जीवात्मा एवं परमात्मा के मिलन को ही कहा गया है महारास: पारासर
तेजस टूडे ब्यूरो
चित्रकूट। भागवत कथा के षष्टम दिवस पर कथा व्यास डॉ. श्याम सुंदर पाराशर महाराज ने कहा की अधिकारी जितना बड़ा होता है, उसका किया हुआ अपराध भी उतना ही बड़ा होता है। जैसे यदि किसी ग्राम का प्रधान भ्रष्ट होगा तो वह अपने गांव का ही नुकसान करेगा परंतु यदि विधायक भ्रष्ट होगा तो वह ज्यादा हानी करेगा। यदि प्रधानमंत्री ही भ्रष्ट होगा तो पूरा देश ही अंधकारमय हो जाएगा। इसी प्रकार भागवत में भगवान का अपराध ब्रह्मा जी ने भी किया और इंद्र ने भी किया पर भगवान ने इंद्र को तो क्षमा मांगने पर क्षमा किया पर ब्रह्मा जी की लंबी चौड़ी स्तुति करने पर भी उनसे बात तक नहीं किया। बताया कि इंद्र के सामने ब्रह्मा जी का पद बहुत बड़ा है। इसलिए भगवान ने ब्रह्मा जी को क्षमा नहीं किया।
कथा में भगवान की अत्यंत ही अतरंग लीला का वर्णन करते हुए कहा कि यह लीला साधारण मनुष्यों की बुद्धि से परे की लीला है, इसलिए शुकदेव जी ने इस लीला का वर्णन प्रारंभ करते हुए कहा यह सर्वसाधारण मनुष्य की लीला नहीं है साक्षात भगवान की लीला है जिन गोपियों का भगवान ने चीर चुराया उन्हीं को रास का अधिकार प्रदान किया। जीवात्मा और परमात्मा के मिलन को ही महारास कहा गया है। यह महारास के चित्र देखकर साधारण जीवों की बुद्धि भ्रमित होती है, क्योंकि उसमें लीला का दृश्य तो दिखाया है पर उसमें ठाकुर जी ने वह लीला की उस समय ठाकुर जी की उम्र मात्र 5 वर्ष की थी। आज कलयुग में भी ग्रामीण अंचल में बालक और बालिकाएं नदी तालाब में निर्वस्त्र नहाते दिख जायेंगे, इसलिए यह द्वापर की ठाकुर जी की 5 वर्ष में की लीला है हम सांसारियों ने इस श्रेष्ठ और अद्भुत लीला का महत्व ही नष्ट कर दिया है। आगे कथा में बताया कि भगवान ने बृजलीला पूर्ण कर मथुरा में कंस का वध कर मथुरा वासियों को कंस के अत्याचार से मुक्त किया। अपने माता-पिता देवकी वासुदेव को बंधन से मुक्त किया और उज्जैन में संदीपनी मुनि के गुरुकुल में जाकर अध्ययन किया हमारे भारतवर्ष में गुरुकुल परंपरा का बहुत महत्व था, क्योंकि एक राजा का बेटा गुरुकुल में पढ़ता था और एक गरीब ब्राह्मण का बेटा भी और सभी बालक गुरुकुल में हर तरह की शिक्षा निरूशुल्क प्राप्त करते थे। अध्ययन पूर्ण होने पर अपने सामर्थ्य से गुरु दक्षिणा देते थे पर विद्यार्थियों ने विदेशी आक्रांताओं ने सबसे पहले हमारी गुरुकुल परंपरा को ही नष्ट किया और हमें विदेशी भाषाओं का दास बना दिया।
कथा में महंत सच्चिदानंद महाराज रामसखा आश्रम, श्रीमहंत बलराम दास महाराज रामानंद आश्रम, महंत मोहन दास महाराज टाठीघाट, महंत रामदास महाराज, राम हर्षण कुंज, महंत सुखराम दास महाराज, पूज्य संत बृजनंदन दास महाराज, महंत गोपाल महाराज, पूज्य संत सुदामा दास महाराज, कथावाचक आनंद भूषण दीक्षित महाराज, अविनाश चंद्र द्विवेदी विधायक मऊ मानिकपुर, डॉ संतोष मिश्रा, प्रशांत करवरिया, मुख्य यजमान परिवार अरुणा मिश्रा, महेन्द्र मिश्र छाया, नलज मिश्र, आनंद मिश्र (डीसीपी, दिल्ली), आलोक दुबे (एएसपी, मेरठ), दीपा, अभिषेक मिश्र, नेहा, मधुरेश आदि मौजूद रहे।
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