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उनका मिट्टी में लहू बहा ही नहीं…
तूने गैरों का दुखड़ा सुना ही नहीं,
कभी अपनों का विष पिया भी नहीं।
झूठी लेते हो साँसें, जग को क्या फायदा,
तूने जीवन सही से जिया ही नहीं।
कुदरत बख्शी है तुझको बहुत कुछ यहाँ,
तेरे अंदर जब झाँका, वफ़ा ही नहीं।
तुझको सलीके से रहने आया ही नहीं,
जिसका लिया तू कभी दिया ही नहीं।
अच्छा सोचा नहीं तू बुरा ही किया,
जैसे धरती पे दिखता तुझे खुदा ही नहीं।
मोती जब भी बिछाया पापियों के लिए,
बहता आँसू किसी का सिला ही नहीं।
रहमतें बचाने बता तुझे आएँगी कहाँ से,
किसी की जुबां पे तेरे लिए दुआ ही नहीं।
बद्दुआ लेकर एक दिन तू मर जायेगा,
तेरा दुनिया में देख कुछ बचा ही नहीं।
पहले नभ से उतरते थे फ़रिश्ते जमीं पर,
रामकेश अब तो जीने में मजा ही नहीं।
लूट रहे हैं दोनों हाथों से जो देश को,
उनका इस मिट्टी में लहू बहा ही नहीं।
रामकेश एम. यादव ‘सरस’ मुम्बई।
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