मदर्स डेः देश में आखिर इतने वृद्धाश्रम क्यों?

विनोद कुमार जौनपुर। आज देश सहित पूरी दुनिया में मदर्स डे मनाया जा रहा है। वहीं जिला अस्पताल में शर्मसार करने वाली घटना सामने आयी है। इमरजेंसी वार्ड के सामने महिला करीब एक घंटा तड़पी नजर आयी। आज हर कोई माँ की यादों को समेटे हुए है। उन्हें याद कर रहा है परंतु आज सबसे बड़ा कड़वा सच यह है कि क्या सिर्फ मदर्स डे पर माँ को याद करना ही माँ के प्रति सच्ची सेवा है। आज हमारा समाज किस ओर जा रहा है? युवा पीढ़ी को क्यों भार लग रहे हैं माता-पिता? पश्चिमी सभ्यता के लोग हमारे देश की संस्कृति को अपनाने के लिये आतुर हैं, वहीं हमारी युवा पीढ़ी कहीं न कहीं अपनी संस्कृति को भूलती जा रही है। आज जहां गली-गली में वृद्धाश्रम खुल रहे हैं, उससे तो यही कहने पर मजबूर हैं कि क्या यही हमारी प्रगति हैं? क्या हमारी युवा पीढ़ी अपने कर्तव्य से विमुख होती जा रही है? क्या आज की युवा पीढ़ी स्वार्थी हो गयी है? जरा सोचिए, मां अनमोल है। उसके चरणों की धूल भी इंसान के लिए अनमोल है। माँ के कदमों के नीचे जन्नत है। माँ के दूध के कर्ज से कोई भी इंसान मुक्त नहीं हो सकता। प्रसव पीड़ा के समय माँ की दर्द से निकली चीख भी अदा नहीं हो सकती। गर्भ में धारण से लेकर पैदा होने तक 9 माह तक जिस बोझ को माँ झेलती है, उसके कर्ज की अदायगी करना नामुमकिन है। जन्म देनी वाली मां की ममता को बार बार सलाम। समाजसेविका शोभना स्मृति का कहना है कि ऐसा सम्मान एक दिन एक क्षण में आप सम्मान देकर पूरा तख्त पलट नहीं सकते हैं। माताओं के लिये हमेशा तैयार रहना चाहिए, क्योंकि मात्र शक्ति एक बहुत बड़ी चीज है जिसका कर्ज कभी कोई उतार नहीं सकता। अगर हमारे दिल की गहराइयों में उनके लिए सम्मान नहीं है और केवल मुख से बोले या लिख दें, दो अक्षर या वीडियो के माध्यम चित्रण प्रस्तुत करने से मैं उस सम्मान को सम्मान नहीं मानती हूं। इसके लिए हमारा एक स्नेह सम्मान एक विश्वनीयतापूर्वक होना चाहिये। पारदर्शितापूर्वक होना चाहिये। जाति, धर्म व मजहब के नाम पर महिलाओं का शोषण होता चला आ रहा है, उसको मैं बिल्कुल नकारती हूं। रेनू सिंह का कहना है कि आज देश 21वीं सदी में लोग के सोशल मीडिया पर बधाई देने का जो चलन है, उसे मैं नकारती हूं। लड़कियां सेवा करती हैं लेकिन वहीं लड़कियां जब दूसरे घर की बहू बनती हैं तो बिल्कुल नहीं देखना चाहती है। हमारे सास-ससुर हैं। जिस पति को हमने प्राप्त किया है, अपने सुख-सुविधा के लिये, वह इनके द्वारा पाला पोशा और त्याग किया हुआ पति है। यह उनका तुरन्त का अधिकार बनता है कि मेरा पति है और सहने की क्षमता समाज में नहीं होती है। स्नेहलता का कहना है कि प्रकृति का श्रृंगार है मां। बच्चों का दुलार है मां। जीवन संरचना का आधार है मां। हर पीड़ा सहे और प्यार करे, वही मां है। जितनी बखान की जाय, वह कम है। ऐसे होती हैं मां। लाल प्रकाश ‘राही’ का कहना है कि मां का अहसास ही जीवन में एक अलग तरह का अहसास है। हर आह के साथ माँ की याद का आना एक स्वाभाविक तरीका है। किसी भी तरह के दुःख में यदि किसी का नाम आता है तो वह माँ की ही होती है। मैंने बहुत करीब से देखा है। जिस बच्चे के सर पर से माँ आँचल नहीं होता है, उसकी जिंदगी आवारा सी हो जाती है। माँ बच्चों के लिए एक मकान की बुनियाद की तरह होती है लेकिन टेक्नोलॉजी और आधुनिक विकास ने समाज के अंदर से संवेदना ही खत्म कर दिया है। बाजारवाद की संस्कृति ने मनुष्य को विनियम की वस्तु बना डाला है। जहाँ हर काम लाभ कमाने के उद्देश्य से ही करने लगा है। ऐसे हालात में प्रेम और संवेदना का मर जाना स्वाभाविक है।

विनोद कुमार
जौनपुर। आज देश सहित पूरी दुनिया में मदर्स डे मनाया जा रहा है। वहीं जिला अस्पताल में शर्मसार करने वाली घटना सामने आयी है। इमरजेंसी वार्ड के सामने महिला करीब एक घंटा तड़पी नजर आयी। आज हर कोई माँ की यादों को समेटे हुए है। उन्हें याद कर रहा है परंतु आज सबसे बड़ा कड़वा सच यह है कि क्या सिर्फ मदर्स डे पर माँ को याद करना ही माँ के प्रति सच्ची सेवा है।

आज हमारा समाज किस ओर जा रहा है? युवा पीढ़ी को क्यों भार लग रहे हैं माता-पिता? पश्चिमी सभ्यता के लोग हमारे देश की संस्कृति को अपनाने के लिये आतुर हैं, वहीं हमारी युवा पीढ़ी कहीं न कहीं अपनी संस्कृति को भूलती जा रही है। आज जहां गली-गली में वृद्धाश्रम खुल रहे हैं, उससे तो यही कहने पर मजबूर हैं कि क्या यही हमारी प्रगति हैं? क्या हमारी युवा पीढ़ी अपने कर्तव्य से विमुख होती जा रही है? क्या आज की युवा पीढ़ी स्वार्थी हो गयी है?

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जरा सोचिए, मां अनमोल है। उसके चरणों की धूल भी इंसान के लिए अनमोल है। माँ के कदमों के नीचे जन्नत है। माँ के दूध के कर्ज से कोई भी इंसान मुक्त नहीं हो सकता। प्रसव पीड़ा के समय माँ की दर्द से निकली चीख भी अदा नहीं हो सकती। गर्भ में धारण से लेकर पैदा होने तक 9 माह तक जिस बोझ को माँ झेलती है, उसके कर्ज की अदायगी करना नामुमकिन है। जन्म देनी वाली मां की ममता को बार बार सलाम।

समाजसेविका शोभना स्मृति का कहना है कि ऐसा सम्मान एक दिन एक क्षण में आप सम्मान देकर पूरा तख्त पलट नहीं सकते हैं। माताओं के लिये हमेशा तैयार रहना चाहिए, क्योंकि मात्र शक्ति एक बहुत बड़ी चीज है जिसका कर्ज कभी कोई उतार नहीं सकता। अगर हमारे दिल की गहराइयों में उनके लिए सम्मान नहीं है और केवल मुख से बोले या लिख दें, दो अक्षर या वीडियो के माध्यम चित्रण प्रस्तुत करने से मैं उस सम्मान को सम्मान नहीं मानती हूं। इसके लिए हमारा एक स्नेह सम्मान एक विश्वनीयतापूर्वक होना चाहिये। पारदर्शितापूर्वक होना चाहिये। जाति, धर्म व मजहब के नाम पर महिलाओं का शोषण होता चला आ रहा है, उसको मैं बिल्कुल नकारती हूं।

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रेनू सिंह का कहना है कि आज देश 21वीं सदी में लोग के सोशल मीडिया पर बधाई देने का जो चलन है, उसे मैं नकारती हूं। लड़कियां सेवा करती हैं लेकिन वहीं लड़कियां जब दूसरे घर की बहू बनती हैं तो बिल्कुल नहीं देखना चाहती है। हमारे सास-ससुर हैं। जिस पति को हमने प्राप्त किया है, अपने सुख-सुविधा के लिये, वह इनके द्वारा पाला पोशा और त्याग किया हुआ पति है। यह उनका तुरन्त का अधिकार बनता है कि मेरा पति है और सहने की क्षमता समाज में नहीं होती है।
स्नेहलता का कहना है कि प्रकृति का श्रृंगार है मां। बच्चों का दुलार है मां। जीवन संरचना का आधार है मां। हर पीड़ा सहे और प्यार करे, वही मां है। जितनी बखान की जाय, वह कम है। ऐसे होती हैं मां।

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लाल प्रकाश ‘राही’ का कहना है कि मां का अहसास ही जीवन में एक अलग तरह का अहसास है। हर आह के साथ माँ की याद का आना एक स्वाभाविक तरीका है। किसी भी तरह के दुःख में यदि किसी का नाम आता है तो वह माँ की ही होती है। मैंने बहुत करीब से देखा है। जिस बच्चे के सर पर से माँ आँचल नहीं होता है, उसकी जिंदगी आवारा सी हो जाती है। माँ बच्चों के लिए एक मकान की बुनियाद की तरह होती है लेकिन टेक्नोलॉजी और आधुनिक विकास ने समाज के अंदर से संवेदना ही खत्म कर दिया है। बाजारवाद की संस्कृति ने मनुष्य को विनियम की वस्तु बना डाला है। जहाँ हर काम लाभ कमाने के उद्देश्य से ही करने लगा है। ऐसे हालात में प्रेम और संवेदना का मर जाना स्वाभाविक है।

विनोद कुमार जौनपुर। आज देश सहित पूरी दुनिया में मदर्स डे मनाया जा रहा है। वहीं जिला अस्पताल में शर्मसार करने वाली घटना सामने आयी है। इमरजेंसी वार्ड के सामने महिला करीब एक घंटा तड़पी नजर आयी। आज हर कोई माँ की यादों को समेटे हुए है। उन्हें याद कर रहा है परंतु आज सबसे बड़ा कड़वा सच यह है कि क्या सिर्फ मदर्स डे पर माँ को याद करना ही माँ के प्रति सच्ची सेवा है। आज हमारा समाज किस ओर जा रहा है? युवा पीढ़ी को क्यों भार लग रहे हैं माता-पिता? पश्चिमी सभ्यता के लोग हमारे देश की संस्कृति को अपनाने के लिये आतुर हैं, वहीं हमारी युवा पीढ़ी कहीं न कहीं अपनी संस्कृति को भूलती जा रही है। आज जहां गली-गली में वृद्धाश्रम खुल रहे हैं, उससे तो यही कहने पर मजबूर हैं कि क्या यही हमारी प्रगति हैं? क्या हमारी युवा पीढ़ी अपने कर्तव्य से विमुख होती जा रही है? क्या आज की युवा पीढ़ी स्वार्थी हो गयी है? जरा सोचिए, मां अनमोल है। उसके चरणों की धूल भी इंसान के लिए अनमोल है। माँ के कदमों के नीचे जन्नत है। माँ के दूध के कर्ज से कोई भी इंसान मुक्त नहीं हो सकता। प्रसव पीड़ा के समय माँ की दर्द से निकली चीख भी अदा नहीं हो सकती। गर्भ में धारण से लेकर पैदा होने तक 9 माह तक जिस बोझ को माँ झेलती है, उसके कर्ज की अदायगी करना नामुमकिन है। जन्म देनी वाली मां की ममता को बार बार सलाम। समाजसेविका शोभना स्मृति का कहना है कि ऐसा सम्मान एक दिन एक क्षण में आप सम्मान देकर पूरा तख्त पलट नहीं सकते हैं। माताओं के लिये हमेशा तैयार रहना चाहिए, क्योंकि मात्र शक्ति एक बहुत बड़ी चीज है जिसका कर्ज कभी कोई उतार नहीं सकता। अगर हमारे दिल की गहराइयों में उनके लिए सम्मान नहीं है और केवल मुख से बोले या लिख दें, दो अक्षर या वीडियो के माध्यम चित्रण प्रस्तुत करने से मैं उस सम्मान को सम्मान नहीं मानती हूं। इसके लिए हमारा एक स्नेह सम्मान एक विश्वनीयतापूर्वक होना चाहिये। पारदर्शितापूर्वक होना चाहिये। जाति, धर्म व मजहब के नाम पर महिलाओं का शोषण होता चला आ रहा है, उसको मैं बिल्कुल नकारती हूं। रेनू सिंह का कहना है कि आज देश 21वीं सदी में लोग के सोशल मीडिया पर बधाई देने का जो चलन है, उसे मैं नकारती हूं। लड़कियां सेवा करती हैं लेकिन वहीं लड़कियां जब दूसरे घर की बहू बनती हैं तो बिल्कुल नहीं देखना चाहती है। हमारे सास-ससुर हैं। जिस पति को हमने प्राप्त किया है, अपने सुख-सुविधा के लिये, वह इनके द्वारा पाला पोशा और त्याग किया हुआ पति है। यह उनका तुरन्त का अधिकार बनता है कि मेरा पति है और सहने की क्षमता समाज में नहीं होती है। स्नेहलता का कहना है कि प्रकृति का श्रृंगार है मां। बच्चों का दुलार है मां। जीवन संरचना का आधार है मां। हर पीड़ा सहे और प्यार करे, वही मां है। जितनी बखान की जाय, वह कम है। ऐसे होती हैं मां। लाल प्रकाश ‘राही’ का कहना है कि मां का अहसास ही जीवन में एक अलग तरह का अहसास है। हर आह के साथ माँ की याद का आना एक स्वाभाविक तरीका है। किसी भी तरह के दुःख में यदि किसी का नाम आता है तो वह माँ की ही होती है। मैंने बहुत करीब से देखा है। जिस बच्चे के सर पर से माँ आँचल नहीं होता है, उसकी जिंदगी आवारा सी हो जाती है। माँ बच्चों के लिए एक मकान की बुनियाद की तरह होती है लेकिन टेक्नोलॉजी और आधुनिक विकास ने समाज के अंदर से संवेदना ही खत्म कर दिया है। बाजारवाद की संस्कृति ने मनुष्य को विनियम की वस्तु बना डाला है। जहाँ हर काम लाभ कमाने के उद्देश्य से ही करने लगा है। ऐसे हालात में प्रेम और संवेदना का मर जाना स्वाभाविक है।
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