नमो घाट पर मौत का ताण्डव: सुरक्षा के नाम पर खड़े बाउंसर बने जल्लाद
एण्ट्री को लेकर मामूली विवाद, हॉकी-रॉड एवं डण्डों से पीट-पीटकर की पर्यटक की हत्या
घाटों से मन्दिर तक निजी बाउंसरों की बढ़ती दबंगई पर उठे गम्भीर सवाल
तेजस टूडे ब्यूरो
सुरेश गांधी/जितेन्द्र सिंह चौधरी
वाराणसी। धर्म, अध्यात्म और अतिथि सत्कार की पहचान रखने वाली काशी एक बार फिर ऐसे सवालों के घेरे में है जिसने पूरे शहर को झकझोर दिया है। स्मार्ट सिटी की चमक के बीच वाराणसी के चर्चित नमो घाट पर सुरक्षा के नाम पर तैनात निजी बाउंसरों और सिक्योरिटी गार्डों पर ऐसा खूनी खेल खेलने का आरोप लगा है जिसने मानवता को शर्मसार कर दिया। मामूली कहासुनी के बाद एक गरीब पर्यटक को कथित तौर पर हॉकी, लोहे की रॉड, डंडों और बेल्ट से इस कदर पीटा गया कि उसकी मौके पर ही मौत हो गई जबकि उसके 4 साथी गंभीर रूप से घायल हो गये हैं।
यह घटना सिर्फ एक हत्या नहीं, बल्कि उस भयावह व्यवस्था पर सवाल है जहां सुरक्षा देने वाले ही जान लेने पर उतर आए हैं। सवाल यह भी उठ रहा है कि आखिर घाटों और सार्वजनिक स्थलों पर तैनात निजी सुरक्षाकर्मियों को कानून हाथ में लेने का अधिकार किसने दिया? मृतक की पहचान सोनभद्र जनपद के रायपुर थाना क्षेत्र स्थित खलियारी गांव निवासी राजेश उर्फ चिंटू जायसवाल (17 वर्ष) के रूप में हुई है। बताया जा रहा है कि वह अपने परिवार का सहारा था और सब्जी बेचकर घर का खर्च चलाता था। शनिवार रात वह अपने दोस्तों शिव जी, बृजेश, अंगद और रोहित के साथ वाराणसी घूमने निकला था। रात लगभग 3 बजे सभी नमो घाट पहुंचे।
प्रत्यक्षदर्शियों और घायलों के अनुसार गेट पर मौजूद निजी सुरक्षा गार्डों ने घाट बंद होने की बात कहकर उन्हें रोक दिया। इस दौरान कहासुनी हुई और फिर मामला हिंसा में बदल गया। आरोप है कि कुछ ही देर में 10 से 12 बाउंसर और गार्ड हॉकी, रॉड और डंडों के साथ पहुंचे और युवकों को घेरकर हमला बोल दिये। निहत्थे युवक अपनी जान बचाने के लिए भागते रहे लेकिन राजेश उर्फ चिंटू गिर पड़ा। आरोप है कि इसके बाद भी हमलावर नहीं रुके और उसे तब तक पीटते रहे जब तक उसकी सांसें थम नहीं गईं। बाद में पुलिस घायलों को अस्पताल लेकर पहुंची जहां चिकित्सकों ने राजेश को मृत घोषित कर दिया। घटना के बाद घाट परिसर में अफरा-तफरी मच गई। पुलिस ने चार सिक्योरिटी गार्डों को हिरासत में लिया है जबकि अन्य आरोपियों की तलाश जारी है। सीसीटीवी फुटेज खंगाले जा रहे हैं और प्रत्यक्षदर्शियों के बयान लिए जा रहे हैं।
घाटों से मन्दिरों तक बढ़ता ‘बाउंसर राज’?
काशी में यह पहला मामला नहीं है। घाटों, धार्मिक स्थलों और भीड़भाड़ वाले क्षेत्रों में निजी बाउंसरों और सुरक्षा कर्मियों पर दुर्व्यवहार, दबंगई और मारपीट के आरोप पहले भी उठते रहे हैं। कई बार शिकायतें हुईं लेकिन आरोप है कि मामले थाने तक पहुंचकर दब जाते रहे। ऐसे में नमो घाट की यह घटना एक बड़े सवाल को जन्म दे रही है—क्या वाराणसी में सुरक्षा व्यवस्था अब नियंत्रण की जगह भय का माध्यम बनती जा रही है?
गरीब घर का बुझ गया चिराग
राजेश उर्फ चिंटू 3 भाइयों में दूसरे नंबर पर था। परिवार की आर्थिक जिम्मेदारियों का बड़ा हिस्सा उसके कंधों पर था। सब्जी बेचकर वह घर का खर्च चलाता था। एक रात घूमने निकला बेटा अब घर वापस नहीं लौटेगा। परिवार पर दुख का ऐसा पहाड़ टूटा है जिसकी भरपाई शायद कभी नहीं हो सकेगी।
सवाल जो जवाब मांग रहे हैं
क्या निजी सुरक्षा कर्मियों को कानून हाथ में लेने की खुली छूट मिली हुई है? क्या घाटों और सार्वजनिक स्थलों पर बाउंसरों के लिए कोई स्पष्ट जवाबदेही तय है? पहले की शिकायतों पर यदि कार्रवाई होती तो क्या यह मौत टल सकती थी? काशी की छवि पर लग रहे ऐसे दागों को रोकने के लिए प्रशासन क्या करेगा? यह सिर्फ एक युवक की मौत नहीं है, यह उस व्यवस्था के चेहरे पर सवाल है जहां सुरक्षा का दावा करने वाले ही कथित तौर पर भय का पर्याय बनते जा रहे हैं। काशी में अब केवल अपराधियों से नहीं, बल्कि सुरक्षा के नाम पर खड़े लोगों से भी जवाब मांगे जा रहे हैं।
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