फागुन का रंग
आयी बसंत झूमकर,
खुशी हुई देखकर
चहुंओर हरियाली छायी
मन सबो का हर्षायी
तरू लता, में पत्ते निकले
आमों में मंजरी छाये
पलाश, टेसू में पुष्प खिले
सरसों में पीले फूल खिले
देख प्रकृति का रंग
फागुन का चढ़ा रंग
सब मस्ती को, है तैयार
रंगों की होगी बौछार
गीत फागुन का गायेंगे
खुशियाँ भरपूर मनायेंगे
फागुन का रंग है
जमकर मस्ती उठायेंगे
ना किसी से बैर
ना, कोई शेर, सवा शेर
जब प्रकृति ही रंगे हैं
तो, इंसानों मे क्या दंगे हैं
भुलाकर, सब अफनी व्यथा
आशीष, ले और देती जा
ये महीना आनंद का है
दुखो,कष्टों से अंत का है
खुद के बुराई दूर कर
अच्छाई को अब बाहर कर
देख, दुनिया कितनी सुन्दर है
मन जिसका स्वच्छ, भीतर है
आयी वसंत झूमकर
फागुन का चढ़ा जमकर
चुन्नू साहा
पाकूड, झारखण्ड।
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