स्नेह का पर्व: होली
हृदय द्वार पर दस्तक देता,
पावन पर्व यह होली का,
बैर-भाव सब विस्मृत कर दे,
यही मंत्र है टोली का।
भीग रहे हैं वस्त्र प्रेम में,
मन भी सराबोर हुआ,
अबीर-गुलाल प्रतीक मात्र हैं,
असली रंग हमजोली का।
हाथों में विश्वास भरा हो,
नयनों में सम्मान रहे,
रंग वही जो खुशियाँ बांटे,
सबका ही अभिमान रहे।
हुड़दंगों के शोर-शराबे में,
शालीनता न खो जाए,
त्योहार वही जो मधुर याद बन,
अधरों की मुस्कान रहे।
टेसू के फूलों से महकी,
आज धरा की अँगनाई,
कोयल की कूक ने कानों में,
मधुर रागिनी बिखराई।
प्रकृति भी है सज-धज बैठी,
नवल रूप श्रृंगार लिए,
मानो अंबर ने धरती को,
रंगों की सौगातें दीं।
वो मिट्टी की सौंधी खुशबू,
वो कीचड़ की होली थी,
न कोई छोटा, न कोई बड़ा था,
बस बच्चों की टोली थी।
आज बदल गए ढंग खेलने के,
पर भाव वही अनमोल रहे,
मर्यादा की लक्ष्मण रेखा,
हर अंतर्मन की बोली रहे।
कड़वाहट को भस्म करें हम,
जला होलिका द्वेषों की,
प्रेम-सुधा की धार बहे अब,
मिटे व्यथा अवशेषों की।
रंगों का यह खेल तभी है,
जब मन से मन मिल जाए,
तभी पूर्ण है अर्थ जगत में,
फागुन के संदेशों की।
जात-पात की दीवारें ढहें,
रंगों की इस बौछार में,
इंसानियत का इत्र घुला हो,
फागुन के इस प्यार में।
कोई भी प्यासा न रहे यहाँ,
स्नेह के मीठे प्यालों का,
आओ मिलकर वंदन करें हम,
इन चटक-सुनहरे गालों का।
मत भूलो कि रंग वही है,
जो रिश्तों को गहरा दे,
सूखे गालों पर भी जो,
स्नेह की अमिट लकीरें दे।
कुछ ऐसा मत करना संजीव,
जिससे औरों का मन आहत हो,
लोक-लाज और शिष्टाचार ही,
होली की असली चाहत हो।
संजीव सिंह पत्रकार
न्यू जलपाई गुड़ी।
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