ओटीटी प्लेटफार्म से बदलता मीडिया का स्वरूप
ओटीटी (ओवर दी ऑप) प्लेटफॉर्म्स जैसे नेटफ्लिक्स, अमेज़न प्राइम, डिज़्नी$ हॉटस्टार, सोनी लिव, ज़ी5 और विशेष रूप से भारतीय प्लेटफॉर्म जैसे एमएक्स प्लेयर, ऑल्ट बालाजी आदि ने मीडिया के पारंपरिक ढांचे को पूरी तरह बदल दिया है।
अब दर्शक खुद तय करते हैं कि उन्हें क्या देखना है, कब देखना है और किस भाषा में देखना है। ओटीटी प्लेटफॉर्म्स ने दर्शकों को मीडिया उपभोग की आज़ादी दी है। अब समय, स्थान या डिवाइस की बाध्यता समाप्त हो गई है। समाचार, वेब सीरीज़, फिल्में, डॉक्यूमेंट्री सब अब दर्शकों के हाथ में है। ओटीटी प्लेटफॉर्म्स ने भारतीय क्षेत्रीय भाषाओं के कंटेंट को नई ऊँचाइयाँ दी हैं। उदाहरणः “स्कैम 1992“ जैसे हिंदी वेब शो, “फैमिली मैन“ का तमिल व तेलुगु में डब होना, “राणा नायडू“ जैसे हिंदी-तेलुगु मिक्स कंटेंट का आना।
अब मराठी, बंगाली, तमिल, भोजपुरी, पंजाबी में ओरिजिनल वेब सीरीज़ बन रही हैं जो पहले केवल फिल्मों तक सीमित थी। ओटीटी ने उन विषयों को मंच दिया है जिन्हें मुख्य धारा के टीवी चैनल या सिनेमा हिचकिचाहट से दिखाते थे। जैसेः लैंगिक असमानता, एलजीबीटीक्यू $ मुद्दे, ग्रामीण जीवन, राजनीतिक व्यंग्य, जातीय विषमता आदि। ओटीटी कंटेंट में संवाद अधिक स्वाभाविक, बोलचाल की भाषा, स्थानीय मुहावरे और देसी शब्दों का प्रयोग करते हैं। यहाँ पारंपरिक ’शुद्ध हिंदी’ या ’सांस्कृतिक मर्यादा’ का दबाव कम होता है। इससे मीडिया की भाषा आम आदमी के और करीब आ गई है। आज ओटीटी केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं है।
कई समाचार एजेंसियां और डॉक्यूमेंट्री निर्माता भी ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर अपनी जगह बना रहे हैं। जैसे बीबीसी, वायस और एआई जाजीरा के समाचार आधारित डॉक्यूमेंट्री ओटीटी पर खूब देखे जा रहे हैं। टीवी और सिनेमा की तरह ओटीटी पर कठोर सेंसरशिप लागू नहीं है। इसने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को तो बढ़ाया है लेकिन इसके साथ भाषाई मर्यादा, अश्लीलता और अभद्र भाषा के प्रयोग पर बहस भी खड़ी कर दी है। खास यह है कि ओटीटी प्लेटफॉर्म का भाषा पर खासा प्रभाव पड़ा है: आंचलिक शब्दों और मुहावरों का तेजी से प्रयोग, हिंग्लिश और मिश्रित भाषा का वर्चस्व, स्थानीय स्लैंग का सामान्यीकरण, अभद्र भाषा के प्रयोग की बढ़ती स्वीकृति (जिस पर समाज में मतभेद भी हैं), क्षेत्रीय भाषाओं का ग्लोबलाइजेशन आदि प्रमुख है। कहा जा सकता हे ओटीटी प्लेटफॉर्म्स ने मीडिया के स्वरूप को पूरी तरह से लोकतांत्रिक बना दिया है। अब कंटेंट निर्माता के पास ज्यादा रचनात्मक आजादी है और दर्शक के पास भाषा व विषय का विस्तृत चयन। यह माध्यम भारतीय भाषाओं और विविध समाजों को वैश्विक मंच पर लाने में सबसे प्रभावी साबित हो रहा है।
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