एक तरफ तो पूंजीपतियों के नुमाइंदे यह बोल रहे हैं कि देश की तरक्की के लिए सप्ताह में ‘70 घंटे और 90 घंटे’ काम करने की जरूरत है, दूसरी तरफ देश की करीब आधी जनसंख्या के पास इतना समय है कि वह कुंभ मेले में स्नान के लिए जाती है। यह भारत के लिए चिंता का विषय होना चाहिए। हम देख रहे हैं कि कई युवा-युवतियां जो कि आईआईटी किये हुए हैं, वह भी साधु बनने आ रहे हैं और साधु लोग सांसद, विधायक, मंत्री बन रहे हैं। आईआईटी छात्र को उनके घर वाले और कई साधु संत भी विक्षिप्त बता रहे हैं। अगर इस देश का युवा वर्ग पढ़-लिखकर विक्षिप्त की हालत में जी रहा है तो उस देश का भविष्य क्या होगा।





