जब जब धरती पर पापाचार—अत्याचार बढ़ा तब तब भगवान अवतरित हुये: शान्तनु जी
रामकथा के दूसरे दिन श्रीराम जन्मोत्सव ने भक्तों को किया भाव—विभोर

तेजस टूडे ब्यूरो
शुभांशू जायसवाल
जौनपुर। भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता/समाजसेवी ज्ञान प्रकाश सिंह की अगुवाई में सेवा भारती के नेतृत्व में नगर के बीआरपी इंटर कॉलेज परिसर में चल रही श्रीराम कथा के दूसरे दिन आचार्य शांतनु जी महाराज ने भगवान श्रीराम के जन्मोत्सव सहित कई धार्मिक प्रसंगों का मार्मिक वर्णन किया।
कथा के दौरान भगवान शिव-पार्वती संवाद, भक्त के प्रति भगवान के प्रेम, निर्गुण-सगुण स्वरूप और धरती पर अधर्म बढ़ने पर भगवान के अवतार लेने के प्रसंगों के माध्यम से श्रद्धालुओं को धर्म, विश्वास और भक्ति का संदेश दिया। श्रीराम जन्मोत्सव के प्रसंग ने कथा स्थल को भक्तिमय बना दिया और श्रद्धालु जयकारों के साथ भक्ति में लीन हो गए। आचार्य शांतनु जी महाराज ने भगवान शिव और माता पार्वती के संवाद का वर्णन करते हुए कहा कि भगवान शिव और माता पार्वती जगत के माता-पिता हैं। भगवान शंकर कैलाश में वटवृक्ष की शीतल छाया में विराजमान थे। यह वटवृक्ष विश्वास का प्रतीक है। विश्वास ही मनुष्य को उसके जीवन में फल प्रदान करता है। उन्होंने कहा कि भगवान शिव की सुंदरता केवल उनके स्वरूप में ही नहीं, बल्कि उनकी सहजता, शांति और सरलता में भी दिखाई देती है।

उन्होंने माता पार्वती के प्रसंग के माध्यम से समझाया कि किसी भी विषय को समझने के लिए विश्वास और धैर्य आवश्यक हैं। माता पार्वती ने भगवान शिव से प्रश्न किया कि भगवान श्रीराम ब्रह्म हैं या कोई अन्य। भगवान शिव ने बताया कि राजा दशरथ के पुत्र श्रीराम ही परम ब्रह्म हैं। माता पार्वती के मन में संशय उत्पन्न हुआ कि यदि श्रीराम ब्रह्म हैं तो उन्हें अपनी पत्नी सीता के हरण के विषय में जानकारी क्यों नहीं है। महाराज ने बताया कि माता पार्वती के मन में उत्पन्न संशय दूर नहीं हुआ और वह भगवान शिव के मना करने के बावजूद भगवान श्रीराम की परीक्षा लेने पहुंच गईं। उन्होंने माता सीता का रूप धारण कर भगवान श्रीराम के सामने आने का प्रयास किया। भगवान श्रीराम ने उन्हें पहचान लिया और माता कहकर संबोधित किया। इससे माता पार्वती को भगवान श्रीराम की दिव्यता का बोध हुआ।
कथा के अनुसार वापस लौटने पर माता पार्वती ने भगवान शिव से अपने परीक्षण के विषय में सत्य नहीं बताया। इसके बाद भगवान शिव समाधि में लीन हो गए। आचार्य जी ने इस प्रसंग के माध्यम से बताया कि भगवान के स्वरूप को समझने के लिए मन में श्रद्धा और विश्वास होना आवश्यक है। संशय भक्ति के मार्ग में बाधा बन सकता है। रामकथा सुनाने वाला और सुनने वाला, दोनों ही धन्य होते हैं। भगवान श्रीराम की कथा गंगा के समान पवित्र है जो मनुष्य को आध्यात्मिक शांति प्रदान करने के साथ पूर्वजों के कल्याण का मार्ग भी प्रशस्त करती है। आचार्य शांतनु जी महाराज ने कहा कि निर्गुण और सगुण में कोई अंतर नहीं है। भक्त जिस भाव से भगवान को पुकारता है, भगवान उसी भाव और स्वरूप में उसे दर्शन देते हैं। भगवान अपने भक्तों के प्रेम के भूखे होते हैं और सच्ची भक्ति के सामने स्वयं को भी भक्त के प्रेम के अधीन कर देते हैं।
उन्होंने एक भक्त की साधना का प्रसंग सुनाते हुए बताया कि एक भक्त 12 वर्षों तक निरंतर साधना करता रहा और प्रतिदिन ठाकुर जी को माला पहनाता था। उसे विश्वास था कि साधना के फलस्वरूप भगवान एक दिन स्वयं उसके पास आएंगे। जब 13वां वर्ष आया तो भक्त ने विशेष रूप से छप्पन भोग की तैयारी की और ठाकुर जी के आगमन की प्रतीक्षा करने लगा।

काफी समय तक प्रतीक्षा करने के बाद भी जब भगवान नहीं आये तो वह निराश होकर रास्ते पर चल पड़ा। इसी दौरान भगवान चरवाहे के रूप में उसके सामने प्रकट हुए और उसे माला पहनाई। इस प्रसंग के माध्यम से महाराज ने समझाया कि परमात्मा को आडंबर से अधिक भक्त का निष्कपट प्रेम प्रिय है। सच्चे मन से की गई साधना और प्रेम कभी व्यर्थ नहीं जाते। महाराज ने कहा कि जब-जब धरती पर दुराचार, पापाचार और अत्याचार बढ़े, तब-तब भगवान को अवतार लेना पड़ा। भगवान की लीलाओं का उद्देश्य धर्म की रक्षा और अधर्म का अंत करना है। उन्होंने भगवान विष्णु और वृंदा से जुड़े प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि जालंधर वध के प्रसंग के बाद वृंदा ने भगवान को श्राप दिया जिसे भगवान ने स्वीकार किया। इसी प्रसंग से शालिग्राम स्वरूप की मान्यता जुड़ी है।
उन्होंने कहा कि धर्म की आड़ में अधर्म नहीं होना चाहिए। जब धर्म के नाम पर गलत कार्य होने लगते हैं तब उसे रोकना आवश्यक हो जाता है। अधर्म को रोकने और धर्म की स्थापना के लिए भगवान को भी लीला करनी पड़ी। उनके प्रत्येक अवतार और लीला के पीछे संसार के कल्याण का भाव निहित है। आचार्य जी ने जीवन में शांति और सहजता के महत्व पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति शांत रहेगा, वही वास्तविक अर्थों में सुंदर होगा। अशांत व्यक्ति स्वयं भी परेशान रहता है और अपने परिवार को भी अशांत रखता है। मनुष्य जैसा भीतर से होता है, उसका प्रभाव उसके बाहरी व्यवहार में भी दिखाई देता है। सहज और सरल स्वभाव जीवन को सुखमय बनाता है। उन्होंने भगवान शिव के स्वरूप का उदाहरण देते हुए कहा कि भगवान शंकर सहज, शांत और सुंदर हैं। मनुष्य को भी अपने जीवन में इन्हीं गुणों को अपनाना चाहिए। क्रोध, अहंकार और संशय से दूर रहकर प्रेम, विश्वास और सद्भाव के साथ जीवन जीना ही सच्ची आध्यात्मिकता है।
श्रीराम जन्मोत्सव के प्रसंग के वर्णन के दौरान कथा स्थल पर श्रद्धा और उत्साह का वातावरण बन गया। भगवान श्रीराम के प्राकट्य का प्रसंग सुनकर श्रद्धालु भावविभोर हो उठे। परिसर में भगवान श्रीराम के जयकारे गूंजने लगे और भक्तों ने भक्ति भाव के साथ जन्मोत्सव की खुशियां मनाईं। श्रद्धालुओं के चेहरों पर उत्साह और उल्लास दिखाई दिया। पूरा वातावरण राममय हो गया और भक्तों ने भगवान श्रीराम के आदर्शों को अपने जीवन में अपनाने का संकल्प लिया। श्रीराम जन्मोत्सव के बाद कथा स्थल पर हर्षोल्लास का माहौल बना रहा। श्रद्धालुओं ने भगवान श्रीराम के जन्म की खुशी में जयकारे लगाए और भक्ति में सराबोर होकर कथा का आनंद लिया। उन्होंने भगवान श्रीराम के जीवन और उनकी लीलाओं के माध्यम से मर्यादा, सत्य, धर्म, कर्तव्य और प्रेम का संदेश दिया। दूसरे दिन की कथा ने श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक भाव से जोड़ते हुए यह प्रेरणा दी कि जीवन में धर्म और सत्य के मार्ग पर चलते हुए दूसरों के प्रति प्रेम, विश्वास और सद्भाव बनाए रखना चाहिए।
इस अवसर पर अम्बरीश जी (राष्ट्रीय मंत्री विश्व हिन्दू परिषद), कृपाशंकर सिंह (पूर्व गृह राज्यमंत्री), ओम प्रकाश सिंह (प्रदेश प्रवक्ता भाजपा), रमेश चन्द्र मिश्रा (विधायक बदलापुर), अशोक उपाध्याय (क्षेत्र कुटुंब प्रबोधन), डॉ. आरएन त्रिपाठी (पूर्व सदस्य लोक सेवा आयोग), सतीश सिंह, पप्पू माली, विनय सिंह (ब्लॉक प्रमुख मुफ़्तीगंज), विनय सिंह (ब्लॉक प्रमुख महाराजगंज), पंकज सिंह कौशिक, डॉ. विनोद कन्नौजिया, सेवा भारती के विभाग प्रमुख डॉ. तेज सिंह, पूर्व सभासद विनय सिंह, अमित सिंह, दीपक सिंह, राघवेंद्र प्रताप सिंह समेत तमाम गणमान्य लोग मौजूद रहे।









