Monday, June 14, 2021

एक तरफ काल, दूसरी ओर आक्सीजन की कालाबाजारी | #TEJASTODAY

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एक तरफ काल, दूसरी ओर आक्सीजन की कालाबाजारी | #TEJASTODAY

एक तरफ काल, दूसरी ओर आक्सीजन की कालाबाजारी | #TEJASTODAY अजय कुमार लखनऊ। कोरोना महामारी में भी कुछ ‘शैतानी ताकतें’ अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रही हैं। लॉक डाउन के समय जरूरत की चीजों की कैसे कालाबाजारी हुई थी, किसी से छिपा नहीं है। आटा जैसी आवश्वयक वस्तु बाजार से गायब हो गई थी। जो आटा आम दिनों में २०-२२ रूपए किलो बिकता था, वह ३० रूपए किलो तक बेचा गया। शायद ही कोई खाद्य पदार्थ ऐसा होगा जिसकी कीमत नहीं बढ़ाई गई हो। कालाबाजारियों ने मुनाफा कमाने के चक्कर में घटिया माल तैयार करना शुरू कर दिया। बाद में यह कालाबाजारी कोरोना के लिए जरूरी चीजों में भी देखने को मिली जो आज तक जारी है। एक तो कोरोना में मरीज के जान के लाले पड़े है, दूसरी तरफ कोरोना के उपचार के लिए जरूरी सामानों की कालाबाजारी ने मरीजों और शासन-प्रशासन की नींद उड़ा रखी है। कोरोना प्रकोप जब शुरू हुआ था तब कालाबाजारियों ने मास्क और सेनेटाइजर के लिए मनमाने पैसे वसूले थे जो बिल्कुल भी उचित नहीं था। इसके बाद रेनी डे सिवियर दवा की कालाबाजारी शुरू हो गई जिसे कोरोना से निपटने में कारगर माना जा रहा था लेकिन यह दवा बड़े प्राइवेट अस्पतालों को छोड़कर बाकी जगह उपलब्ध नहीं थी। ऐसे में अगर किसी मरीज को इस दवा को खरीदना होता है उन्हें ब्लैक मार्केट में कई गुना दाम देने पड़ते। जिस समय कोरोना वायरस के संक्रमण और उससे उपजा खतरा दुनिया भर में चिंता का विषय बना हुआ है, उसमें इसके इलाज से संबंधित दवाओं की कालाबाजारी की खबरें यही दर्शाती हैं कि कैसे कुछ लोग या समूह देश और समाज के सामने पैदा संकट को भी मुनाफे का मौका बना लेते हैं। ऐसे में सरकार से यही उम्मीद होती है कि वह दवाओं की जमाखोरी और कालाबाजारी के खिलाफ सख्त कार्रवाई करे और इस पर रोक के लिए एक ठोस नियमन की व्यवस्था करे। यह विडंबना ही है कि कालाबाजारी पर लगाम लगाने के लिए औषधि कीमत नियामक को दवाओं की कीमत सीमा और मूल्यों में स्वीकार्य वृद्धि के संदर्भ में दवा (कीमत नियंत्रण) आदेश, २०१३ का उल्लंघन नहीं होना सुनिश्चित करने के लिए अलग से निर्देश जारी करना पड़ता है जबकि यह राज्यों के नियमित दायित्व में शामिल होना चाहिए। अगर दवा की कीमतों और उसके कारोबार से संबंधित कानूनी प्रावधान पहले से मौजूद हैं तो उसके पालन के लिए सरकार को अलग से निर्देश जारी करने की जरूरत नहीं पड़नी चाहिए थी। यह एक सामान्य व्यवस्था होनी चाहिए थी जिस पर अमल अनिवार्य हो। उक्त कालाबाजारी से सरकार निपट ही रही थी कि अब आक्सीजन सिलेंडरों की कालाबाजारी ने सरकार की नींद उड़ा कर रख दी है जबकि कोरोना पीड़ितों के लिए आक्सीजन की बेहद जरूरत रहती है। यह और बात है कि न कम्पनियां और न ही सरकार यह मानने को तैयार हैं कि आक्सीजन सिंलेडरों की कमी है। आक्सीजन की काला बाजारी पर उत्पादकों ने आश्वस्त किया है कि आक्सीजन के उत्पादन में कोई कमी नहीं है। समस्या सप्लाई को लेकर है परंतु सच्चाई यही है कि मेडिकल कालेज ऑक्सीजन की उपलब्धता चुनौतीपूर्ण बनती जा रही है। कीमतों का बढ़ना भी यही बताता है कि स्थिति हाथ से बाहर जा सकती है। इसी के चलते १४ सिंतबर को केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डा० हर्षवर्धन को संसद में बयान देना पड़ गया। सरकार कह रही है कि देश में इस समय केवल ५.८ प्रतिशत मामलों में (कोरोना रोगियों के) ऑक्सीजन थेरेपी की आवश्यकता पड़ रही है। वहीं अस्पतालों का हाल कुछ और बता रहा है। उत्तर प्रदेश की बात की जाए तो अन्य राज्यों की तरह यूपी में भी ऑक्सीजन के बढ़ते दाम और अब पर्याप्त उपलब्धता न होने से कोरोना वायरस के संक्रमण का इलाज करवा रहे मरीजों की जान सांसत में है। सरकारी और निजी अस्पतालों में ऑक्सीजन की खपत अचानक २ से ३ गुना तक बढ़ गई है जबकि ऑक्सीजन की आपूर्ति करने वाली कंपनियों के प्लांट में उसका उत्पादन मांग के अनुरूप नहीं हो रहा है। ऑक्सीजन की बढ़ती डिमांड के चलते ऑक्सीजन के वेंडर्स ने कालाबाजारी शुरू कर दी है। जरूरतमंदों से निर्धारित मूल्य से दोगुना तक वसूला जा रहा है। दरअसल जमशेदपुर में लिक्विड ऑक्सीजन प्लांट में ताला लगने और महाराष्ट्र, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल आदि कई राज्यों में किल्लत होने से उत्तर प्रदेश में भी इसका असर देखने को मिल रहा है। ऐसे में जिन मरीजों को ऑक्सीजन की जरूरत है, उन्हें इसकी मनमानी कीमत चुकानी पड़ रही है। होम आइसोलेशन में रह रहे तकरीबन ३४ हजार मरीजों को तो छोटे ऑक्सीजन सिलेंडर का ५ हजार और बड़े सिलेंडर के लिए १० हजार रुपये सुरक्षा राशि के तौर पर भी जमा करनी पड़ रही है। निजी अस्पतालों में तो ऑक्सीजन सपोर्ट पर भर्ती मरीज को पहले एक दिन का १००० से १५०० रुपये देना पड़ता था, अब वह ३००० रुपये तक वसूल रहे हैं। आइसीयू में भर्ती मरीजों से पहले २५०० रुपये प्रतिदिन चार्ज लिया जाता था। अब करीब ५ हजार रुपये तक लिए जा रहे हैं। वहीं बड़े ऑक्सीजन सिलेंडर की रिफलिंग अभी तक २१३ रुपये थी अब अचानक इसके दाम ३५० रुपये तक पहुंच गए हैं। १.५ क्यूबिक मीटर वाले छोटे ऑक्सीजन वाले सिलेंडर की रिफलिंग १३० रुपये में हो रही है। ऐसे में सरकारी अस्पतालों में भी ऑक्सीजन कम पड़ रही है। हालात को देखते हुए कई राज्य सरकारों ने इंडस्ट्रीयल ऑक्सीजन के उत्पादकों को भी मेडिकल ऑक्सीजन के उत्पादन का लाइसेंस दे दिया है। वहीं नए प्लांट्स स्थापित किये जाने की बात भी हो रही है। ऑक्सीजन उद्योग की बात करें तो देश में कुल १२ बड़े और ५०० मझौले-छोटे ऑक्सीजन उत्पादक हैं। इनमें गुजरात बेस्ड कपंनी आइनॉक्स एयर प्रोडक्ट्स प्रा.लि. देश की सबसे बड़ी ऑक्सीजन उत्पादक फर्म है। देश भर में इसके अनेक प्लांट्स हैं। इसी के समकक्ष दिल्ली बेस्ड गोयल एमजी गैसेस प्रा.लि. और कोलकता बेस्ड कंपनी लिंडे इंडिया हैं। ‘ऑल इंडिया इंडस्ट्रीयल गैसेस मेन्युफेक्चरर्स एसोसिएशन‘ का कहना है कि मेडिकल ऑक्सीजन का उत्पादन ४ गुना तक बढ़ा दिया गया है। मार्च २०२० में जहां हम प्रतिदिन ७५० टन मेडिकल ऑक्सीजन का उत्पादन कर रहे थे। आज २७०० टन प्रतिदिन कर रहे हैं। पहले जहां औद्योगिक ऑक्सीलन का उत्पादन ७० प्रतिशत हो रहा था और मेडिकल ऑक्सीजन का ३० प्रतिशत, वह अनुपात मार्च के बाद उलट गया है। संगठन का कहना है कि उद्योग पर जबरर्दस्त दबाव है। मार्च में जब प्रधानमंत्री ने मेडिकल इमरजेंसी सप्लाई से जुड़े सभी साझीदारों से चर्चा कर आपूर्ति का आकलन किया था, तब पर्याप्त आपूर्ति का आश्वासन दिया गया था किंतु अनलॉक बाद सभी उद्योग-धंधे शुरू हो गए जिससे औद्योगिक ऑक्सजीन की मांग भी बढ़ गई। इधर कोरोना मामलों की रफ्तार कई गुना आगे निकल चुकी है। मांग की पूर्ति कैसे होगी? इस पर केंद्र यही कह रहा है कि ऑक्सीजन की कमी नही है। कुल खपत और मांग से लगभग ६० प्रतिशत अधिक उत्पादन हो रहा है। समस्या सप्लाई की है। कोरोना महामारी के चलते एक तरफ काल मरीजों के ऊपर मौत बनकर मंडरा रहा है तो वहीं आक्सीजन की कालाबाजारी ने भी मरीजों की नींद उड़ा रखी है कि कहीं आक्सीजन की कमी उनका दम न तोड़ दे।

अजय कुमार

लखनऊ। कोरोना महामारी में भी कुछ ‘शैतानी ताकतें’ अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रही हैं। लॉक डाउन के समय जरूरत की चीजों की कैसे कालाबाजारी हुई थी, किसी से छिपा नहीं है। आटा जैसी आवश्वयक वस्तु बाजार से गायब हो गई थी। जो आटा आम दिनों में २०-२२ रूपए किलो बिकता था, वह ३० रूपए किलो तक बेचा गया। शायद ही कोई खाद्य पदार्थ ऐसा होगा जिसकी कीमत नहीं बढ़ाई गई हो। कालाबाजारियों ने मुनाफा कमाने के चक्कर में घटिया माल तैयार करना शुरू कर दिया।

बाद में यह कालाबाजारी कोरोना के लिए जरूरी चीजों में भी देखने को मिली जो आज तक जारी है। एक तो कोरोना में मरीज के जान के लाले पड़े है, दूसरी तरफ कोरोना के उपचार के लिए जरूरी सामानों की कालाबाजारी ने मरीजों और शासन-प्रशासन की नींद उड़ा रखी है। कोरोना प्रकोप जब शुरू हुआ था तब कालाबाजारियों ने मास्क और सेनेटाइजर के लिए मनमाने पैसे वसूले थे जो बिल्कुल भी उचित नहीं था। इसके बाद रेनी डे सिवियर दवा की कालाबाजारी शुरू हो गई जिसे कोरोना से निपटने में कारगर माना जा रहा था लेकिन यह दवा बड़े प्राइवेट अस्पतालों को छोड़कर बाकी जगह उपलब्ध नहीं थी। ऐसे में अगर किसी मरीज को इस दवा को खरीदना होता है उन्हें ब्लैक मार्केट में कई गुना दाम देने पड़ते।

जिस समय कोरोना वायरस के संक्रमण और उससे उपजा खतरा दुनिया भर में चिंता का विषय बना हुआ है, उसमें इसके इलाज से संबंधित दवाओं की कालाबाजारी की खबरें यही दर्शाती हैं कि कैसे कुछ लोग या समूह देश और समाज के सामने पैदा संकट को भी मुनाफे का मौका बना लेते हैं। ऐसे में सरकार से यही उम्मीद होती है कि वह दवाओं की जमाखोरी और कालाबाजारी के खिलाफ सख्त कार्रवाई करे और इस पर रोक के लिए एक ठोस नियमन की व्यवस्था करे।

यह विडंबना ही है कि कालाबाजारी पर लगाम लगाने के लिए औषधि कीमत नियामक को दवाओं की कीमत सीमा और मूल्यों में स्वीकार्य वृद्धि के संदर्भ में दवा (कीमत नियंत्रण) आदेश, २०१३ का उल्लंघन नहीं होना सुनिश्चित करने के लिए अलग से निर्देश जारी करना पड़ता है जबकि यह राज्यों के नियमित दायित्व में शामिल होना चाहिए। अगर दवा की कीमतों और उसके कारोबार से संबंधित कानूनी प्रावधान पहले से मौजूद हैं तो उसके पालन के लिए सरकार को अलग से निर्देश जारी करने की जरूरत नहीं पड़नी चाहिए थी। यह एक सामान्य व्यवस्था होनी चाहिए थी जिस पर अमल अनिवार्य हो।

उक्त कालाबाजारी से सरकार निपट ही रही थी कि अब आक्सीजन सिलेंडरों की कालाबाजारी ने सरकार की नींद उड़ा कर रख दी है जबकि कोरोना पीड़ितों के लिए आक्सीजन की बेहद जरूरत रहती है। यह और बात है कि न कम्पनियां और न ही सरकार यह मानने को तैयार हैं कि आक्सीजन सिंलेडरों की कमी है। आक्सीजन की काला बाजारी पर उत्पादकों ने आश्वस्त किया है कि आक्सीजन के उत्पादन में कोई कमी नहीं है। समस्या सप्लाई को लेकर है परंतु सच्चाई यही है कि मेडिकल कालेज ऑक्सीजन की उपलब्धता चुनौतीपूर्ण बनती जा रही है। कीमतों का बढ़ना भी यही बताता है कि स्थिति हाथ से बाहर जा सकती है।

इसी के चलते १४ सिंतबर को केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डा० हर्षवर्धन को संसद में बयान देना पड़ गया। सरकार कह रही है कि देश में इस समय केवल ५.८ प्रतिशत मामलों में (कोरोना रोगियों के) ऑक्सीजन थेरेपी की आवश्यकता पड़ रही है। वहीं अस्पतालों का हाल कुछ और बता रहा है।

उत्तर प्रदेश की बात की जाए तो अन्य राज्यों की तरह यूपी में भी ऑक्सीजन के बढ़ते दाम और अब पर्याप्त उपलब्धता न होने से कोरोना वायरस के संक्रमण का इलाज करवा रहे मरीजों की जान सांसत में है। सरकारी और निजी अस्पतालों में ऑक्सीजन की खपत अचानक २ से ३ गुना तक बढ़ गई है जबकि ऑक्सीजन की आपूर्ति करने वाली कंपनियों के प्लांट में उसका उत्पादन मांग के अनुरूप नहीं हो रहा है। ऑक्सीजन की बढ़ती डिमांड के चलते ऑक्सीजन के वेंडर्स ने कालाबाजारी शुरू कर दी है। जरूरतमंदों से निर्धारित मूल्य से दोगुना तक वसूला जा रहा है।

दरअसल जमशेदपुर में लिक्विड ऑक्सीजन प्लांट में ताला लगने और महाराष्ट्र, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल आदि कई राज्यों में किल्लत होने से उत्तर प्रदेश में भी इसका असर देखने को मिल रहा है। ऐसे में जिन मरीजों को ऑक्सीजन की जरूरत है, उन्हें इसकी मनमानी कीमत चुकानी पड़ रही है। होम आइसोलेशन में रह रहे तकरीबन ३४ हजार मरीजों को तो छोटे ऑक्सीजन सिलेंडर का ५ हजार और बड़े सिलेंडर के लिए १० हजार रुपये सुरक्षा राशि के तौर पर भी जमा करनी पड़ रही है। निजी अस्पतालों में तो ऑक्सीजन सपोर्ट पर भर्ती मरीज को पहले एक दिन का १००० से १५०० रुपये देना पड़ता था, अब वह ३००० रुपये तक वसूल रहे हैं।

आइसीयू में भर्ती मरीजों से पहले २५०० रुपये प्रतिदिन चार्ज लिया जाता था। अब करीब ५ हजार रुपये तक लिए जा रहे हैं। वहीं बड़े ऑक्सीजन सिलेंडर की रिफलिंग अभी तक २१३ रुपये थी अब अचानक इसके दाम ३५० रुपये तक पहुंच गए हैं। १.५ क्यूबिक मीटर वाले छोटे ऑक्सीजन वाले सिलेंडर की रिफलिंग १३० रुपये में हो रही है। ऐसे में सरकारी अस्पतालों में भी ऑक्सीजन कम पड़ रही है।

हालात को देखते हुए कई राज्य सरकारों ने इंडस्ट्रीयल ऑक्सीजन के उत्पादकों को भी मेडिकल ऑक्सीजन के उत्पादन का लाइसेंस दे दिया है। वहीं नए प्लांट्स स्थापित किये जाने की बात भी हो रही है। ऑक्सीजन उद्योग की बात करें तो देश में कुल १२ बड़े और ५०० मझौले-छोटे ऑक्सीजन उत्पादक हैं। इनमें गुजरात बेस्ड कपंनी आइनॉक्स एयर प्रोडक्ट्स प्रा.लि. देश की सबसे बड़ी ऑक्सीजन उत्पादक फर्म है। देश भर में इसके अनेक प्लांट्स हैं। इसी के समकक्ष दिल्ली बेस्ड गोयल एमजी गैसेस प्रा.लि. और कोलकता बेस्ड कंपनी लिंडे इंडिया हैं।

‘ऑल इंडिया इंडस्ट्रीयल गैसेस मेन्युफेक्चरर्स एसोसिएशन‘ का कहना है कि मेडिकल ऑक्सीजन का उत्पादन ४ गुना तक बढ़ा दिया गया है। मार्च २०२० में जहां हम प्रतिदिन ७५० टन मेडिकल ऑक्सीजन का उत्पादन कर रहे थे। आज २७०० टन प्रतिदिन कर रहे हैं। पहले जहां औद्योगिक ऑक्सीलन का उत्पादन ७० प्रतिशत हो रहा था और मेडिकल ऑक्सीजन का ३० प्रतिशत, वह अनुपात मार्च के बाद उलट गया है। संगठन का कहना है कि उद्योग पर जबरर्दस्त दबाव है। मार्च में जब प्रधानमंत्री ने मेडिकल इमरजेंसी सप्लाई से जुड़े सभी साझीदारों से चर्चा कर आपूर्ति का आकलन किया था, तब पर्याप्त आपूर्ति का आश्वासन दिया गया था किंतु अनलॉक बाद सभी उद्योग-धंधे शुरू हो गए जिससे औद्योगिक ऑक्सजीन की मांग भी बढ़ गई।

इधर कोरोना मामलों की रफ्तार कई गुना आगे निकल चुकी है। मांग की पूर्ति कैसे होगी? इस पर केंद्र यही कह रहा है कि ऑक्सीजन की कमी नही है। कुल खपत और मांग से लगभग ६० प्रतिशत अधिक उत्पादन हो रहा है। समस्या सप्लाई की है। कोरोना महामारी के चलते एक तरफ काल मरीजों के ऊपर मौत बनकर मंडरा रहा है तो वहीं आक्सीजन की कालाबाजारी ने भी मरीजों की नींद उड़ा रखी है कि कहीं आक्सीजन की कमी उनका दम न तोड़ दे।

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किस कदर शुक्रिया अदा करूँ उस खुदा का अल्फाज नहीं मिलते,मेरी कामयाबी इतनी खूबसूरत ना होती जो आप जैसे इंसान नहीं मिलते

Gepostet von Tejastoday.com am Freitag, 18. September 2020

दाह संस्कार को गई शव को पुलिस ने लिया कब्जे में | #TEJASTODAY पत्नी सहित ससुराली जनों ने लगाया हत्या का आरोप सुरेरी, जौनपुर। बीते रविवार की रात लगभग 8 बजे नेवढ़िया थाना क्षेत्र के दोदापुर गांव निवासी छविनाथ मिश्र के 40 वर्ष पुत्र विनय मिश्र की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई। मृतक के परिजनों की मानें तो युवक पारिवारिक कलह को लेकर फांसी लगाकर आत्महत्या कर लिया था। वही घटना के बाद मृतक के परिजन बगैर किसी को सूचना दिए मृतक के शव को दाह संस्कार के लिए वाराणसी के मणिकर्णिका घाट पर लेकर पहुंच गए थे। किसी तरह से घटना की सूचना मायके गई पत्नी प्रतिमा को लगी तो उन्होंने घटना की सूचना पुलिस अधीक्षक जौनपुर सहित जिलाधिकारी जौनपुर को दी, और परिजनों के साथ पत्नी भी मणिकर्णिका घाट पहुंच गई। वही घंटों चले पंचायत के बाद नेवढ़िया पुलिस शव को कब्जे में लेकर थाने पर पहुंची और शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया। मृतक की पत्नी प्रतिमा का आरोप है कि परिवार जनों द्वारा युवक की हत्या की गई है, और उसे आत्महत्या का रूप दिया जा रहा है। वही मृतक के पत्नी का यह भी आरोप है कि जब वह अपने पिता दीनानाथ के साथ सोमवार को तहरीर देने नेवढ़िया थाने पहुची तो थानाध्यक्ष द्वारा फटकार लगाते हुए उन्हें थाने से भगा दिया गया। ग्रामीणों की माने तो मृतक अपने परिवार के साथ मुंबई में ही रहता था, लॉकडाउन के दौरान वह मुंबई से अपने घर आया हुआ था। मृतक की पत्नी रक्षाबंधन के पर्व पर अपने मायके गई हुई थी। मृतक को दो बच्चे हर्षीत 14 वर्ष, अंकिता 8 वर्ष है। इस संदर्भ में थानाध्यक्ष नेवढ़िया संतोष राय ने बताया कि पत्नी की शिकायत पर मृतक के शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया है पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद आवश्यक कार्रवाई की जाएगी।

सम्पूर्ण समाधान दिवस का हुआ आयोजन | #TEJASTODAY चंदन अग्रहरि शाहगंज, जौनपुर। स्थानीय तहसील सभागार में सम्पूर्ण समाधान दिवस का आयोजन सीडीओ अनुपम शुक्ला की अध्यक्षता में हुआ। जिसमें फरियादियों द्वारा कुल 47 प्रार्थना-पत्र प्रस्तुत किया गया। जिसमें मौके पर 11 प्रार्थना-पत्रों का निस्तारण हुआ। शेष प्रार्थना पत्र सम्बन्धित विभाग को सौंप दिया गया। वहीं कोरोना संक्रमण के चलते बिना मास्क के किसी भी फरियादी को प्रवेश नहीं करने दिया गया। सोशल डिस्टेंसिंग का पालन किया गया। इस दौरान प्रमुख रुप उपजिलाधिकारी राजेश कुमार वर्मा, तहसीलदार अभिषेक राय, क्षेत्राधिकारी जितेन्द्र दूबे, वीडीओ सोंधी अनुराग राय, कस्बा कानूनगो नीरज सिंह आदि मौजूद रहे।

स्वरोजगार के लिये आनलाइन आवेदन आमंत्रित |#TEJASTODAY जौनपुर। साहब सरन रावत उपायुक्त उद्योग जिला उद्योग प्रोत्साहन तथा उद्यमिता विकास केन्द्र ने बताया कि जनपद के युवा/युवतियों को उत्तर-प्रदैश सरकार द्वारा विशेष योजना एम०एस०एम०ई० के अन्तर्गत मुख्यमंत्री युवा स्वरोजगार योजना हेत आनलाइन आवेदन के लिये पात्रता हाईस्कूल पास एवं आयु सीमा १८ से ४० वर्ष के बीच होनी चाहिए। निर्माण व सेवा क्षेत्र में उद्योग स्थापित करने हेतु ऋण की सीमा १.०० लाख से २५.०० लाख तक है जिसमें आवेदक को २५ प्रतिशत अनुदान/छूट प्रदान की जायेगी। अधिक जानकारी के हेतु तहसीलवार सहायक प्रबन्धक/क्षेत्रीय सहायक शाहगंज व बदलापुर जय प्रकाश, ७००७६३७०६३, सदर व केराकत राजेश राही ९४५०३८८०८७, ७८८०३९६००१ एवं मडियाहूॅ व मछलीशहर राजेश भारती ७३९८२७८६७७, ७००७७२०३५८ से सम्पर्क करें। अन्य जानकारी के लिये किसी भी कार्य दिवस में कार्यालय आकर सम्पर्क किया जा सकता है।

पारिवारिक कलह से क्षुब्ध होकर युवक ने ​खाया जहरीला पदार्थ | #TEJASTODAY चंदन अग्रहरि शाहगंज, जौनपुर। क्षेत्र के पारा कमाल गांव में पारिवारिक कलह से क्षुब्ध होकर बुधवार की शाम युवक ने किटनाशक पदार्थ का सेवन कर लिया। आनन फानन में परिजनों ने उपचार के लिए पुरुष चिकित्सालय लाया गया। जहां पर चिकित्सकों ने हालत गंभीर देखते हुए जिला चिकित्सालय रेफर कर दिया। क्षेत्र के पारा कमाल गांव निवासी पिंटू राजभर 22 पुत्र संतलाल बुधवार की शाम पारिवारिक कलह से क्षुब्ध होकर घर में रखा किटनाशक पदार्थ का सेवन कर लिया। हालत गंभीर होने पर परिजन उपचार के लिए पुरुष चिकित्सालय लाया गया। जहां पर हालत गंभीर देखते हुए चिकित्सकों बेहतर इलाज के लिए जिला अस्पताल रेफर कर दिया।

कोरोना संक्रमण के चलते 19 सितम्बर तक न्यायिक कार्य ठप्प | #TEJASTODAY मछलीशहर, जौनपुर। स्थानीय तहसील के अधिवक्ताओं ने बैठक कर कोरोना संक्रमण को मद्देनजर 19 सितम्बर तक न्यायिक कार्य ठप्प रखने का निर्णय लिया है। अधिवक्ता संघ के अध्यक्ष प्रेम बिहारी यादव की अध्यक्षता में शुक्रवार को साधारण सभा की बैठक बुलाई गई। बैठक में सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया कि कोरोना संक्रमण के बढ़ते प्रभाव को देखते हुये अधिवक्ता 19 सितम्बर तक न्यायिक कार्य से विरत रहेंगे। इस मौके पर अधिवक्ताओं ने कहा कि तहसील में वादकारियों व अधिवक्ताओं की बढ़ती भीड़ के कारण सोशल डिस्टेंसिंग का पालन नहीं हो पा रहा है जिसके कारण संक्रमण का बराबर खतरा बना हुआ है। ऐसी स्थिति में एहतियात के तौर पर यह निर्णय अति आवश्यक है। बैठक में महामंत्री अजय सिंह, वरिष्ठ अधिवक्ता दिनेश चंद्र सिन्हा, अशोक श्रीवास्तव, सुरेन्द्र मणि शुक्ला, जगदंबा प्रसाद मिश्र, नागेन्द्र प्रसाद श्रीवास्तव, विनय पाण्डेय, हरि नायक तिवारी, वीरेंद्र भाष्कर यादव, मनमोहन तिवारी आदि उपस्थित रहे।

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