संस्कृति
संस्कृति की बात निराली
हम सबके ये मुंह की लाली
बिना संस्कृति के मोरे भैया
जैसे बाग बिना बिन माली
जितना इसको अपनाओगे
उतना सुख तुम पाओगे
अलग अलग त्योहारों से तुम
अपना महल सजाओगे
संस्कृति एक डोर के जैसी
जो खींचे चारों ओर
आने वाले हैं जो पीढ़ी
करती उसको चांद चकोर
नहीं मिलेगा वृद्ध आश्रम
इसको तुम अपना लो
खोया हुआ जो बीता पल हैं
उसको जल्दी पालो
संस्कृति की बात निराली
हम सब के ये मुंह की लाली
जाता हूं जल्दी से
नहीं आऊंगा फिर से खाली।।
रचनाकार—— अभिषेक चतुर्वेदी
शाहगंज-जौनपुर
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