तीन डीसीपी एवं तीन एडीसीपी, फिर भी थाने पर सुनवाई नहीं होती, आखिर क्यों?
जितेन्द्र सिंह चौधरी/अतुल राय
वाराणसी। कमिश्नरेट वाराणसी में क्राइम को कंट्रोल करने के लिए 3 डीसीपी और तीन एडीसीपी तैनात किए गए हैं। उसके बाद भी पुलिस ऑफिस पुलिस कमिश्नर और ज्वाइंट पुलिस कमिश्नर कार्यालय में फरियादियों की भारी संख्या प्रतिदिन आती है।
आखिर क्यों नहीं थाने पर थानेदारों द्वारा उनके समस्याओं का समाधान किया जाता है? यह सोचने वाली बात है कि कमिश्नरेट वाराणसी में आईपीएस अधिकारियों की पूरी फौज तैयार है। इसके बाद भी थाना स्तर पर फरियादियों का सुनवाई न होना कहीं न कहीं उनके कार्यशैली पर सवालिया निशान है। बताते चलें कि वाराणसी को 3 जोन वरूणा काशी और गोमती में बांटा गया है। तीनों जोन में आईपीएस स्तर के दो—दो अधिकारी डीसीपी और एडीसीपी तैनात किये गये। इसके बाद भी थानेदारों और चौकी प्रभारी द्वारा हिला हवाली बिल्कुल ही समझ से परे है।पुलिस कमिश्नर मोहित अग्रवाल को इस विषय पर गहन चिंतन करने की और कठोर कार्यवाही करने की जरूरत है जिससे थानाध्यक्ष और चौकी प्रभारी के कार्य प्रणाली में सुधार आए और वाराणसी पुलिस की एक अच्छी छवि जनता के बीच प्रस्तुत हो।
219 प्रशिक्षु दरोगा से मुखातिब हुये थे जेसीपी
संयुक्त पुलिस आयुक्त (मुख्यालय एवं अपराध) 219 प्रशिक्षु दरोगा से भी मुखातिब हुए। उन्होंने कहा कि प्रशिक्षु दरोगा की रोजाना रोस्टर के हिसाब से ड्यूटी लगाई जाए। 5-5 दरोगा रोजाना एक-एक एसीपी, एडीसीपी और डीसीपी के यहां पेश हों और उनके प्रशिक्षण की जानकारी ली जाए। प्रशिक्षु दरोगा का बैच बनाकर एडीसीपी और डीसीपी रोजाना उनकी क्लास लें। प्रति प्रशिक्षु दरोगा को अधिकतम पांच मुकदमे की विवेचना दी जाए। विवेचना ऐसे मुकदमों की दी जाए जो सामान्य किस्म के ही हों।
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