एक बाप की कुर्बानी, एक बेटे की चुप्पी
मगर अफसरों को छोड़ देने का अंजाम बहुत बुरा होगा
कुमार सौवीर
बाबर का बेटा हुमायूं और आजम खान का बेटा अब्दुल्ला आजम। कहानी कमोबेश बराबर है लेकिन हश्र अलहदा। अपने बीमार बेटे हुमायूँ की जान बचाने के लिए जहीरूदृीन मोहम्मद बाबर ने हुमायूं के पलंग के सात चक्कर लगाए थे। अल्लाह से दुआ करते हुए कि अल्लाह मेरी उम्र मेरे बेटे हुमायूं पर लगा दे। और यह कहकर उसने खुद मौत को गले लगा लिया था। बाबरनामा में लिखा है– “मैंने हुमायूँ के पलंग के चारों ओर चक्कर लगाए”। आजम खान ने अपने बेटे की सियासी जान बचाने के लिए पूरा सिस्टम हिला दिया, अफसरों को झुकाया, कानून तोड़ा और अंत में खुद मौत को गले लगा लिया। जेल की सलाखों के रूप में।
तब बाबर का बेटा कम से कम बाद में पछताया था लेकिन यहाँ बेटे अब्दुल्ला आजम ने अपने पिता को ही ठोकर मार दी। कोर्ट में अब्दुल्ला आजम का बयान था कि “मैं तो बच्चा था, सारे कागजात पिताजी के लोग बनवाते थे। मुझे कुछ पता ही नहीं था”। सुनने में तो बात मासूम लगती है लेकिन तथ्यों की कसौटी पर यह बिल्कुल हजम नहीं होता। यह एक क्लासिक “बाप का कंधा” वाली बचकाना बहाना है जो कानूनी रूप से भी फेल हो चुका है।
एक बाप की कुर्बानी, एक बेटे की चुप्पी रामपुर की सर्द हवा में आज फिर एक बूढ़ा आदमी जेल की सलाखों के पीछे चला गया। नाम है मोहम्मद आजम खान। उम्र 75 साल। कभी उत्तर प्रदेश की राजनीति का वो कद्दावर चेहरा, जिसके इशारे पर अफसर झुकते थे, आज खुद उसी सिस्टम की गिरफ्त में है। 17 नवंबर 2025 को रामपुर की विशेष एमपी-एमएलए अदालत ने उन्हें और उनके बेटे अब्दुल्ला आजम को 7-7 साल की सजा सुनाई। अपराध? दो अलग-अलग जन्मतिथियों वाले पैन कार्ड बनवाना। बस इतना सा अपराध लेकिन इस छोटी सी जालसाजी के पीछे एक बाप का पूरा जीवन दाँव पर लगा था।
यह 2017 का साल था। उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने वाले थे। आजम खान रामपुर सदर सीट से दस बार के विधायक थे। उनकी राजनीतिक विरासत को कोई खतरा नहीं था लेकिन खतरा था उनकी राजशाही को। उनका बेटा अब्दुल्ला आजम उस वक्त 24 साल का था। असली जन्मतिथि पहली जनवरी 1993 थी। यानी फरवरी-मार्च 2017 के चुनाव में वह पच्चीस साल की न्यूनतम उम्र पूरी नहीं कर पाता। अगर बेटा चुनाव नहीं लड़ पाता तो रामपुर की गद्दी पर कोई वारिस नहीं बचता। सपा के अंदर ही कई लोग सीट हथियाने को तैयार बैठे थे। आजम खान ने फैसला किया कि बेटे को किसी भी कीमत पर विधायक बनाना है।
बस यहीं से शुरू हुई वो जालसाजी, जिसने एक बाप को जेल और एक बेटे को बदनामी दे दी। सबसे पहले हाईस्कूल का सर्टिफिकेट बदला गया। फिर पासपोर्ट। फिर पैन कार्ड। एक पैन कार्ड में जन्मतिथि 1993, दूसरा 1990 में। दोनों के आवेदन में आजम खान का ही मोबाइल नंबर और ईमेल था। रामपुर के तत्कालीन बेसिक शिक्षा अधिकारी ने कोर्ट में बयान दिया– “आजम खान का फोन आया था, धमकाया था, हम मजबूर थे।” लखनऊ पासपोर्ट ऑफिस के अधिकारी ने भी यही कहा। अफसरों ने झुककर कानून तोड़ा, क्योंकि उस वक्त आजम खान सत्ता के शिखर पर थे।
…और अब्दुल्ला? 24 साल का जवान। ग्रेजुएट, राजनीति में कदम रखने वाला। उसने नामांकन पत्र पर खुद साइन किया। फर्जी जन्मतिथि वाला हलफनामा खुद जमा किया। चुनाव जीता। स्वार सीट से विधायक बना। पिता ने उसके लिए सारी दुनिया हिला दी थी।
फिर सत्ता बदली। बीजेपी की आकाश सक्सेना ने शिकायत की। मामला खुला। 6 दिसंबर 2019 को प्राथमिकी दर्ज हुई। आजम खान पर सौ से ज्यादा मुकदमे लगे। जौहर यूनिवर्सिटी की जमीन गई। बुलडोजर चले। पत्नी जेल गईं। बेटा जेल गया और आज 6 साल बाद उसी फर्जी पैन कार्ड के लिए आजम खान फिर जेल में हैं।
कोर्ट में अब्दुल्ला ने कहा था– “मैं तो बच्चा था, मुझे कुछ पता नहीं था, सारे कागजात पिताजी के लोग बनवाते थे।” चौबीस साल की उम्र में बच्चा? जिस उम्र में लोग अपनी जिंदगी खुद चलाते हैं, वह बेटा कहता है उसे कुछ पता नहीं था। बस एक बार कह देता कि “हाँ, ये सब मैंने खुद करवाया था, मेरे पिता निर्दोष हैं” तो शायद आजम खान बच जाते। कम से कम एक बेटा इतिहास में सच बोलने वाले सपूत के तौर पर दर्ज हो जाता लेकिन वह चुप रहा। पिता की कुर्बानी पर चुप्पी साध ली।
जिस बाप ने बेटे के लिए अपना सब कुछ लुटा दिया, उसी बाप को बेटे ने अकेला छोड़ दिया। आज रामपुर की सर्द रात में एक बूढ़ा आदमी जेल की ठंडी दीवार से सटा सो रहा होगा। उसके दिल में सिर्फ एक सवाल होगा– “मैंने तेरे लिए सब कुछ किया था बेटा… तूने मेरे लिए कुछ नहीं किया। ”इतिहास इसे जरूर लिखेगा। नाम होगा अब्दुल्ला आजम का। “सच बोलने वाले सितारे” के रूप में नहीं। बल्कि “अपने बाप को धोखा देने वाले बेटे” के रूप में। एक बाप की आँखों से गिरते आंसूओं की कोई गिनती नहीं होगी।
इस पाप से योगी भी उऋण नहीं हो सकेंगे। कारण यह कि उन्होंने आजम खान के खानदान को तो उसके अपराध के लिए उसके पूरे खानदान को नेस्तनाबूत कर दिया लेकिन उन अफसरों पर चूं तक नहीं किया जिन्होंंने गैरकानूनी काम कर दिया। सवाल तो यह भी है सजा तो उन अफसरों पर भी होनी चाहिए जो आज बेदाग हैं। जिन्होंने जानते-बूझते ही डुप्लीकेट डाक्यूमेंट तैयार किया, भले ही किसी का दबाव रहा हो। तुम्हें दबाव पर काम करने के लिए नहीं दी गयी है नौकरी, कानून के हिसाब से काम करने के लिए नौकरी दी गयी है।

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