गुण अवगुण कर्महिं परखि, सुधि देखहिं परिणाम।
बिनु जाने आरम्भ कृत, मिलत अयश तेहिं नाम।।
ज्ञेय पतिंगहिं दीप गुण, निकट जात पुनि सोइ।
लव निमेष लौ महि जरै, विषय ज्ञान नहिं होइ।।
जल प्रवाह पिशितहिं निरखि, शफरी भोजन लोभ।
कण्टक कण्ठहिं बिच धसै, प्रान जात करि क्षोभ।।
जानि समुझि संकट फंसै, जीव पतन गति काम।
ताहिं डूबि उबरै नहीं, मुख निकसै नहिं राम।।
होत पराया सबहिं कोऊ, भ्रम बस आपन जान।
स्वार्थ विमुख नर विरत है, श्वास विरत तन प्रान।।
आतप छाया जल तृषा, क्षुधा तृप्ति कर अन्न।
काम नारि संसर्ग सुख, भ्रम सुख जड़ आपन्न।।
लोभिहिं याचक रिपु सदा, जड़ रिपु ज्ञानहिं सोइ।
ब्यभिचारिणि रिपु होत पति, चोर चन्द्र रिपु होइ।।
आत्मद्वेश निज मृत्यु सम, द्वेष अपर धन नाश।
राजद्वेश जीवन नशै, विप्र द्वेश कुल नाश।।

विटप सदन तृन शयन अरु, असन पत्र फल मूल।
सरिता जल वल्कल वसन, विपिन वास अनुकूल।।
वित्तहीन जग मान नहिं, मिलत सदा अपमान।
श्रेष्ठ तासु गति साधु होइ, करइ राम गुन गान।।
एक विटप महं वास नित, विहग रूप बहुरंग।
प्रात होत चहुँ दिशि गमन, शोक विषय नहिं अंग।।
जन्म मृत्यु गमनागमन, सुख दुख मिलन वियोग।
एकाकी नहिं होइ कछु, विधिगत सब संजोग।।
रचनाकार- डॉ. प्रदीप दूबे
(साहित्य शिरोमणि) शिक्षक/पत्रकार
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