माँ….
माँ…. तुम….!
कभी कड़े पहना देती हो..हाथों में
कभी करधनी….. कमर में….
कभी धागे वाली तो,
कभी किसी धातु की भी…..!
इतना ही नहीं… इनमें छोटे-छोटे…
घुँघुरु अलग से लगा देती हो,
नंगे बदन रहा तब भी….और…
कुछ बड़ा हुआ तब भी….
खुद को तो घूँघट में ही रख,
चालाकी से…. मुझको भी….!
घर में ही सीमित रखती हो
माँ बाँध देती हो तुम…
इन धागों से… मेरा इधर-उधर का,
विचरण और भटकाव….
बस उतनी ही दूर तक जा पाता हूँ
जहाँ तक तुम सुन लेती हो,
बजते हुए घुँघुरुओं की आवाज
कानों से तुम… चंचला हो जाती हो
वाचाल होने की भी,
तुमको जरूरत नहीं रहती…..
मेरी चंचलता खुद में समा लेती हो
माँ…. ये तुम्हारी बंदिशें हैं…या
मेरे फक्कड़पन को,
रोकने का प्रयास…. या….
दूर करती हो अपना,
थोपा गया एकाकीपन….!
मैं आज भी नहीं जान पाया…
यह भी नहीं जान पाया कि,
तुम्हारा यह बंधन,
जग को कितना भाता है….!
यह तो बस तुम ही जानो या
जाने विधाता है…..
मैं तो इतना ही जान सका हूँ कि
इस बंधन को तुम,
मेरा श्रृंगार समझती हो….
नजर न लग जाए मुझको,
इसलिए मेरे माथे पर,
काजल का टीका भी रखती हो…
क्या कहूँ माँ…. तुम तो हरदम….
मुझको अपनी आँखों में ही,
रखा करती हो……
ऐसे तो…माँ…. माया जगत में…
बंधन की शुरुआत तुम्ही हो
पर यह भी सच है कि,
जीवन का पर्याय तुम्ही हो….
खुद में समेटे जीवन का,
सब अध्याय तुम्ही हो… और…
जीवन का हर जज्बात तुम्ही हो…
क्या कहूँ माँ…..
मेरा तो यह चाहे मन,
बना रहे हर-पल यह बंधन
ना कोई इसमें झूठी बात,
सदा मिले मुझको तेरी यह सौगात
सदा मिले मुझको तेरी यह सौगात
रचनाकार—— जितेन्द्र दुबे
अपर पुलिस अधीक्षक
जनपद-कासगंज
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