सुदामा जी भिक्षा मांग करके अपने परिवार का पालन पोषण करते थे: डा. कौशलेन्द्र
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सुदामा जी भिक्षा मांग करके अपने परिवार का पालन पोषण करते थे: डा. कौशलेन्द्र
तेजस टूडे ब्यूरो
ओमकार सिंह
अम्बेडकरनगर। रामबाबा अतरौरा ग्राम में भागवत कथा के सातवां दिन कथा वाचक डा. कौशलेंद्र महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए सुदामा चरित्र और परीक्षित मोक्ष आदि प्रसंगों का सुंदर वर्णन किया। सुदामा जी जितेंद्रिय एवं भगवान कृष्ण के परम मित्र थे। भिक्षा मांगकर अपने परिवार का पालन पोषण करते। गरीबी के बावजूद भी हमेशा भगवान के ध्यान में मग्न रहते। पत्नी सुशीला सुदामा जी से बार बार आग्रह करती कि आपके मित्र तो द्वारकाधीश है। उनसे जाकर मिलो शायद वह हमारी मदद कर दें। सुदामा पत्नी के कहने पर द्वारका पहुंचते हैं और जब द्वारपाल भगवान कृष्ण को बताते हैं कि सुदामा नाम का ब्राम्हण आया है। कृष्ण यह सुनकर नंगे पैर दौङकर आते हैं और अपने मित्र को गले से लगा लेते। उनकी दीन दशा देखकर कृष्ण के आंखों से अश्रुओं की धारा प्रवाहित होने लगती है।
उन्होंने बताया कि सुदामा जी को सिंघासन पर बैठाकर कृष्ण जी सुदामा के चरण धोते हैं। सभी पटरानियां सुदामा जी से आशीर्वाद लेती हैं। सुदामा जी विदा लेकर अपने स्थान लौटते हैं तो भगवान कृष्ण की कृपा से अपने यहां महल बना पाते हैं लेकिन सुदामा जी अपनी फूंस की बनी कुटिया में रहकर भगवान का सुमिरन करते हैं, इसलिए कहा गया है कि जब जब भक्तों पर विपदा आई है। प्रभु उनका तारण करने जरुर आए हैं। अगले प्रसंग में शुकदेव जी ने राजा परीक्षित को सात दिन तक श्रीमद्भागवत कथा सुनाई जिससे उनके मन से मृत्यु का भय निकल गया। तक्षक नाग आता है और राजा परीक्षित को डस लेता है। राजा परीक्षित कथा श्रवण करने के कारण भगवान के परमधाम को पहुंचते है।
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भगवान की कथा सुनकर ज्ञान प्राप्त होता है: अतुल शास्त्री
ज्योतिष गुरू अतुल शास्त्री ने कहा कि कथा के माध्यम से भगवान की भागवत कथा सुनते हैं। हम बच्चों को भगवान की कथा सुनकर बहुत सारी प्रेरणा बहुत सारा ज्ञान प्राप्त होता है, इसलिए जो बचपन में कथा सुनते हैं। उनका पूरा जीवन संवरता है। जीवन संवर जाए जीवन सत्मार्ग पर चले, इसलिए भगवान की कथा जब अवसर मिले तभी से प्रारम्भ कर देनी चाहिए। जितना जल्दी अवसर मिल जाए। हम राम कृष्ण को पूजते हैं। भगवान श्रीराम की हम पूजा करते हैं। श्याम सुंदर भगवान की हम पूजा करते हैं। दोनों ही जो हैं, अपने माता–पिता को बड़ा स्नेह करते हैं और उनका आदर करते हैं। महाराज ने कहा कि अगर फसल में बीज की देखभाल ढंग से न की जाय। सही से पानी न दिया जाए तो खेत में फसल खराब हो जाती है। बच्चों में संस्कार की केयरिंग न की जाए तो आने वाली नसल खराब होती है। कई बार जवानी में हम लोग इन सबकी केयर नहीं करते है हमें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन धीरे धीरे जब फर्क पड़ने लगता है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। तब यही कहावत सिद्ध होती है अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत। मुख्य यजमान एडवोकेट शिव कुमार त्रिपाठी जनमानस ने अपील किया कि प्रसाद अवश्य लें।
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