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हरियाली से महिला सशक्तीकरण बिहार में दीदी की पौधशाला बन रही ग्रामीण महिलाओं की तरक्की का नया जरिया: श्रवण

  • हरियाली से महिला सशक्तीकरण बिहार में दीदी की पौधशाला बन रही ग्रामीण महिलाओं की तरक्की का नया जरिया: श्रवण

  • राज्य में 987 जीविका की नर्सरियों का हो रहा संचालन

  • इसके सहारे हजारों महिलाओं को मिला स्थायी रोजगार

तेजस टूडे ब्यूरो
सिद्धार्थ सुमन
बिहार। बिहार की ग्रामीण महिलाओं ने अब केवल घर संभालने तक खुद को सीमित नहीं रखा है, बल्कि वे पर्यावरण की रक्षा करते हुए खुद के साथ पूरे परिवार को आर्थिक रूप से बेहद मजबूत भी बना रही हैं। बिहार ग्रामीण जीविकोपार्जन प्रोत्साहन सोसायटी के तहत संचालित दीदी की पौधशाला कार्यक्रम आज राज्य में महिला आधारित हरित उद्यमिता का एक सशक्त और सफल मॉडल बनकर उभरा है। इस पहल से जुड़कर ग्रामीण महिलाएं न केवल खुद स्वावलंबी बन रही हैं बल्कि अपने गांवों को हरा-भरा भी कर रही हैं।
दीदी की पौधशाला जैसी अभिनव योजना के तहत स्वयं सहायता समूह से जुड़ी महिलाएं अपने ही गांवों में पौधशालाएं तैयार करती हैं। यहां विभिन्न प्रकार के पौधे उगाए गए हैं जिसकी आपूर्ति वन विभाग, मनरेगा, बागवानी और खुले बाजार में की जाती है। वर्तमान में बिहार के विभिन्न जिलों में लगभग 987 दीदी की पौधशालाएं सफलता पूर्वक संचालित हो रही हैं जहां प्रति पौधशाला के हिसाब से तीन से चार महिलाओं को स्थाई रोजगार मिला हुआ है।
ग्रामीण विकास विभाग के अधिकारियों का कहना है कि नर्सरियों में पौधा उत्पादन के कार्यों में लगी महिलाओं की प्रति महिला के हिसाब से औसतन वर्ष में 3-4 लाख रुपए की विशुद्ध आमदनी हो रही है। सरकार इस पूरी योजना को चरणबद्ध तरीके से राज्य के सभी 534 प्रखंडों तक विस्तारित करने में जुटी है।
इस योजना का लाभ उठाने के लिए महिला का कम से कम एक साल पुराना जीविका समूह से जुड़ा होना अनिवार्य है। साथ ही उसकी उम्र 18 वर्ष से अधिक और करीब 0.5 एकड़ जमीन सड़क संपर्क के साथ होनी चाहिए। एकल महिलाओं, विधवाओं, दिव्यांगों और अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति वर्ग की महिलाओं को इसमें प्राथमिकता दी जा रही है। आवेदन के बाद जीविका और तकनीकी संस्थानों द्वारा इन महिलाओं को नर्सरी प्रबंधन, बीज उपचार और पौध उत्पादन का प्रशिक्षण दिया जाता है।

मांग के अनुसार पौधों का उत्पादन, प्रति पौधा 30 रुपये मूल्य
ग्रामीण विकास विभाग के अधिकारियों के अनुसार, दीदी की पौधशालाओं में शीशम,महोगनी, सागवान, पीपल, नीम और अशोक जैसे कीमती पेड़ों के साथ अमरूद, आंवला, लीची, आम, नींबू जैसे फलदार पौधे भी तैयार किए जा रहे हैं। भविष्य में इसमें मसाले, औषधीय पौधे, बांस और हाइब्रिड पौधों को भी जोड़ने की तैयारी है। अधिकारियों ने बताया कि दीदी की पौधशालाओं में मांग के अनुसार पौधे भी तैयार किए जाते हैं और प्रति पौधे की बिक्री 30 रुपये के हिसाब से की जा रही है।

पलायन पर लगाम एवं पर्यावरण की रक्षा
दीदी की पौधशाला योजना ने ग्रामीण इलाकों की तस्वीर बदल दी है। गांव में ही रोजगार मिलने से पलायन में कमी आई है। महिलाओं में आत्मविश्वास और नेतृत्व क्षमता बढ़ी है। इसके साथ ही राज्य में हरित आवरण और जैव विविधता का संरक्षण भी तेजी से हो रहा है। आने वाले समय में इन पौधशालाओं को एक मंच पर लाने के लिए दीदी की नर्सरी कंपनी बनाने की भी योजना है जिससे इनका व्यापार और बड़ा हो सकेगा। गामीण विकास मंत्री श्रवण कुमार ने कहा कि पर्यावरण संरक्षण और महिलाओं को स्थानीय स्तर पर रोजगार उपलब्ध कराने की दिशा में पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की दूरगामी सोच का परिणाम है कि आज बिहार का हरित आवरण 7 फीसदी से बढ़कर 15 फीसदी से भी अधिक हो चुका है। वर्ष 2028 तक इसे 17 फीसदी तक पहुंचाने की योजना है। दीदी की पौधशाला ग्रामीण महिलाओं को हरित उद्यमी बनाने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है। इससे जहां बड़े पैमाने पर रोजगार का सृजन हो रहा है, वहीं हमारे गांव हरियाली की ओर अग्रसर हो रहे हैं। सरकार महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। इस योजना को और अधिक विस्तार दिया जाएगा।

 

 

 

 

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