यह दृश्य न केवल सरकार की योजनाओं की धज्जियां उड़ाता है, बल्कि बाल अधिकारों का खुला उल्लंघन भी है। भारत सरकार ने बाल श्रम पर सख्ती से रोक लगाई है और 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों से किसी भी प्रकार का श्रम कराना कानूनन अपराध है। बावजूद इसके धर्मपुर में ग्राम प्रधान द्वारा बच्चों को काम पर लगाया जाना न केवल अमानवीय है, बल्कि यह एक संगीन अपराध की श्रेणी में आता है। प्रशासनिक स्तर पर भी यह लापरवाही स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही है। मांधाता ब्लॉक के अधिकारी, ग्राम सचिव और तकनीकी सहायक (जेई) की मिलीभगत या लापरवाही से ही यह कार्य संभव हो पाया है। यह भी सवाल उठता है कि मनरेगा जैसी पारदर्शी योजना में नाबालिक बच्चों की मौजूदगी कैसे संभव हो पाई। क्या मस्टररोल में इन बच्चों के नाम दर्ज हैं? क्या इनके नाम पर भुगतान भी किया जा रहा है। ब्लॉक के पीडी (प्रोजेक्ट डायरेक्टर) दयाराम यादव की चुप्पी भी संदेह को बढ़ाती है। यदि अधिकारी सच में सजग होते तो बच्चों से मजदूरी कराना कभी संभव नहीं होता। यह पूरा मामला भ्रष्टाचार, लापरवाही और अमानवता का प्रतीक बनकर सामने आया है। जरूरत है कि प्रशासन तुरंत संज्ञान लेकर दोषियों पर सख्त कार्रवाई करे। साथ ही इन बच्चों को शिक्षा से जोड़ा जाए, ताकि उनका भविष्य उज्ज्वल हो सके। जिन हाथों में कलम होनी चाहिए, उन हाथों में फावड़ा देना किसी भी सभ्य समाज के लिए शर्मनाक है।





