HomeTrendingएक ही रोबोटिक सर्जरी में दो अलग-अलग किडनी समस्याओं का हुआ उपचार

एक ही रोबोटिक सर्जरी में दो अलग-अलग किडनी समस्याओं का हुआ उपचार

  • एक ही रोबोटिक सर्जरी में दो अलग-अलग किडनी समस्याओं का हुआ उपचार

  • ऐसा भारत में पहली बार हुआ, 7 साल की बच्ची को मिली राहत

तेजस टूडे ब्यूरो
आरएल पाण्डेय
लखनऊ। अपोलोमेडिक्स सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटलकी यूरोलॉजी टीम ने भारत में पहली बार एक ही रोबोटिक सर्जिकल सत्र में 7 साल की बच्ची की दोनों किडनियों से जुड़ी दो अलग-अलग जटिल जन्मजात समस्याओं का सफलतापूर्वक इलाज करने की उपलब्धि हासिल की है। बच्ची की दाईं किडनी में पेल्वियूरेटेरिक जंक्शन यानी पीयूजे ऑब्स्ट्रक्शन था। इस समस्या में किडनी से पेशाब के बहाव में रुकावट आती है। वहीं बाईं किडनी में ग्रेड-फोर वेसिकोयूरेटेरिक रिफ्लक्स यानी वीयूआर की समस्या थी। इसमें पेशाब मूत्राशय से वापस किडनी की ओर जाने लगता है।
यह सर्जरी डॉ. गिवी गौरव एसोसिएट डायरेक्टर एवं यूनिट हेड यूरोलॉजी यूरो-ऑन्कोलॉजी एवं किडनी ट्रांसप्लांट के नेतृत्व में की गई। बच्ची को दो से 3 साल की उम्र से बार-बार यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फेक्शन यानी यूटीआई की शिकायत थी। अलग-अलग जगहों पर इलाज कराने के बावजूद संक्रमण बार-बार हो रहा था। बाद में बच्ची को पेट के दाईं ओर और फ्लैंक यानी कमर के पास दर्द के साथ मतली की शिकायत हुई जिसके बाद उसे अपोलोमेडिक्स लाया गया। विस्तृत जांच में दाईं किडनी में पीयूजे ऑब्स्ट्रक्शन के साथ एक लोअर-पोल क्रॉसिंग वेसल भी पाया गया। इसका मतलब है कि किडनी के निचले हिस्से के पास मौजूद एक रक्त वाहिका पेशाब के बहाव में रुकावट पैदा कर रही थी।
दूसरी ओर एमसीयूजी जांच में बाईं किडनी में ग्रेड-फोर वीआर की पुष्टि हुई। यह पेशाब के वापस किडनी की ओर जाने की गंभीर समस्या है। डीटीपीए जांच में पता चला कि दाईं किडनी लगभग 40 प्रतिशत और बाईं किडनी लगभग 60 प्रतिशत काम कर रही थी। डॉक्टरों के सामने चुनौती यह थी कि बेहतर काम कर रही बाईं किडनी में भी गंभीर रिफ्लक्स के साथ बार-बार संक्रमण का इतिहास था जबकि दाईं किडनी में पेशाब के बहाव की महत्वपूर्ण रुकावट थी। दोनों किडनियों की समस्याएं अलग-अलग थीं और उनके इलाज के लिए दो अलग-अलग सर्जिकल प्रक्रियाओं की जरूरत थी, इसलिए डॉक्टरों ने दोनों का इलाज एक ही सर्जिकल सत्र में करने का निर्णय लिया।
सर्जरी के एक महीने बाद हुए फॉलो-अप में बच्ची को कोई नया यूटीआई नहीं हुआ। ऑपरेशन के बाद की अल्ट्रासोनोग्राफी सामान्य रही। डीटीपीए जांच में भी दाईं किडनी में पेशाब के बहाव की कोई रुकावट नहीं पाई गई। एक महीने के फॉलो-अप पर यूरेटेरिक स्टेंट भी सफलतापूर्वक निकाल दिए गए। स्टेंट छोटी ट्यूब होती हैं जिन्हें सर्जरी के बाद पेशाब के बहाव को बनाए रखने में मदद के लिए लगाया जाता है। बच्ची की रिकवरी संतोषजनक रही। डॉ. गिवी गौरव ने कहा, “इस मामले की खास बात केवल यह नहीं थी कि दोनों प्रक्रियाएं रोबोट की मदद से की गईं। बच्ची की दोनों किडनियों में अलग-अलग समस्याएं थीं और उनके लिए दो अलग-अलग रिकंस्ट्रक्टिव प्रक्रियाओं की जरूरत थी।
अपोलोमेडिक्स सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल के एमडी एवं सीईओ डॉ. मयंक सोमानी ने इस उपलब्धि पर कहा, “बच्चों में जन्मजात यूरिनरी ट्रैक्ट संबंधी समस्याओं की समय पर पहचान और विशेषज्ञों से इलाज कराना बेहद महत्वपूर्ण है। इस मामले में टीम ने दोनों किडनियों की अलग-अलग समस्याओं का एक ही मिनिमली इनवेसिव रोबोटिक प्रक्रिया में उपचार किया।

 

 

 

 

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