होगी और फसलें भी बहुत अच्छा होगी।
    भगवान शिव की पूजा-अर्चना केवल मन मात्र से करने से ही वह संतुष्ट हो जाते हैं। इस बार पहले सोमवार को माया स्वरूप भगवान शिव, दूसरे को महाकालेश्वर भगवान शिव, तीसरे को अर्धनारीश्वर, चौथे को तंत्र के ईश्वर और पशुओं को भोलेनाथ की पूजा की जाएगी जहां तक हो सके शुद्ध चित्त होकर मन मस्तिष्क का पूर्ण विकास करते हुए भौतिक व मानसिक अथवा आध्यात्मिक रुप से ही भगवान शिव भगवती पार्वती का जप तप करने से वह पूर्ण प्रसन्न हो जाते हैं लेकिन शर्त इतनी ही है कि सावन माह व्रत करने के बाद मनुष्य अपने जीवन के पापकर्म अश्लील काम व्यभिचार गंदी आदतें और चोरी बेईमानी वास्तव में छोड़ दें, अन्यथा उसे घोर कष्ट मिलता है। शिवजी का व्रत करने और रुद्राक्ष धारण करने के बाद भी गलत काम करने वाले बहुत ही कष्ट पाते हैं।
    ॐ नमः शिवाय अथवा भगवान शिव भगवती पार्वत्यै नमो नमः या ऊं त्र्यंबक यजामहे सुगंधि पुष्टि वर्धनम उर्वारुकमिव बंधानाम मृत्योर्मुक्षीय मामृताम परम सिद्ध मंत्र का जाप करने से तमाम रोग शोक कष्टों से छुटकारा तो मिलता ही है। अपनी पूजा तपस्या के अनुसार स्वप्न में अथवा साक्षात सामने ही भगवान शिव भगवती पार्वती का दर्शन होता है इसमें कोई संदेह नहीं है। जितना ही ज्यादा जटिलता और कर्मकांड बढ़ाया जाता है, उतना ही पूजा पाठ का फल उतना ही कम होता जाता है, इसलिए भगवान शिव की जय माता पार्वती की जय बोलते हुए सरल सात्विक रूप से करना चाहिये।
    भगवान शिव के चरित्र और उनके स्वरूप को ध्यान से देखें तो सारा ब्रह्मांड उत्पन्न और नष्ट होने का परम रहस्य उनके शरीर में समाया हुआ है। सिर पर घटाएं जटाओं पर चंद्रमा गंगा की धवल धार और गले में काल कराल नाग देवता वक्षस्थल पर गंगा गले में हलाहल विष हृदय में अमृत बाघंबर का वस्त्र चट्टान पर सीधे खड़े होने की मुद्रा ब्रह्मांड पैदा करने वाले डमरू का निनाद और अल्फा बीटा गामा किरणों और लेसर तथा क्वासर और लेजर की शक्तियों से युक्त है। उनका परम भयानक त्रिशूल और पाशुपतास्त्र सब कुछ परम रहस्य के केंद्र हैं, उनके तीनों नेत्र इलेक्ट्रॉन प्रोटान न्यूट्रान और अल्फा बीटा गामा किरणों के संयुक्त रूप हैं। उनका पाशुपतास्त्र परम ब्रम्हांडीय महा बम है जो कुछ पलों में 200 खरब ब्रह्मांडों और 200 खरब प्रति महाब्रह्मांड एक खरब ब्लैक होल्स नष्ट करने में समर्थ हैं तो उनका डमरू पल मात्र में ही माता भगवती की कृपा से इतने ही ब्रह्मांड करण और प्रति ब्रह्मांड ऊर्जा और प्रति उर्जा सब कुछ पैदा करने में सक्षम हैं। भगवती माता पार्वती और माता काली ब्लैक होल्स और व्हाइट हाउस की प्रतीक हैं जो शिव जी की स्त्री अथवा परिणयात्मक परम शक्तियां हैं। इन सबका विस्तृत वर्णन कभी फिर विस्तार से किया जायेगा।
    डा. दिलीप सिंह
    मौसमविद्, ज्योतिर्विद्, न्यायविद्

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  • कांवड़: श्रद्धा, साधना और शिव से साक्षात्कार की यात्रा

    कांवड़: श्रद्धा, साधना और शिव से साक्षात्कार की यात्रा

    कांवड़: श्रद्धा, साधना और शिव से साक्षात्कार की यात्रा

    सुरेश गांधी
    कहते हैं कि कांवड़ यात्रा का प्रत्येक कदम एक अश्वमेध यज्ञ के बराबर पुण्य देता है और सच भी यही है। यह भारत की आत्मा से निकला हुआ वह विश्वास है जो हर साल सावन में अपने कंधों पर धर्म, संस्कृति और श्रद्धा को उठाये चलता है। आज जब हम ‘कांवड़ यात्रा’ को केवल एक धार्मिक उत्सव मानते हैं तो हम उसके भीतर की चेतना को कम कर देते हैं। यह यात्रा एक लोक-तीर्थ है, यह तीर्थ वह है जो स्वयं बनता है जिसमें श्रद्धालु ही पुरोहित हैं और श्रद्धा ही विधान है। कांवड़ शिव का निमंत्रण नहीं, बल्कि शिव से मिलने का संकल्प है। यह यात्रा जल के सहारे आत्मा की अग्नि को शान्त करने की आराधना है। यह यात्रा हर कदम पर ‘हर हर महादेव’ को स्वयं में धारण करने की प्रक्रिया है। श्रावण मास में शिवभक्तों का उत्साह देखते ही बनता है। छोटे-बड़े, युवा-वृद्ध, नर-नारी, सब एक समान केसरिया परिधान में “बोल बम” के नारे लगाते हुए कांवड़ यात्रा पर निकल पड़ते हैं। यह धार्मिक अनुष्ठान केवल जलाभिषेक नहीं, बल्कि आत्मनियंत्रण, त्याग और परंपरा का अनूठा संगम बन जाता है। सावन में शिवभक्तों की यह यात्रा हमें सिखाती है कि श्रद्धा में शक्ति है, संकल्प में सामर्थ्य है और भक्ति में वह ऊर्जा है जो असंभव को भी संभव बना देती है। कांवड़ यात्रा हर वर्ष न केवल सड़कों को गुलजार करती है, बल्कि हृदयों को शिव-भाव से सराबोर कर देती है।
    श्रावण मास का आगमन होते ही देश भर की सड़कों पर एक विशेष दृश्य दिखाई देता है। केसरिया वस्त्रों में लिपटे, कंधे पर गंगाजल से भरी कांवड़ उठाए भक्त, “हर-हर महादेव“ की गूंज के साथ शिव के धाम की ओर बढ़ते हुए। यह कोई सामान्य यात्रा नहीं, बल्कि यह श्रद्धा, तपस्या और शिवत्व की खोज की वह चिरंतन परंपरा है जो हर वर्ष सावन में पुनः जीवंत होती है। भारत की हजारों वर्षों पुरानी धार्मिक चेतना में शिव एक ऐसे देवता हैं, जो निर्विकारी हैं, निराकार हैं, फिर भी सबसे साकार रूप में पूजित हैं। उन्हीं शिव को जल अर्पित करने की साधना का नाम है कांवड़ यात्रा। यह यात्रा केवल गंगाजल के उठान की नहीं, आत्मा के उत्थान की प्रक्रिया है। कांवड़ का अर्थ है, शिव के लिए वह परिश्रम, जो अपने भीतर की भक्ति को समर्पण में बदल देता है। श्रद्धालु जब गंगोत्री, हरिद्वार, ऋषिकेश, सुल्तानगंज या काशी से जल भरते हैं और सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलकर किसी शिवालय में जाकर अभिषेक करते हैं तो वह केवल धार्मिक कर्म नहीं करते, वे एक वैदिक संकल्प को साकार करते हैं— “शिवो भूत्वा शिवं यजेत।”
    कांवड़ की परम्परा को लेकर पुराणों और लोक कथाओं में अनेक सन्दर्भ मिलते हैं। समुद्र मंथन के समय निकले विष को जब शिव ने पिया तो उनकी तप्त जठराग्नि को शांत करने के लिए जलाभिषेक किया गया। कहा जाता है कि रावण और भगवान परशुराम ने शिव की आराधना के लिए जल से कांवड़ यात्रा की शुरुआत की थी। वहीं, श्रवण कुमार की कथा तो भारतीय मानस में आदर्श बन गई, जब उन्होंने कांवड़ में माता-पिता को बिठाकर तीर्थयात्रा करवाई। इस प्रकार कांवड़ यात्रा केवल जल का वहन नहीं, बल्कि धर्म, सेवा और तप का संगम है। गंगा, जो विष्णु के चरणों से निकली और शिव की जटाओं में समाई, वही जब कांवड़ में भरकर फिर से शिव को समर्पित की जाती है तो यह एक चक्र की पूर्णता है। यह केवल जलाभिषेक नहीं, बल्कि शिव और गंगा की संयुक्त आराधना है। शिवमहिम्न स्तोत्र के अनुसार जल चढ़ाकर हम शिव से वही शक्ति वापस मांगते हैं जो उन्होंने सृष्टि की रचना और कल्याण के लिए समर्पित की।
    कांवड़ यात्रा की सबसे अद्भुत बात यह है कि यह बिना निमंत्रण, बिना संगठन, बिना शासन के आदेश के होती है। लोग स्वतः प्रेरित होते हैं। उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान से लेकर बंगाल तक लाखों कांवरिया हरिद्वार, देवघर, पुरा महादेव या काशी से जल लेकर निकलते हैं। गांव-गांव में शिवालय सजते हैं, घर-घर में शिव आराधना होती है। यहां तक कि पर्यावरण और समाज भी इसका हिस्सा बन जाते हैं। रास्ते में जगह-जगह “कांवड़ शिविर“, जलपान केंद्र, प्राथमिक चिकित्सा स्टॉल, सांस्कृतिक मंच आदि इसकी जीवंतता को उत्सव में बदल देते हैं। इसे किसी एक समुदाय, जाति, वर्ग या भाषा से नहीं जोड़ा जा सकता— यह भारत की साझा संस्कृति और समवेत श्रद्धा का प्रतीक है। कांवड़ यात्रा न केवल धार्मिक कर्म है, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक संवाद भी है। जल की यह यात्रा— जहां स्वयं कांवरिया जल से भीगता है— हमें पर्यावरण, जल-संरक्षण, श्रम और संयम का संदेश देती है। यह एक चलायमान योग साधना है जिसमें शरीर तपता है, मन शिव में रमता है और आत्मा विमल होती है। जब लाखों कांवरिये गंगा से जल भरकर अपने गांव-नगर के शिवालयों तक पहुंचते हैं तो साथ में वे गंगा की पुण्यता, सांस्कृतिक गौरव और धार्मिक चेतना को भी पहुंचाते हैं। यह एक विराट आंदोलन है— जो धर्म, परंपरा और राष्ट्रीय चेतना का अद्भुत संगम है।

    श्रावण का जलाभिषेक
    श्रावण मास जब आता है तो गगन में घटाएँ उमड़ती हैं, धरती पर हरीतिमा लहराती है और भक्तों के मन में भक्ति की बाढ़ आ जाती है। यह महीना शिवभक्ति, तप और संयम और समर्पण का प्रतीक है। उत्तर से दक्षिण और पर्वत से सागर तक “हर हर महादेव” और “बोल बम” के नारों से सारा देश शिवमय हो उठता है। यह केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की आत्मा का उत्सव है। श्रावण मास का प्रत्येक सोमवार एक आध्यात्मिक अनुष्ठान बन जाता है। शिवलिंग पर जल, पंचामृत और बेलपत्र चढ़ाने की परंपरा केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि वह कृतज्ञता का प्राकट्य हैकृउन महादेव के प्रति जिन्होंने हलाहल पान कर सृष्टि की रक्षा की।

    श्रद्धा का महासागर
    श्रावण में शिवभक्ति की सबसे अद्वितीय अभिव्यक्ति है कांवड़ यात्रा। यह यात्रा केवल गंगाजल का परिवहन नहीं, आत्मा की यात्रा है जहां प्रत्येक कांवड़िया “मैं” से “हम” की ओर बढ़ता है। पैरों में छाले, आंखों में दृढ़ संकल्प और कंधे पर गंगाजल लिए ये यात्री देश की धार्मिक चेतना का चलायमान रूप हैं। प्राचीन समय में जब राजस्थान के मारवाड़ी समाज के लोग गोमुख से जल लेकर रामेश्वरम तक पदयात्रा करते थे तो वह केवल एक तीर्थ नहीं, बल्कि उत्तर से दक्षिण तक की सांस्कृतिक कड़ी का प्रवाह था। आज यह परंपरा भले ही डाक कांवड़, खड़ी कांवड़ या दांडी कांवड़ जैसे विभिन्न रूपों में परिवर्तित हो गई हो लेकिन उसकी आत्मा अब भी वैसी ही है— अडिग, अपराजेय और आस्थामयी।

    सामाजिक समरसता और सेवा का पर्व
    श्रावण मास केवल भक्ति का पर्व नहीं, बल्कि सेवा का संगम भी है। देश के हर कोने में कांवड़ियों के स्वागत में शिविर, भंडारे, चिकित्सा सेवा, जल वितरण की व्यवस्था होती है। आमजन, पुलिस, प्रशासन और स्वयंसेवी संस्थाएं एक समान भाव से इस महायात्रा को अपना योगदान देती हैं। यही भारत की सनातन शक्ति हैकृजहाँ धर्म केवल पूजा तक सीमित नहीं, वह लोकसेवा से जुड़ा है।

    नव पीढ़ी के लिये प्रेरणा
    जब बच्चे, युवा, वृद्ध और महिलाएं भी इस यात्रा में सम्मिलित होते हैं तो यह केवल धार्मिक भावना का उत्सव नहीं, बल्कि राष्ट्रीय एकता और जीवनमूल्यों की पाठशाला बन जाती है। जिस प्रकार “बम बम भोले“ का स्वर संपूर्ण शरीर में ऊर्जा भर देता है, उसी प्रकार यह यात्रा हर मनुष्य में संयम, अनुशासन और आत्मनियंत्रण की भावना भरती है।

    उत्सव नहीं, उत्सर्ग है श्रावण
    श्रावण मास केवल पूजा-पाठ का अवसर नहीं, बल्कि यह तप का प्रतीक है। यह आत्मा को स्वच्छ, विचारों को परिष्कृत करने का और भगवान शिव के समक्ष अपनी सीमाओं को लांघने का अवसर है। यह मास हमें सिखाता है कि विष पीने वाले शिव की पूजा केवल जल से नहीं, बल्कि अपने जीवन में भी उनके जैसे त्याग, सहनशीलता और करुणा लाकर की जानी चाहिए। वर्तमान समय में जब भौतिकता हावी है तब श्रावण और कांवड़ यात्रा जैसे आयोजन हमें हमारी जड़ों से जोड़ते हैं। हमारे अंदर सोई मानवीय संवेदनाओं को जगाते हैं और हमें सिखाते हैं कि सच्ची भक्ति केवल मंदिरों में नहीं, सेवा, समर्पण और तपस्या में है, इसलिए आइए, इस श्रावण में केवल अभिषेक न करें, अपने मन को भी धोएं, अपने जीवन को भी शिवमय बनाएं। तभी सच्चे अर्थों में “बोल बम” का नारा केवल शब्द न रहकर जीवन का मंत्र बन जाएगा।

    कांवड़ यात्रा की ऐतिहासिक जड़ें
    उत्तर भारत से आए मारवाड़ी समाज के लोगों ने दरभंगा और मिथिला क्षेत्र में सबसे पहले इस परंपरा को आरंभ किया था। वर्षों बाद यह इतनी लोकप्रिय हुई कि अब बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, बंगाल से लेकर नेपाल और असम तक लाखों कांवड़िये इसमें भाग लेते हैं। कुछ क्षेत्रों में यह परंपरा सावन के अतिरिक्त वसंत पंचमी पर भी निभाई जाती है।

    कांवड़ के विविध रूप
    सावन में भक्तों की भक्ति शिव तक पहुंचने के कई मार्गों से होती है। डाक कांवड़, खड़ी कांवड़, दांडी कांवड़ जैसे संकल्पों में बंधे श्रद्धालु बोल-बम के उद्घोष के साथ निकलते हैं शिव धाम की ओर। कांवड़ यात्रा में एक जैसी भक्ति जरूर होती है लेकिन उसके रूप और संकल्प विभिन्न होते हैं। यहां जानिए कांवड़ यात्रा के प्रमुख प्रकारः—

    1. डाक कांवड़
    शिव तक बिना रुके दौड़ते हुए पहुँचने का संकल्प। डाक कांवड़िये उन श्रद्धालुओं को कहते हैं जो गंगाजल लेने के बाद बिना रुके लगातार दौड़ते हुए शिव धाम तक जल चढ़ाते हैं। इनकी यात्रा अक्सर 24 घंटे के भीतर पूरी होती है। इस दौरान न यह भोजन करते हैं और न ही शरीर से उत्सर्जन की कोई क्रिया करते हैं। संकल्प इतना कठोर होता है कि शरीर की थकावट भी इनकी आस्था के आगे झुक जाती है।

    2. खड़ी कांवड़
    कांवड़ को जमीन पर न रखने की कठिन तपस्या। इस संकल्प में कांवड़ को जमीन पर एक पल के लिए भी नहीं रखा जाता। जब यात्री विश्राम करते हैं तो उनका साथी कांवड़ को अपने कंधों पर चलने के भाव में हिलाता-डुलाता रहता है। यह गहरी आस्था, सहयोग और संयम की प्रतीक यात्रा है। इस दौरान संकल्पित श्रद्धालु पूर्ण शाकाहारी रहते हैं और किसी प्रकार के नशे या अशुद्ध वस्तु का सेवन नहीं करते।

    3. दांडी कांवड़
    धरती पर लेट-लेट कर नापते हैं भोलेनाथ तक की दूरी। सबसे कठिन मानी जाने वाली यह यात्रा शरीर की लंबाई से भूमि पर लेट-लेट कर पूरी की जाती है। इसे ‘दंडवत यात्रा’ भी कहा जाता है। यह यात्रा कई बार एक महीने तक चलती है। नियम इतने कठोर होते हैं कि कांवड़ उठाने से पहले स्नान अनिवार्य होता है। तेल, साबुन, कंघी का उपयोग वर्जित होता है। इस यात्रा में भक्त शिव का नाम लेते हुए अपनी देह और मन दोनों को तपाते हैं।

    एक भाषा, एक स्वर: बोल बम
    इस पवित्र यात्रा की एक विशेष बात यह भी है कि देश के हर कोने से आने वाले ये श्रद्धालु केवल एक भाषा बोलते हैंकृ‘बोल बम’। यही इनका अभिवादन होता है, यही पहचान। एक-दूसरे को “भोला“ या “भोली“ कहकर पुकारना, भक्ति का सामाजिक और आध्यात्मिक रूप दोनों दर्शाता है।

    श्रद्धा का समर्पण, आस्था का उत्सव
    कांवड़ यात्रा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आस्था की ऐसी धारा है जो जाति, भाषा, वर्ग, उम्र के भेद मिटाकर सभी को शिवमय कर देती है। यह संकल्प, संयम और समर्पण की पराकाष्ठा है जहां शरीर थक सकता है लेकिन आत्मा नहीं।

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    600 बीमारी का एक ही दवा RENATUS NOVA

  • कवि गोष्ठी उदीयमान कवियों के लिये संजीवनी है: कमलेश मौर्य

    कवि गोष्ठी उदीयमान कवियों के लिये संजीवनी है: कमलेश मौर्य

    कवि गोष्ठी उदीयमान कवियों के लिये संजीवनी है: कमलेश मौर्य

    तेजस टूडे ब्यूरो
    विशाल रस्तोगी
    बिसवां, सीतापुर। बाबा छोटे लाल लक्ष्मी देवी सेवा समिति रामा भारी के तत्वावधान में संपन्न कवि गोष्ठी के मुख्य अतिथि जनपद के विख्यात साहित्यकार साहित्य भूषण कमलेश मौर्य मृदु ने कहा कि कवि गोष्ठी उदीयमान कवियों के लिए संजीवनी है। वहीं वरिष्ठ कवियों को सम्मान प्रदान करती है। कवि गोष्ठियों के माध्यम से नवोदित कवियों को वरिष्ठ कवियों का संरक्षण व मार्गदर्शन प्राप्त होता है। लखनऊ के सेक्टर 12 खलील मार्केट इंदिरा नगर में स्थित वरिष्ठ कवि रमाशंकर शर्मा नीलम के आवास पर संपन्न कवि गोष्ठी की अध्यक्षता लखीमपुर खीरी से पधारे वरिष्ठ कवि डा. शिव शर्मा विरक्त ने किया। गोष्ठी का शुभारंभ आशा शर्मा ने प्रस्तुत मातु शारदे की वंदना से हुआ।
    उन्होंने मां सरस्वती से याचना करते हुए कहा—— मातु शारदे वर दे वर दे। जगद्गुरु की पदवी पर फिर देश प्रतिष्ठित कर दे। वरिष्ठ कवि रमाशंकर शर्मा नीलाम के मुक्तक ग़ज़ल व छंद बहुत सराहे गये—— अनलंकृत हीर न देखी गई। मनमीन अधीर न देखी गई। स्वछंद विहारिण कोकिला के, पग स्वर्ण जंजीर न देखी गई।
    मुख्य अतिथि साहित्य भूषण कमलेश मौर्य “मृदु” ने श्रृंगार के मुक्तक सुना कर वाहवाही बटोरी— तेरी खातिर प्यार का नया स्टाइल बन जाऊंगा। अगर प्यार से छुओगी तो टच मोबाइल बन जाऊंगा। गर हमास सी कातिैल नजर ने कत्ल किया मेरे दिल का, तो छोडूंगा नहीं तुझे मैं इजराइल बन जाऊंगा।
    कवि गोष्ठी के अध्यक्ष वरिष्ठ कवि डा. शिव शर्मा विरक्त के छंदों ने सभी का मन मोह लिया।—— संकट हो जिस कंटक से जड़ से कट जाय सदा के लिए। हो मन की मनको खलती मन से हट जाय सदा के लिए। दर्द मिटा न सका पर यत्न किया घट जाय सदा के लिए। क्यों विष का विष तत्व मिटे विष ही मिट जाय सदा के लिए।। नीलम जी ने उपस्थित कवियों का स्वागत किया तो आशा शर्मा ने सभी के प्रति आभार व्यक्त किया।

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  • गुरू पूर्णिमा और उसका महत्व

    गुरू पूर्णिमा और उसका महत्व

    गुरू पूर्णिमा और उसका महत्व

    डा. दिलीप सिंह एडवोकेट
    गुरु पूर्णिमा भारत के लिए सबसे महान त्यौहार में से एक है। इस दिन शिष्य अपने उसे गुरु के प्रति पूर्णिमा कृतज्ञता व्यक्त करते हैं जो उनको गुरु से मिला है और जिसके बिना उनका जीवन में आगे बढ़ना असंभव था। उन्हें असत्य में सत्य और अंधकार में प्रकाश और अज्ञान में ज्ञान का दर्शन होना पूरी तरह असंभव था, इसीलिए भारत में गुरु का स्थान सबसे ऊंचा ईश्वर से भी ऊंचा माना गया है तभी तो वेद पुराण रामायण महाभारत हर एक जगह गुरु की महिमा वर्णित की गई है। कबीर दास जी कहते हैं—— गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लागूं पांय, बलिहारी गुरु आपनो गोविंद दिए बताय।
    पूर्णिमा भारत में हमेशा से सबसे महत्वपूर्ण दिनों में से एक रहा है। इस दिन किया गया। पूजा पाठ यज्ञ हवन अनुष्ठान सफल होता है और पूमा में चंद्रमा अपनी संपूर्ण कलाओं के साथ उपस्थित रहता है और मनुष्य का मन चंद्रमा से जुड़ा हुआ है। मनुष्य ही नहीं, बल्कि जीव, जंतु, पौधे, वनस्पतियां, जल सब चंद्रमा से जुड़े होते हैं, इसीलिए पूर्णिमा के दिन समुद्र में वृहतज्वार भाटा आते हैं। इस दिन किसी भी कार्य में एकाग्र रहता है और इसी दिन गुरु तत्व की प्रधानता रहती है जिसके कारण आषाढ़ महीने की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा कहते हैं। इसी को व्यास पूर्णिमा और आषाढ़ की पूर्णिमा भी कहा जाता है। आषाढ़ महीना वैसे भी बहुत जागृत और संजीव होता है। इस समय वर्षा होने से पेड़ पौधे वनस्पतियां सब हरे भरे और प्रफुल्लित हो जाते हैं और 4 महीने भयंकर गर्मी झेलने के बाद वर्षा से मानव मन भी प्रफुल्लित हो जाता है। कहा भी गया है—— आषाढ़ की अजब कहानी आया बादल बरसा पानी।
    गुरु पूर्णिमा के दिन शिष्य अपने गुरु के प्रति सम्मान व्यक्त करते हैं। बहुत से उनको सम्मान और यथाशक्ति उपहार भी देते हैं। यथा योग्य सेवा करते हैं और उनके द्वारा किए गए कार्य की महत्व को सच्चे हृदय से याद करते हैं। संसार में कोई भी व्यक्ति आज तक बिना अपने गुरु के आगे नहीं बढ़ा है। गुरु का अर्थ वह कोई भी व्यक्ति जो आपको सच्ची राह दिखाता है। ईश्वर से मिलने का मार्ग प्रशस्त करता है। ज्ञान प्रकाश और पुण्य के रास्ते पर ले जाता है। अज्ञान अंधकार सत्य से दूर करता है। गुरु बहुत व्यापक शब्द है। इसमें माता-पिता, सच्चे मित्र, बड़े लोग, शिक्षक और गुण सभी शामिल हैं जो गुरु का काम करते हैं लेकिन सबसे बड़े गुरु आदि देव भगवान शिव और भगवती माता पार्वती जी हैं। भगवान श्रीराम, भगवान श्री कृष्ण, शिवाजी, पांडव, स्वामी विवेकानंद, कल्पना चावला, मैडम क्यूरी सभी गुरु के दिखाए और बताए रास्ते पर चलकर ही महान बने हैं।
    गुरु पूर्णिमा के दिन मानव मस्तिष्क पूर्ण जागृत होता है और इस दिन यज्ञ, हवन, पूजन, अनुष्ठान सच्चे हृदय से किया जाय तो पूरी तरह सफल होता है। गुण के साथ भगवान शिव और भगवती माता पार्वती को भी अवश्य ही इस दिन याद करना चाहिए। इसके साथ यह दिन परम पवित्र भी होता है और हमें कभी नहीं भूलना चाहिए कि गुरु ऐसा व्यक्ति है जो माता-पिता दोनों का समय और प्रेम एक साथ देता है। इसका प्रमाण है गुरु द्रोणाचार्य जो अपने शिष्य अर्जुन को अपने पुत्र अश्वत्थामा से भी अधिक मानते थे, इसलिए गुरु पूर्णिमा के दिन हम सबको सच्चे हृदय से अपने गुरुजनों का सम्मान करना चाहिए और उनकी सेवा करनी चाहिए। उनके प्रति किसी भी प्रकार के अहंकार को त्याग देना चाहिये।

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  • हिन्दुत्व या पीडीए, कौन पड़ रहा है भारी?

    हिन्दुत्व या पीडीए, कौन पड़ रहा है भारी?

    हिन्दुत्व या पीडीए, कौन पड़ रहा है भारी?

    उत्तर प्रदेश की सियासत में दो विचारधाराएं आमने-सामने हैं। एक तरफ भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) का हिंदुत्व का नारा जो धार्मिक एकजुटता और सांस्कृतिक गौरव के बल पर वोटरों को लुभाने की कोशिश करता है। दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी (सपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव की पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) रणनीति जो सामाजिक न्याय और समावेशी राजनीति की बुनियाद पर टिकी है। 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा-कांग्रेस गठबंधन ने बीजेपी को कड़ी टक्कर दी जिसने 80 सीटों वाले उत्तर प्रदेश में बीजेपी को 33 और सपा को 37 सीटों तक सीमित कर दिया। यह नतीजा अखिलेश की पीडीए रणनीति की ताकत को दर्शाता है लेकिन 2027 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी के हिंदुत्व के सामने यह कितना टिक पाएगी, यह एक बड़ा सवाल है।
    अखिलेश यादव ने 2023 में पीडीए का नारा दिया था जिसका मतलब है पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक। यह रणनीति सपा के पारंपरिक मुस्लिम-यादव (एम-वाई) वोट बैंक को विस्तार देने की कोशिश थी। सपा ने हमेशा यादव और मुस्लिम समुदायों पर निर्भरता दिखाई, लेकिन अखिलेश ने गैर-यादव ओबीसी, दलित सहित अन्य अल्पसंख्यकों को जोड़ने की रणनीति अपनाई। 2024 के चुनाव में सपा ने 62 सीटों पर उम्मीदवार उतारे, जिनमें केवल पाँच यादव थे और बाकी टिकट गैर-यादव ओबीसी (27), दलित (15) और ऊपरी जातियों (11) को दिए गए। इस रणनीति ने सपा को बुंदेलखंड, अवध और पूर्वांचल जैसे क्षेत्रों में जीत दिलाई जहाँ उसने बीजेपी को कड़ी चुनौती दी। सपा ने कुर्मी, शाक्य, मौर्य, पाल और निषाद जैसी जातियों को टिकट देकर सामाजिक गणित को अपने पक्ष में किया।
    अखिलेश की पीडीए रणनीति का आधार सामाजिक न्याय और आर्थिक मुद्दों पर केंद्रित है। उन्होंने बेरोजगारी, महंगाई और सरकारी भर्तियों में पेपर लीक जैसे मुद्दों को उठाकर युवाओं और ग्रामीण वोटरों को लुभाया। इसके अलावा उन्होंने संविधान और आरक्षण की रक्षा का मुद्दा जोर-शोर से उठाया, खासकर दलित और ओबीसी समुदायों के बीच। सपा ने बीजेपी पर संविधान बदलने और आरक्षण खत्म करने का आरोप लगाया जिसने दलित और पिछड़े वोटरों में डर पैदा किया। अखिलेश ने जुड़ेंगे तो जीतेंगे का नारा दिया जो बीजेपी के बटेंगे तो कटेंगे के जवाब में था। यह नारा एकता और सामाजिक न्याय की भावना को दर्शाता है जिसने 2024 में सपा को इंडिया गठबंधन के साथ 43 सीटें जिताने में मदद की।
    वहीं बीजेपी हिंदुत्व की सियासत कर रही है। राम मंदिर का निर्माण, जिसे बीजेपी ने अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि बताया, वह 2024 के चुनाव में वैसा जादू नहीं दिखा सका, जैसा पार्टी ने उम्मीद की थी। अयोध्या में ही बीजेपी को हार का सामना करना पड़ा, जब सपा के अवधेश प्रसाद ने फैजाबाद सीट जीती। बीजेपी ने हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण की कोशिश की जिसमें मुस्लिमों को आरक्षण देने के कथित विपक्षी प्लान का मुद्दा उठाया गया लेकिन यह रणनीति उलटी पड़ गई, क्योंकि गैर-यादव ओबीसी और दलित मतदाताओं ने सपा-कांग्रेस गठबंधन को समर्थन दिया। बीजेपी ने 2014 और 2019 में हिंदुत्व और राष्ट्रवाद के बल पर उत्तर प्रदेश में भारी जीत हासिल की थी लेकिन 2024 में उसका वोट शेयर 33.6ः तक सिमट गया।
    हालांकि बीजेपी की हिंदुत्व की राजनीति को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में बीजेपी ने कानून-व्यवस्था और हिंदू गौरव जैसे मुद्दों को जोर-शोर से उठाया। योगी ने श्बटेंगे तो कटेंगेश् जैसे नारों के जरिए हिंदू एकता की बात की जो ऊपरी जातियों और कुछ ओबीसी समुदायों में प्रभावी रही। बीजेपी ने अति पिछड़ा वर्ग (ईबीसी) को लुभाने के लिए भी प्रयास किये, जैसे निषाद, कुर्मी और मौर्य समुदायों को टिकट देना। 2017 और 2022 के विधानसभा चुनाव में इस रणनीति ने बीजेपी को भारी सफलता दिलाई थी लेकिन 2024 में सपा की पीडीए रणनीति ने इन समुदायों में सेंध लगाई, खासकर कुर्मी और दलित वोटरों में।
    अखिलेश ने हाल के दिनों में हिंदुत्व के मैदान में भी कदम रखा है। इटावा में केदारेश्वर महादेव मंदिर का निर्माण इसका उदाहरण है। यह मंदिर न केवल धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि बीजेपी के श्सपा मुस्लिम तुष्टिकरण करती हैश् के आरोप का जवाब भी है। सपा नेताओं का कहना है कि उनकी पार्टी सच्चे हिंदुत्व को बढ़ावा देती है जो गंगा-जमुनी तहजीब और समावेशिता पर आधारित है लेकिन बीजेपी इसे श्राजनीतिक अवसरवादश् करार देती है और दावा करती है कि सपा का पीडीए वास्तव में केवल यादवों तक सीमित है।
    2027 के विधानसभा चुनाव में अखिलेश की पीडीए रणनीति की असली परीक्षा होगी। सपा ने 2024 में गैर-यादव ओबीसी और दलितों को अपने साथ जोड़ा लेकिन इस गठजोड़ को बनाए रखना आसान नहीं होगा। बीजेपी ने अपनी हार से सबक लिया है और अब वह हिंदुत्व के साथ सामाजिक गठजोड़ को मजबूत करने की कोशिश कर रही है। योगी आदित्यनाथ ने उप चुनाव में सक्रियता बढ़ाई है और बीजेपी ने दलित और ओबीसी नेताओं को आगे लाने की रणनीति बनाई है। मील्कीपुर जैसे उपचुनाव में बीजेपी ने पासी उम्मीदवार उतारकर सपा की पीडीए रणनीति को चुनौती दी।
    सपा के सामने चुनौती है कि वह अपने पीडीए गठजोड़ को संगठित रखे। दलित वोटर, जो पहले बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के साथ थे, अब सपा की ओर झुके हैं, क्योंकि बसपा का प्रभाव कम हुआ है लेकिन बीजेपी और बसपा दोनों ही इस वोट बैंक को वापस लाने की कोशिश करेंगे। इसके अलावा सपा को इंडिया गठबंधन के सहयोगियों, खासकर कांग्रेस, के साथ तालमेल बनाए रखना होगा। 2024 में सपा-कांग्रेस गठबंधन ने अच्छा प्रदर्शन किया लेकिन गठबंधन में सीट बंटवारे और नेतृत्व को लेकर तनाव की आशंका बनी रहती है।
    दूसरी तरफ बीजेपी के पास संगठनात्मक ताकत और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) का समर्थन है। वह हिंदुत्व के मुद्दों को और तेज कर सकती है। खासकर अगर 2027 से पहले कोई बड़ा धार्मिक या सांस्कृतिक मुद्दा उभरता है। योगी आदित्यनाथ की छवि एक कट्टर हिंदू नेता के रूप में बीजेपी को ऊपरी जातियों और कुछ ओबीसी समुदायों में मजबूती देती है। लेकिन बीजेपी को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि उसका हिंदुत्व का नारा गैर-यादव ओबीसी और दलित वोटरों को अलग न करे। अखिलेश की पीडीए रणनीति ने 2024 में बीजेपी को कड़ी चुनौती दी लेकिन इसका भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि सपा इस गठजोड़ को कितनी मजबूती से बनाए रखती है। दूसरी ओर बीजेपी का हिंदुत्व अभी भी एक शक्तिशाली हथियार है जो धार्मिक भावनाओं को भुनाने में माहिर है। 2027 का चुनाव इस बात का फैसला करेगा कि सामाजिक न्याय का नारा धार्मिक ध्रुवीकरण के सामने कितना टिक पाता है।
    अजय कुमार
    वरिष्ठ पत्रकार उत्तर प्रदेश
    मो.नं. 9335566111

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    600 बीमारी का एक ही दवा RENATUS NOVA

  • बिहार की महिलाओं को सरकारी नौकरियों में 35 प्रतिशत आरक्षण

    बिहार की महिलाओं को सरकारी नौकरियों में 35 प्रतिशत आरक्षण

    बिहार की महिलाओं को सरकारी नौकरियों में 35 प्रतिशत आरक्षण

    बिहार में विधानसभा चुनाव की सरगर्मी बढ़ते ही मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने एक बार फिर अपने शासन की विशेष पहचान को रेखांकित किया है। इस बार उन्होंने बिहार की मूल निवासी महिलाओं के लिए सरकारी नौकरियों में 35 प्रतिशत आरक्षण की घोषणा करके एक ऐतिहासिक कदम उठाया है। यह फैसला न केवल बिहार की महिलाओं के लिए एक बड़ा तोहफा है, बल्कि राज्य की राजनीति में भी एक नया रंग भरता है। नीतीश कुमार की सरकार ने हमेशा से सामाजिक समावेशन और महिला सशक्तिकरण को अपनी प्राथमिकता बनाया है और यह निर्णय उसी दिशा में एक और कदम है। इस घोषणा ने न केवल बिहार की महिलाओं में उत्साह का संचार किया है, बल्कि विपक्षी दलों को भी नए सिरे से रणनीति बनाने पर मजबूर कर दिया है।
    बिहार, जहां सामाजिक और आर्थिक विषमताएं लंबे समय से एक चुनौती रही हैं, वहां नीतीश सरकार का यह कदम स्थानीय महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। पहले यह आरक्षण नीति सभी महिलाओं के लिए लागू थी, चाहे वे किसी भी राज्य की हों लेकिन अब इस नए फैसले के तहत केवल बिहार की मूल निवासी महिलाओं को ही सरकारी नौकरियों में 35 प्रतिशत आरक्षण का लाभ मिलेगा। इसका मतलब है कि बिहार के बाहर की महिलाओं को अब सामान्य श्रेणी में प्रतिस्पर्धा करनी होगी। यह नीति स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसरों को बढ़ाने और बिहार की महिलाओं को प्राथमिकता देने की दिशा में एक ठोस कदम माना जा रहा है।
    मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट की बैठक में इस प्रस्ताव को मंजूरी दी गई। इस बैठक में कुल 43 प्रस्तावों पर विचार-विमर्श हुआ लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा में रहा यह डोमिसाइल आधारित आरक्षण का फैसला। कैबिनेट के अपर मुख्य सचिव डॉ. एस सिद्धार्थ ने प्रेस को बताया कि इस नीति का उद्देश्य बिहार की महिलाओं को रोजगार के क्षेत्र में और अधिक सशक्त बनाना है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अब बिहार की सरकारी नौकरियों में अन्य राज्यों की महिलाएं सामान्य श्रेणी में ही आवेदन कर सकेंगी। यह बदलाव न केवल बिहार की महिलाओं को प्रोत्साहित करेगा, बल्कि स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसरों को भी बढ़ाएगा।
    इस फैसले का समय भी अपने आप में महत्वपूर्ण है। बिहार में इस साल के अंत में विधानसभा चुनाव होने हैं और नीतीश कुमार की यह घोषणा एक रणनीतिक कदम के रूप में देखी जा रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम न केवल महिलाओं के बीच नीतीश सरकार की लोकप्रियता को बढ़ाएगा, बल्कि मतदाताओं, खासकर महिला मतदाताओं को आकर्षित करने में भी मदद करेगा। बिहार में महिलाओं की वोटिंग दर पिछले कुछ चुनावों में पुरुषों से अधिक रही है। 2019 के लोकसभा चुनाव में जहां पुरुषों की वोटिंग दर 55.2 प्रतिशत थी, वहीं महिलाओं की वोटिंग दर 57.3 प्रतिशत थी। यह आंकड़ा स्पष्ट करता है कि महिलाएं बिहार की राजनीति में एक निर्णायक भूमिका निभा रही हैं। ऐसे में नीतीश सरकार का यह फैसला उनकी इस ताकत को और मजबूत करने की दिशा में एक कदम है।
    बिहार में महिला सशक्तिकरण की दिशा में नीतीश कुमार की सरकार पहले भी कई बड़े कदम उठा चुकी है। साल 2006 में बिहार देश का पहला राज्य बना, जिसने पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण लागू किया। इसके बाद 2007 में शहरी स्थानीय निकायों में भी 50 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था की गई। प्राथमिक शिक्षक भर्ती में भी 2006 से ही महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण दिया जा रहा है। 2016 में नीतीश सरकार ने सरकारी नौकरियों में महिलाओं के लिए 35 प्रतिशत आरक्षण की नीति लागू की थी जिसे अब और सशक्त करते हुए डोमिसाइल नीति के साथ जोड़ा गया है। यह नीति बिहार की महिलाओं को न केवल आर्थिक रूप से सशक्त बनाएगी, बल्कि सामाजिक स्तर पर भी उनकी स्थिति को मजबूत करेगी।
    इस फैसले का एक और पहलू यह है कि यह बिहार की महिलाओं को स्थानीय स्तर पर अधिक अवसर प्रदान करेगा। विशेषज्ञों का कहना है कि डोमिसाइल नीति लागू होने से बिहार की महिलाओं को सरकारी नौकरियों में प्राथमिकता मिलेगी जिससे उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार होगा। बिहार में ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में महिलाओं की शैक्षिक और आर्थिक स्थिति में अभी भी काफी सुधार की जरूरत है। इस नीति से शिक्षित और प्रशिक्षित महिलाओं को सरकारी सेवाओं में अधिक अवसर मिलेंगे जिससे वे अपने परिवार और समाज में एक मजबूत भूमिका निभा सकेंगी।
    हालांकि इस फैसले को लेकर कुछ सवाल भी उठ रहे हैं। विपक्षी दलों ने इस कदम को चुनावी स्टंट करार दिया है। उनका कहना है कि नीतीश सरकार ने यह फैसला केवल वोट बैंक को मजबूत करने के लिए लिया है लेकिन सरकार का तर्क है कि यह कदम बिहार की महिलाओं को सशक्त बनाने की दिशा में एक दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा है। इस नीति से न केवल बिहार की महिलाओं को रोजगार के अवसर मिलेंगे, बल्कि यह भी सुनिश्चित होगा कि स्थानीय प्रतिभाओं को प्राथमिकता दी जाय।
    इसके अलावा नीतीश सरकार ने इस कैबिनेट बैठक में कई अन्य महत्वपूर्ण फैसले भी लिए। इनमें दिव्यांगों के लिए आर्थिक सहायता, किसानों के लिए डीजल अनुदान योजना और बिहार युवा आयोग के गठन जैसे प्रस्ताव शामिल हैं लेकिन इन सभी में सबसे ज्यादा चर्चा में रहा है यह महिला आरक्षण का फैसला। यह नीति न केवल बिहार की महिलाओं के लिए एक नई शुरुआत है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि नीतीश कुमार की सरकार सामाजिक बदलाव और समावेशी विकास के लिए प्रतिबद्ध है।
    आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह नीति बिहार की महिलाओं के लिए कितने अवसर लेकर आती है और इसका राजनीतिक प्रभाव क्या रहता है लेकिन एक बात तो तय है कि इस फैसले ने बिहार की राजनीति में एक नया अध्याय जोड़ा है। नीतीश कुमार ने एक बार फिर साबित किया है कि वे सामाजिक बदलाव और महिला सशक्तिकरण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को लेकर गंभीर हैं। यह कदम न केवल बिहार की महिलाओं के लिए एक सुनहरा अवसर है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि सही नीतियों और इच्छाशक्ति के साथ सामाजिक परिवर्तन संभव है।
    संजय सक्सेना
    वरिष्ठ पत्रकार लखनऊ
    मो.नं. 9454105568

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    600 बीमारी का एक ही दवा RENATUS NOVA

  • भारतीय मीडिया: बदलता स्वरूप और भाषा का नया दौर

    भारतीय मीडिया: बदलता स्वरूप और भाषा का नया दौर

    भारतीय मीडिया: बदलता स्वरूप और भाषा का नया दौर

    सुरेश गांधी
    21वीं सदी के तीसरे दशक में भारतीय मीडिया एक अभूतपूर्व परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। 2025 के बाद की नई पीढ़ी ने सूचना, संवाद और मनोरंजन के उपभोग के तरीकों में आमूलचूल बदलाव ला दिए हैं। इस बदलाव के केंद्र में सोशल मीडिया, ओटीटी प्लेटफॉर्म, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, मोबाइल क्रांति और डिजिटल मीडिया की सहज उपलब्धता है। इसके प्रभाव से मीडिया का स्वरूप, प्रस्तुति और भाषा न केवल तेजी से बदले हैं, बल्कि भारतीय भाषाओं की भूमिका भी अब पहले से कहीं अधिक सशक्त हो गई है। मतलब साफ है वर्ष 2025 के साथ मीडिया जगत में एक नई पीढ़ी का आगमन हुआ है। यह पीढ़ी तकनीक-प्रेमी, त्वरित जानकारी चाहने वाली और अपने अलग संचार माध्यमों को प्राथमिकता देने वाली है। इस पीढ़ी ने मीडिया के पारंपरिक स्वरूप को पूरी तरह से बदल दिया है। इसने न केवल मीडिया की संरचना बल्कि इसकी भाषा, शैली, प्रस्तुति और समाज से इसके संबंधों को भी अभूतपूर्व ढंग से प्रभावित किया है।
    सोशल मीडिया ने पारंपरिक मीडिया की गति और दिशा दोनों को चुनौती दी है। ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम और यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म्स ने सूचना के संप्रेषण की प्रक्रिया को ’रीयल टाइम’ बना दिया है। अब खबरें पहले सोशल मीडिया पर वायरल होती हैं और फिर मुख्य धारा के मीडिया में स्थान पाती हैं। सोशल मीडिया ने हर व्यक्ति को पत्रकार बना दिया है। अब कोई भी नागरिक किसी घटना का वीडियो या फोटो अपलोड कर खबर बना सकता है। खबरों की प्रस्तुति में भी बड़ा बदलाव आया है जहां आकर्षक हेडलाइंस, शॉर्ट वीडियो, रील्स और छोटे-छोटे ट्वीट्स का बोलबाला है। सोशल मीडिया ने मीडिया की भाषा को सरल, हिंग्लिश और संवादात्मक बना दिया है। हालांकि इसके साथ ही ट्रोलिंग, अफवाह और फेक न्यूज की समस्याएं भी तेजी से बढ़ी हैं जिससे मीडिया की विश्वसनीयता पर सवाल उठने लगे हैं। ओटीटी प्लेटफॉर्म्स ने भारतीय मीडिया को कंटेंट की आज़ादी दी है। नेटफ्लिक्स, अमेज़न प्राइम, डिज़्नी$ हॉटस्टार और भारतीय ओटीटी जैसे एमएक्स प्लेयर ने दर्शकों को समय, भाषा और विषय की आज़ादी दी है। अब दर्शक खुद तय करता है कि क्या देखना है, कब देखना है और किस भाषा में देखना है। ओटीटी के माध्यम से क्षेत्रीय भाषाओं का पुनर्जागरण हुआ है। हिंदी, तमिल, तेलुगु, मराठी, पंजाबी और भोजपुरी में अब वेब सीरीज़ और फिल्में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं। ओटीटी कंटेंट की भाषा अधिक स्वाभाविक, स्थानीय मुहावरों से युक्त और बोलचाल की शैली में होती है।
    हालांकि सेंसरशिप की कमी के कारण इसमें कभी-कभी अभद्र भाषा और अश्लीलता की सीमा पार होने की शिकायतें भी देखी जाती हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) ने मीडिया में कंटेंट निर्माण, अनुवाद और वितरण में क्रांतिकारी बदलाव किया है। समाचार एजेंसियां अब एआई की मदद से खेल, आर्थिक और मौसम से संबंधित समाचार स्वतः तैयार कर रही हैं। वॉयस असिस्टेंट्स, चैटबॉट्स और न्यूज एग्रीगेटर्स एआई के जरिए पाठकों को उनकी रुचि और भाषा के अनुसार समाचार परोस रहे हैं। या यूं कहे सोशल मीडिया ने समाचारों के संप्रेषण और उपभोग का तरीका बदल दिया है। अब समाचार तत्काल चाहिए और संक्षिप्त चाहिए। ट्विटर, इंस्टाग्राम रील्स, यूट्यूब शॉर्ट्स जैसे प्लेटफॉर्म्स ने पारंपरिक मीडिया को तेज, आकर्षक और जनसंवादी होने के लिए मजबूर कर दिया है। सोशल मीडिया ने “जनता का मीडिया“ का रूप ले लिया है जहां हर व्यक्ति एक संभावित पत्रकार है। ओटीटी (ओवर दी टॉप) प्लेटफॉर्म ने मनोरंजन, समाचार और जनसंचार के तरीकों को क्रांतिकारी रूप से बदला है। अब दर्शक अपने समय के अनुसार कंटेंट देखना पसंद करते हैं। यह प्लेटफॉर्म क्षेत्रीय भाषाओं, स्थानीय कथानकों और विविध संस्कृति को व्यापक मंच दे रहे हैं। एआई ने मीडिया की भाषा, प्रस्तुति और कंटेंट निर्माण को बहुत प्रभावित किया है। ऑटोमेटेड रिपोर्टिंग, बॉट्स के माध्यम से समाचार संप्रेषण और एआई आधारित भाषा अनुकूलन ने भाषा के सरलीकरण और त्वरित संवाद को बढ़ावा दिया है।
    डिजिटल युग में फेक न्यूज सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरी है। इसके चलते मीडिया संस्थानों को फैक्ट-चेकिंग, त्वरित खंडन और भाषा में सटीकता बनाए रखने के लिए अधिक सचेत रहना पड़ा है। सामुदायिक रेडियो आज भी ग्रामीण और आंचलिक समाज का प्रमुख संचार माध्यम बना हुआ है। यह माध्यम स्थानीय भाषा, बोली और संस्कृति को संरक्षित करने में अहम भूमिका निभा रहा है। कहा जा सकता है आज की मीडिया भाषा अधिक सरल, सीधी और भावनात्मक हो गई है। मोबाइल और सोशल मीडिया की वजह से संक्षिप्त भाषा का चलन बढ़ा है, वहीं डिजिटल मीडिया के लिए ’क्लिकबेट’ हेडलाइंस भी एक नई भाषा शैली के रूप में उभरी हैं। डिजिटल मीडिया ने हिंदी, तमिल, तेलुगु, बंगला, मराठी जैसी भारतीय भाषाओं को तेजी से ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर स्थान दिलाया है। अब क्षेत्रीय भाषाओं में ब्लॉग, ई-पेपर, वेब सीरीज़ और पॉडकास्ट की लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है। स्मार्टफोन के व्यापक प्रसार ने भारतीय भाषाओं में सामग्री की मांग को तेजी से बढ़ाया है। आज गूगल, फेसबुक, इंस्टाग्राम सहित लगभग सभी एप्स भारतीय भाषाओं में उपलब्ध हैं। यह भाषाई लोकतंत्रीकरण का एक बड़ा उदाहरण है। मीडिया क्षेत्रीय भाषाओं, आंचलिक बोलियों और लुप्तप्राय भाषाओं को बचाने में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। डिजिटल आर्काइव्स, भाषा आधारित यूट्यूब चैनल और क्षेत्रीय पॉडकास्ट इसके सशक्त माध्यम बन चुके हैं। वाट्सऐप, इंस्टाग्राम और फेसबुक पर हिंग्लिश, बंग्लिश जैसी मिश्रित भाषाओं का चलन बढ़ा है। इसने पारंपरिक भाषा संरचना को तोड़ा है लेकिन साथ ही भाषाओं में लचीलापन भी बढ़ाया है।
    आज जनसंपर्क की भाषा अधिक ग्राहक-केंद्रित, संवादात्मक और दृश्यात्मक हो गई है। इसमें डिजिटल कंटेंट, वायरल वीडियो और मीम्स का स्थान बढ़ा है। डिजिटल मीडिया के लिए लेखन शैली में भी आमूल चूल परिवर्तन देखने को मिल रहा है। इसमें एसइओ आधारित हेडलाइंस, इन्फोग्राफिक्स और विजुअल्स का प्रयोग के अलावा हाइपरलिंकिंग और इंटरैक्टिव कंटेंट आदि प्रमुख है। जहां तक साहित्य का सवाल है तो मीडिया की भाषा तेजी से सरल, संवादात्मक और त्वरित हो रही है जबकि साहित्य अब भी गंभीर, गहन और कलात्मक भाषा की माँग करता है। हालांकि डिजिटल युग में साहित्य भी पॉडकास्ट, ई-बुक्स और इंस्टाग्राम कविताओं के माध्यम से तेजी से मीडिया से जुड़ रहा है। डिजिटल मीडिया ने आंचलिक भाषाओं के लिए एक वैश्विक मंच तैयार किया है। अब भोजपुरी, मैथिली, अवधी, बुंदेलखंडी, मालवी जैसी भाषाओं में यूट्यूब चैनल, पॉडकास्ट और वेब सीरीज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय हो रही हैं। खास यह है कि भविष्य में भारतीय भाषाओं का दबदबा और बढ़ेगा। एआई और वॉयस असिस्टेंट में क्षेत्रीय भाषाओं का उपयोग और विस्तार होगा।
    मीडिया और समाज की भाषा में और अधिक पारदर्शिता और संवादात्मकता आएगी। डिजिटल माध्यम साहित्य, पत्रकारिता और जनसंपर्क में भाषाई नवाचार को बढ़ावा देगा। जानकारों की मानें तो भारतीय मीडिया आज एक बहुस्तरीय संक्रमण से गुजर रहा है जहां तकनीक, सामाजिक अपेक्षाएं और भाषाई विविधताएं मिलकर इसे लगातार नया स्वरूप दे रही हैं। सोशल मीडिया, ओटीटी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मोबाइल क्रांति ने मीडिया की भाषा और उसके संप्रेषण को और अधिक लोकतांत्रिक और बहुभाषी बना दिया है। इस बदलाव के साथ भारतीय मीडिया न केवल वैश्विक हो रहा है, बल्कि भारतीय भाषाओं को संरक्षित और समृद्ध भी कर रहा है।

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  • पारम्परिक मीडिया की गति पर चुनौती

    पारम्परिक मीडिया की गति पर चुनौती

    पारम्परिक मीडिया की गति पर चुनौती

    पहले समाचार पत्र, टीवी और रेडियो सूचना का मुख्य स्रोत थे। सोशल मीडिया ने ’लाइव’ और ’रीयल टाइम’ रिपोर्टिंग को बढ़ावा दिया। अब समाचार पहले ट्विटर पर ट्रेंड होते हैं। बाद में अखबारों में छपते हैं। सोशल मीडिया ने सिटिजन जर्नलिज्म को बढ़ावा दिया। अब कोई भी व्यक्ति घटना का वीडियो या फोटो पोस्ट कर सकता है जिससे मीडिया हाउस भी सोशल मीडिया की खबरों पर निर्भर हो गए हैं। सोशल मीडिया पर खबरें छोटे-छोटे बाइट्स, आकर्षक हेडलाइंस और शॉर्ट वीडियो में प्रस्तुत की जाती हैं। रील्स, शॉर्ट्स और ट्वीट्स की दुनिया में लंबी खबरों का महत्व कम हुआ है। सोशल मीडिया पर भाषा अधिक सरल, लोकभाषा, हिंग्लिश और कभी-कभी स्लैंग तक पहुँच गई है। इसका उद्देश्य है अधिक से अधिक लोगों तक पहुँच। राजनीतिक दल, कॉर्पोरेट ब्रांड और सामाजिक आंदोलनों के लिए सोशल मीडिया अब सीधा जनसंपर्क का माध्यम बन चुका है। यहां ट्रेंड्स और वायरल कंटेंट चुनावों, नीतियों और सामाजिक सोच को तेजी से प्रभावित करते हैं। सोशल मीडिया के बूम के साथ ट्रोलिंग, अफवाह और फेक न्यूज भी बड़ी समस्या बन गई है जिसने मीडिया की साख और जिम्मेदारी दोनों पर दबाव बढ़ाया है। मतलब साफ है सोशल मीडिया ने भारतीय मीडिया के स्वरूप, प्रस्तुति, भाषा और समाज के साथ उसके रिश्ते को पूरी तरह बदल दिया है। अब मीडिया न सिर्फ पत्रकारों का है और न ही सिर्फ खबरों का, बल्कि हर व्यक्ति की राय, सोच और वीडियो भी मीडिया का हिस्सा हैं।

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  • ओटीटी प्लेटफार्म से बदलता मीडिया का स्वरूप

    ओटीटी प्लेटफार्म से बदलता मीडिया का स्वरूप

    ओटीटी प्लेटफार्म से बदलता मीडिया का स्वरूप

    ओटीटी (ओवर दी ऑप) प्लेटफॉर्म्स जैसे नेटफ्लिक्स, अमेज़न प्राइम, डिज़्नी$ हॉटस्टार, सोनी लिव, ज़ी5 और विशेष रूप से भारतीय प्लेटफॉर्म जैसे एमएक्स प्लेयर, ऑल्ट बालाजी आदि ने मीडिया के पारंपरिक ढांचे को पूरी तरह बदल दिया है। अब दर्शक खुद तय करते हैं कि उन्हें क्या देखना है, कब देखना है और किस भाषा में देखना है। ओटीटी प्लेटफॉर्म्स ने दर्शकों को मीडिया उपभोग की आज़ादी दी है। अब समय, स्थान या डिवाइस की बाध्यता समाप्त हो गई है। समाचार, वेब सीरीज़, फिल्में, डॉक्यूमेंट्री सब अब दर्शकों के हाथ में है। ओटीटी प्लेटफॉर्म्स ने भारतीय क्षेत्रीय भाषाओं के कंटेंट को नई ऊँचाइयाँ दी हैं। उदाहरणः “स्कैम 1992“ जैसे हिंदी वेब शो, “फैमिली मैन“ का तमिल व तेलुगु में डब होना, “राणा नायडू“ जैसे हिंदी-तेलुगु मिक्स कंटेंट का आना। अब मराठी, बंगाली, तमिल, भोजपुरी, पंजाबी में ओरिजिनल वेब सीरीज़ बन रही हैं जो पहले केवल फिल्मों तक सीमित थी। ओटीटी ने उन विषयों को मंच दिया है जिन्हें मुख्य धारा के टीवी चैनल या सिनेमा हिचकिचाहट से दिखाते थे। जैसेः लैंगिक असमानता, एलजीबीटीक्यू $ मुद्दे, ग्रामीण जीवन, राजनीतिक व्यंग्य, जातीय विषमता आदि। ओटीटी कंटेंट में संवाद अधिक स्वाभाविक, बोलचाल की भाषा, स्थानीय मुहावरे और देसी शब्दों का प्रयोग करते हैं। यहाँ पारंपरिक ’शुद्ध हिंदी’ या ’सांस्कृतिक मर्यादा’ का दबाव कम होता है। इससे मीडिया की भाषा आम आदमी के और करीब आ गई है। आज ओटीटी केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं है। कई समाचार एजेंसियां और डॉक्यूमेंट्री निर्माता भी ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर अपनी जगह बना रहे हैं। जैसे बीबीसी, वायस और एआई जाजीरा के समाचार आधारित डॉक्यूमेंट्री ओटीटी पर खूब देखे जा रहे हैं। टीवी और सिनेमा की तरह ओटीटी पर कठोर सेंसरशिप लागू नहीं है। इसने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को तो बढ़ाया है लेकिन इसके साथ भाषाई मर्यादा, अश्लीलता और अभद्र भाषा के प्रयोग पर बहस भी खड़ी कर दी है। खास यह है कि ओटीटी प्लेटफॉर्म का भाषा पर खासा प्रभाव पड़ा है: आंचलिक शब्दों और मुहावरों का तेजी से प्रयोग, हिंग्लिश और मिश्रित भाषा का वर्चस्व, स्थानीय स्लैंग का सामान्यीकरण, अभद्र भाषा के प्रयोग की बढ़ती स्वीकृति (जिस पर समाज में मतभेद भी हैं), क्षेत्रीय भाषाओं का ग्लोबलाइजेशन आदि प्रमुख है। कहा जा सकता हे ओटीटी प्लेटफॉर्म्स ने मीडिया के स्वरूप को पूरी तरह से लोकतांत्रिक बना दिया है। अब कंटेंट निर्माता के पास ज्यादा रचनात्मक आजादी है और दर्शक के पास भाषा व विषय का विस्तृत चयन। यह माध्यम भारतीय भाषाओं और विविध समाजों को वैश्विक मंच पर लाने में सबसे प्रभावी साबित हो रहा है।

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  • अन्धकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाला सद्गुरू

    अन्धकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाला सद्गुरू

    अन्धकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाला सद्गुरू

    मानव जीवन काल में सुख—दुख लगा रहता हैं। बिना गुरु के मानव जीवन में कल्याण नहीं होता है। अन्धकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाले सदगुरु है।जीवात्मा से परमात्मा का मिलन कराने वाला ही सच्चा सदगुरु है। हमारे हिन्दू सत्य सनातन धर्म में गुरु को महान विशेष दर्जा दिया गया है। गुरू पूर्णिमा ज्ञान और श्रद्धा का पर्व है।से आषाढ़ पूर्णिमा की महर्षि वेद व्यास जी की जयंती के रूप में मनाया जाता है। इस दिन शिष्य अपने गुरु के प्रति सम्मान पूजन और आभार प्रकट कर आध्यात्मिक जीवन में मार्गदर्शन का स्मरण किया जाता है। हिंदू धर्म में गुरु पूर्णिमा को बेहद पवित्र और आध्यात्मिक महत्व का दिन माना जाता है, क्योंकि इसी दिन महर्षि वेदव्यास जी का जन्म हुआ था। उन्होंने न केवल महाभारत, बल्कि श्रीमद्भागवत, अट्ठारह पुराण, ब्रह्म सूत्र जैसे ग्रंथों की रचना करके सनातन धर्म को अमूल्य धरोहर दी। गुरु पूर्णिमा को गुरु-शिष्य परंपरा का महोत्सव के रूप में मनाया जाता है। इस दिन लोग अपने आध्यात्मिक, सामाजिक या शैक्षिक गुरु का सम्मान करते हैं। उनका आशीर्वाद लेते हैं और उनके मार्गदर्शन के लिए कृतज्ञता प्रकट करते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन पवित्र नदियों में स्नान करना, दान-पुण्य करना और गुरु का पूजन करना अत्यंत शुभ माना जाता है।
    गुरु पूर्णिमा केवल एक पर्व नहीं बल्कि उस ज्ञान की आराधना है जो जीवन के अंधकार को मिटाकर हमें सही राह दिखाता है। गुरु पूर्णिमा वह विशेष दिन है जब हम अपने जीवन के गुरुओं को सम्मानपूर्वक नमन करते हैं। ये गुरु हमारे शिक्षक हो सकते हैं। माता-पिता, आध्यात्मिक मार्गदर्शक या कोई भी ऐसा व्यक्ति, जिसने हमें जीवन का सही रास्ता दिखाया हो। इस पर्व का धार्मिक और भावनात्मक महत्व बेहद गहरा है। मान्यता है कि आषाढ़ माह पूर्णिमा के दिन ही महर्षि वेद व्यास जी का जन्म हुआ था जिन्होंने वेदों, पुराणों और महाभारत जैसे ग्रंथों की रचना करके सनातन धर्म को एक गहरी बौद्धिक नींव दी। गुरु पूर्णिमा के अगले ही दिन से सावन मास का शुभारंभ होता है। जो विशेष रूप से उत्तर भारत में शिवभक्ति और व्रतों के लिए पवित्र माना जाता है।
    जानकारों के अनुसार भगवान विष्णु, मां लक्ष्मी और वेदव्यास जी की पूजा करने का विशेष महत्व बताया गया है। इस दिन लोग अपने गुरुओं का पूजन अर्चन कर आशीर्वाद लेते हैं। उन्हें उपहार अर्पित करते हैं व उनके प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। गुरु पूर्णिमा केवल परंपरा नहीं, बल्कि उस सच्चे ज्ञान और मार्गदर्शन की पूजा है जो जीवन को सार्थक बनाता है। गुरु-शिष्य परंपरा भारतीय सनातन धर्म संस्कृति का एक अभिन्न अंग है। जो ज्ञान, कौशल, नैतिक मूल्यों और आध्यात्मिक विकास को बढ़ावा देती है। यह एक अनमोल धरोहर है जिसे आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना आवश्यक है।
    बिपिन सैनी पत्रकार
    तेजस टूडे, जौनपुर।

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    600 बीमारी का एक ही दवा RENATUS NOVA

  • अखिलेश को बड़ा झटका देने की तैयारी में ब्राह्मण समाज!

    अखिलेश को बड़ा झटका देने की तैयारी में ब्राह्मण समाज!

    अखिलेश को बड़ा झटका देने की तैयारी में ब्राह्मण समाज!

    आजमगढ़, उत्तर प्रदेश का एक ऐसा जिला जो समाजवादी पार्टी (सपा) का गढ़ माना जाता है, 3 जुलाई 2025 को एक बार फिर सुर्खियों में था। सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने अपने नए आवास और पार्टी कार्यालय, जिसे उन्होंने पीडीए भवन नाम दिया, का उद्घाटन और गृह प्रवेश किया। यह भवन अनवरगंज में 72 बिस्वा जमीन पर बना है जिसमें अखिलेश का निजी निवास, पार्टी कार्यालय और समर्थकों के लिए एक बड़ा हॉल शामिल है लेकिन इस भव्य आयोजन के बीच एक सवाल ने सबका ध्यान खींचा। अखिलेश ने गृह प्रवेश की पूजा के लिए काशी के ब्राह्मण विद्वानों को आमंत्रित करने की कोशिश की लेकिन पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) समुदाय के किसी विद्वान को क्यों नहीं बुलाया? यह सवाल न केवल सियासी गलियारों में, बल्कि सोशल मीडिया और स्थानीय जनता के बीच भी चर्चा का विषय बन गया। ब्राह्मण समाज की नाराजगी की बात की जाय तो ब्राह्मण सभा ने सपा कार्यालय और आवास के गृह प्रवेश के लिये गये ब्राह्मणों को अपने समाज से निकाल दिया है। ब्राह्मणों की यह नाराजगी सपा को 2027 के चुनाव में भारी पड़ सकती है, यूपी में करीब 10 प्रतिशत ब्राह्मण हैं।
    आजमगढ़ में समाजवादी पार्टी का यह नया कार्यालय 2027 के विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखकर बनाया गया है। अखिलेश ने इसे पीडीए भवन नाम देकर अपनी रणनीति को स्पष्ट कर दिया। पीडीए, यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक सपा की राजनीतिक रणनीति का आधार रहा है जिसने 2024 के लोकसभा चुनावों में पार्टी को 37 सीटें दिलाकर उत्तर प्रदेश में बीजेपी के विजय रथ को रोकने में मदद की। अखिलेश ने उद्घाटन समारोह में कहा, “पीडीए की एकता ही हमें 2027 में सत्ता दिलाएगी।” इस भवन को न केवल एक कार्यालय, बल्कि एक प्रशिक्षण केंद्र के रूप में भी देखा जा रहा है जहां युवाओं को समाजवादी विचारधारा से जोड़ा जाएगा।
    इस आयोजन की चमक उस समय फीकी पड़ गई, जब यह खबर आई कि अखिलेश ने गृह प्रवेश की पूजा के लिए काशी के ब्राह्मण विद्वानों को बुलाने की इच्छा जताई थी लेकिन वे नहीं आए। सूत्रों के अनुसार काशी के पंडितों ने इटावा में हाल ही में हुए एक विवाद, जिसे ‘इटावा कथावाचक कांड’ कहा जा रहा है, के कारण नाराजगी जताते हुए पूजा कराने से मना कर दिया। इस कांड में अखिलेश के कुछ बयानों को ब्राह्मण समुदाय के खिलाफ माना गया था जिसमें उन्होंने कथित तौर पर दान-दक्षिणा और पूजा-पाठ की परंपराओं पर सवाल उठाए थे।
    अखिलेश ने अंततः स्थानीय पंडितों से पूजा करवाई और कुछ स्रोतों के अनुसार, पुजारी चंदन कुशवाहा ने इस कार्य को संपन्न किया लेकिन सवाल यह उठता है कि पीडीए भवन के उद्घाटन जैसे महत्वपूर्ण अवसर पर जब अखिलेश अपनी पीडीए रणनीति को और मजबूत करने की बात कर रहे थे, तब उन्होंने पीडीए समुदाय के किसी विद्वान को पूजा के लिए क्यों नहीं चुना? यह सवाल न केवल उनके विरोधियों, बल्कि उनके समर्थकों के बीच भी चर्चा का विषय बन गया। सोशल मीडिया पर कुछ लोगों ने इसे अखिलेश की रणनीति में विरोधाभास बताया। एक यूजर ने लिखा, “भवन का नाम तो रख दिया, लेकिन पूजा ब्राह्मणों से ही करवानी है। क्या पीडीए में कोई विद्वान नहीं था?” एक अन्य यूजर ने तंज कसते हुए कहा, “अखिलेश जी को कोई पीडीए का पंडित नहीं मिला क्या? कथनी और करनी में अंतर साफ दिखता है।” इन टिप्पणियों ने सपा के पीडीए फार्मूले पर सवाल उठाये जिसे अखिलेश ने हाल के वर्षों में अपनी पार्टी की छवि को यादव-मुस्लिम से हटाकर व्यापक बनाने के लिए अपनाया था।
    आजमगढ़ में पूजा के लिए ब्राह्मण विद्वानों को बुलाने की कोशिश को भी इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। अखिलेश शायद यह संदेश देना चाहते थे कि उनकी पार्टी सभी समुदायों को साथ लेकर चल रही है। लेकिन काशी के पंडितों की अनुपस्थिति और स्थानीय पंडितों द्वारा पूजा करवाने ने इस संदेश को कमजोर कर दिया। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि अखिलेश का यह कदम उनकी पीडीए रणनीति को मजबूत करने का प्रयास था लेकिन यह उल्टा पड़ गया।
    इस आयोजन को और चर्चा में लाने वाला एक अन्य पहलू था ब्राह्मण महासभा और विश्व हिंदू महासंघ के सदस्यों का विरोध। कुछ प्रदर्शनकारियों ने अखिलेश के खिलाफ काले झंडे लहराए और उन पर ब्राह्मण समुदाय की छवि खराब करने का आरोप लगाया। इसके अलावा एक सुरक्षा चूक ने भी सुर्खियां बटोरीं, जब एक युवक बैरिकेडिंग तोड़कर मंच के करीब पहुंच गया। पुलिस ने उसे तुरंत हिरासत में लिया लेकिन इस घटना ने अखिलेश की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाये।
    इन विवादों के बावजूद पीडीए भवन का उद्घाटन समाजवादी पार्टी के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है। यह भवन न केवल अखिलेश का दूसरा घर है, बल्कि पूर्वांचल में सपा की सियासी रणनीति का केंद्र भी बनेगा। अखिलेश ने अपने भाषण में बीजेपी पर जमकर हमला बोला और पूर्वांचल एक्सप्रेस वे का श्रेय अपनी सरकार को दिया। उन्होंने कहा कि लखनऊ से आजमगढ़ पहुंचने में उतना ही समय लगता है, जितना सैफई। यह हमारे द्वारा बनाए गए एक्सप्रेस वे की बदौलत है।
    बहरहाल, आजमगढ़ में पीडीए भवन का उद्घाटन और गृह प्रवेश एक सियासी मास्टर स्ट्रोक हो सकता था लेकिन ब्राह्मण विद्वानों की अनुपस्थिति और पीडीए समुदाय के विद्वानों को न बुलाने का फैसला सवालों के घेरे में आ गया जहां वे एक तरफ अपने मूल समर्थक वर्ग को मजबूत करना चाहते हैं तो दूसरी तरफ सवर्ण वोटरों को भी साधने की कोशिश कर रहे हैं। 2027 के चुनावों में यह रणनीति कितनी कारगर होगी, यह तो समय ही बतायेगा।
    अजय कुमार
    वरिष्ठ पत्रकार उत्तर प्रदेश
    मो.नं. 9335566111

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    600 बीमारी का एक ही दवा RENATUS NOVA

  • बिहार में वोटर लिस्ट जांच पर सबके अपने दावे और विचार

    बिहार में वोटर लिस्ट जांच पर सबके अपने दावे और विचार

    बिहार में वोटर लिस्ट जांच पर सबके अपने दावे और विचार

    बिहार में कुछ माह बाद होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के लिये उठाये गये कदम ने सियासी तूफान खड़ा कर दिया है। विपक्षी दल इस प्रक्रिया को लोकतंत्र पर हमला और गरीब, दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक समुदायों के मताधिकार को छीनने की साजिश करार दे रहे हैं। दूसरी ओर चुनाव आयोग इसे नियमित और संवैधानिक प्रक्रिया बताकर अपनी स्थिति मजबूत कर रहा है। यह विवाद अब दिल्ली के निर्वाचन सदन से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है और बिहार की सियासत में एक बड़ा मुद्दा बन चुका है। 10 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट इस मामले की सुनवाई कर सकता है।
    विपक्षी दलों, विशेष रूप से इंडिया गठबंधन के घटक दलों जैसे कांग्रेस, राष्ट्रीय जनता दल (राजद), समाजवादी पार्टी और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने इस पुनरीक्षण प्रक्रिया को वोटबंदी करार दिया है। 2 जुलाई 2025 को 11 विपक्षी दलों का 18 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल दिल्ली में निर्वाचन सदन पहुंचा और चुनाव आयोग से मुलाकात की। इस प्रतिनिधिमंडल में कांग्रेस के अभिषेक मनु सिंघवी, राजद के मनोज झा और सीपीआई (एमएल) के दीपांकर भट्टाचार्य जैसे प्रमुख नेता शामिल थे। इसी क्रम में ओवैसी ने भी अलग से चुनाव आयोग पहुंच कर अपना पक्ष रखा। विपक्ष का कहना है कि यह प्रक्रिया जल्दबाजी में शुरू की गई है और यह गरीब, ग्रामीण, और हाशिए पर रहने वाले समुदायों को मतदाता सूची से हटाने की साजिश है।
    कांग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि बिहार में लगभग 7.75 करोड़ मतदाता हैं। इतनी बड़ी संख्या की जांच कुछ महीनों में करना असंभव है। यह प्रक्रिया उन लोगों को निशाना बनाएगी जिनके पास जन्म प्रमाण पत्र या माता-पिता की नागरिकता जैसे दस्तावेज नहीं हैं। राजद नेता तेजस्वी यादव ने इसे और तीखे शब्दों में लोकतंत्र पर हमला बताया। उन्होंने सवाल उठाया। 2003 में पूरे देश में पुनरीक्षण हुआ था लेकिन अब सिर्फ बिहार में क्यों? यह प्रक्रिया मानसून के दौरान, जब बाढ़ आम है, शुरू की गई है। क्या यह गरीब और वंचित वोटरों को बाहर करने की साजिश नहीं है?
    विपक्षी नेताओं का तर्क है कि सत्यापन के लिए मांगे गए 11 दस्तावेज, जैसे पासपोर्ट, जन्म प्रमाण पत्र और माता-पिता की नागरिकता प्रमाण, अधिकांश गरीब और ग्रामीण लोगों के पास उपलब्ध नहीं हैं। तेजस्वी ने दावा किया कि बिहार के 8 करोड़ से अधिक मतदाताओं में से 60 फीसदी को अपनी नागरिकता साबित करनी होगी जो विशेष रूप से दलित, पिछड़े, और अल्पसंख्यक समुदायों के लिए चुनौतीपूर्ण है। एआईएमआईएम सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने इसे अव्यवस्थित और अवैज्ञानिक बताते हुए कहा कि यह प्रक्रिया पहले ही हो चुकी है और इसे दोहराने का कोई औचित्य नहीं है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने एक्स पर पोस्ट करते हुए इसे बीजेपी-आरएसएस की साजिश बताया जिसका मकसद दलितों और वंचितों के वोटिंग अधिकार छीनना है। योगेंद्र यादव ने अनुमान लगाया कि इस प्रक्रिया से 4.76 करोड़ मतदाताओं का नाम हट सकता है जिसे उन्होंने वोट उड़ाने का खेल करार दिया।
    उधर बीजेपी और एनडीए ने विपक्ष के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि यह प्रक्रिया निष्पक्षता और पारदर्शिता के लिए जरूरी है। बीजेपी नेता रविशंकर प्रसाद ने तंज कसते हुए कहा, जिनके राज में बूथ कैप्चरिंग और हिंसा आम थी, उन्हें अब निष्पक्षता से परेशानी हो रही है। हालांकि, एनडीए के कुछ सहयोगी, जैसे जेडीयू और लोक जनशक्ति पार्टी (राम विलास), ने दबी जुबान में इस प्रक्रिया की समय सीमा पर चिंता जताई है। बहरहाल कुल मिलाकर लगता है कि बिहार में मतदाता सूची का पुनरीक्षण एक नियमित प्रक्रिया हो सकती है लेकिन इसकी समय सीमा और दस्तावेजों की मांग ने इसे विवादास्पद बना दिया है। विपक्ष इसे गरीब और वंचित समुदायों के खिलाफ एक साजिश के रूप में देख रहा है जबकि चुनाव आयोग इसे लोकतंत्र को मजबूत करने का कदम बता रहा है। यह विवाद बिहार की सियासत को और गरमायेगा और इसका असर 2025 के विधानसभा चुनावों पर पड़ना तय है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला इस मामले में निर्णायक हो सकता है लेकिन तब तक यह मुद्दा बिहार की जनता और नेताओं के बीच बहस का केंद्र बना रहेगा। विपक्ष की आपत्तियों ने अब कानूनी रूप ले लिया है। सपा सांसद कपिल सिब्बल, तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा, राजद के मनोज झा, और कई गैर-सरकारी संगठनों ने इस प्रक्रिया को रद्द करने की मांग के साथ सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी ने कोर्ट से तत्काल सुनवाई की मांग किया, यह तर्क देते हुए कि इतने कम समय में यह प्रक्रिया संभव नहीं है और यह संविधान का उल्लंघन करती है। इस मामले की सुनवाई 10 जुलाई 2025 को होनी है।
    चुनाव आयोग ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि यह प्रक्रिया पूरी तरह संवैधानिक और नियमित है जो पिछले 75 वर्षों से समय-समय पर की जाती रही है। आयोग का कहना है कि इसका उद्देश्य अवैध प्रवासियों, जैसे नेपाल, बांग्लादेश और म्यांमार से आए लोगों को मतदाता सूची से हटाना और केवल भारतीय नागरिकों को वोटिंग का अधिकार सुनिश्चित करना है। मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने 4 जुलाई को स्पष्ट किया कि यह प्रक्रिया तय समय पर और पूरी पारदर्शिता के साथ पूरी की जाएगी। इसमें चुनाव कर्मियों और राजनीतिक दलों की सक्रिय भागीदारी है। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि 2003 की मतदाता सूची को आधार मानकर 4.96 करोड़ मतदाताओं को दस्तावेज जमा करने की आवश्यकता नहीं होगी। साथ ही एक गलतफहमी को दूर करते हुए आयोग ने कहा कि एक अखबार के विज्ञापन में केवल फॉर्म भरने की बात भ्रामक थी। मसौदा सूची में उन मतदाताओं के नाम शामिल होंगे जिनके गणना फॉर्म प्राप्त हो चुके हैं। आयोग ने यह भी बताया कि यह प्रक्रिया बिहार के अलावा असम, केरल, पुडुचेरी, तमिलनाडु, और पश्चिम बंगाल में भी लागू होगी। इसका मकसद मतदाता सूची को अपडेट करना, मृतकों के नाम हटाना और 18 वर्ष से अधिक उम्र के नए मतदाताओं को जोड़ना है।
    संजय सक्सेना
    वरिष्ठ पत्रकार लखनऊ
    मो.नं. 9454105568, 82990505

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    600 बीमारी का एक ही दवा RENATUS NOVA

  • काशी के पत्रकारों को कब मिलेगा उनका हक?

    काशी के पत्रकारों को कब मिलेगा उनका हक?

    काशी के पत्रकारों को कब मिलेगा उनका हक?

    सुरेश गांधी
    पत्रकार, लोकतंत्र के उस चौथे स्तंभ का हिस्सा हैं जो बिना किसी हथियार के हर दिन सच्चाई की लड़ाई लड़ते हैं लेकिन विडंबना देखिए, काशी जैसे ऐतिहासिक और सांस्कृतिक नगरी में जहां से विश्व को सत्य, संस्कृति और परंपरा का संदेश जाता है, वहीं के पत्रकार आज भी अपने बुनियादी हक़ आवास, पेंशन और सामाजिक सुरक्षा के लिए जूझ रहे हैं। खास तौर से यह सब तब जब खुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी उनके सांसद है और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ काशी के हर तबके के उत्थान के लिए संकल्पित है। यह सवाल केवल सुविधा का नहीं, बल्कि एक पूरे पेशे की गरिमा और सुरक्षा से जुड़ा है। जब गोरखपुर में पत्रकारों को मुख्यमंत्री आवास योजना का लाभ दिया गया तो काशी के पत्रकार क्यों अब तक प्रतीक्षा कर रहे हैं?
    काशी, जहां से पूरे विश्व तक साहित्य, संस्कृति और आध्यात्मिकता का संदेश जाता है, आज भी पत्रकारों की बुनियादी जरूरत आवास, पेंशन और स्वास्थ्य सुरक्षा पूरी नहीं हो पा रही। दूसरी ओर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा गोरखपुर में पत्रकारों के लिए शुरू की गई कल्याणकारी योजनाओं को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैंः’’ “काशी के पत्रकारों को उनका हक क्या कभी मिल पाएगा?”’’ जबकि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने गृह जनपद गोरखपुर में पत्रकारों के लिए आवासीय योजना का शुभारंभ कर स्पष्ट संदेश दिया था कि पत्रकारों के लिए सरकार गंभीर है। कोरोना काल में दिवंगत हुए पत्रकारों के परिजनों को 10-10 लाख रुपये की सहायता भी दी गई। यह कदम सराहनीय था लेकिन वही योजना वाराणसी जैसे महत्वपूर्ण धार्मिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक केंद्र में क्यों नहीं लाई जा रही? जब गोरखपुर मॉडल सफल हो रहा है तो काशी के पत्रकारों को इस योजना से क्यों वंचित रखा जा रहा है? यह अपने आप में एक बड़ा सवाल है। हालांकि यह कोई पहली बार नहीं है जब पत्रकार आवास की मांग कर रहे हैं। पूर्ववर्ती सरकारों में लखनऊ, गोरखपुर, प्रयागराज सहित कई जनपदों में पत्रकारों को आवास उपलब्ध कराए गए। अगर उन योजनाओं में कुछ गड़बड़ियां हुईं तो जांच होनी चाहिए थी। उन्होंने किन परिस्थितियों में ऐसा किया, न कि पूरी पीढ़ी को दंडित किया जाना चाहिए। क्या यह तर्क संगत है कि कुछ लोगों की गलतियों का बोझ नई पीढ़ी के पत्रकारों पर डाला जाए? जैसे भ्रष्टाचार के कारण विकास योजनाएं बंद नहीं की जातीं, वैसे ही अतीत की त्रुटियों के कारण वर्तमान पत्रकारों से आवास जैसी बुनियादी सुविधा छीनना भी एक किस्म का अन्याय है।
    हाल ही में लखनऊ में पत्रकारों के प्रतिनिधिमंडल ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात कर छह महत्वपूर्ण मांगें रखीं जिसमें 1. आवास योजना: राज्य व जिला स्तर पर पत्रकारों को सस्ती दरों पर मकान या फ्लैट उपलब्ध कराए जाएं। 2. पेंशन योजना: 60 वर्ष से अधिक उम्र के पत्रकारों को मासिक पेंशन सुनिश्चित की जाए। 3. स्वास्थ्य सुविधा: एसजीपीजीआई में इलाज के लिए विशेष फंड बनाया जाए और आयुष्मान योजना पुनः लागू की जाए। 4. मुआवजा: आकस्मिक मृत्यु पर 20 लाख की राहत राशि पुनः बहाल की जाए। 5. स्थायी समितिः जिला स्तर पर पत्रकार-प्रशासन समन्वय समिति बनाई जाए। 6. विशेष नोडल अधिकारी: स्वास्थ्य बीमा और इलाज के मामलों की देखरेख के लिए अलग अधिकारी नामित किए जाएं। राजस्थान, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र जैसे राज्यों में पत्रकार सुरक्षा अधिनियम लागू हो चुका है। कई राज्यों में पत्रकारों को पेंशन, बीमा और विशेष मेडिकल सुविधाएं मिल रही हैं। उत्तर प्रदेश में यह कदम अपेक्षाकृत धीमे हैं जबकि यहां पत्रकार हर दिन जान जोखिम में डालकर रिपोर्टिंग करते हैं। खासकर काशी जैसे संवेदनशील धार्मिक शहर में जहां के सांसद खुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी है। केंद्र सरकार के भी कई विभागों में पत्रकारों के लिए आयुष्मान योजना जैसी स्वास्थ्य सुविधाएं चल रही हैं परंतु उत्तर प्रदेश में पत्रकारों के आयुष्मान कार्ड निलंबित होने की शिकायतें लगातार आ रही हैं। पत्रकारों के लिए एसजीपीजीआई जैसी संस्थानों में इलाज के लिए विशेष फंड की मांग लखनऊ में जोरशोर से उठी। पत्रकारों का कहना है कि जब प्रशासनिक अधिकारी और जनप्रतिनिधि विशेष चिकित्सा सुविधा पा सकते हैं तो पत्रकार क्यों नहीं?
    हालांकि मुख्यमंत्री के सलाहकार अवनीश अवस्थी ने इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार का भरोसा दिया है। मुख्यमंत्री ने भी पेंशन योजना और चिकित्सा सुरक्षा पर सकारात्मक रुख दिखाया है लेकिन ज़मीनी अमल अब भी बाकी है। काशी के पत्रकार संगठनों ने स्थानीय स्तर पर बैठक कर जल्द ही मुख्यमंत्री को एक अलग ज्ञापन देने और सीधी मुलाकात की तैयारी कर ली है। सवाल यह नहीं है कि सुविधा कब मिलेगी, सवाल यह है कि जिन लोगों ने दशकों इस पेशे को ईमानदारी से निभाया, उन्हें कब तक अनदेखा किया जाएगा? पत्रकारों के प्रति सरकार का सकारात्मक रवैया केवल बयानों तक सीमित न रहे, यह वक्त की मांग है। पत्रकार आवास, पेंशन और स्वास्थ्य सुविधाएं कोई अनावश्यक मांग नहीं हैं। यह उनके हक़ की लड़ाई है जो पूरी तरह से न्याय संगत है। पूर्व की गलतियों का हवाला देकर नई पीढ़ी को सुविधाओं से वंचित करना उसी तरह है। जैसे एक बगीचे को इसलिए न सींचना, क्योंकि किसी समय किसी ने गलत बीज बो दिया था। अगर उत्तर प्रदेश सरकार ने गोरखपुर में पत्रकारों के लिए आवास दिया है तो काशी क्यों वंचित रहे? जब अन्य राज्यों ने पत्रकार सुरक्षा अधिनियम लागू किया है तो उत्तर प्रदेश में अब तक क्यों नहीं? काशी के पत्रकारों को अब वादों से नहीं, ठोस निर्णय की जरूरत है। यह हक़ की मांग है जिसे नजरअंदाज करना लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को कमजोर करने जैसा होगा।
    लखनऊ में 36 से अधिक सरकारी फ्लैट्स आवंटित करने की मांग की गई थी जिसे मुख्यमंत्री ने शीघ्र कार्यान्वयन का आश्वासन दिया। स्थानीय संगठन भी इस दिशा में सक्रिय हो गए हैं। उत्तर प्रदेश में 2024 में 60 वर्ष से ऊपर के पत्रकारों के लिए पेंशन स्कीम की शुरुआत हुई। मुख्यमंत्री के सलाहकार अवनीश अवस्थी ने स्पष्ट कहा: “पत्रकारों के पेंशन और आवास की समस्या का समाधान किया जाएगा”। मध्य प्रदेश, राजस्थान सहित कई राज्यों में पत्रकार को 3 से 5 हजार मासिक मिल रही है. यूपी में यह राशि अभी अस्पष्ट है परंतु जल्द घोषणा की उम्मीद जताई जा रही है। काशी में भी वरिष्ठ पत्रकार आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं और उनकी मांग है कि यह पेंशन जल्द लागू हो। पत्रकारों की एक और मांग है, एसजीपीजीआई में इलाज के लिए फंड 25 लाख से बढ़ाकर 50 लाख किया जाय। जब सरकार दावा करती है मानव सेवा का, तो पत्रकारों का जीवन-उपयोगिता का मानक जोड़ा जाना अनिवार्य है। पत्रकारों की आकस्मिक मृत्यु या दुर्घटना पर 20 लाख की राहत राशि बहाल करने की मांग दोहराई गई। कार्यकर्ता यह भी कह रहे हैं कि सिर्फ कल्याण योजनाएं नहीं, बल्कि पत्रकारों के मूल संरक्षण के लिए सुरक्षा कानून लागू होना चाहिए। हो जो भी काशी के पत्रकारों की मांग सिर्फ सुविधाओं की नहीं है, यह सम्मान की लड़ाई है। जब गोरखपुर और अन्य राज्यों में मॉडल साकार हो रहे हैं, तब यहां देर क्यों? अब वक्त है, केवल आश्वासनों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। सरकार को पात्र आवासीय समयसीमा तय करे, पेंशन राशि स्पष्ट करे, स्वास्थ्य कवर को व्यापक बनाए, सुरक्षा कानून लागू करे और पत्रकारों को वास्तविक, जमीन पर साबित इज्जत दे।

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  • महाप्रभू त्रिलोक नाथ को नमन

    महाप्रभू त्रिलोक नाथ को नमन

    महाप्रभू त्रिलोक नाथ को नमन

    महासुदर्शन धर वासुदेव को नमन,
    श्री धन्वंतरि भगवान जी को नमन,
    अमृत कलश जिनके हाथों में है,
    महाप्रभू त्रिलोकनाथ को नमन।

    सर्व भय से निर्भय करने वाले,
    सर्व रोगों से निरोगी करने वाले,
    सर्व पापों को नष्ट करने वाले,
    त्रिलोक पथगामी प्रभू को नमन।

    महाविष्णुस्वरूप, धन्वंतरिस्वरूप,
    श्री श्री श्री औषधचक्र धारी प्रभू,
    श्री ॐ नमोनारायण जी को नमन,
    महाप्रभू त्रिलोक स्वामी को नमन।

    भगवान धनवंतरि अमृतधारी हैं,
    सारे अनिष्ट वही नष्ट करते हैं,
    आदित्य त्रिलोक नाथ को नमन,
    विष्णु अवतार श्रीराम को नमन।

    डा. कर्नल आदिशंकर मिश्र
    विद्या वाचस्पति, लखनऊ।

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    600 बीमारी का एक ही दवा RENATUS NOVA

  • एक लाख की स्कूटी चौदह का नम्बर…!

    एक लाख की स्कूटी चौदह का नम्बर…!

    एक लाख की स्कूटी चौदह का नम्बर…!

    यह हमीरपुर के संजीव कुमार का शौक,
    हिमाचल प्रदेश के परिवहन विभाग को!
    “चौदह लाख”का लगाया तगड़ा “भोग”।
    “वीआयपी” नंबर के लिए इस शख्स ने,
    खाली कर दिया हैं अपना ख़ुद खजाना!
    यारों शौक के आगे नहीं हैं कोई बहाना।
    इतने में तो एक “लग्जरी”कार आ जाती,
    स्कूटी खरीदने से जब मिल रहीं ख्याति!
    इससे तो भैया खबर भी बनती हैं जाती।
    ये आयोजित ऑनलाइन हुई थी नीलामी,
    आये दोनों ही शख्स भी “नामी-गिरामी”!
    साढ़े तेरह व चौदह लाख की लगी बोली,
    प्रदेश में दोपहिया वाहनों की नंबर प्लेट!
    सोलन-हमीरपुर के बंदे करते हैं आखेंट।
    आज तक किसी भी नंबर प्लेट के लिए,
    इतनी बड़ी रकम कभी-भी ना मिली थी!
    राज्य की सरकार की बांछे न खिली थी।
    (संदर्भ- स्कूटी के नम्बर के लिये 14 लाख किये खर्च)

    संजय एम. तराणेकर
    (कवि, लेखक व समीक्षक)
    इन्दौर-452011 (मध्य प्रदेश)

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  • साथ आये उद्धव-राज ठाकरे की मराठी मानुषों पर सियासी नजर

    साथ आये उद्धव-राज ठाकरे की मराठी मानुषों पर सियासी नजर

    साथ आये उद्धव-राज ठाकरे की मराठी मानुषों पर सियासी नजर

    महाराष्ट्र की राजनीति में बड़ा खेला हुआ है। दशकों से सियासत की दुनिया में एक-दूसरे के दुश्मन बने दो भाई एक हो गये हैं। बात राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे के साथ आने की हो रही है। दोनों भाइयों ने एक साथ आने पर एक सुर में प्रतिक्रिया व्यक्त की। महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के प्रमुख राज ठाकरे ने कहाकि जो बाल साहब ठाकरे नहीं कर सके, वह आज देवेंद्र फडणवीस ने कर दिया। उन्होंने हम दोनों भाइयों को साथ खड़ा कर दिया। वहीं इस मौके पर उद्धव ठाकरे ने भी राज ठाकरे के सुर में सुर मिलाया। उन्होंने कहा कि हम क्या कहते हैं, इससे ज्यादा जरूरी है यह है कि हम साथ हैं। हम साथ आए हैं। साथ ही रहेंगे। हमें इस्तेमाल करके फेंकने वालों को अब हम फेंकेंगे।
    इस मौके पर दोनों ने कई मुद्दों पर अपनी प्रतिक्रिया दीं। उद्धव ठाकरे ने एकनाथ शिंदे पर भी निशाना साधा। उन्होंने कहा कि आपने हमें बहुत इस्तेमाल कर लिया है। अगर आपके पास बाला साहेब ठाकरे का समर्थन न होता तो आपको महाराष्ट्र में कौन जानता? आप हमें हिंदुत्व सिखाने वाले हैं कौन? उद्धव ने कहा कि जब मुंबई में दंगे हो रहे थे मराठा लोगों ने महाराष्ट्र में सभी हिंदुओं को बचाया था, चाहे वो कोई भी होंगे। अगर आप विरोध के लिए, न्याय पाने के लिए लड़ रहे मराठी लोगों को गुंडा कह रहे हैं तो ठीक है, हम गुंडा हैं। इसके पहले इस मौके पर राज ठाकरे ने कहा कि हिंदी अच्छी भाषा है। हमें हिंदी अच्छी लगती है। सारी भाषाएं अच्छी हैं लेकिन हिंदी भाषा को थोपा जाना बर्दाश्त नहीं। राज ठाकरे ने कहा कि महाराष्ट्र सरकार ने मराठी लोगों की मजबूत एकता के कारण त्रिभाषा फार्मूले पर फैसला वापस लिया। त्रिभाषा फार्मूला पर फैसला मुंबई को महाराष्ट्र से अलग करने की साजिश का मुख्य हिस्सा था। महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना प्रमुख राज ठाकरे ने केंद्र सरकार पर कथित रूप से देश भर में हिंदी थोपने को लेकर जमकर निशाना साधा। उन्होंने न सिर्फ शिक्षा व्यवस्था में बदलाव की आलोचना की, बल्कि भारतीय जनता पार्टी (को भी उसकी हिंदुत्व की परिभाषा पर सवालों के घेरे में खड़ा किया। राज ठाकरे ने लाल कृष्ण आडवाणी का उदाहरण देते हुए कहा कि एलके आडवाणी मिशनरी स्कूल में पढ़े हैं। क्या वह कम हिंदू हो गये?
    राज ठाकरे ने आगे कहा कि भाषा का व्यक्ति से क्या लेना-देना? उन्होंने कहाकि बाला साहेब ठाकरे और मेरे पिता श्रीकांत ठाकरे ने इंग्लिश मीडियम में पढ़ाई की। बाला साहेब ठाकरे ने अंग्रेजी स्कूल में पढ़ाई की, अंग्रेजी अखबार में काम किया लेकिन मराठी को लेकर कभी समझौता नहीं किया। दक्षिण भारत के कई राजनीतिक नेता और फिल्मी हस्तियां अंग्रेजी विद्यालयों में पढ़ी लेकिन उन्हें तमिल और तेलुगु भाषा पर गर्व है। लालकृष्ण आडवाणी ने सेंट पैट्रिक हाईस्कूल में पढ़ाई की

    , जो एक मिशनरी स्कूल था लेकिन उनके हिंदुत्व पर शक कर सकते हैं? मनसे प्रमुख ने कहाकि महाराष्ट्र से बड़ा कोई मुद्दा नहीं है। उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र के लिए जो कर सकते हैं करेंगे। राज ठाकरे ने इस दौरान कहा कि भाषा के बाद यह लोग जाति की राजनीति करेंगे। उन्होंने कहा कि ये मराठी लोगों को कभी एक साथ नहीं आने देंगे। राज ठाकरे ने कहाकि हिंदी बोलने वाले राज्य आर्थिक रूप से पिछड़े हुए हैं। लोग वहां से भागकर गैर हिंदी भाषी प्रदेशों की तरफ आ रहे हैं।
    राज ठाकरे ने आगे कहा कि यह लोग बस वोट के लिए ऐसा कर रहे हैं। अगर हिंदी लागू करने का यह फैसला चुपचाप स्वीकार कर लिया जाता तो आगे यह लोग अगले कदम के रूप में मुंबई को महाराष्ट्र से अलग कर देते। उन्होंने कहा कि हिंदी भाषी राज्यों पर कई साल तक मराठा शासन रहा। लेकिन क्या वहां पर कभी हमने मराठी लागू करने की कोशिश की? राज ठाकरे ने तंज करते हुए कहा कि मंत्रियों की हिंदी सुनोगे तो गिर पड़ोगे। कुल मिलाकर दोनों नेता हिन्दी और महाराष्ट्र में काम धंधा करने वाले यूपी-बिहार के हिन्दी बोलने वाले लोगों का विरोध करके मराठी मानुष के वोट को साधने की कोशिश करते नजर आये।
    अजय कुमार
    वरिष्ठ पत्रकार उत्तर प्रदेश
    मो.नं. 9335566111

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  • मोहर्रम के दौरान ईरानी नेता खामनेई के कसीदे क्यों?

    मोहर्रम के दौरान ईरानी नेता खामनेई के कसीदे क्यों?

    मोहर्रम के दौरान ईरानी नेता खामनेई के कसीदे क्यों?

    उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ सहित कई जिलों और जम्मू-कश्मीर के श्रीनगर में हाल ही में दो घटनाएं एक जैसी घटीं जिन्होंने देश भर में एक नई बहस छेड़ दी है। दरअसल भारत में मोहर्रम के दौरान शिया समुदाय द्वारा इमाम हुसैन की शहादत को याद करने के लिए जुलूस, ताज़िया और मातम का आयोजन किया जाता है। इस पवित्र महीने में मुसलमानों की धार्मिक भावनाएँ प्रबल होती हैं और विशेष रूप से शिया समुदाय अपने धार्मिक गुरुओं को सम्मान देता है। ऐसे मौके पर अक्सर राजनीति को धर्म से दूर रखा जाता है लेकिन हाल ही में उत्तर प्रदेश के उन्नाव, लखनऊ सहित देश के कई राज्यों में मोहर्रम के दौरान ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई के बैनर-पोस्टर लगाए गये जिसको लेकर विवाद खड़ा हो गया है। सवाल पूछा जा रहा है कि जब इजरायल और ईरान के बीच संबंध बेहद तनावपूर्ण हैं और भारत दोनों देश के नेताओं को समझा-बूझा रहा है तब समाज का एक वर्ग किसी एक देश की सरकार के पक्ष में क्यों खड़ा दिखाई देता है। वह भी ऐसे मौके पर जब शिया मुलसमान इमाम हुसैन की शहादत को याद करके मातम बना रहे है। यह तर्क दिया जा सकता है कि खामेनेई एक धार्मिक शख्सियत हैं लेकिन इसके साथ सच्चाई यह भी है के वह इस समय सियासी रूप में नजर आ रहे हैं।
    बहरहाल उत्तर प्रदेश में तमाम जिलों के स्थानीय प्रशासन और पुलिस ने इन पोस्टरों को हटाने का आदेश दिया, क्योंकि सार्वजनिक स्थानों पर विदेशी नेताओं की तस्वीरें लगाना नियमों के खिलाफ माना जाता है। कई लोगों का मानना है कि यह भारत की संप्रभुता और सामाजिक सौहार्द के लिए खतरा हो सकता है, खासकर जब ईरान-इज़रायल संघर्ष की पृष्ठभूमि में इसे राजनीतिक समर्थन के रूप में देखा जाता है। उन्नाव में पुलिस ने शांति बनाए रखने के लिए पोस्टर हटवाये जिस पर शिया संगठनों ने नाराज़गी जताई। मौलाना यासूब अब्बास जैसे धर्मगुरुओं ने इसे धार्मिक भावनाओं पर हमला बताया जबकि प्रशासन का कहना था कि यह कदम सामुदायिक तनाव को रोकने के लिए ज़रूरी था।
    गौरतलब हो कि धर्म के नाम कुछ शिया मुसलमान जो कर रहे हैं, उसके चलते भारत-इजरायल के पुराने संबंधों भी प्रभावित हो सकते हैं। कुछ लोग इसे वैचारिक प्रदर्शन मानते हैं जो इमाम हुसैन के अन्याय के खिलाफ संघर्ष को दर्शाता है। फिर भी भारत जैसे बहु-सांस्कृतिक देश में ऐसी गतिविधियां सावधानी बरतने की मांग करती हैं, ताकि सामाजिक एकता बनी रहे। लखनऊ में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई का पोस्टर लगाए जाने और श्रीनगर में मुहर्रम के दौरान आतंकी संगठन हिज़्बुल्लाह के झंडे लहराए जाने की घटनाएं न केवल राष्ट्रीय स्तर पर, बल्कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति के दायरे में भी चर्चा का विषय बन गई हैं। इन घटनाओं ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या धार्मिक आस्था की आड़ में भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष देश में विदेशी एजेंडा पनप रहा है? लखनऊ के अवध पॉइंट स्थित शिया धर्मगुरु मौलाना यासूब अब्बास के आवास, शिया डिग्री कालेज, विक्टोरिया स्ट्रीट आदि कुछ स्थानों पर जब अयातुल्ला खामेनेई के बड़े-बड़े पोस्टर लगाये गये तब कई लोगों ने इसे सामान्य धार्मिक परंपरा माना।
    मौलाना यासूब ने सफाई दी कि हर साल की तरह इस बार भी हैदरी टास्क फोर्स की ओर से ये पोस्टर लगाए गए हैं। बहरहाल शिया धर्मगुरूओं को यही लगता है कि खामेनेई शिया समुदाय के लिए एक धार्मिक गुरु हैं, इसलिए इसमें कोई राजनीतिक एजेंडा नहीं है लेकिन इस बार मामला इसलिए खास बन गया क्योंकि यह पोस्टर ऐसे समय लगाया गया, जब ईरान और इज़रायल के बीच 12 दिन तक भयंकर संघर्ष चला। ऐसे में जब भारत में किसी ऐसे देश के सर्वाेच्च नेता की सार्वजनिक तस्वीरें सामने आती हैं जो खुद को इज़रायल का शत्रु घोषित करता है तो विवाद होना लाज़िमी था। इस घटना के बाद सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएं आईं। कई लोगों ने पूछा कि जब भारत की सरकार किसी भी वैश्विक संघर्ष में निष्पक्ष भूमिका अपनाने की नीति पर चल रही है तब भारत की सड़कों पर विदेशी नेताओं के प्रचार की आवश्यकता क्या है? क्या यह धार्मिक भावनाओं की अभिव्यक्ति है या भारत में विदेशी राजनैतिक विचारधाराओं के लिए ज़मीन तैयार करने की एक कोशिश? यह सवाल और गंभीर हो जाता है कि क्या भारत की धार्मिक स्वतंत्रता का दायरा इतना बड़ा है कि उसके भीतर दूसरे देशों की राजनीति को भी छिपने की जगह मिल जाए? क्या धर्म के नाम पर कोई भी समूह किसी विदेशी नेता के लिए समर्थन जुटा सकता है, भले ही उसका भारत से कोई लेना-देना न हो?
    इस घटना के बाद उत्तर प्रदेश की खुफिया एजेंसियां सतर्क हो गईं। प्रशासन ने उन इलाकों में निगरानी बढ़ा दी जहां शिया आबादी अधिक है। अधिकारियों ने सार्वजनिक रूप से कुछ नहीं कहा लेकिन सुरक्षा व्यवस्था को लेकर अंदरखाने गंभीरता देखी गई। इससे पहले भी जब इज़रायल ने ईरान पर हमला किया था तब मौलाना यासूब अब्बास के नेतृत्व में लखनऊ में प्रदर्शन हुए थे। उस समय इज़रायल और अमेरिका के नेताओं के पोस्टर जलाए गए थे और भारत सरकार से ईरान के समर्थन की मांग की गई थी। इस पूरे मामले को तब और तूल मिला जब श्रीनगर की सड़कों पर मुहर्रम के दौरान हिज़्बुल्लाह और फिलिस्तीन के झंडे दिखाई दिए। इन झंडों को लेकर न केवल मीडिया में, बल्कि प्रशासनिक हलकों में भी चिंता बढ़ गई। यह पहला मौका नहीं है जब श्रीनगर के शिया मुसलमानों ने इस प्रकार की राजनीतिक अभिव्यक्तियाँ की हो लेकिन इस बार यह खुलेआम और संगठित रूप से हुआ। हिज़्बुल्लाह के प्रमुख हसन नसरल्लाह और अयातुल्ला खामेनेई के पोस्टर लेकर जुलूस में नारे लगाए गए।हिज़्बुल्लाह एक लेबनानी शिया आतंकी संगठन है जिसे अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी और खाड़ी के कई देशों ने आतंकी संगठन घोषित कर रखा है। 1983 में बेरूत में अमेरिकी मरीन बैरक पर हमला, 1985 में एक विमान का अपहरण और 1994 में अर्जेंटीना में यहूदी केंद्र पर हमला कृ ये सभी हमले इसी संगठन के नाम हैं। हिज़्बुल्लाह ईरान समर्थित संगठन है और इसका मकसद इज़रायल को मिटाना बताया गया है। भारत से इसका कोई सीधा नाता नहीं है, फिर भी श्रीनगर के कुछ शिया समूह इसे अपना प्रतिनिधि मानते हैं।इस समर्थन का आधार धार्मिक है।
    शिया मुसलमानों की मान्यता है कि मुहर्रम में इमाम हुसैन ने यज़ीद के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी और अब इज़रायल को आधुनिक यज़ीद बताया जा रहा है। हिज़्बुल्लाह को ‘हुसैनी फौज’ की तरह पेश किया जा रहा है जो इज़रायल से लड़ रहा है। इस विचारधारा के मुताबिक हसन नसरल्लाह जैसे नेता आज के दौर में इमाम हुसैन की तरह हैं जो ‘जालिम ताकतों’ से लड़ रहे हैं। यही कारण है कि इनका समर्थन सिर्फ धार्मिक नहीं, बल्कि राजनीतिक और वैचारिक स्तर पर भी हो रहा है लेकिन सवाल उठता है कि क्या इस प्रकार की भावनाएं भारत की राष्ट्रीय अखंडता के लिए खतरा बन सकती हैं? धार्मिक आयोजन अगर वैश्विक राजनीतिक संघर्षों का मंच बनने लगे तो भारत की गंगा-जमुनी तहजीब को गंभीर चोट पहुँच सकती है। इससे पहले भी श्रीनगर में हमास और फिलिस्तीन के समर्थन में नारे लग चुके हैं। ऐसे माहौल में जब भारत के युवा वैश्विक इंटरनेट पर धार्मिक कट्टरता की ओर आकर्षित हो रहे हैं, तब इन जुलूसों के माध्यम से उन्हें अप्रत्यक्ष रूप से कट्टरता के लिए प्रेरित किया जा सकता है। सरकार और खुफिया एजेंसियों को अब यह सोचना होगा कि धार्मिक स्वतंत्रता और राष्ट्र हित के बीच संतुलन कैसे साधा जाए। धार्मिक आयोजन और जुलूसों पर नजर रखना अब केवल सांप्रदायिक तनाव से बचने के लिए नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी जरूरी हो गया है। अगर कोई धार्मिक समूह विदेशी आतंकी संगठन के झंडे लहराता है तो यह केवल धार्मिक भावना नहीं, बल्कि भारत की संप्रभुता के लिए सीधा खतरा है।सरकार को चाहिए कि वह स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करे कि धार्मिक आयोजनों में विदेशी नेताओं, संगठनों या झंडों का प्रदर्शन प्रतिबंधित हो। धार्मिक नेताओं को भी यह जिम्मेदारी लेनी चाहिए कि वे धार्मिक आयोजनों को राजनीतिक रंग न दें।
    धर्म और राजनीति का मिश्रण एक ऐसा विस्फोटक मेल है जो समाज की जड़ों को हिला सकता है। यह भी आवश्यक है कि मुस्लिम समुदाय के भीतर से ही इस प्रकार की गतिविधियों का विरोध हो। भारत में अधिकांश मुसलमान देशभक्त हैं और भारत के संविधान में विश्वास रखते हैं लेकिन जब कुछ कट्टरपंथी तत्व समुदाय की आड़ में विदेशी संगठनों का समर्थन करते हैं तो इससे पूरे समुदाय की छवि धूमिल होती है।मीडिया, सामाजिक संगठनों और शिक्षाविदों को भी आगे आकर यह बहस छेड़नी चाहिए कि धार्मिक आयोजनों को वैश्विक राजनीतिक संघर्षों से दूर कैसे रखा जाए। मुहर्रम या किसी भी धार्मिक आयोजन का उद्देश्य भक्ति, शोक और आत्मचिंतन होना चाहिए, न कि अंतरराष्ट्रीय सियासत का समर्थन। लखनऊ और श्रीनगर की घटनाएं केवल स्थानीय घटनाएं नहीं हैं, बल्कि यह भारत की सामाजिक संरचना, धार्मिक स्वतंत्रता और सुरक्षा नीति के लिए एक चेतावनी हैं। अगर अभी ध्यान नहीं दिया गया तो यह प्रवृत्ति भविष्य में और गहरी जड़ें जमा सकती है। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि भारत की धरती पर विदेशी झंडे नहीं, बल्कि केवल भारतीयता की पहचान फहराये।
    संजय सक्सेना, लखनऊ
    9454105568

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    600 बीमारी का एक ही दवा RENATUS NOVA

  • बच्चों को हिंसक एवं बीमार बना रहा सोशल मीडिया

    बच्चों को हिंसक एवं बीमार बना रहा सोशल मीडिया

    बच्चों को हिंसक एवं बीमार बना रहा सोशल मीडिया

    सोशल मीडिया के बढ़ते उपयोग से बच्चों का बचपन न केवल प्रभावित हो रहा है, बल्कि बीमार, हिंसक एवं आपराधिक भी हो रहा है। यह चिंताजनक एवं चुनौतीपूर्ण है। यह बच्चों को समय के प्रति, परिवार एव सामाजिक कौशल के प्रति और मानसिक स्वास्थ्य के प्रति नकारात्मक रूप से प्रभावित कर सकता है। सोशल मीडिया ने बच्चों से बाल-सुलभ क्रीड़ाएं ही नहीं छीनी, बल्कि दादी-नानी की कहानियों से भी वंचित कर दिया है। कुछ विशेषज्ञ इस बात से चिंतित हैं कि सोशल मीडिया के अत्यधिक उपयोग से बच्चे अनैतिक, उग्र, जिद्दी एवं आक्रामक भी हो रहे हैं जो उन्हें चिंता और अवसाद में धकेल रहे हैं। बच्चें सोशल मीडिया पर वक्त ज्यादा गुजार रहे हैं, ऑनलाइन गेम्स ने बच्चों की दुनिया ही बदल दी है। अब यह आवाज उठने लगी है कि क्यों न बच्चों के लिए सोशल मीडिया के उपयोग को प्रतिबंधित कर देना चाहिए? टेन के हार्परकॉलिन्स और नीलसन आईक्यू की एक अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट में ऐसे ही चिन्ताजक तथ्य सामने आये हैं कि बड़ी संख्या में युवा माता-पिता कहानियों की बजाय डिजिटल मनोरंजन को प्राथमिकता दे रहे हैं। पंचतंत्र से लेकर स्नो व्हाइट पिनोकियो जैसी कहानियां अब शेल्फ पर धूल फांक रही हैं। नये बन रहे समाज एवं परिवार में सोशल मीडिया जहर घोल रहा है।
    स्मार्टफोन बड़ों ही नहीं, बल्कि बच्चों के हाथ में आ गया है। जवान और बूढ़े ही नहीं छोटे-छोटे बच्चे तक इसके आदी होते जा रहे हैं। व्हाट्सएप, फेसबुक, गेम्स सब कुछ स्मार्टफोन पर होने की वजह से बच्चों और युवाओं में इसकी आदत अब धीरे-धीरे लत में तब्दील होती जा रही है। सोने के समय बच्चों को कहानियां सुनाना या उनके लिए लोरियां गाना कभी पारिवारिक संस्कृति का अहम हिस्सा हुआ करता था। दादी-नानी हों या माता-पिता की सुनाई गई परीकथाएं बच्चों के लिए नींद से पहले की सबसे प्यारी यादें होती थीं। लेकिन अब सोशल मीडिया के आने से इसके बिना बचपन सूना हो रहा है। बच्चे किताबों और खेलकूद के मैदानों से दूर हो रहे हैं। स्क्रीन की नीली रोशनी उनकी आंखों के साथ दिमागी सेहत पर भी बुरा असर डाल रही है। इसके अलावा शारीरिक श्रम एवं रचनात्मकता भी कम हो गई है। यह केवल पश्चिमी देशों की ही नहीं, बल्कि भारत की भी सच्चाई बन चुकी है। जेन जेड यानी 1996 से 2010 के बीच जन्मे युवा माता-पिता अब इस प्यारी परंपरा से मुंह मोड़ रहे हैं। हालिया शोधों से पता चला है कि अब कहानियां पढ़ना-सुनाना जेन जेड माता-पिता के लिए जिम्मेदारी एवं मनोरंजन नहीं, बल्कि एक थकाऊ काम बन गया है। मोबाइल अब केवल बच्चों के लिए ही समस्या नहीं है, बल्कि बड़े भी इसकी चपेट में हैं। यह सिर्फ फोन या मैसेज करने तक ही सीमित नहीं रहा है। ना जाने कितने ही तरह के ऐप्स, व्हाट्सएप, फेसबुक जैसी सोशल मीडिया एप और गेम्स बड़ों एवं बच्चों को दिन भर व्यस्त रखते हैं लेकिन अगर मोबाइल के बिना आपको बेचैनी होती है तो समझ जाइये कि आप भी इस एडिक्शन के शिकार होते जा रहे हैं जो आपके लिए चिन्ता की बात है।
    टेन के हार्परकॉलिन्स और नीलसन आईक्यू की ताजा रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में खासकर महानगरों और शहरी इलाकों में सोशल मीडिया का बच्चों में प्रचलन अधिक बढ़ रहा है। पढ़ने को मनोरंजन एवं ज्ञान का हिस्सा मानने की बजाय ‘गंभीर पढ़ाई’ से जोड़कर देखा जा रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक नई पीढ़ी के अभिभावकों को लगता है कि बच्चों को कहानी सुनाना एक अतिरिक्त जिम्मेदारी है। शहरीकरण एवं पारिवारिक संरचना में बदलते स्वरूप से पिछले दस सालों में बड़े बदलाव हुए हैं, संयुक्त परिवार की जगह अब एकल परिवार हैं जहां दादी-नानी जैसे कहानी सुनाने वाले सदस्य मौजूद नहीं है। समय की कमी, कामकाजी जीवन की व्यस्तता और थकान के कारण माता-पिता के पास बच्चों को कहानी सुनाने का समय नहीं बचता। नई पीढ़ी के माता-पिता खुद ही पढ़ने की आदत से दूर हो चुके हैं जिससे बच्चों को प्रेरणा नहीं मिलती। स्कूल का होमवर्क भी इसमें बड़ी बाधा है। रिपोर्ट के आंकडों के अनुसार 41 प्रतिशत माता-पिता ही रोज अपने 4 साल तक के बच्चों को कहानी सुनाते हैं जबकि 2012 में यह आंकड़ा 64 प्रतिशत था। 28 प्रतिशत जेन जेड माता-पिता पढ़ने को एक मजेदार गतिविधि नहीं मानते।
    बच्चों की सोशल मीडिया चैनल्स पर उपस्थिति उन्हें वास्तविक जीवन से दूर करके वर्चुअल दुनिया में ले जा रही है। जहां दिखावटीपन एवं नकारात्मकता की भरमार है। इससे बच्चों का बचपन तो छिन ही रहा है, उनका मानसिक एवं शारीरिक विकास भी अवरुद्ध हो रहा है। सोशल मीडिया यानी यूट्यूब-इंस्टा, अन्य सोशल साइट की लत बच्चों को वास्तविक दुनिया से दूर कर रही है और उनकी एकाग्रता, याददाश्त और ध्यान की क्षमता को कम करके उन्हें अपंग, बीमार एवं हिंसक बना रही है। बच्चे अपने प्रश्नों का हल या समस्या का निवारण किताबों में ढूँढकर पढ़ने के बजाय केवल मोबाइल पर ढूँढने के आदी होते जा रहे हैं जो उचित नहीं है। मोबाइल और साइबर एडिक्शन अब एक गम्भीर समस्या बनती जा रही है जो बच्चों की दिनचर्या पर बुरा असर डाल रही है। इससे मानसिक विचलन और चिड़चिड़ापन बढ़ता जा रहा है कि हम छोटी छोटी बातों पर घर-परिवार के सदस्यों पर गुस्सा करने लग गये हैं।
    मोबाइल आपके बच्चे से उसका बचपन ही नहीं छीन रहा है, बल्कि उसे हिंसक भी बना रहा है। हरियाणा में 9 साल के एक बच्चे को इसकी इतनी बुरी लत थी कि उसने स्मार्टफोन छीने जाने की वजह से अपना हाथ काटने की कोशिश की। मोबाइल की लत का ये इकलौता मामला नहीं है। 12 साल का अविनाश मोबाइल के बिना एक पल नहीं रह सकता। उससे अगर मोबाइल छीन लिया जाये तो वह गुस्से में आ जाता है। ऐसी ही लत है भोपाल यूनिवर्सिटी की प्रिया को। उसे व्हाट्सऐप की ऐसी लत लगी कि वह पूरी रात जगी रह जाती है। अब वह इस लत से छुटकारा पाने के लिए मानसिक अस्पताल में काउन्सलिंग ले रही है।
    मोबाइल की लत से बच्चे आपराधिक भी होते जा रहे हैं और गलत कदम तक उठा रहे हैं। अभी हाल ही में ग्रेटर नोएडा में एक 16 वर्षीय लड़के ने अपनी माँ और बहन की हत्या कर दी, क्योंकि बहन ने शिकायत कर दी थी कि भाई दिन भर मोबाइल फोन पर खतरनाक गेम खेलता रहता है और इसलिए माँ ने बेटे की पिटाई की, उसे डाँटा और उसका मोबाइल छीन लिया। मोबाइल पर मारधाड़ वाले गेम खेलते रहने के आदी लड़के का गुस्सा इसी से बढ़ गया। इसी तरह कुछ महीनों पहले कोटा में एक 16 वर्षीय किशोर ने फाँसी लगाकर आत्महत्या कर ली। पुलिस की जाँच पड़ताल में पता चला कि बच्चे को पबजी गेम खेलने की लत थी और दिन भर मोबाइल में गेम खेलता रहता था। जब घरवालों ने मोबाइल छीन लिया और देने से मना कर दिया तो यह गलत कदम उठा लिया।
    देश में बड़े अस्पतालों में मोबाइल की लत के शिकार लोगों के इलाज के लिए खास क्लीनिक हैं और यहाँ आने वाले मरीजों की संख्या जिनमें बच्चें बहुतायत में हैं, अब दिनोंदिन बढ़ती जा रही है। मोबाइल और एप बनाने वाली कम्पनियाँ अपने मुनाफे के लिए कितनी अमानवीय हो गयी हैं कि यह सब जानते हुए भी लोगों को मानसिक रोग के गड्ढे में धकेल रही हैं। वे नये-नये गेम बनाकर मुनाफा बटोर रही हैं। परिवार एवं समाज में जागरूकता अभियान के साथ सरकार को इस उभर रहे बड़े संकट पर ध्यान देना होगा। बच्चों को खेल, कला, संगीत सहित अन्य गतिविधियों में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित करना होगा। बच्चों को ऑनलाइन सुरक्षा के बारे में जानकारी दें और उन्हें साइबर अपराधों से बचने के तरीके सिखाएं। बच्चों को सोशल मीडिया का उपयोग करने के बारे में सही जानकारी देना और उन्हें इसके नकारात्मक प्रभावों से बचाना जरूरी है।
    प्रो. राहुल सिंह अध्यक्ष
    उत्तर प्रदेश वाणिज्य परिषद

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    600 बीमारी का एक ही दवा RENATUS NOVA

  • घड़ी…!

    घड़ी…!

    घड़ी…!

    जिसने भी बनाई है,
    दुनिया में घड़ी…
    क्या कहूँ… कैसे कहूँ…?
    अच्छाईयों के साथ ही उसने,
    समस्या कर दी कई खड़ी…
    जनम होते ही प्यारे,
    राशि- लगन देखने को…!
    ज्योतिषी को जरूरत इसकी पड़ी…
    बाँचने को उम्र भर का भविष्य…!
    कुण्डली की नीँव… होती यही घड़ी…
    घड़ी को देखना और सीखना भी…!
    रही हमेशा ही… एक कठिन घड़ी…
    सिखलाई के दौर में… अनायास ही…
    माँ-बाप ने कई-कई चपत जड़ी…
    हाथ में जो पड़ी पहली बार घड़ी…!
    सबकी निगाह… घड़ी पर ही चढ़ी…
    और पूछा हर किसी ने…!
    उम्मीद लगा कर बड़ी-बड़ी…
    क्या बजा रही है प्यारे… आपकी घड़ी
    सचमुच… जरूरत हर किसी को…
    इस घड़ी की है पड़ी… चाहे…
    अमीर हो या कोई गरीब हो….या…
    हो ऑला लिए डॉक्टर… या फिर…
    मास्टर… हाथ में लिए छड़ी…
    घड़ी के कारण ही प्यारे…!
    होती है हर परीक्षा कड़ी…
    घड़ी के कारण ही… स्कूल में भी…
    अक्सर ही गुरुदेव ने जड़ी… छड़ी…
    जो खेल खेला कभी अधिक देर तक
    इस घड़ी के कारण ही…!
    दरवाजे पर… जम के चपत पड़ी…
    नींद से भोर में ही जगाती रही घड़ी
    और तो और अकारण ही…!
    नींद से हमेशा ही… लड़ी है घड़ी…
    कभी क्विज़ हुआ तो मुताबिक घड़ी
    चलती है….सवालों की झड़ी…
    खेल में भी प्यारे… ढूँढने को विजेता…
    चाहिए होती है… एक अदद घड़ी…
    यही नहीं प्यारे…!
    गौर से देखो तो सही…
    चाँद और सूरज की चाल भी,
    तय कर रही है यहाँ घड़ी…
    मंगल हो या हो अमंगल…!
    लोकतंत्र हो या कि हो राजतंत्र,
    दोनों के ही दुनियावी काज में…!
    यहाँ तक कि मंत्र और नमाज में भी
    चाहिए होती है यह घड़ी…
    विवाह के हर चोंचलों से अलग…!
    लोगों की निगाह पर होती है घड़ी…
    घड़ी पर ही यहाँ… टिकी होती है…
    बेचारे दूल्हे की….इज्जत बड़ी…
    यात्रा में भी देखो यारों…!
    जीप हो या बस… या हो रेलगाड़ी…
    इनको तो चलाती ही है घड़ी…
    ध्यान से देखो तो… समय से…
    जहाज को भो उड़ाती है घड़ी…
    थाना-पुलिस में भी देख लो प्यारे…
    जी.डी./सी.डी. भी चलाती है घड़ी…
    पल-पल का हिसाब यहाँ…!
    जोड़े-घटाए रखती है घड़ी…
    जाहिर है जनाब… जग में…
    जीवन के हर मोड़ पर,
    जरूरत है घड़ी… पर यहीं…
    यह भी क़ाबिल-ए-गौर है प्यारे…
    कि इस घड़ी की भी…!
    है दुश्वारियां बड़ी-बड़ी…
    कुछ अजीब सी दासताँ है कि…!
    सबको यहाँ चाहिए चलती हुई घड़ी…
    कोई भी रखना नहीं चाहता…
    घरों में घड़ी बंद सी पड़ी… क्योंकि…
    विकास का और भाग्य का पर्याय है…
    चलती हुई घड़ी… चलती हुई घड़ी…
    बंद हो जो कोई घड़ी…!
    मानी गई है… यहाँ सदा…
    दुख की घड़ी… दुख की घड़ी…
    रचनाकार—— जितेन्द्र कुमार दुबे
    अपर पुलिस उपायुक्त, लखनऊ

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  • जीवन में बढ़ती उम्र के बदलाव

    जीवन में बढ़ती उम्र के बदलाव

    जीवन में बढ़ती उम्र के बदलाव

    अपने जीवन की अब छिहत्तर की उम्र
    पारकर सतहत्तर की ओर जा रहा हूँ,
    जीवन में बदलाव महसूस कर रहा हूँ,
    मन में मैं आज़ाद महसूस कर रहा हूँ।

    मेरे सगे सम्बन्धियों, मेरी पत्नी, मेरे
    बच्चों, दोस्तों से प्यार करने के बाद,
    अब मैं स्वयं से प्यार करने लगा हूँ,
    एहसास हुआ है कि मैं अब मैं नहीं हूँ।

    दुनिया मेरे ही कंधों पर नहीं टिकी है,
    मैं ठेले वालों से मोलतोल नहीं करता,
    इसलिए उनको कुछ पैसे अधिक दे
    कर मैं मेरी जेब की बचत नहीं करता।

    मैं इस तरह से गरीब को अपना घर
    चलाने में थोड़ी मदद कर सकता हूँ,
    मैं वापस छुट्टे का इंतजार किए बिना
    टैक्सी चालक को भुगतान करता हूँ।

    अतिरिक्त धन उसके चेहरे पर एक
    ख़ुशी की मुस्कान तो ला ही सकता है,
    आखिरकार वह जीने के लिए मुझ
    से कहीं ज़्यादा मेहनत जो करता है।

    अपनी उम्र के लोगों को बताना बंद,
    कर दिया, वे वो कहानी सुना चुके हैं,
    आखिर वो कहानी उनकी बीती यादें
    ताज़ा कर जीवन का हौंसला देती हैं।

    आदित्य कोई इंसान गलत भी हो तो
    मैंने उसको सुधारना बंद किया है,
    सबका ठेका मैने ही नहीं लिया है,
    टोकाटोकी से अपनी शांति भली है।

    डा. कर्नल आदिशंकर मिश्र
    ‘विद्या वाचस्पति’ लखनऊ।

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