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होली त्योहार: अब नहीं सुनाई देते फाग के गीत

  • होली त्योहार: अब नहीं सुनाई देते फाग के गीत

डा. विमल यादव

असिस्टेंट प्रोफेसर
बदलते समय में फीकी पड़ती लोक परम्परा, फाल्गुन की रातें और चौपाल की रौनक
होली का नाम लेते ही कभी गांवों की चौपाल, कच्ची गलियों और आंगनों से उठती ढोलक की थाप और मंजीरे की झंकार कानों में गूंज उठती थी। फाल्गुन का महीना लगते ही वातावरण में एक विशेष उल्लास भर जाता था। रात ढलते ही पुरुषों की टोलियाँ और महिलाओं के अलग समूह पारंपरिक फाग गाने के लिए एकत्रित होते थे। गीतों में हास्य, व्यंग्य, श्रृंगार और भक्ति का अद्भुत संगम होता था। आज वही होली बदलते सामाजिक परिवेश में नए रूप में दिखाई दे रही है। रंगों की चमक बरकरार है परंतु फाग के गीतों की वह आत्मीय गूंज अब विरल होती जा रही है।

भारतीय सांस्कृतिक परंपरा में होली केवल उत्सव नहीं, बल्कि लोकजीवन की सामूहिक अभिव्यक्ति रही है। इसकी पौराणिक पृष्ठभूमि प्रह्लाद और होलिका की कथा से जुड़ी है जो सत्य की विजय का प्रतीक मानी जाती है। वहीं ब्रज क्षेत्र में राधा और कृष्ण की लीलाओं से जुड़ी फाग परम्परा ने इस पर्व को रस और रंग का अनूठा आयाम दिया। फाग गीतों में कृष्ण-राधा के संवाद, गोपियों की नोकझोंक और लोकजीवन की सहज अनुभूतियाँ बड़े जीवंत रूप में अभिव्यक्त होती थीं।
ब्रज के मथुरा, वृंदावन और आस-पास के क्षेत्रों में होली का उत्सव आज भी विश्वविख्यात है। यहां लट्ठमार होली, फूलों की होली और पारम्परिक फाग गायन की झलक मिलती है, किंतु स्थानीय लोगों का कहना है कि पहले जैसी सामूहिकता और स्वाभाविकता अब कम होती जा रही है। बड़े आयोजनों में मंच और साउंड सिस्टम की प्रधानता ने पारम्परिक चौपाल संस्कृति को पीछे कर दिया है।

ग्रामीणांचलों में भी स्थिति कमोबेश यही है। पहले होली से एक सप्ताह पूर्व ही गाँव में फाग मंडलियों का अभ्यास आरंभ हो जाता था। बुजुर्ग लोकगायक नई पीढ़ी को गीत सिखाते थे। ढोलक, झांझ और हारमोनियम के साथ पूरी रात फाग गाए जाते थे। इन गीतों में सामाजिक व्यंग्य भी होता था, गाँव के मुखिया से लेकर नवविवाहित दाम्पत्य तक, सभी पर हास्यपूर्ण टिप्पणियाँ की जाती , जिन्हें लोग सहजता से स्वीकार करते थे। यह लोकसंवाद का सशक्त माध्यम था। अब इसकी जगह डीजे और फिल्मी गीतों ने ले ली है। तेज ध्वनि और आधुनिक धुनों के बीच लोक संगीत की कोमल लय दबती जा रही है।

तेजी से बढ़ता शहरीकरण, गाँवों से युवाओं का पलायन और संयुक्त परिवारों का विघटन, इन सबने लोकपरंपराओं की निरंतरता को प्रभावित किया है। आज के युवा रोजगार और शिक्षा के कारण शहरों में बस रहे हैं। वहाँ सामूहिक सांस्कृतिक अभ्यास के अवसर सीमित हैं। डिजिटल मनोरंजन और सोशल मीडिया ने भी पारम्परिक मेल-मिलाप की संस्कृति को प्रभावित किया है। होली पर अब लोग एक-दूसरे के घर जाकर फाग गाने की बजाय मोबाइल पर शुभकामना संदेश भेजकर औपचारिकता निभा लेते हैं।

लोक कलाकारों की स्थिति भी चिंताजनक है। अनेक पारंपरिक फाग गायक बताते हैं कि पहले उन्हें गांव-गांव से निमंत्रण मिलता था और उनका सम्मान किया जाता था। अब कार्यक्रमों में डीजे और ऑर्केस्ट्रा को प्राथमिकता मिलती है। आर्थिक प्रोत्साहन के अभाव में नई पीढ़ी लोकगायन को अपनाने से हिचक रही है। यदि यह क्रम जारी रहा तो आने वाले वर्षों में फाग गीत केवल पुस्तकों और अभिलेखों तक सीमित रह सकते हैं।

हालांकि सकारात्मक पहल भी सामने आ रही हैं। कुछ सांस्कृतिक संस्थाएँ और स्थानीय प्रशासन पारम्परिक फाग प्रतियोगिताओं और लोक उत्सवों का आयोजन कर रहे हैं। विद्यालयों और महाविद्यालयों में लोक संगीत कार्यशालाओं की शुरुआत की जा रही है। आकाशवाणी और अन्य प्रसारण माध्यमों पर फाग विशेष कार्यक्रम प्रसारित किए जा रहे हैं। सोशल मीडिया का उपयोग भी अब संरक्षण के साधन के रूप में किया जा रहा है, युवा कलाकार पारम्परिक फाग रिकॉर्ड कर डिजिटल मंचों पर साझा कर रहे हैं जिससे इन गीतों को नया श्रोता वर्ग मिल रहा है लेकिन यह पर्याप्त नहीं है।
आधुनिकता को पूर्णतः अस्वीकार करना समाधान नहीं है। आवश्यकता सन्तुलन की है। यदि होली के उत्सव में कुछ समय पारम्परिक फाग गायन के लिए सुरक्षित रखा जाए, ग्राम पंचायत और स्थानीय संस्थाएँ लोक कलाकारों को मंच दें और नई पीढ़ी को अपने सांस्कृतिक मूल्यों से परिचित कराया जाय तो यह परंपरा पुनर्जीवित हो सकती है। होली का वास्तविक सौंदर्य केवल रंगों की चटख में नहीं, बल्कि उन स्वरों में है जो समुदाय को एक सूत्र में बांधते हैं। फाग के गीतों में जो अपनापन, सहजता और लोकजीवन की आत्मा बसती है, वही इस पर्व की पहचान है। यदि यह स्वर खो गया तो होली का सांस्कृतिक आयाम अधूरा हो जाएगा, इसलिए समय की मांग है कि हम अपने लोकसंगीत और परंपराओं को सहेजने की सामूहिक जिम्मेदारी निभाएँ, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ भी फाल्गुन की रातों में फाग की मधुर गूंज सुन सकें।

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