डा. दिलीप सिंह एडवोकेट
संत शिरोमणि रविदास एक महान धर्मगुरु आध्यात्मिक व्यक्तित्व कवि और साहित्यकार होने के साथ महान समाज सुधारक भी थे,
उनका जन्म सीर गोवर्धन गांव वाराणसी में 1388 ईस्वी में और मृत्यु 1518 ईस्वी में हुआ था अपने दीर्घ जीवन काल में संत शिरोमणि रविदास ने भारत और सनातन धर्म की रक्षा करते हुए एक से बढ़कर एक प्रतिमान स्थापित किया।
माघ महीने की परम पवित्र पूर्णिमा के दिन रविदास जी का जन्म रविवार के दिन हुआ था। इसी से उनका नाम रविदास पड़ा। उनका व्यक्तिगत धंधा जो पारिवारिक था। मोची का था और वे जूते चप्पल सिलने का काम करते थे और आजीवन इस कार्य को पूरी निष्ठा और विश्वास के साथ करते रहे। वाराणसी वैसे भी संसार का सबसे प्राचीनतम नगर और धर्म आस्था विश्वास का केंद्र रहा है और गंगा जी उसकी पहचान रही है। काशी भगवान भूतनाथ शिव जी के त्रिशूल पर टिकी हुई धरती से अलग है, इसलिए काशी का जो महत्व में है, वह किसी अन्य नगर का नहीं हो सकता है। यहां पर मृत्यु होने मात्र से ही व्यक्ति को जन्म-जन्मांतर से जन्म और मरण से हमेशा के लिए छुटकारा मिल जाता है।
महान संत रविदास जी के पिता का नाम संतोष दास और माता का नाम कर्मा देवी था बड़े होने पर उन्होंने अपने पैतृक व्यवसाय को अपनाया और धर्म आध्यात्म और भक्ति में इतने निपुण हो गये कि बड़े-बड़े संत महात्मा राजा महाराजा उनसे प्रभावित होकर उनके अनुयाई बन गए लेकिन मुस्लिम धर्म वालों से उनकी नहीं बनी इसलिए मुस्लिम धर्म के लोगों ने उनको बहुत ही पीड़ित प्रताड़ित और अपमानित किया वह कबीर दास जी के घनिष्ठ पर चित्र लोगों में और समकालीन लोगों में थे और कबीर दास की तरह जीवित है हिंदी की महान भक्त कवयित्री और राजस्थान के राज परिवार की परम पवित्र मीराबाई उनकी थी। रविदास जी ने हर प्रकार की कुरीतियों और अंधविश्वास के विरुद्ध आज जीवन संघर्ष किया और प्रचार—प्रसार किया और हर पवित्र और सच्ची चीजों को अपनाने का आवाहन किया और किसी भी काम को कभी छोटा या बड़ा नहीं माना।
उनके बारे में अनेक क्यों मदंतियां और चमत्कार कहे जाते हैं लेकिन स्वयं रविदास जी चमत्कार से और दिखावा तथा नंबर से बहुत दूर रहते थे। अपना पैतृक मोची का काम करते हुए उन्हें बहुत ही संतोष प्राप्त होता था। उनकी भक्ति रचनाएं हिंदी साहित्य की अमूल्य निधि है और मानव मात्र को नई दिशा दिखाती हैं उनके जीवन के बारे में कहा जाता है कि एक बार बहुत से संत और प्रसिद्ध गंगा स्नान करने जा रहे थे। उन्होंने संत रविदास जी से भी गंगा स्नान करने को कहा तो उन्होंने कहा कि मैं अगले दिन निश्चित समय पर किसी को जूता सील करके देने का वचन दिया है और इसलिए मैं नहीं जा सकता। हम मेरी ओर से एक कड़ा ले जाकर गंगा मां को अर्पित करके मेरा प्रणाम कह देना जब वे लोग स्नान के बाद रविदास जी का कड़ा मां गंगा जी कौन का नाम लेकर अर्पित करने लगे तो बहुत बड़ा चमत्कार हुआ साक्षात माता गंगा बीच धार से प्रकट हुई और उनका कड़ा लिया। उन्हें आशीर्वाद देकर अदृश्य हो गये जिससे चारों ओर रविदास जी की धाक जम गई।
ऐसे महान शिरोमणि रविदास जी एक और चमत्कार उनके बारे में प्रसिद्ध है। एक बार कोई स्त्री सोने का कड़ा पहनकर गंगा स्नान करने को गई थी। संजोग से उसका कलश नदी में गिर गया और वह घर जाकर पीड़ित प्रताड़ित होने को लेकर बहुत परेशान हुई और फूट-फूट कर रोने लगी। अंत में वह संत शिरोमणि रविदास के यहां गई और रोकर अपना कष्ट कहने लगी। रविदास जी ने कहा कि मैं तो बहुत साधारण व्यक्ति हूं। अगर तुम्हारा सोने का कड़ा गंगा में खोया है तो गंगा में ही मिलेगा। जब उसने बहुत विलाप किया तो रविदास जी ने दया करके अपने कटौती से हाथ डालकर उसके सोने के कड़े लेकर उसे दे दिये तभी से मन हो चंगा तो कठौती में गंगा वाली बात विश्व विख्यात हो गयी।
इस बार संत शिरोमणि रविदास जी का जन्म दिवस पूरे भारत और विश्व के अनेक स्थानों में 12 फरवरी को बुधवार के दिन मनाया जाएगा, क्योंकि 11 फरवरी को पूर्णिमा की तिथि शाम को 6:55 पर प्रारंभ होगी जो 12 फरवरी को शाम 7:22 तक रहेगी। इस प्रकार उदय तिथि के अनुसार पूर्णिमा और रविदास जी की जयंती 12 फरवरी के दिन मनाई जाएगी। मांग का परम पवित्र महीना अत्यंत शुभ होता है। इस समय नदी सरोवर लाल पोखर का पानी बिलकुल निर्मल और स्वच्छ होता है, इसलिए इस पूर्णिमा को स्नान का विशेष महत्व है। सभी नदियों में बड़ी संख्या में सामान्य लोग और रविदास जी के अनुयाई स्नान करते हैं।
रविदास जी का पूरे भारत के अलावा पंजाब में विशेष प्रभाव पड़ा, इसलिए उनके जन्मदिन पर गुरुद्वारा भी सजाए जाते हैं। लोग कीर्तन भजन करते हैं और रविदास जी के महत्व में का वर्णन किया जाता है और अनेक लोग रविदास जी के वेशभूषा धारण कर उनके जीवन को लोगों से बताते हैं। गुरुद्वारा में शब्द कीर्तन का आयोजन किया जाता है। वास्तव में स्वच्छ सरल हृदय के भक्त शिरोमणि संत शिरोमणि रविदास जी मानवता और सनातन धर्म की अमूल्य निधि हैं। उनके अनुयायी पूरे भारत में बड़ी संख्या में पाए जाते हैं और उनके जन्मदिन पर वाराणसी उनके भक्तों से पट जाती है। रविदास जी ने देश और धर्म के लिए जो काम किया वह सदा सर्वदा अविस्मरणीय रहेगा।
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