है वह कौन…?

है वह कौन…?

नीरस-नीरवता में…!
आकर जो तोड़ गया मेरा मौन
मैं तो ना जानूँ उसको
है वह कौन…?
तन की तपती ज्वाला को…!
जादू कर… जो कर गया शान्त…
मैं तो ना जानूँ उसको
है वह कौन….?
मैंने तो मद में अपने…!
उसकी सुध थी बिसराई
याद दिलाई जिसने… उसकी मुझको…
मैं तो ना जानूँ उसको
है वह कौन…?
विषय-विकार बहुत से थे…!
कोई तो था उकसाने वाला…
या फिर… मन को भरमाने वाला…
मरम-भरम का तोड़ा जिसने
मैं तो ना जानूँ उसको
है वह कौन…?
जो बनकर आया दुःख विमोचक…!
मेरे हर कष्टों का उन्मोचक
इसका प्रेरक है कौन विधाता
मैं तो ना जानूँ उसको
है वह कौन…?
पर… एक बात कहूँ मैं मित्रों…!
दुखते पाँवों को सहलाने वाला,
जग में राह सही दिखलाने वाला,
पक्का कोई परम प्रिय ही होगा….
धरम-करम से भी… अपना ही होगा
मानो मेरी यह गहरी बात…
ये बंदे तो…. देते हैं हरदम…!
बस खुशियों की सौगात…
इनकी तो होती है… अलग ही जात…
पर फिर से… मैं यह कहता हूँ…
मैं तो ना जानूँ उसको
है वह कौन…?
है वह कौन…?

रचनाकार——जितेन्द्र दुबे
अपर पुलिस उपायुक्त, लखनऊ