अक्षय तृतीया और भगवान परशुराम

अक्षय तृतीया और भगवान परशुराम

डा. दिलीप सिंह एडवोकेट
अक्षय तृतीया एक ऐतिहासिक दिन है जो इस वर्ष 30 अप्रैल को मनाया जायेगा। यह पर्व विशेष रूप से इस समय भगवान परशुराम से जुड़ गया है जो भगवान श्रीहरि विष्णु के अवतार थे लेकिन अक्षय तृतीया कई महत्वपूर्ण महापुरुषों और कथाओं से ही जुड़ा हुआ है। अक्षय तृतीया प्रति वर्ष वैशाख माह की शुक्ल पक्ष की तृतीया के दिन पड़ता है और इस वर्ष तिथि 30 अप्रैल को पड़ रही है।
सबसे पहले तो अक्षय तृतीया पवित्र दिन है और यह आदि देव ऋषभदेव के साथ जुड़ा हुआ है जिन्होंने घनघोर तपस्या करके तीनों लोकों में हाहाकार मचा दिया था और पूरे 400 दिन के बाद गन्ने के रस से अपना व्रत पूरा किया था, इसलिए जैन पंथ के लोग इसे बहुत ही उत्साह से मनाया करते हैं। इसके अलावा किसी दिन भगवान श्री हरि विष्णु के अवतार भागवत परशुराम जी का जन्म धरती पर महर्षि जामदानी और माता रेणुका के यहां हुआ था जिनकी तपोस्थली जमदग्निपुरम जमैथा गांव में है, उन्हीं के नाम से जौनपुर का नाम पहले जमदग्नि पुरम रखा गया था जो कालांतर में जौनपुर हो गया।
अक्षय तृतीया के दिन ही द्रौपदी को भगवान सूर्य के द्वारा उनके कासन को देखते हुए अक्षय पत्र दिया गया था जो तब तक खाली नहीं होता था जब तक भोजन बनाने वाला उसको खा नहीं लेता था। दुर्योधन के कहने पर जब दुर्वासा ऋषि गए तब उनको अक्षय पात्र द्वारा ही तृप्ति किया गया था। एक अन्य घटनाक्रम में सदा नीरा सरस्वती नदी के किनारे आज के दिन ही ब्रह्म ऋषि वेद व्यास ने महाभारत की कथा भगवान गणेश जी को बोलकर लिखाना शुरू किया था। भगवान वेदव्यास के श्राप के कारण ही सरस्वती जमीन के अंदर चली गयी।
एक अन्य घटनाक्रम में किसी दिन परम पवित्र देव नदी गंगा मां का “धरती पर हुआ था जिससे समस्त भारत और सगर पुत्रों का कल्याण हुआ था और लाने वाले भागीरथ के नाम पर गंगा मां का नाम भागीरथी पड़ा सागर पुत्रों के नाम पर ही समुद्र का नाम सागर पड़ा। आज के दिन ही विप्र सुदामा अपने बाल सखा भगवान श्रीकृष्ण से मिलने द्वारका गए थे और भगवान श्री कृष्ण ने सुदामा के पूरे गांव को ही द्वारका जैसा बना दिया था। इस वर्ष वैसे तो अक्षय तृतीया रात में 11:46 पर 29 अप्रैल को ही लग जाएगी जो 30 अप्रैल को 9:37 तक रहेगी लेकिन उदय तिथि के अनुसार 30 अप्रैल के दिन ही भगवान परशुराम जयंती और अक्षय तृतीया मनाया जायेगी।
30 अप्रैल को सुबह 5:40 से दोपहर 12:18 तक अक्षय तृतीया का पूजा पाठ व्रत अनुष्ठान करने का सर्वश्रेष्ठ समय है। इस दिन भगवान विष्णु माता लक्ष्मी को प्रतिमा रखकर उसे लाल वस्त्र से ढंककर लाल या पीले रंग के कपड़े बिस हुए चौकी पर रखा जाता है और उनको सत्तू खीर चैन मौसमी फल और मिठाई कब भोग लगाया जाता है और पूजा करने के पहले प्रतिमा को गंगाजल से धोया जाता है।
भगवान परशुराम किसी धर्म और जाति विशेष के नहीं थे। यह संपूर्ण पृथ्वी पर फैले हुए पाप और अत्याचार और निरंकुश राजाओं को सही मार्ग पर लाने के लिए कटिबद्ध थे। इसी क्रम में उन्हें अनेकों महायुद्ध करने पड़े, इसलिए उन्होंने भयंकर तपस्या करके भगवान शिव से अद्वितीय फरसा और धनुष बाण प्राप्त किया जिसके सामने बड़े से बड़ा महान योद्धा भी पराजित हो जाता था।
भगवान परशुराम अद्वितीय पितृ भक्त थे। पिता के कहने पर उन्होंने माता रेणुका का गर्दन काट लिया लेकिन जब पिता ने वर मांगने को कहा तो उन्होंने वर मांग कर माता को जीवित कर दिया जिससे परम प्रसन्न हुए परशुराम जी को उनके पूज्य पिता जमदग्नि ऋषि ने इच्छामृत्यु का वरदान दिया और परशुराम आज भी धरती पर विभीषण ब्रह्म ऋषि मार्कंडेय हनुमान जी आल्हा कृपाचार्य अश्वत्थामा और हनुमान जी के साथ अमर हैं।
अक्षय तृतीया पर बहुत से दुष्प्रचार किया जाते हैं। जैसे कि इस दिन आभूषण, वाहन, मकान खरीदना बहुत शुभ माना जाता है लेकिन मैं बहुत प्रामाणिक रूप से बता दूं कि भगवान परशुराम या अक्षय तृतीया पर खरीदारी से कोई संबंध ही नहीं है। यह कुछ लोगों की चाल है कि इसी दिन नई चीजों को खरीदना चाहिए जबकि ऐसा कुछ नहीं है। ऐसा ही जनप्रतवाद और झूठा बातें धनतेरस के दिन फैलायी जाती हैं। वैद्यनाथ धनवंतरी से खरीदारी से कोई संबंध ही नहीं है, इसलिए आप चाहे जो भी खरीदारी करें या निर्माण करें, उसका क्षेत्र दिया से कुछ भी लेना—देना नहीं है।
भगवान परशुराम का बड़े-बड़े परम वीरों से युद्ध हुआ जिसमें सहस्त्रार्जुन को उन्होंने मारकर 21 बार उसके वंश का विनाश किया लेकिन सनातन धर्म को तोड़ने वाले लोगों ने इसे यह कह कर प्रसारित किया कि उन्होंने 21 बार धरती से सभी क्षत्रियों का विनाश कर दिया था जो बिल्कुल झूठ है। उन्हीं के समय में राम, लक्ष्मण, राजा दशरथ सहित अन्य लोग कहां से होते थे? उन्होंने रावण को भी मुक्त कराया था और भगवान श्रीराम से उनका आखिरी युद्ध हुआ था जिसमें उनके पराजित होना पड़ा और उनके तेज का भगवान श्रीराम ने हरण कर लिया। इसका अर्थ यह भी है कि जब एक अवतार आ गया तो पीछे के अवतार की प्रासंगिकता समाप्त हो गई। भगवान परशुराम ने अनंत गति से चलने का अपना वरदान सुरक्षित रखा और आज भारत की धरती को ऐसे ही परम बुद्धिमान—महातेजस्वी परशुराम जी की आवश्यकता है जो शैतान, राक्षस और विधर्मी लोगों का संघर्ष करके देश में राम राज्य का मार्ग प्रशस्त करें।

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