HomeArticleराजधर्म सिंहासन सत्ता की कैसी मजबूरी है

राजधर्म सिंहासन सत्ता की कैसी मजबूरी है

राजधर्म सिंहासन सत्ता की कैसी मजबूरी है

भारत मां की कोख उजड़ती ये कैसी दूरी है।।
दर्द दे रहे हो जीवन में थोड़ी दया नहीं आयी
भारत में मातम पसरा आंखें सबकी भर आयी।।
चार दिनों तक बंद रहेंगे उनके हुक्का पानी
कितना मुश्किल दौर रहा कैसी ये मनमानी।।
सैर सपाटा करने वाले इस घटना से दूर रहे
धर्म वाद की खाई में वे पटने को मजबूर रहे।।
शासन की पुर जोर सोच थी शांति कायम है
रुक—रुक होती घटना ये भी कैसी डायन है।।
सरकारी तंत्र की चूक से पब्लिक कैसे झेले
आये दिन होती है मौतें सब दिखते कैसे मेले।।
गांव राज्य से लोग यहां पर मूड बदलने आये
पल में प्रलय हो जाए दिखते बंदूकों के साये।।
पुलिस प्रशासन दूर हो गए मौत पास में आई
कैसी अनहोनी घटना थी लाश नजर ही आई।।
खुशी मना करके लाशों पर कैसे मुस्काते थे
राजनीति की एक पहेली सबको समझाते थे।।
मीडिया कर्मी शांत रहे उनको मिला मसाला है
जीवन जिसका चला गया कुछ तो होने वाला है।।
कुछ की हत्या करके कुछ को तो संदेश दिया
राम भरोसे जान बची धर्म का उपदेश दिया।।
पहलगाम में मची तबाही जीवन के बर्बादी की
मौत ताण्डव देख रही थी ये आधी आबादी की।।
बाईस अप्रैल दो हजार पच्चीस से आंखे है नम
घटना घटा दी है उसने शांत रहे आप और हम।।
शासन प्रशासन की गल्ती ने कैसी कीमत हारी
छह दिन में विधवा बन बैठी वह सुहागन बेचारी।।

देवी प्रसाद शर्मा ‘प्रभात’
ब्यूरो चीफ आजमगढ़
हिन्दी दैनिक तेजस टूडे
मो.नं. 7008310396

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