मित्रों……! रिक्शा और रिक्शे की सवारी, हमारी यादों में आज भी बसा है… बचपन में रिक्शे पर, माँ-बाप की गोद में बैठ कर या फिर….ऊपर पीछे की ओर पटरी लगी बालकनी में बैठकर रिक्शे की सवारी….आज भी… हम सबकी यादों का हिस्सा है मित्रों रिक्शे की सवारी के दौरान अक्सर…धीमी गति से चलने, दायें-बाएं अकारण मुड़ जाने पर, तीखी टिप्पणी और डाँट-डपट आम बात होती….. रिक्शेवाले से किराए का मोल-भाव करना, वह भी…बिना कुछ जाने समझे… यह तो.. जीवन में सबक देने वाला और याद रहने वाला किस्सा है…. मित्रों….हमने….. इस रिक्शे की सवारी के दौरान शायद ही कभी गौर किया होगा रिक्शेवाले के चेहरे के भावों पर, उसकी मेहनत, उसके पसीने पर शायद ही कभी सोचा हो…. उसके और उसके परिजनों के जीवन-जीने पर….. यात्रा के दौरान रिक्शावाला तो हमेशा संदेह की नजरों से ही देखा-सुना जाता रहा….. अकेला होने पर तो कई तरह के परीक्षण के बाद रिक्शे की सवारी शुरू की जाती.. पान खाने वाला रिक्शाचालक, बेअदब-रंगबाज ही माना जाता… शायद ही कोई सवारी उसके पास जाती…… मित्रों कभी हमने नजर नहीं डाली रिक्शेवाले के कपड़े-पहनावे पर हम तो मन ही मन खुश रहे उसको अपना रसूख़ दिखावे पर इसके बावजूद भी रिक्शेवाले अक्सर खुश ही दिखा करते, अपनी कमाई पर….. उसे कभी भी क्रोध नहीं आया गाँव-देश की जनता हरजाई पर… मित्रों…विकास के इस नए दौर में, रिक्शे की जगह ई-रिक्शा,जीप, टेंपो और विक्रम का चलन है…. सवारी को भी….रिक्शे वालों से शिकवा-शिकायत और जलन है.. यह सोचने का विषय है मित्रों कि रिक्शावाला,जो गरीबी में रह रहे परिवार का वतन है…… वह आज के दौर में….. अपना और अपने परिजनों का कैसे कर रहा जतन है…? कैसे कर रहा जतन है…? रचनाकार—— जितेन्द्र दुबे अपर पुलिस अधीक्षक जनपद-कासगंज।
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