मणि बंध शक्ति विकासक क्रिया से मजबूत व लचीली होती है हाथ की कलाई: योगाचार्य
तेजस टूडे ब्यूरो
शिवमंगल अग्रहरि
चित्रकूट। जिला मुख्यालय के कुबेर गंज निवासी योगाचार्य रमेश सिंह राजपूत ने बताया कि मणि बंध शक्ति विकास क्रिया के माध्यम से हम हाथ की कलाईयों की मांसपेशियों को लचीली व मजबूत बना सकते हैं।
हाथ को चलायमान करने के लिए कलाईयों का बहुत अधिक महत्व है। मजबूत कलाई वाले टेनिस, बैडमिंटन, क्रिकेट आदि में बाजी मार ले जाते हैं।
साथ ही लचीली व मजबूत कलाई लेखन, पेंटिंग, स्थूल व्यायाम योग को सरल और सुगम बनाती हैं तथा रोजमर्रा की दिनचर्या को पूरा करने में भी सहायक है। हाथ और कलाई हमें हर दिन अपने आस-पास की दुनिया से जुड़ने में मदद करते हैं। अगर हाथ या कलाई में दर्द है या अन्य कोई परेशानी है और कोई सुधार होते न दिख रहा हो तो मणि बंध शक्ति विकासक क्रिया को अपनी दिनचर्या का अभिन्न अंग बनाएं और ठीक से करें। मणि बंध शक्ति विकासक क्रिया कलाई और हथेली की शक्ति को बढ़ाने में मदद करती है। यदि कलाई की शक्ति और गतिशीलता को बढ़ाना चाहते हैं, तो भी इस क्रिया को करें। इससे कलाई की गतिशीलता और सहनशीलता बढ़ती है। यह क्रिया कई योग और व्यायाम पद्धतियों में शामिल है और इसे रोजाना करने से कलाई की चोटों को रोकने में भी मदद मिल सकती है। कलाई की मांसपेशियां अग्रबाहु की मांसपेशियां हैं जो कलाई के जोड़ को नियंत्रित करती हैं जिससे हाथ को मोड़ा जा सकता है, फैलाया जा सकता है और घुमाया जा सकता है। इन मांसपेशियों को हाथ की गति और स्थिरता के लिए मजबूत और लचीला होना आवश्यक है। कलाई को 75 से 90 डिग्री तक मोड़ पाना सामान्य कलाई का लचीलापन माना जाता है। योगाचार्य ने बताया कि इस सूक्ष्म योग क्रिया को करने के लिए साम्यावस्था में एड़ी पंजा मिलाकर सीधे खड़े होते हैं, हाथों को अपने सामने धरती के समांतर फैलाते हैं तथा दोनों हाथों के बीच सीने की चौड़ाई के बराबर दूरी रखते हुए अंगूठे को छिपाकर टाइट मुट्ठी बांधते हैं। इस क्रिया को दो भागों में पूरा करते हैं। प्रथम भाग में सांस भरते हुए मुट्ठियों को ऊपर की ओर अधिकतम मोड़ते हैं। इस दशा में कोहनी से हाथ सीधा रहता है तथा सांस छोड़ते हुए मुट्ठियों को नीचे की ओर मोड़ते हैं। इस भाग को पांच बार दोहराते है। दूसरे भाग में दोनों हाथों को कोहनी से मोड़कर सीने के सामने मुट्ठियों को आमने-सामने सीने से चार इंच दूर रखते हुए, दोनों कोहनी कंधों के सीध में धरती के समांतर रखते हुए सांस भरकर दोनों मुट्ठियों को ऊपर की ओर अधिकतम मोड़ते हैं और साथ छोड़ते हुए नीचे की ओर ले जाते हैं। इसे भी पांच बार दोहराते हैं। इसके बाद दोनों हाथ नीचे करते हुए शिथिल ताड़ासन में विश्राम करते हैं और कलाई में हुए सकारात्मक परिवर्तन को अनुभव करते हैं। बताया कि सावधानी के तौर पर चोट या अधिक दर्द की दशा में इसे सावधानीपूर्वक धीरे-धीरे करना चाहिए।
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