जयबू एक दिन बबुनी पियवा के गांव हो…
डूबै नाहीं दिहा गोरी, नईहर कै नाँव हो,
जाएके पड़ी बबुनी पियवा के गाँव हो।
दिनवाँ धराई जब अईहैं चार कहरवा,
डोलिया बिठाई लेई जाई ऊ भंवरवा।
सेजिया पे चली नाहीं कउनों ऊ दांव हो,
जाएके पड़ी बबुनी पियवा के गाँव हो।
घर ऊ अँगनवाँ रोई, रोई ऊ दुअरवा,
रोई-रोई माई-बाबू, ओढ़ई हैं ओहरवा।
अरे, दाग नाहीं लागे पावे तोहरे ऊ पाँव हो,
जाएके पड़ी बबुनी पियवा के गाँव हो।
गन्दी न होवे दिहा सुना ई चुनरिया,
डूबै न दिहा अपने बाबू कै पगड़िया।
देखि हैं सजन, तोहरे करम कै कसाव हो,
जाएके पड़ी बबुनी पियवा के गाँव हो।
नदिया किनारे रामकेश चिता सजि जाई,
दुनिया-जहान केहू सथवा न जाई।
अईलू जहाँ से सुना देई उहै छाँव हो,
जाएके पड़ी बबुनी पियवा के गाँव हो।
रामकेश एम. यादव
‘सरस’ मुम्बई,
मो.नं. 7045535450
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