वसुधैव क़ुटुम्बकम् की सोच

वसुधैव क़ुटुम्बकम् की सोच

बसुधैव क़ुटुम्बकम् की सोच,
बहुत ही पुरानी सी लगती है,
इस विचार पर बात करना भी,
बहुत ही अजीब सी लगती है।

यह सारा विश्व क्या अपना
देश और समाज ही देख लो,
अपना कुटुम्ब भी इस जमाने
में संभाल सको तो संभाल लो।

विश्व भी कई खेमों में बँटा है,
देश और समाज का निवासी
भी कई वर्गों व दलों में बँटा है,
कुटुंब के भाई भाई में बँटवारा है।

धर्म, जाति, भाषा, क्षेत्र व अमीर,
ग़रीब में भेद भाव का अतिरेक है,
ऊँच, नीच, ईर्ष्या, द्वेष, मद, मोह,
के कुभाव में डूबा इंसान हरएक है।

आज के युग में सब कुछ धोखा है,
खोजता फिरता हर एक मौक़ा है,
आदित्य ईश्वर स्वयं एक साक्षी है,
उसके अतिरिक्त संसार धोखा है।

डा. कर्नल आदिशंकर मिश्र
विद्या वाचस्पति, लखनऊ।

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