HomeJaunpurJaunpur News: राम वनगमन का प्रसंग सुनकर भावुक हुये श्रोतागण, छलकीं आंखें

Jaunpur News: राम वनगमन का प्रसंग सुनकर भावुक हुये श्रोतागण, छलकीं आंखें

  • राम वनगमन का प्रसंग सुनकर भावुक हुये श्रोतागण, छलकीं आंखें

  • समाजसेवी ज्ञान प्रकाश सिंह के रामकथा कार्यक्रम में उमड़ी भारी भीड़

तेजस टूडे ब्यूरो
अजय पाण्डेय
जौनपुर। भाजपा के वरिष्ठ नेता एवं समाजसेवी ज्ञान प्रकाश सिंह के नेतृत्व में बी.आर.पी. इंटर कॉलेज मैदान पर चल रहे नौ दिवसीय राम कथा 5वें दिन आचार्य शातनु महराज जी ने कहा कि जब त्रेता युग में मिथिला की पावन धरती जनकपुर में माता सीता और भगवान श्रीराम के विवाह के बाद जब बारात अयोध्या लौटने की तैयारी में थी, तब दोनों राज परिवारों में हर्ष और उल्लास का वातावरण था। जनकपुर में जहां विवाहोत्सव की खुशियां मनाई जा रही थीं, वहीं अयोध्या में महाराज दशरथ के परिवार और नगरवासियों को नववधू माता सीता तथा नवविवाहित राजकुमारों के आगमन की प्रतीक्षा होने लगी। राजमहल से लेकर नगर के प्रमुख मार्गों तक सजाया गया। लोग मंगल गीत गाने लगे। हर नगर गलियों को सजाने लगी ।
जब भगवान श्रीराम अपने भाइयों और माता सीता सहित अयोध्या पहुंचे तब राज परिवार में आनंद छा गया। महाराज दशरथ अपने पुत्रों और नववधुओं को देखकर प्रसन्न हुए। माताओं ने बहुओं का स्नेहपूर्वक स्वागत किया और परिवार में उत्सव का माहौल बना। माता सीता का व्यक्तित्व त्याग, विनम्रता और संस्कारों का प्रतीक माना जाता है। उनके अयोध्या आगमन से श्रीराम के जीवन में दाम्पत्य की नई यात्रा आरंभ हुई। अयोध्यावासियों के लिए श्रीराम और सीता का यह मिलन आदर्श दांपत्य, प्रेम और मर्यादा की प्रेरणा बना। कथा के मुख्य आयोजक ज्ञान प्रकाश सिंह की प्रशंसा करते हुए आचार्य शांतनु जी महाराज ने कहा कि वह प्रत्येक कार्य पूरे मनोयोग से करते हैं जिसका उदाहरण श्रीरामकथा की व्यवस्थाओं में दिखाई देता है। इस अवसर पर राज्यमंत्री गिरीश चन्द्र यादव, पूर्वांचल विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. राकेश सिंह, कुलसचिव डॉ. विनोद सिंह, शैलेन्द्र सिंह, चेयरमैन मनोरमा मौर्या, डा. राम सूरत मौर्या, अरविंद सिंह, पूर्व विधायक दिनेश चौधरी, डॉ. रणजीत सिंह, जय बक्श दास महाराज, राकेश उपाध्याय, राहुल सिंह, रिंकू महाराज, राजन सिंह, महेंद्र सिंह, राधेश्याम सिंह, विनोद मिश्रा, यादवेंद्र प्रताप सिंह, धर्मेंद्र श्रीवास्तव, दयाल सिंह, ज्ञानंजय सिंह, मीनाक्षी सिंह, राजेश सिंह, अमरेश सिंह, आदित्य सिंह, मनोज सिंह, डॉ. अरुण मिश्रा, डॉ. विनोद सिंह, डॉ. अजय दुबे, डॉ. सुधीर श्रीवास्तव सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु एवं गणमान्य लोग मौजूद रहे।

मंथरा की बातों में आकर कैकेयी ने मांगे दो वरदान
जब महारानी कैकेयी की दासी मंथरा को श्रीराम के राज्याभिषेक की सूचना मिली तो उसने कैकेयी के मन में भरत के भविष्य को लेकर आशंकाएं उत्पन्न करनी शुरू कर दीं। मंथरा की बातों में आकर कैकेयी का मन बदल गया। उन्होंने महाराज दशरथ को उनके द्वारा पूर्व में दिए गए दो वरदानों की याद दिलाई। कैकेयी ने पहला वरदान मांगा कि उनके पुत्र भरत को अयोध्या का राजा बनाया जाए और दूसरा वरदान मांगा कि भगवान श्रीराम को 14 वर्ष के लिए वनवास भेज दिया जाय। यह सुनते ही महाराज दशरथ स्तब्ध रह गये। जिस पुत्र को वे अपने जीवन का आधार मानते थे, उसी को वनवास देने की बात उनके हृदय को चीर गई। उन्होंने कैकेयी को समझाने का प्रयास किया लेकिन कैकेयी अपने वरदानों पर अडिग रहीं।

महाराज दशरथ का टूट गया हृदय
महाराज दशरथ के सामने एक ओर पुत्र के प्रति अगाध प्रेम था तो दूसरी ओर दिया हुआ वचन निभाने की मर्यादा। वे चाहते थे कि किसी भी तरह श्रीराम वनवास पर न जायं लेकिन सत्य और वचन के बंधन ने उन्हें विवश कर दिया। राजमहल में शोक छा गया। महाराज दशरथ की आंखों से आंसू बहने लगे। उनके लिए यह कल्पना भी असहनीय थी कि जिन श्रीराम के राज्याभिषेक की तैयारियां हो रही थीं, अब उन्हीं को चौदह वर्षों के लिए अयोध्या छोड़ना पड़ेगा।

अयोध्या में छा गया शोक, प्रजा की आंखें हुईं नम
जिस अयोध्या में कुछ समय पहले राज्याभिषेक की खुशियां मनाई जा रही थीं, वहां अब दुख और निराशा का वातावरण था। नगरवासियों को जब श्रीराम के वनवास की सूचना मिली तो वे व्यथित हो उठे। किसी को विश्वास नहीं हो रहा था कि उनके प्रिय राम चौदह वर्षों तक उनसे दूर रहेंगे। माताओं की आंखों में आंसू थे। राजपरिवार दुख में डूबा हुआ था और महाराज दशरथ अपने प्रिय पुत्र के वियोग की कल्पना से ही व्याकुल थे। अयोध्यावासी श्रीराम को रोकना चाहते थे लेकिन प्रभु अपने कर्तव्य और पिता के वचन का पालन करने के लिए दृढ़ थे।

वन की ओर चल पड़े मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम
अंततः वह मार्मिक घड़ी आ गई, जब भगवान श्रीराम ने माता सीता और लक्ष्मण जी के साथ अयोध्या से वन की ओर प्रस्थान किया। उनके कदम वन की ओर बढ़ रहे थे लेकिन अयोध्या के लाखों हृदय उनके साथ चल रहे थे। महाराज दशरथ के लिए यह वियोग असहनीय सिद्ध हुआ। श्रीराम के वन जाने के बाद उनका दुख लगातार बढ़ता गया। रामायण के अनुसार अंततः पुत्र-वियोग में ही उन्होंने अपने प्राण त्याग दिये।

 

 

 

 

 

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