गरीब की मजबूरी एवं व्यवस्था की विफलता के प्रतीक हैं अनुपयोगी शव वाहन: विकास तिवारी
तेजस टूडे ब्यूरो
शुभांशू जायसवाल
जौनपुर। स्वास्थ्य विभाग की उस व्यवस्था पर गम्भीर सवाल खड़ हो रही है जिसे आम आदमी के जीवन एवं मृत्यु के बीच सबसे मजबूत सहारा माना जाता है। अस्पताल परिसर में लाखों रुपये के शव वाहन खड़े-खड़े कबाड़ में तब्दील हो रहे हैं। निजी एम्बुलेंस चालकों द्वारा मनमानी वसूली की शिकायतें सामने आती रही हैं। उक्त बातें दीवानी न्यायालय के अधिवक्ता/समाजसेवी विकास तिवारी ने कही। साथ ही आगे कहा कि सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब सरकार ने शव वाहनों की व्यवस्था जनता की सुविधा के लिये की है तो वे अस्पताल परिसर में खड़े होकर क्यों सड़ रहे हैं? यदि वाहन उपलब्ध हैं तो उनका संचालन क्यों नहीं हो रहा है? चालक नहीं हैं तो भर्ती क्यों नहीं की गयी? बजट की कमी है तो उसका समाधान क्यों नहीं हुआ? यदि जिम्मेदारी तय है तो अब तक जवाबदेही क्यों नहीं तय हुई? उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य विभाग को यह समझना होगा कि अस्पताल परिसर में खड़ा हर अनुपयोगी शव वाहन केवल एक वाहन नहीं, बल्कि किसी गरीब परिवार की मजबूरी एवं व्यवस्था की विफलता का प्रतीक है।
श्री तिवारी ने कहा कि मौत के बाद भी गरीब परिवार को यदि अपने प्रियजन का शव घर ले जाने के लिये पैसे जुटाने पड़े तो इससे अधिक संवेदनशील और गम्भीर सवाल स्वास्थ्य व्यवस्था पर और क्या हो सकता है। यह केवल वाहनों के कबाड़ बनने का मामला नहीं है, बल्कि यह सरकारी संसाधनों के उपयोग, स्वास्थ्य विभाग की जवाबदेही एवं गरीब परिवारों के प्रति संवेदनशीलता का प्रश्न है। जिम्मेदार अधिकारी केवल कागजी रिपोर्ट न बनायें, बल्कि अस्पताल परिसर में खड़े शव वाहनों का भौतिक सत्यापन करायें। उनकी स्थिति सार्वजनिक करें और यह स्पष्ट करें कि जनता के लिये उपलब्ध कराये गये वाहन आखिर जनता के काम क्यों नहीं आ रहे हैं? स्वास्थ्य सेवा व्यवस्था है, न कि सिर्फ भवन, बजट एवं कागज। जवाबदेही तय होगी तभी व्यवस्था बदलेगी।










