सियासत के बजाय कानून बनाकर औरंगजेब की निशानियां नेस्तनाबूद हों
सुरेश गांधी
मांग व समय के लिहाज से परिवर्तन हर कालखंड में होता रहा है। चाहे वह सती प्रथा जैसी कुरीतियां रही हो या बाल विवाह जैसी अनुपयुक्त सामाजिक रीति-रिवाज व चलन। या यूं कहे अक्सर हम बड़े—बजुर्गों से कहते-सुनते आ रहे हैं “जमाना बदल गया है या बदल रहा है, यह परमात्मा की लीला है।” मतलब साफ है जब दुनिया के राजनैतिक, धार्मिक, सामाजिक हर क्षेत्र में परिवर्तन हो रहे हैं तो मुगल आक्रांता औरंगजेब के सनातनी क्रूरता को बयां करती निशानियों को क्यों नहीं उखाड़ फेका जा सकता?
खास तौर से तब जब उसकी निशानियां हमारे युवा पीढ़ी को पूर्वजों पर हुए बर्बरता की दास्तां कहते हुए मुंह चिढ़ा रही हो और अबू आजमी व ओवैसी सरीके कट्टरपंथी औरंगजेब की क्रूरता को अपना आदर्श बताती फिर रही है जबकि ज्ञानवापी, श्रीकृष्ण जन्मस्थली जैसे अनगिनत मंदिर औरंगजेब की क्रूरता का न सिर्फ जीवंत उदाहरण हैं, बल्कि फिल्म ’छावा’ की वह डायलॉग जिसमें अपनी क्रूरता को बयां करते हुए औरंगजेब कहता है “पूरे खानदान की लाश पर खड़े होकर हमने ये ताज पहना था, इसे दोबारा उसी वक्त पहनेंगे जब सांभाजी की चीख गूंजेगी।“ जवाब में सांभा जी ने कहा, तू मरेगा तब यह तेरी मुगल सल्तनत भी मर जाएगी…! लेकिन अफसोस है कि हमारे पूर्व की सरकारे औरंगजेब के कब्र को मकबरे के रुप में संरक्षित की। अब वक्त है सनातन की दुहाई देने वाली मोदी-योगी सरकार कानून बनाकर आतताई मुगल आक्रांता औरंगजेब की हर निशानी को नेस्तनाबूद करें।
औरंगजेब की क्रूरता, औरंगजेब की कब्र और इतिहास में मंदिर तोड़े जाने को लेकर पूरे देश में सियासी जंग छिड़ी हुई है। वह औरंगजेब जिसने गद्दी खातिर अपने पिता शाहजहां को बंदी बनाकर खुद बादशाह बनकर क्रूरता की सारी हदें पार करते हुए देंगे, में खौलवाकर मार डालता था। उसने न सिर्फ अपने भाई दाराशिकोह की हत्या करवाई, बल्कि दूसरे भाई मुराद को भी विष देकर मरवा दिया। तब की जनता पर अनगिनत जुल्म किए और हिंदुओं से कर वसूला। उसने हिंदुओं पर कई तरह की पाबंदियां भी लगा दी थीं। उसने अपने 49 साल के कार्यकाल में 46 लाख से भी अधिक हिंदुओं का कत्ल करवा दिया तो दूसरी तरफ लाखों हिन्दुओं को जबरन मुसलमान बनने पर मजबूर किया था। भारत का इतिहास ऐसी हजारों घटनाओं से भरा है जिनसे पता चलता है कि औरंगजेब क्रूर मुगल शासक था।
बता दें कि औरंगजेब ने भारत के 15 करोड़ लोगों पर वर्ष 1658 से 1707 तक करीब 49 साल तक शासन किया। इस दौरान उसने भारत के कई मंदिरों को तुड़वा दिया जिसमें प्रमुख रूप से बाबा श्रीकाशी विश्वनाथ का मंदिर और सोमनाथ मंदिर शामिल हैं। औरंगजेब का सिर्फ एक लक्ष्य था वो पूरे भारत पर राज करना चाहता था। इसके लिए उसने राज्यों का दमन किया लेकिन उसकी इच्छा पूरी नहीं हो पाई। औरंगजेब को शिवा जी महाराज से मुंह की खानी पड़ी। यह अलग बात है कि उसने शिवा जी के बड़े बेटे संभाजी महाराज को 1689 में धोखे से पकड़वाकर क्रूरता की सारी हदें पार करते हुए हत्या कराई थी। औरंगजेब ने संभा जी महाराज को जिंदा रहने के लिए इस्लाम कबूल करने का प्रस्ताव दिया लेकिन जब उन्होंने इससे इंकार किया तो उनकी चमड़ी उधेड़ दी गई, उनके हाथ काट दिए गए, नाखून उखाड़ लिए, आंखे निकाल ली गयी और जीभ काट दिये गये लेकिन सांभा जी महाराज झुके नहीं।
औरंगजेब के अत्याचार को इससे भी समझा सकता है कि उसने हिन्दू त्योहारों के मनाने पर रोक लगा दी थी। कश्मीरी ब्राह्मणों को इस्लाम कबूल न करने के लिए उन्हें जिंदा दफन करवाना शुरू कर दिया और जब मदद में सिक्खों के नौवें गुरु तेग बहादुर जी सामने आएं तो औरंगजेब ने सरेराह उनका सिर कटवा दिया लेकिन फिल्म छावा के बाद आज औरंगजेब भारतीय राजनीति का वह रक्त बीज बनकर उभरा है जिससे देश की सियासत को गरमा गयी है। आज भी वह देश में अलग अलग रूपों में जिंदा होकर करोड़ों हिन्दुस्तानियों के सीने पर मूंग दर रहा हैं। अबू आज़मी, ओवैसी जैसे कट्टरपंथी उसकी शान में कसीदे गढ़ रहे हैं। औरंगज़ेब के नाम पर इंडी गठबंधन में भी फूट पड़ गई है? ऐसे में बड़ा सवाल तो यही आज़मी जैसे कट्टरपंथियों ने जो कहा कि वह सच की ज़ुबान है या क्रूर का गुणगान है? खासकर पूर्व की वो सरकारें जिसने सब कुछ जानते हुए भी मुस्लिमपरस्ती में औरंगाबाद में उसका मकबरा बनाकर एएसआई के हाथों संरक्षित करवाई है। हालांकि कुछ साल पहले भाजपा—शिवसेना गंठबंधन सरकार के मुखिया उद्धव ठाकरे ने उसके नाम पर बने जनपद औरंगाबाद की जगह छत्रपति शिवा जी नगर रखा है।
भला क्यों नहीं जब बांगलादेश में सत्ता बदली तो वहां के संस्थापक शेख मुजीबुर्रहमान की मूर्तियों को तोड़ दिया गया, जर्मन के तानाशाह एडॉल्फ हिटलर के काले कारनामों को अभिलेखों से हटा दिया गया। इराक के सद्दाम हुसैन को नेस्तनाबूद कर दिया गया लेकिन भारत अकेला देश है जहां अत्याचार करने वाले मुगल आक्रांता के नामों पर न सिर्फ मकबरे, बल्कि शहरों और सड़कों के नाम भी रखे गये जबकि अन्य देशों में सद्दाम जैसे क्रूर शासकों के मूर्तियों, इमारतों को यह कहकर तहस-नहस कर दिया गया कि हम उसे अपना आदर्श नहीं मानते हैं। स्कूल/कॉलेजों के किताबों से उसका नाम यहकर हटाया जा रहा है कि उसने समाज के लोगों बड़ा नुकसान किया है। कहा जा सकता है कि कल के आतताई शासकों के इतिहास को मिटाना ही आज की मांग है और ऐसे क्रूर आक्रांताओं का महिमामंडित किया जा रहा है जबकि बाकी के देश ऐसे क्रूर शासकों के इतिहास को ही दफन कर रहे हैं।
हालांकि अब भारत में भी औरंगजेब की कब्र को हटाने की मांग तेज हो गई है। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस समेत कई नेताओं ने इसका समर्थन किया है लेकिन अफसोस है कि पूर्व की सरकारों की वजह से यह कब्र आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के अधीन है। इसे हटाने के लिए केंद्र सरकार की मंजूरी जरूरी है। और यह तभी संभव है जब सरकार कानून बनाये, क्योंकि कानून बनाकर ही औरंगजेब के सारे निशानियों को जड़ से उखाड़ फेंका जा सकता है। वह 3 मार्च 1707 को महाराष्ट्र के अहमदनगर में मर गया था। उस समय उसकी उम्र करीब 88 साल थी। औरंगजेब का पूरा नाम अबुल मुजफ्फर मुहिउद्दीन मुहम्मद औरंगजेब था। इसका जन्म 4 नवंबर 1618 सन् में गुजरात के दोहद में हुआ था। छत्रपति संभाजी महाराज ने हिंदू धर्म और स्वाभिमान की रक्षा के लिए अपने प्राणों को त्याग दिया लेकिन उसके आगे घुटने नहीं टेका। उनकी वीरता, कर्तव्य और देशभक्ति के लिए आज भी उनको याद किया जाता है। संभाजी महाराज को छावा भी कहा जाता है।
इतिहासकारों के मुताबिक बुन्देलखंड के वीर छत्रसाल ने एक युद्ध के दौरान शरीर पर एक चीरा लगा दिया। इसके वह तीन महीने तक बिस्तर पर तड़पता रहा और फिर तड़प-तड़प कर 1707 ई. में उसकी मौत हो गई। उसकी मौत के बाद शक्तिशाली एवं वैभवशाली साम्राज्य का विघटन और पतन तेजी से हुआ। अपने शासनकाल में उसने भारत में 1000 हिंदू मंदिरों को तोड़ने का आदेश दिया था। गुरु तेग बहादुर के 400वें प्रकाश पर्व पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले की प्राचीर से देश के नाम संदेश दिया। ये कार्यक्रम लाल किले में इसलिए आयोजित किया गया, क्योंकि गुरु तेग बहादुर की हत्या का आदेश औरंगजेब ने इसी लाल किले से दिया था।
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