कोरोना का मनोवैज्ञानिक प्रभाव

जौनपुर। Google News पर चलने वाला जिले का पहला न्यूज पोर्टल TejasToday.com आप सब के प्यार और सम्मान से अपनी एक अलग पहचान बना लिया है। यही वजह है कि जौनपुर के लोगों का भरपूर प्यार इस पोर्टल को मिला है। TejasToday.com को इस मुकाम तक पहुंचाने में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से आप लोगों अहम भूमिका रही है। आज TejasToday.com की विजि​टर संख्या 2 करोड़ हो गया है। इस पोर्टल के संचालन होने के नाते मै Deepak Jaiswal आप सबका तहे दिल से शुक्रिया अदा करता हूं, और साथ ही TejasToday.com को इस मुकाम तक पहुंचाने पर हमारे पूज्यनीय मामा जी तेजस टूडे समाचार पत्र के सम्पादक और समूह सम्पादक रामजी जायसवाल की अहम भूमिका रही है मै उनको भी धन्यवाद देता हूं। जो मुझे और आपके TejasToday.com को बहुत ही सर्पोट करके आप सबके बीच लाकर खड़ा किये है। गौरतलब हो कि इस पोर्टल की शुरूआत वर्ष 2018 में हुई थी और आज आप सबके भरपूर प्यार और सम्मान से TejasToday.com न्यूज पोर्टल के 2 करोड़ विजि​टर हो गये है। आपको बताते चले कि TejasToday.com न्यूज पोर्टल के प्रतिदिन के विजिटर लगभग 1.50 है। ये आपका अपना TejasToday.com न्यूज पोर्टल सिर्फ जौनपुर ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण भारत के अलावा विदेशों में भी लोग देखते है। आप सबके प्यार और सम्मान ने मुझे इस मुकाम पर पहुंचाया है और यह न्यूज पोर्टल आपका अपना है आप इस तरह अपना प्यार देते रहिए। आपका छोटा भाई Deepak Jaiswal धन्यवाद

डॉ. अखिलेश्वर शुक्ला

स्वतंत्र भारत में यह पहला मौका है जब हम एक बड़ी अंतरराष्ट्रीय घटना (कोरोना संक्रमण) का सामना कर रहे हैं। प्रथम विश्वयुद्ध (1914 से 1918) के समय जल थल वायु सेना ने लड़ाई लड़ी थी। दुनिया का पहला अनुभव था। जिसमें गुलाम भारत सहित तीन महत्वपूर्ण महाद्वीपों को भारी खामियाजा भुगतना पड़ा था। अमेरिका एक शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में उभरा।
द्वितीय विश्वयुद्ध (1939 से 1945) में अमेरिका ने परमाणु बम का प्रयोग करके जापान के नागासाकी-हिरोशिमा को इतना प्रभावित किया कि आज तक वहां इसका प्रभाव देखा जा सकता है। यह तीसरा मौका है जिसे हम तृतीय विश्व युद्ध के आगाज के रूप में भी देख सकते हैं। पिछली दो अंतरराष्ट्रीय घटनाओं से यह भिन्न इसलिए है, क्योकि शत्रु अदृश्य है। दिखाई नहीं देता। तमाम साक्ष्यों के आधार पर यह कहा जाने लगा है कि चीन की देन यह संकट है। जिसे हम कोविड-19 (कोरोना) के नाम से जान रहे हैं।

डॉ. अखिलेश्वर शुक्ला स्वतंत्र भारत में यह पहला मौका है जब हम एक बड़ी अंतरराष्ट्रीय घटना (कोरोना संक्रमण) का सामना कर रहे हैं। प्रथम विश्वयुद्ध (1914 से 1918) के समय जल थल वायु सेना ने लड़ाई लड़ी थी। दुनिया का पहला अनुभव था। जिसमें गुलाम भारत सहित तीन महत्वपूर्ण महाद्वीपों को भारी खामियाजा भुगतना पड़ा था। अमेरिका एक शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में उभरा। द्वितीय विश्वयुद्ध (1939 से 1945) में अमेरिका ने परमाणु बम का प्रयोग करके जापान के नागासाकी-हिरोशिमा को इतना प्रभावित किया कि आज तक वहां इसका प्रभाव देखा जा सकता है। यह तीसरा मौका है जिसे हम तृतीय विश्व युद्ध के आगाज के रूप में भी देख सकते हैं। पिछली दो अंतरराष्ट्रीय घटनाओं से यह भिन्न इसलिए है, क्योकि शत्रु अदृश्य है। दिखाई नहीं देता। तमाम साक्ष्यों के आधार पर यह कहा जाने लगा है कि चीन की देन यह संकट है। जिसे हम कोविड-19 (कोरोना) के नाम से जान रहे हैं। उक्त घटनाओं का मनोवैज्ञानिक अध्ययन किया जाए तो इस निष्कर्ष पर आसानी से पहुंचा जा सकता है कि शक्ति संपन्नता एवं आर्थिक प्रगति के बल पर सर्वशक्तिमान बनने की होड़ ने हमें आज इस स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया है। शक्ति संपन्न सर्वशक्तिमान राष्ट्र भी आज घरों के अंदर दुबके पड़े हैं। इसे भारतीय मनोवैज्ञानिको को एक नई चुनौती के रूप में लेने की आवश्यकता है। वर्तमान कोरोना संक्रमण की भयावहता से भारतीय कैसे सामना कर सकते हैं। इसे एक गंभीर विषय के रूप में लिया जाना चाहिए। देश के बड़े मनोवैज्ञानिक जिसमें कुछ मेरे वरिष्ठ एवं सहचर साथी भी राष्ट्रीय वेबीनार आयोजित करके घरों में बंद लोगों की समस्याओं को जानने समझने एवं एक सकारात्मक परिणाम तक पहुंचने का प्रयास कर रहे हैं। भारत विभिन्नता में एकता का देश है- धर्म, भाषा, क्षेत्र, प्रवृत्ति संस्कृति संस्कार की विभिन्नता के कारण अनेकानेक अकल्पनीय समस्याओं का भी हमें सामना करने को तैयार रहना होता है। ऐसे में साक्षात्कार प्रणाली की सर्व व्यापकता के साथ ही साथ ऐतिहासिक तथ्यों का अवलोकन का अवलंबन भी नितांत आवश्यक है। ऐसा मेरा व्यक्तिगत अवधारणा है। सीमित संसाधनों में सघन आबादी (जनसंख्या) वाला देश एक विजयी भाव लेकर अंतरराष्ट्रीय पटल पर उभरा है। इसमें हमारे नेतृत्व की दूरदर्शिता, राजनीतिक एकता के साथ ही सामाजिक जागरूकता से लेकर व्यक्तिगत राष्ट्रीय समर्पण का भाव अद्भुत वह अविस्मरणीय रूप में दिखाई देता है। शक्ति संपन्न यूरोपीय देशों तथा सर्वशक्तिमान अमेरिका के साथ भारत की तुलना किया जाए तो स्वास्थ्य सुविधाओं में भारत कहीं नहीं टिकता, लेकिन लाकडाउन की पीड़ा बर्दाश्त नहीं कर पाने वाले अमेरिकी नागरिक सड़कों पर आग्नेयास्त्रों के साथ प्रदर्शन करते दिखे। वहीं असहाय भारतीय गरीब मजदूर मुंबई व दिल्ली की सड़कों पर गठरी-मोटरी सर पर रखें पैदल घर पहुंचने की जिद लिए दिखे। इस जमीन आसमान के फर्क को समझने तथा पश्चिमी अंधानुकरण से बचने की आवश्यकता है। भारतीय नागरिकों का एक बड़ा हिस्सा गांव से चलकर शहरों तक पहुंचा है जिसमें एक श्रमिक वर्ग तो दूसरा बुद्धिजीवी वर्ग है। बुद्धिजीवी वर्ग यदि श्रमिक वर्ग की समस्या समझने लगे तो फिर भारत दुनिया के नक्शे में एक चमकता हुआ सितारा होगा। दुर्भाग्य है कि बुद्धिजीवी वर्ग यदि सुविधाभोगी हो जाता है तो दूसरे की पीड़ा को समझने के बजाय उसकी निंदा में ज्यादा समय देता है। यदि हम भारतीय निंदा की जगह आत्म समीक्षा की प्रणाली को अपना लें- जिसका लाक डाउन एक उपयुक्त अवसर भी है। तो फिर इस समस्या (कोरोना संक्रमण) के साथ साथ आने वाले सभी समस्याओं का समाधान हम भारतीय आसानी से कर सकते हैं। संघर्ष की जगह सहयोग का रास्ता अपनाना होगा। नकारात्मकता की जगह सकारात्मकता के भाव विकसित करने होंगे। स्वयं को सर्वशक्तिमान समझने की भूल ना करके सभी की सहभागिता ही हमारी सुरक्षा है का भाव प्रकट करना होगा। प्राचीन संस्कृति सभ्यता तथा रिषियों-मनीषियों के वाणी, कथनों को सुनने समझने एवं वैज्ञानिकता के तराजू पर तौलते हुए, अनुकरण करने मात्र से ही कम संसाधनों में हम सुखी स्वस्थ एवं प्रसन्न भारत की कल्पना को साकार कर सकते हैं। भारतीय सोच विश्व के लिए एक मार्गदर्शन का कार्य करेगा हमारे मानवीय मूल्यों तथा मजबूत मनोवैज्ञानिक मनोदशा का लोहा पूरी दुनिया को मानने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। यह पूरे विश्वास के साथ हम भारतीय कह सकते हैं। डॉ. अखिलेश्वर शुक्ला विभागाध्यक्ष (राजनीति विज्ञान विभाग) राजा श्री कृष्ण दत्त स्नातकोत्तर महाविद्यालय, जौनपुर उत्तर प्रदेश संपर्क: 9451336363

उक्त घटनाओं का मनोवैज्ञानिक अध्ययन किया जाए तो इस निष्कर्ष पर आसानी से पहुंचा जा सकता है कि शक्ति संपन्नता एवं आर्थिक प्रगति के बल पर सर्वशक्तिमान बनने की होड़ ने हमें आज इस स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया है। शक्ति संपन्न सर्वशक्तिमान राष्ट्र भी आज घरों के अंदर दुबके पड़े हैं। इसे भारतीय मनोवैज्ञानिको को एक नई चुनौती के रूप में लेने की आवश्यकता है। वर्तमान कोरोना संक्रमण की भयावहता से भारतीय कैसे सामना कर सकते हैं। इसे एक गंभीर विषय के रूप में लिया जाना चाहिए।

देश के बड़े मनोवैज्ञानिक जिसमें कुछ मेरे वरिष्ठ एवं सहचर साथी भी राष्ट्रीय वेबीनार आयोजित करके घरों में बंद लोगों की समस्याओं को जानने समझने एवं एक सकारात्मक परिणाम तक पहुंचने का प्रयास कर रहे हैं। भारत विभिन्नता में एकता का देश है- धर्म, भाषा, क्षेत्र, प्रवृत्ति संस्कृति संस्कार की विभिन्नता के कारण अनेकानेक अकल्पनीय समस्याओं का भी हमें सामना करने को तैयार रहना होता है। ऐसे में साक्षात्कार प्रणाली की सर्व व्यापकता के साथ ही साथ ऐतिहासिक तथ्यों का अवलोकन का अवलंबन भी नितांत आवश्यक है। ऐसा मेरा व्यक्तिगत अवधारणा है।

सीमित संसाधनों में सघन आबादी (जनसंख्या) वाला देश एक विजयी भाव लेकर अंतरराष्ट्रीय पटल पर उभरा है। इसमें हमारे नेतृत्व की दूरदर्शिता, राजनीतिक एकता के साथ ही सामाजिक जागरूकता से लेकर व्यक्तिगत राष्ट्रीय समर्पण का भाव अद्भुत वह अविस्मरणीय रूप में दिखाई देता है। शक्ति संपन्न यूरोपीय देशों तथा सर्वशक्तिमान अमेरिका के साथ भारत की तुलना किया जाए तो स्वास्थ्य सुविधाओं में भारत कहीं नहीं टिकता, लेकिन लाकडाउन की पीड़ा बर्दाश्त नहीं कर पाने वाले अमेरिकी नागरिक सड़कों पर आग्नेयास्त्रों के साथ प्रदर्शन करते दिखे। वहीं असहाय भारतीय गरीब मजदूर मुंबई व दिल्ली की सड़कों पर गठरी-मोटरी सर पर रखें पैदल घर पहुंचने की जिद लिए दिखे। इस जमीन आसमान के फर्क को समझने तथा पश्चिमी अंधानुकरण से बचने की आवश्यकता है। भारतीय नागरिकों का एक बड़ा हिस्सा गांव से चलकर शहरों तक पहुंचा है जिसमें एक श्रमिक वर्ग तो दूसरा बुद्धिजीवी वर्ग है। बुद्धिजीवी वर्ग यदि श्रमिक वर्ग की समस्या समझने लगे तो फिर भारत दुनिया के नक्शे में एक चमकता हुआ सितारा होगा।

दुर्भाग्य है कि बुद्धिजीवी वर्ग यदि सुविधाभोगी हो जाता है तो दूसरे की पीड़ा को समझने के बजाय उसकी निंदा में ज्यादा समय देता है। यदि हम भारतीय निंदा की जगह आत्म समीक्षा की प्रणाली को अपना लें- जिसका लाक डाउन एक उपयुक्त अवसर भी है। तो फिर इस समस्या (कोरोना संक्रमण) के साथ साथ आने वाले सभी समस्याओं का समाधान हम भारतीय आसानी से कर सकते हैं। संघर्ष की जगह सहयोग का रास्ता अपनाना होगा।

नकारात्मकता की जगह सकारात्मकता के भाव विकसित करने होंगे। स्वयं को सर्वशक्तिमान समझने की भूल ना करके सभी की सहभागिता ही हमारी सुरक्षा है का भाव प्रकट करना होगा। प्राचीन संस्कृति सभ्यता तथा रिषियों-मनीषियों के वाणी, कथनों को सुनने समझने एवं वैज्ञानिकता के तराजू पर तौलते हुए, अनुकरण करने मात्र से ही कम संसाधनों में हम सुखी स्वस्थ एवं प्रसन्न भारत की कल्पना को साकार कर सकते हैं।

भारतीय सोच विश्व के लिए एक मार्गदर्शन का कार्य करेगा हमारे मानवीय मूल्यों तथा मजबूत मनोवैज्ञानिक मनोदशा का लोहा पूरी दुनिया को मानने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। यह पूरे विश्वास के साथ हम भारतीय कह सकते हैं।

डॉ. अखिलेश्वर शुक्ला
विभागाध्यक्ष (राजनीति विज्ञान विभाग)
राजा श्री कृष्ण दत्त स्नातकोत्तर महाविद्यालय, जौनपुर उत्तर प्रदेश
संपर्क: 9451336363

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