HomeArticleतुम्हें भुला पाऊँ मुमकिन नहीं

तुम्हें भुला पाऊँ मुमकिन नहीं

तुम्हें भुला पाऊँ मुमकिन नहीं

तुम्हारी अर्चना मुश्किल न थी,
मगर पाना तुम्हें मुमकिन नहीं,
मन में समाये हो इस तरह,
भुला पाऊँ तुम्हें मुमकिन नहीं।

रहता हूँ भक्ति भाव में बेहोश,
अब तो हे! प्रभू करिये दया,
रहूँ किंचित मैं होश में बेशक,
बरसे सदा मुझ पर तेरी कृपा।

राज ये मदहोशी या बेहोशी के,
किसी को बतलाना, मुमकिन नहीं,
भक्ति है या शक्ति है, पागलपन है,
क्या नाम इसका बताना मुमकिन नहीं।

तुम अंतर्यामी हो या जादूगर हो,
जो भी हो मेरे तन मन में बसे हो,
नाम तेरा कैसे भी दिन रात जपता रहूँ
तेरे करम से बच पाना मुमकिन नहीं।

नहीं है जब पास तू मेरे,
कहे दिल छोड़ दूँ दुनिया,
पर तू तो बसा है हृदय में, तन मन में,
जीते जी ये कर पाना, मुमकिन नहीं।

ज़िन्दगी हँसाये प्रभू तब ये मैं समझूँ,
मेरे सदकर्मों का फल मिल रहा है,
ज़िन्दगी में रोना पड़े तो समझ लूँगा,
सत्कर्मों में कमी का फल मिल रहा है।

मुस्कुराहट इसलिए नहीं कि ख़ुशियाँ
ज़िन्दगी में सत्कर्म फल से मिल रही हैं,
मुस्कुराहट इसलिए है कि आदित्य
सत्कर्म करते रहने का प्रभु से वादा है।

डा. कर्नल आदिशंकर मिश्र
विद्या वाचस्पति, लखनऊ

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