बांदा में बगैर मान्य योग्यता इलाज का आरोप
क्लीनिकों के पंजीकरण से लेकर मेडिकल स्टोरों तक जांच की मांग
तेजस टूडे ब्यूरो
रूपा गोयल
बांदा। जनपद में कथित झोला छाप चिकित्सकों के संचालन को लेकर एक बार फिर स्वास्थ्य विभाग की निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठने लगे हैं। जिला मुख्यालय से लेकर अतर्रा कस्बे और ग्रामीण क्षेत्रों तक बिना मान्य चिकित्सकीय योग्यता के इलाज किए जाने की शिकायतें सामने आ रही हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि मरीजों की जिंदगी से जुड़े इन मामलों में स्वास्थ्य विभाग की निगरानी कितनी प्रभावी है और शिकायत मिलने के बाद संबंधित प्रतिष्ठानों के खिलाफ जांच एवं कार्रवाई किस स्तर पर की जा रही है।
अतर्रा थाना क्षेत्र के गर्गन पुरवा में एक क्लीनिक के संचालन, संचालक की शैक्षिक योग्यता और आवश्यक दस्तावेजों की उपलब्धता को लेकर कई सवाल सामने आए हैं। मीडिया टीम की पड़ताल में प्राइवेट प्राथमिक चिकित्सा मित्र मेडिकल सोसाइटी के पदाधिकारियों के नाम वाला एक पंपलेट भी क्लीनिक के काउंटर की दीवार पर लगा मिला। हालांकि, पंपलेट पर किसी संगठन का नाम या पदाधिकारियों का उल्लेख होना अपने आप में अवैध चिकित्सा संचालन में उसकी संलिप्तता अथवा संरक्षण का प्रमाण नहीं है। पूरे मामले की वास्तविक स्थिति संबंधित अभिलेखों के सत्यापन और निष्पक्ष जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।
क्लीनिक संचालक ने इंटरमीडिएट तक बताई शिक्षा, चिकित्सकीय दस्तावेजों पर मांगा गया जवाब मीडिया टीम जब गर्गन पुरवा स्थित राजकुमार कुशवाहा के क्लीनिक पहुंची तो उनसे उनकी चिकित्सकीय योग्यता के बारे में जानकारी मांगी गई। उपलब्ध विवरण के अनुसार उन्होंने अपनी शिक्षा इंटरमीडिएट तक बताई। इसके बाद उनसे चिकित्सकीय डिग्री तथा क्लीनिक और मेडिकल स्टोर के वैध पंजीकरण से संबंधित दस्तावेज दिखाने को कहा गया। आरोप है कि उन्होंने दस्तावेज प्रस्तुत करने के बजाय प्राइवेट प्राथमिक चिकित्सा मित्र मेडिकल सोसाइटी के अध्यक्ष बबलू गुप्ता से फोन पर बात करने को कहा।
मीडिया कर्मियों ने स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य किसी संगठन के पदाधिकारी से बातचीत करना नहीं, बल्कि क्लीनिक के संचालन से जुड़े दस्तावेजों और चिकित्सकीय योग्यता का सत्यापन करना है। इसी दौरान फोन पर हुई बातचीत में दूसरी ओर से कथित तौर पर क्लीनिक के अंदर जाने पर सवाल उठाते हुए बाहर निकलने को कहा गया और फोन काट दिया गया। इस घटनाक्रम के बाद क्लीनिक के पंजीकरण और संचालक की योग्यता को लेकर उठे सवालों का जवाब दस्तावेजों के सत्यापन से मिलना जरूरी हो गया है। हालांकि केवल इंटरमीडिएट तक शिक्षा प्राप्त होने की जानकारी से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि संबंधित व्यक्ति के पास कोई अन्य वैधानिक योग्यता नहीं है। यह स्पष्ट करने के लिए संबंधित विभाग को उनकी वास्तविक योग्यता, पंजीकरण और वहां दी जा रही चिकित्सा सेवाओं की जांच करनी होगी।
सीएमओ को दी गयी जानकारी, लिखित शिकायत और साक्ष्य मांगे जाने की बात
मामले की गंभीरता को देखते हुए मीडिया टीम ने मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. ब्रजेन्द्र सिंह को फोन करके पूरे घटनाक्रम की जानकारी दी। सीएमओ ने कार्यालय आकर लिखित शिकायत देने को कहा। उन्होंने बताया कि वह सरकारी कार्य से लखनऊ जा रहे हैं। मीडिया टीम ने उन्हें बताया कि जनपद में अन्य स्थानों पर भी ऐसे मामलों की पड़ताल की जा रही है और दोपहर 3 बजे तक उनसे मिलने का प्रयास किया जाएगा। बातचीत के दौरान सीएमओ ने संबंधित चिकित्सक को सूचित करने तथा फोटो और वीडियो उपलब्ध कराने पर कार्रवाई करने की बात कही। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि शिकायत और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर संबंधित क्लीनिक का निरीक्षण कराया जाता है या नहीं। साथ ही यदि दस्तावेजों में अनियमितता पाई जाती है तो जिम्मेदार व्यक्तियों के विरुद्ध नियमानुसार क्या कार्रवाई की जाती है।
क्लीनिक में मिला संगठन का पम्पलेट, पदाधिकारियों के नामों ने खड़े किये सवाल
मीडिया टीम को क्लीनिक के काउंटर की दीवार पर प्राइवेट प्राथमिक चिकित्सा मित्र मेडिकल सोसाइटी का एक पंपलेट चस्पा मिला। इस पर अध्यक्ष बबलू गुप्ता, कोषाध्यक्ष अखिलेश यादव, वरिष्ठ उपाध्यक्ष उमेश सर्राफ, संयोजक रामराज गुप्ता आनंद और प्रखंड संयोजक डीके गुप्ता के नाम तथा पद अंकित थे। पम्पलेट पर 15 जुलाई 2025 को सदर विधायक के होटल अतिथि के पास आयोजित एक कार्यक्रम का उल्लेख भी था। इसमें डिप्लोमा धारकों, फार्मासिस्टों और चिकित्सा मित्रों से अधिक संख्या में पहुंचकर एकजुटता प्रदर्शित करने का आह्वान किया गया था। पंपलेट मिलने के बाद संगठन की भूमिका और उसके पदाधिकारियों के दावों को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है लेकिन किसी क्लीनिक में संगठन का पंपलेट लगा होना अपने आपमें किसी अवैध गतिविधि को संरक्षण देने का सबूत नहीं है, इसलिये आवश्यक है कि संगठन की वास्तविक स्थिति, उसके पदाधिकारियों की भूमिका और संबंधित क्लीनिक से उसके संबंधों की पुष्टि तथ्यों के आधार पर की जाय।
रामराज गुप्ता ने संगठन की जानकारी से किया इनकार
इस संबंध में मीडिया टीम ने प्रांतीय संयोजक रामराज गुप्ता से बांदा के चमरौड़ी स्थित उनके मेडिकल स्टोर पर मुलाकात कर सवाल किए। उपलब्ध विवरण के अनुसार उन्होंने संगठन के बारे में जानकारी होने से इनकार किया और कहा कि वह अवैध गतिविधियों का समर्थन नहीं करते। उन्होंने ऐसे मामलों में प्रशासन की ओर से कार्रवाई किए जाने की बात कही। जहां क्लीनिक पर संगठन के पदाधिकारियों के नाम वाला पंपलेट मिलने की बात सामने आई, वहीं संबंधित पदाधिकारी ने संगठन की जानकारी से इनकार किया। ऐसे में इस विरोधाभास की वास्तविकता स्पष्ट करने के लिए संगठन के दस्तावेजों, पदाधिकारियों की जानकारी और संबंधित व्यक्तियों के बयानों का सत्यापन आवश्यक है।
डीके गुप्ता की भूमिका एवं फार्मासिस्ट की डिग्री के इस्तेमाल पर भी सवाल
मीडिया टीम को मिली जानकारी में डीके गुप्ता के पूर्व में चिकित्सक डॉ. नरेश के यहां कंपाउंडर के रूप में काम करने की बात सामने आई। बताया गया कि डॉ. नरेश झांसी में सेवाएं देते थे और अब सेवानिवृत्त हो चुके हैं। आरोप है कि डीके गुप्ता उनके नाम का सहारा लेकर इलाज कर रहे हैं। इसी तरह बबलू गुप्ता के मेडिकल स्टोर में फार्मासिस्ट की डिग्री के इस्तेमाल को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, इसलिए किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने से पहले संबंधित दस्तावेजों, लाइसेंस, फार्मासिस्ट की नियुक्ति और चिकित्सकीय योग्यता की जांच जरूरी है। स्वास्थ्य विभाग को यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि संबंधित प्रतिष्ठानों का पंजीकरण वैध है या नहीं, वहां दवाओं की बिक्री के लिए आवश्यक लाइसेंस उपलब्ध हैं या नहीं और दवाओं के कारोबार में निर्धारित नियमों का पालन किया जा रहा है या नहीं। यदि जांच में किसी प्रकार की अनियमितता प्रमाणित होती है तो संबंधित कानूनों के तहत कार्रवाई की जानी चाहिये।
कोडीनयुक्त कफ सिरप की बरामदगी का मामला भी चर्चा में
जनपद में कोडीनयुक्त कफ सिरप की कथित नशीली खेप की बरामदगी का मामला भी चर्चा में रहा है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार बिसंडा थाना पुलिस ने बड़ी खेप पकड़ी थी, जिसकी बाजार कीमत करोड़ों रुपये बताई गई थी। इस मामले में आरोपित व्यक्तियों की गिरफ्तारी और नेटवर्क की जांच की जानकारी भी सामने आई थी। हालांकि इस बरामदगी के मामले को गर्गन पुरवा स्थित क्लीनिक या पंपलेट पर अंकित व्यक्तियों से जोड़ने वाला कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है, इसलिए दोनों मामलों के बीच संबंध होने का दावा करना उचित नहीं होगा। फिर भी, दवाओं की अवैध बिक्री, बिना आवश्यक लाइसेंस कारोबार और प्रतिबंधित या नियंत्रित दवाओं के दुरुपयोग से जुड़े मामलों में संबंधित एजेंसियों की निगरानी महत्वपूर्ण है। किसी भी संभावित संबंध की पुष्टि केवल जांच और ठोस साक्ष्यों के आधार पर ही की जानी चाहिए।
पथरा क्षेत्र में भी क्लीनिकों के सत्यापन की जरूरत
मीडिया टीम इसके बाद ग्रामीण अंचल के पथरा क्षेत्र पहुंची जहां कुछ क्लीनिक खुले मिले लेकिन संबंधित चिकित्सक मौजूद नहीं थे। ऐसे में वहां संचालित प्रतिष्ठानों की चिकित्सकीय योग्यता, पंजीकरण और उपचार संबंधी व्यवस्थाओं की जांच किए जाने की जरूरत महसूस हुई। हालांकि किसी चिकित्सक का निरीक्षण के समय क्लीनिक में मौजूद नहीं होना अपने आप में अनियमितता का प्रमाण नहीं है। संबंधित प्रतिष्ठानों के संचालन की वास्तविक स्थिति जानने के लिए स्वास्थ्य विभाग का निरीक्षण और दस्तावेजों का सत्यापन आवश्यक है। इसी दौरान सीएमओ कार्यालय से डॉ. मदन सिंह का फोन आया। उन्होंने सरकारी कार्य से हाईकोर्ट जाने की बात कहते हुए अपनी बात सोमवार को रखने का अनुरोध किया। सीएमओ के लखनऊ दौरे और डॉ. मदन सिंह के हाईकोर्ट जाने के कारण मीडिया टीम संबंधित अधिकारियों से मुलाकात कर फोटो और वीडियो उपलब्ध नहीं करा सकी।
स्वास्थ्य विभाग की निगरानी पर बड़ा सवाल, जांच कब होगी?
पूरे मामले के सामने आने के बाद सबसे बड़ा सवाल यह है कि जनपद में मरीजों का इलाज करने वाले क्लीनिकों और चिकित्सा प्रतिष्ठानों की नियमित जांच किस स्तर पर की जा रही है। क्या संबंधित विभाग को इन प्रतिष्ठानों के संचालकों की योग्यता और पंजीकरण की पूरी जानकारी है? क्या मेडिकल स्टोरों के लाइसेंस, फार्मासिस्ट की नियुक्ति, दवाओं के भंडारण और बिक्री संबंधी अभिलेखों की जांच की जाती है? यदि किसी प्रतिष्ठान के खिलाफ शिकायत मिलती है तो उस पर कार्रवाई की समयसीमा क्या है? इन सवालों का जवाब स्वास्थ्य विभाग की जांच और कार्रवाई से ही सामने आ सकता है। मरीजों का भरोसा बनाए रखने के लिए जरूरी है कि शिकायतों को केवल कागजी प्रक्रिया तक सीमित न रखा जाए। जिन प्रतिष्ठानों के संबंध में गंभीर आरोप सामने आए हैं, उनका नियमानुसार निरीक्षण कराया जाए और उपलब्ध दस्तावेजों का सत्यापन किया जाए। जहां अनियमितताएं प्रमाणित हों, वहां कानून के अनुसार कार्रवाई की जाए। साथ ही जिन व्यक्तियों पर आरोप लगाए गए हैं, उनका पक्ष भी लिया जाना चाहिए, ताकि जांच निष्पक्ष और तथ्यपरक रहे। किसी संगठन, पदाधिकारी या प्रतिष्ठान के खिलाफ कार्रवाई केवल नाम सामने आने के आधार पर नहीं, बल्कि प्रमाणित तथ्यों के आधार पर होनी चाहिए। फिलहाल गर्गन पुरवा के क्लीनिक की चिकित्सकीय योग्यता, पंजीकरण और संबंधित व्यक्तियों की भूमिका की स्वतंत्र पुष्टि होना बाकी है। अब निगाहें स्वास्थ्य विभाग की जांच पर टिकी हैं। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि विभाग आरोपों की पड़ताल कर वास्तविक स्थिति स्पष्ट करता है और जहां नियमों का उल्लंघन मिलता है, वहां नियमानुसार कार्रवाई करता है या नहीं।













