51 शक्तिपीठों में एकमात्र मां विन्ध्यवासिनी ही हैं पूर्णपीठ
सुरेश गांधी
शास्त्रों में मां विंध्यवासिनी के ऐतिहासिक महात्म्य का अलग-अलग वर्णन मिलता है। शिव पुराण में मां विंध्यवासिनी को सती माना गया है तो श्रीमद्भागवत में नंदजा देवी कहा गया है।
मां के अन्य नाम कृष्णानुजा, वनदुर्गा भी शास्त्रों में वर्णित हैं। इस महाशक्तिपीठ में वैदिक तथा वाम मार्ग विधि से पूजन होता है। खास यह है कि मां के 51 शक्ति पीठों में हर जगह मां के कहीं न कहीं अंग गिरे हैं और उन्हीं अंगों के नाम पर धाम है। यूं कहे शक्तिपीठों में देवी के अलग-अलग अंगों की प्रतीक रूप में पूजा होती है लेकिन आदिशक्ति मां का इकलौता धाम विंध्याचल ही ऐसा स्थान है जहां देवी के पूरे विग्रह के दर्शन होते हैं। अर्थात 51 शक्तिपीठों में मां विंध्यवासिनी ही पूर्णपीठ है।
कहते हैं कि हृदय में भक्ति और नैनों में दर्शन का उत्साह लिए भक्तों को मां के दर्शन मात्र से ही हो जाती है फलों की प्राप्ति। लघु त्रिकोण पर मां के मंदिर में मां का विग्रह श्रीयंत्र पर है। कहते हैं कि नवरात्र के नौ दिनों में मां के मंदिर में लगे ध्वजा पर ही विराजती है, ताकि किसी वजह से मंदिर में न पहुंच पाने वालों को भी मां के सूक्ष्म रूप के दर्शन हो जाएं। नवरात्र के दिनों में इतनी भीड़ होती है कि अधिसंख्य लोग मां की पताका के दर्शन करके ही खुद को धन्य मानते हैं।
जी हां, मां विंध्यवासिनी एक ऐसी जागृत शक्तिपीठ है जिसका अस्तित्व सृष्टि आरंभ होने से पूर्व और प्रलय के बाद भी रहेगा। त्रिकोण यंत्र पर स्थित विंध्याचल निवासिनी देवी लोकहिताय, महालक्ष्मी, महाकाली तथा महासरस्वती का रूप धारण करती हैं। विंध्यवासिनी देवी विंध्य पर्वत पर स्थित मधु तथा कैटभ नामक असुरों का नाश करने वाली भगवती यंत्र की अधिष्ठात्री देवी हैं। कहा जाता है कि इस स्थान पर जो तप करता है, उसे अवश्य सिद्वि प्राप्त होती है। शायद यही वजह है जब देवासुर संग्राम के वक्त देवों पर दानव भारी पड़ने लगे तो देवों के देव महादेव, ब्रह्मा व विष्णु ने भी इस धाम में तप की और मां के आर्शीवाद से विजय हासिल की। विविध संप्रदाय के उपासकों को मनवांछित फल देने वाली मां विंध्यवासिनी देवी अपने अलौकिक प्रकाश के साथ यहां नित्य विराजमान रहती हैं।
वैसे भी मां विन्ध्यवासिनी का मंदिर त्रिकोण पर स्थित है। कहते हैं कि यहां मां का प्रार्दुभाव नहीं प्राकट्य होता है, इनका भी प्राकट्य हुआ था। भूमंडल में अद्भूत यह त्रिकोण तीन शक्तियों से जागृत त्रिकोण होता है। सारे जगत में उद्भव, स्मृति व संहार का प्रतीक है। उसमें एक बिन्दु पर महालक्ष्मी के रुप में विराजमान है तो दूसरे बिन्दु पर महाकाली और तिसरे बिन्दु पर मां सरस्वती अष्टभुजा के नाम से जानी जाती है। इन्हीं तीनों रुपों का लोग दर्शन करते है। भगवती के दर्शन से अर्थ, मोक्ष काम धर्म प्राप्त होता है। यहां ज्ञानी और अज्ञानी दोनों प्रकार के लोग साधनाएं कर भगवती से अपनी क्षमता के अनुसार साधना ग्रहण करते है। मां के मंदिर से 6 किमी की दूर पहाड़ी पर महाकाली, महालक्ष्मी और अष्टभुजा के रुप में भी विराजती है। इसके बाद काली खोह में स्थित मां काली के दर्शन के लिए जाना होता है।
फिलहाल मां के चमत्कारों की कहानी लंबी है और महिमा अनंत। मां के द्वार पर एक बार जो आ गया, वह फिर कहीं और नहीं जाता। कहते हैं कि दरबार में नित्य होने वाली मां के चारों रुपों की आरती का दर्शन कर लेने मात्र से हजार अश्वमेघ यज्ञ के फलों की प्राप्ति होती है। यह दिव्य मनोरम जगह है। बाबा भोलेनाथ की नगरी काशी व भगवान विष्णु की नगरी प्रयाग के मध्य पवित्र विन्ध्याचल धाम, जो उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर में है जहां यूपी ही नहीं, बल्कि देश के कोने-कोने से तो श्रद्धालुओं का मां के दर्शन को तो आना होता ही है। चैत व शारदीय नवरात्र के नौ दिनों तक विशाल मेला लगता है। इस मेले में लाख-दो लाख नहीं, बल्कि 25 लाख से भी अधिक श्रद्धालु पहुंचते है। मां का दर्शन कर मन्नतों की झोली भरकर ले जाते हैं।
मंदिर के प्रधान पुजारी श्रृंगारिया शेखर सरन उपाध्याय कहते हैं। देश के तमाम स्थानों में शक्तिपीठ है लेकिन यहां की शक्तिपीठ की महिमा अद्भूत व निराली है। पुराणों में विन्ध्याचल को शक्तिपीठ, सिद्धपीठ व मणिपीठ कहा गया है। चूणामणि में 51 शक्तिपीठ व श्रीमद्भागवत में 108 पीठों का उल्लेख मिलता है। जिसमें विन्ध्याचल शक्तिपीठ का विशेष महत्व है। विन्ध्य पर्वत माला की आंचलों में स्थित यह विंध्याचल शक्तिपीठ अनादिकाल से ही शक्ति की लीला भूमि रही है। शास़्त्रों के अनुसार शती के पृष्ठभाग का विपार्थ हुआ था। कहा जाता है कि मां देवी पार्वती ने यहीं पर तप कर अर्पणा नाम पाया व भगवान शिव को प्राप्त किया।
विन्ध्य क्षेत्रे समं क्षेत्रं, नास्ति ब्रहृमांड गोलके। विन्ध्य क्षेत्रं परम् दिव्यं, पावनं मंगलं प्रदत।। अर्थात विन्ध्याचल जैसा स्थान, जहां मां भगवती के तीनों रुप मां लक्ष्मी, मां काली मां सरस्वती एक ऐसे त्रिकोण पर विराजमान है जो पूरे ब्रहमांड में कहीं नहीं है। घण्ट-घड़ियालों के संगीतमयी स्वर से गूंजने वाले इस क्षेत्र में लोगों का मन शांतचित्त हो जाता है। पतित पावनी मां गंगा एवं शक्तिरूपी मां विन्ध्यवासिनी से मिर्जापुर की धरती पवित्र हो जाती है। सिद्धपीठ विन्ध्याचल धाम पुरातन काल से ऋषियों-मुनियों व जनसाधारण के लिए आकर्षण एवं प्रेरणा का स्रोत रहा है।
नंदगोप गृहे जाता यशोदागर्भसम्भवा, तत्स्तौ नाशयिष्यामि विन्ध्याचलवासिनी।। अर्थात भगवती जी ने स्वयं बोलीं— मैं द्वापर युग में नंद के यहां यशोदा के गर्भ से पैदा होंगी और कंस के हाथों से मुक्त होकर विन्ध्य क्षेत्र में निवास करेगी। कहा जाता है कि जो मनुष्य इस स्थान पर तप करता है, उसे अवश्य सिद्वि प्राप्त होती है। विविध संप्रदाय के उपासकों को मनवांछित फल देने वाली मां विंध्यवासिनी देवी अपने अलौकिक प्रकाश के साथ यहां नित्य विराजमान रहती हैं। ऐसी मान्यता है कि सृष्टि आरंभ होने से पूर्व और प्रलय के बाद भी इस क्षेत्र का अस्तित्व कभी समाप्त नहीं हो सकता। ब्रह्मा, विष्णु व महेश भी भगवती की मातृभाव से उपासना करते हैं तभी वे सृष्टि की व्यवस्था करने में समर्थ होते हैं। इसकी पुष्टि मार्कंडेय पुराण श्री दुर्गा सप्तशती की कथा से भी होती है। नवरात्र में महानिशा पूजन का भी अपना महत्व है। यहां अष्टमी तिथि पर वाममार्गी तथा दक्षिण मार्गी तांत्रिकों का जमावड़ा रहता है। आधी रात के बाद रोंगटे खड़े कर देने वाली पूजा शुरू होती है। ऐसा माना जाता है कि तांत्रिक यहां अपनी तंत्र विद्या सिद्ध करते हैं।
मां चूड़ा छोड़ती है——
यहां विशाल नीम के पेड़ पर मां चूड़ा छोड़ती है ऐसा भक्तों का मान्यता है। अतः जहां भी मां का मंदिर होता है, वहां नीम का पेड़ अवश्य होता है। मां के श्रृंगार हेतु यहीं पर चंदन घिसा जाता है। मां के द्वार पर विराजित गणेशजी की पूजा के बाद मां की श्रृंगार फिर आरती की जाती है। मंदिर का उपरी परिसर जहां भक्त परिक्रमा व धागा बांधते है। मंदिर में पाठ करते हुए ये भक्त यहीं पर साधना करते है, जिनका मां इनका कल्याण करती है। भक्त हलवे का प्रसाद बनाकर लाते है और मंदिर के भक्तों में वितरीत कराते है।
जब बैकुंठ पर भारी पड़ा मां का पलड़ा—
कहा जाता है कि एक बार नारायण ने भगवान महादेव से विन्ध्य क्षेत्र की महिमा का वृतांत पूछा, महादेव ने कहा, विन्ध्य क्षेत्रस्य महात्मयम वक्तु शिशु परमेश्वरम्, लिखतुम हहया क्षचु दृष्टतः सुरेश्यम्। अर्थात विन्ध्य क्षेत्र की महिमा हजार मुख वाले सिस, लिखने को हजार भुजा वाले अर्जुन व सहस्त्र शस्त्रों से युक्त इंद्र भी बताने में असमर्थ है जबकि एक बार ब्रहमा ने तराजु पर वैकुंठ व विंध्याचल को तौला था। वैकुंठ का पलड़ा हल्का होने से वह स्वर्ग चला गया जबकि विंध्य पृथ्वी पर ही रह गया। इस तरह वैकुंठ स्वर्ग से भी विन्ध्य धाम अति उत्तम है।
कहा जाता है कि सूरज का रास्ता रोकने वाला इस संसार में एकमात्र विन्ध्य पर्वत ही था। विन्ध्य पर्वत द्वारा रास्ता रोक दिये जाने से परेशान सूर्यदेव, विन्ध्य के गुरु अगस्त्य मुनि की शरण में गये। सूरज की प्रार्थना सुनकर गुरु अगस्त्य मुनि ने विन्ध्य पर्वत से कहा कि वह अपना आकार बढ़ाना रोक दे। अगस्त्य मुनि का कहना था कि वे अब बूढ़े हो चले हैं। उनसे अब और ऊँचाई पर चढ़ पाना इस बढ़ती उम्र में असंभव है। अगस्त्य मुनि के लाख आग्रह के बाद भी जब विन्ध्य पर्वत नहीं माना तो उन्होंने श्राप देने को कहा, तभी विन्ध्य पर्वत शरणागत होते हुए क्षमा याचना की। मुनि द्वारा क्षमा किए जाने के बाद विन्ध्य पर्वत ने अपना आकार बढ़ाना रोक दिया। इसके बाद ही सूरज को आगे बढ़ने का रास्ता मिलना संभव हो पाया था। कहते हैं तभी से विन्ध्य पर्वत आज भी जहां के तहां सिर झुकाये खड़ा है। अपने गुरु की आज्ञा पालन के लिए। इस तथ्य का उल्लेख श्वामन पुराण के 18वें अध्याय में भी है। कहते हैं कि पर्वतराज विन्ध्य के ऊपरी शिखर पर ही मां भगवती दुर्गा आज भी निवास करती हैं। भगवान भास्कर की पहली किरण विध्याचल धाम पर ही पड़ती है।
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