Tag: Internal strife and Mughal conspiracies

  • आंतरिक कलह और मुग़ल षड्यंत्र

    आंतरिक कलह और मुग़ल षड्यंत्र

    • आंतरिक कलह और मुग़ल षड्यंत्र

    किसी भी सुदृढ़ शासन को गिराने के लिए अक्सर आंतरिक मतभेद सबसे बड़ा हथियार बनते हैं। कहलगांव में भी यही हुआ। यद्यपि राजा जानकीराम एक सक्षम शासक थे लेकिन परगने के कुछ प्रभावशाली सामाजिक वर्ग उनकी सत्ता को पूरी तरह स्वीकार करने को तैयार नहीं थे। इसी असंतोष के बीच पंडित हिरानंद और बिद्यानंद नामक दो भाइयों का राजा जानकी राम से विवाद हो गया। यह विवाद केवल स्थानीय स्तर तक सीमित नहीं रहा। दोनों भाइयों ने कहलगांव छोड़कर पटना का रुख किया और वहां के मुग़ल नाज़िम के पास राजा के विरुद्ध शिकायत दर्ज कराई। मुग़ल प्रशासन के लिए यह वही ‘स्वर्ण अवसर’ था जिसकी उन्हें वर्षों से तलाश थी।
    मुग़ल नाज़िम ने इस शिकायत को आधार बनाकर कहलगांव पर दंडात्मक सैन्य कार्रवाई का निर्णय लिया। जब राजा जानकीराम को सूचना मिली कि पटना से एक विशाल मुग़ल सेना उन्हें कुचलने के लिए आ रही है तो उन्होंने पीछे हटने के बजाय रणक्षेत्र को चुना। उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि वह मुग़ल अधीनता या अपमानजनक संधि के बजाय युद्ध की विभीषिका का सामना करना पसंद करेंगे। उन्होंने अपने सीमित संसाधनों और वफादार समर्थकों को एकजुट किया और परगने की रक्षा के लिए मोर्चाबंदी शुरू कर दी। यह लड़ाई केवल ज़मीन की नहीं, बल्कि उनके आत्म-सम्मान की थी।

    सन् 1569 में मुग़ल सेना, पंडित हिरानंद और बिद्यानंद की अगुवाई में कहलगांव की सीमाओं तक पहुँच गई। इतिहास गवाह है कि राजा जानकीराम कलाल ने मुग़ल दंडात्मक बल का डटकर मुकाबला किया। श्रेष्ठ सैन्य संख्या और मुग़ल मारक क्षमता के बावजूद, उन्होंने अंतिम सांस तक प्रतिरोध जारी रखा। समकालीन अभिलेखों के अनुसार युद्धभूमि में अदम्य साहस का परिचय देते हुए राजा जानकीराम लड़ते-लड़ते वीरगति को प्राप्त हुए। उनकी मृत्यु के साथ ही कहलगांव के एक स्वतंत्र और स्वाभिमानी युग का अंत हुआ।
    मुग़ल प्रशासन ने उनकी मृत्यु के पश्चात कहलगांव की ज़मींदारी उपहार स्वरूप उन दोनों भाइयों को सौंप दी जिन्होंने मुग़लों का मार्ग प्रशस्त किया था। राजा जानकीराम कलाल का बलिदान हमें सिखाता है कि सत्ताएँ बदल सकती हैं लेकिन इतिहास उन्हीं का सम्मान करता है जो अपने मूल्यों और स्वाभिमान के लिए अंतिम क्षण तक खड़े रहते हैं। कहलगांव की मिट्टी आज भी उस वीर शासक की गाथा सुनाती है जिसने मुग़ल साम्राज्य की विशाल शक्ति के सामने झुकने से इनकार कर दिया था।

    जे.के. कर्णवाल
    मेरठ, उत्तर प्रदेश।

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