Friday, August 12, 2022

अरूण कुमार गुप्ता ने खोजी प्राचीन प्रतिमाएँ

चन्दौली। जिले के साहबगंज कस्बे के अतायस्तगंज ग्राम के खेतों के मध्य से कस्बा निवासी व प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग काशी हिन्दू विश्वविद्यालय वाराणसी के परास्नातक पुरातन छात्र अरूण कुमार गुप्ता ने ललितासन मुद्रा में माहेश्वर, अनेकों बड़े छोटे शिवलिंग, प्रणाल, उमा की प्रतिमा, अलंकृत स्तम्भ, मृणठप्पा इत्यादि अनेकों खण्डित बलुए प्रस्तर निर्मित प्रतिमाएँ खोजा है। जिसकी पहचान प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के असिस्टेंट प्रोफेसर डा. विनोद कुमार जायसवाल व दृश्य कला संकाय के प्रो. शान्ति स्वरूप सिन्हा ने किया है। डा. विनोद के अनुसार ललितासन मुद्रा में माहेश्वर की खण्डित प्रतिमा जिनका दाहिना पैर नन्दी के पीठ पर है जो अपने आराध्य देव शिव को भक्तिभाव से देख रहा है। बायाँ पैर एक पिठिका पर है चूंकि कटि से ऊपर का भाग खण्डित है किन्तु बायी ओर माहेश्वर के मुद्रा व खण्डित भाग के कारण कहा जा सकता है कि इनकी अर्धांगिनी उमा रही होंगी। एक अन्य खण्डित प्रतिमा जिनके किरिट करण्ड (केश), कुण्डल, स्त्रियोचित चेहरा, भाव भंगिमा, बाये हाथ में दर्पण लिए एक देवी अर्थात पार्वती की प्रतिमा हो सकती है जिनके बायी शिरे पर मालाधारी गंधर्व विचरण कर रहा है। दूसरे खण्डित प्रतिमा जो कटि से लेकर घुटने तक है यह विशिष्ट अलंकरण से युक्त है। इसका अंगविन्यास सिधा है अतः किसी देवी की है न कि अप्सरा आदि की। इसके अलावा एक बड़ा सा छिद्रयुक्त अरघा है, जिसमें शिवलिंग को स्थापित किया गया है तथा कई छोटे-छोटे अरघायुक्त शिवलिंग भी मिले हैं। इस प्रकार यह सम्पूर्ण खण्डित प्रतिमाएँ किसी शिव मंदिर के भग्नावशेष प्रदर्शित कर रहे हैं जिसमें उमा-माहेश्वर की पूजा अर्चना होती थी। प्रतिमाओं के निर्माण शैली, अलंकरण, प्रतिमाशास्त्री अंकनांें, लक्षणों के आधार पर इसे 9वीं से 11वीं शताब्दी के मध्य कालखण्ड का कहा जा सकता है जिसे मुगलों के समय हिन्दू मंदिरों के तहस नहस अभियान के समय यह भी कालकवलित हुआ। शेष भग्नावशेषों के विस्तृत विवरण व निष्कर्ष हेतु स्थानीय सर्वेक्षण व अवलोकन अपेक्षित है।

चन्दौली। जिले के साहबगंज कस्बे के अतायस्तगंज ग्राम के खेतों के मध्य से कस्बा निवासी व प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग काशी हिन्दू विश्वविद्यालय वाराणसी के परास्नातक पुरातन छात्र अरूण कुमार गुप्ता ने ललितासन मुद्रा में माहेश्वर, अनेकों बड़े छोटे शिवलिंग, प्रणाल, उमा की प्रतिमा, अलंकृत स्तम्भ, मृणठप्पा इत्यादि अनेकों खण्डित बलुए प्रस्तर निर्मित प्रतिमाएँ खोजा है। जिसकी पहचान प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के असिस्टेंट प्रोफेसर डा. विनोद कुमार जायसवाल व दृश्य कला संकाय के प्रो. शान्ति स्वरूप सिन्हा ने किया है।

  चन्दौली। जिले के साहबगंज कस्बे के अतायस्तगंज ग्राम के खेतों के मध्य से कस्बा निवासी व प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग काशी हिन्दू विश्वविद्यालय वाराणसी के परास्नातक पुरातन छात्र अरूण कुमार गुप्ता ने ललितासन मुद्रा में माहेश्वर, अनेकों बड़े छोटे शिवलिंग, प्रणाल, उमा की प्रतिमा, अलंकृत स्तम्भ, मृणठप्पा इत्यादि अनेकों खण्डित बलुए प्रस्तर निर्मित प्रतिमाएँ खोजा है। जिसकी पहचान प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के असिस्टेंट प्रोफेसर डा. विनोद कुमार जायसवाल व दृश्य कला संकाय के प्रो. शान्ति स्वरूप सिन्हा ने किया है। डा. विनोद के अनुसार ललितासन मुद्रा में माहेश्वर की खण्डित प्रतिमा जिनका दाहिना पैर नन्दी के पीठ पर है जो अपने आराध्य देव शिव को भक्तिभाव से देख रहा है। बायाँ पैर एक पिठिका पर है चूंकि कटि से ऊपर का भाग खण्डित है किन्तु बायी ओर माहेश्वर के मुद्रा व खण्डित भाग के कारण कहा जा सकता है कि इनकी अर्धांगिनी उमा रही होंगी। एक अन्य खण्डित प्रतिमा जिनके किरिट करण्ड (केश), कुण्डल, स्त्रियोचित चेहरा, भाव भंगिमा, बाये हाथ में दर्पण लिए एक देवी अर्थात पार्वती की प्रतिमा हो सकती है जिनके बायी शिरे पर मालाधारी गंधर्व विचरण कर रहा है। दूसरे खण्डित प्रतिमा जो कटि से लेकर घुटने तक है यह विशिष्ट अलंकरण से युक्त है। इसका अंगविन्यास सिधा है अतः किसी देवी की है न कि अप्सरा आदि की। इसके अलावा एक बड़ा सा छिद्रयुक्त अरघा है, जिसमें शिवलिंग को स्थापित किया गया है तथा कई छोटे-छोटे अरघायुक्त शिवलिंग भी मिले हैं। इस प्रकार यह सम्पूर्ण खण्डित प्रतिमाएँ किसी शिव मंदिर के भग्नावशेष प्रदर्शित कर रहे हैं जिसमें उमा-माहेश्वर की पूजा अर्चना होती थी। प्रतिमाओं के निर्माण शैली, अलंकरण, प्रतिमाशास्त्री अंकनांें, लक्षणों के आधार पर इसे 9वीं से 11वीं शताब्दी के मध्य कालखण्ड का कहा जा सकता है जिसे मुगलों के समय हिन्दू मंदिरों के तहस नहस अभियान के समय यह भी कालकवलित हुआ। शेष भग्नावशेषों के विस्तृत विवरण व निष्कर्ष हेतु स्थानीय सर्वेक्षण व अवलोकन अपेक्षित है।

डा. विनोद के अनुसार ललितासन मुद्रा में माहेश्वर की खण्डित प्रतिमा जिनका दाहिना पैर नन्दी के पीठ पर है जो अपने आराध्य देव शिव को भक्तिभाव से देख रहा है। बायाँ पैर एक पिठिका पर है चूंकि कटि से ऊपर का भाग खण्डित है किन्तु बायी ओर माहेश्वर के मुद्रा व खण्डित भाग के कारण कहा जा सकता है कि इनकी अर्धांगिनी उमा रही होंगी। एक अन्य खण्डित प्रतिमा जिनके किरिट करण्ड (केश), कुण्डल, स्त्रियोचित चेहरा, भाव भंगिमा, बाये हाथ में दर्पण लिए एक देवी अर्थात पार्वती की प्रतिमा हो सकती है जिनके बायी शिरे पर मालाधारी गंधर्व विचरण कर रहा है।
दूसरे खण्डित प्रतिमा जो कटि से लेकर घुटने तक है यह विशिष्ट अलंकरण से युक्त है। इसका अंगविन्यास सिधा है अतः किसी देवी की है न कि अप्सरा आदि की। इसके अलावा एक बड़ा सा छिद्रयुक्त अरघा है, जिसमें शिवलिंग को स्थापित किया गया है तथा कई छोटे-छोटे अरघायुक्त शिवलिंग भी मिले हैं। इस प्रकार यह सम्पूर्ण खण्डित प्रतिमाएँ किसी शिव मंदिर के भग्नावशेष प्रदर्शित कर रहे हैं जिसमें उमा-माहेश्वर की पूजा अर्चना होती थी।
प्रतिमाओं के निर्माण शैली, अलंकरण, प्रतिमाशास्त्री अंकनांें, लक्षणों के आधार पर इसे 9वीं से 11वीं शताब्दी के मध्य कालखण्ड का कहा जा सकता है जिसे मुगलों के समय हिन्दू मंदिरों के तहस नहस अभियान के समय यह भी कालकवलित हुआ। शेष भग्नावशेषों के विस्तृत विवरण व निष्कर्ष हेतु स्थानीय सर्वेक्षण व अवलोकन अपेक्षित है।

चंदन अग्रहरि शाहगंज, जौनपुर। जेसीआई शाहगंज संस्कार द्वारा गुरुवार को नगर पालिका परिषद के 100 सफाई व बाजार में काम करने वाले कर्मचारियों को मास्क, सेनेटाइजर व गमछा देकर सम्मानित किया। वहीं सुल्तानपुर जनपद में कोरोना संक्रमितों का उपचार करके लौटे संस्था के सदस्य जेसी डा. राशिद अशरफ को सम्मानित किया गया। प्राप्त जानकारी के अनुसार नई आबादी मोहल्ला निवासी जेसीआई शाहगंज संस्कार टीम के सदस्य जेसी डा. राशिद अशरफ को सुल्तानपुर जनपद में कोरोना मरीजों के इलाज के लिए ड्यूटी लगी थी। सेवा के पश्चात 15 दिन होम कोरंटाइन रहने के बाद घर लौटने पर स्टार क्लब के अनवर एडवोकेट, हेल्पिंग हैंड सोसाइटी की शबनम रिज़वी ने माल्यार्पण कर स्वागत किया। वहीं नगर पालिका परिषद में चेयरमैन प्रतिनिधि प्रदीप जायसवाल, अधिशाषी अधिकारी दिनेश कुमार यादव, संस्कार के अध्यक्ष एखलाक खान समेत सदस्यों ने माल्यार्पण स्वागत किया। इस मौके पर जेसी गुलाम साबिर, पंकज सिंह, सेराज आतिश, मो. मेंहदी, डा. शर्फुद्दीन आज़मी, विवेक गुप्ता, दानिश रिज़वी, माजिद, सभासद गणेश चौहान आदि रहे। जौनपुर। भाजपा कार्यालय पर सामाजिक दूरी का ख्याल रखते हुये जिलाध्यक्ष श्री पुष्पराज सिंह के अध्यक्षता में बैठक हुई, जिसमें आपातकाल पर चर्चा हुई। जिलाध्यक्ष ने कहा कि 25 जून का दिन एक विवादस्पद फैसले के लिए जाना जाता है यही वह दिन था जब देश में आपातकाल लगाने की घोषणा हुई तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने जनता को बेवजह मुश्किलों के समुंदर में धकेल दिया। 25 जून, 1975 को आपातकाल की घोषणा की गई और 26 जून 1975 से 21-मार्च 1977 तक यानी 21 महीने की अवधि तक आपातकाल जारी रहा। आपातकाल के फैसले को लेकर इंदिरा गांधी द्वारा कई दलीलें दी गईं। देश को गंभीर खतरा बताया गया, लेकिन पर्दे के पीछे की कहानी कुछ और ही थी उन्होंने कहा कि हमारे जिले जौनपुर से भी कई नेता जेल गए जिसमे मुख्य रूप से पूर्व विधायक सुरेन्द्र सिंह अल्प आयु में ही जेल गए कैलाश विश्वकर्मा जी, हरिश्चन्द्र श्रीवास्तव तमाम नेता जेल गये थे। जिलाध्यक्ष ने कहा कि आपातकाल की नींव 12 जून 1975 को ही रख दी गई थी जब इंदिरा गांधी के खिलाफ संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के प्रत्याशी राजनारायण ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक याचिका दाखिल की राजनारायण ने अपनी याचिका में इंदिरा गांधी पर 6 आरोप लगाये थे 12 जून 1975 को राजनारायण की इस याचिका पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया इंदिरा गांधी को चुनाव में सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग का दोषी पाया गया और इंदिरा गांधी के निर्वाचन को रद्द कर दिया और 6 साल तक उनके चुनाव लड़ने पर भी रोक लगा दी। हाईकोर्ट के फैसले के बाद इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री पद छोड़ना पड़ता इसलिए इस लटकती तलवार से बचने के लिए प्रधानमंत्री के आधिकारिक आवास पर आपात बैठक बुलाई गई। इस दौरान कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष डीके बरुआ ने इंदिरा गांधी को सुझाव दिया कि अंतिम फैसला आने तक वो कांग्रेस अध्यक्ष बन जाएं और प्रधानमंत्री की कुर्सी वह खुद संभाल लेंगे लेकिन बरुआ का यह सुझाव इंदिरा गांधी के बेटे संजय गांधी को पसंद नहीं आया संजय की सलाह पर इंदिरा गांधी ने हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ 23 जून को सुप्रीम कोर्ट में अपील की सुप्रीम कोर्ट ने अगले दिन 24 जून 1975 को याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि वो इस फैसले पर पूरी तरह से रोक नहीं लगाएंगे। सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें प्रधानमंत्री बने रहने की अनुमति दे दी, मगर साथ ही कहा कि वो अंतिम फैसला आने तक सांसद के रूप में मतदान नहीं कर सकतीं विपक्ष के नेता सुप्रीम कोर्ट का पूरा फैसला आने तक नैतिक तौर पर इंदिरा गांधी के इस्तीफे पर अड़ गए। एक तरफ इंदिरा गांधी कोर्ट में कानूनी लड़ाई लड़ रहीं थीं, दूसरी तरफ विपक्ष उन्हें घेरने में जुटा हुआ था। गुजरात और बिहार में छात्रों के आंदोलन के बाद विपक्ष कांग्रेस के खिलाफ एकजुट हो गया। लोकनायक कहे जाने वाले जयप्रकाश नारायण (जेपी) की अगुआई में विपक्ष लगातार कांग्रेस सरकार पर हमला कर रहा था। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अगले दिन 25 जून 1975 को दिल्ली के रामलीला मैदान में जेपी ने एक रैली का आयोजन किया जिसमे अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, आचार्य जेबी कृपलानी, मोरारजी देसाई और चंद्रशेखर जैसे तमाम दिग्गज नेता एक साथ एक मंच पर मौजूद थे। विपक्ष के बढ़ते दबाव के बीच इंदिरा गांधी ने 25 जून 1975 की आधी रात को तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद से इमरजेंसी के घोषणा पत्र पर दस्तखत करा लिए जिसके बाद सभी विपक्षी नेता गिरफ्तार कर लिए गए 26 जून 1975 को सुबह 6 बजे कैबिनेट की एक बैठक बुलाई गई इस बैठक के बाद इंदिरा गांधी ने ऑल इंडिया रेडियो के ऑफिस पहुंचकर देश को संबोधित किया उन्होंने कहा कि आपातकाल के पीछे आंतरिक अशांति को वजह बताई लेकिन इसके खिलाफ गहरी साजिश रची गई इसके बाद प्रेस की आजादी छीन ली गई, कई वरिष्ठ पत्रकारों को जेल भेज दिया गया अखबार तो बाद में फिर छपने लगे, लेकिन उनमें क्या छापा जा रहा है। ये पहले सरकार को बताना पड़ता था। इमरजेंसी का विरोध करने वालों को इंदिरा गांधी ने जेल भेज दिया था 21 महीने में 11 लाख लोगों को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया. 21 मार्च 1977 को इमरजेंसी खत्म करने की घोषणा की गई। इंदिरा गांधी और कांग्रेस आपातकाल को संविधान के अनुसार लिए गया फैसला बताते रहे, लेकिन वास्तव में उन्होंने 1975 में संविधान द्वारा दिए गए इस अधिकार का दुरुपयोग किया। कार्यक्रम में मुख्य रूप से शामिल जिला उपाध्यक्ष सुरेंद्र सिंघानियां, अमित श्रीवास्तव, जिला महामंत्री शुशील मिश्रा, पीयूष गुप्ता, जिला मंत्री राजू दादा, अभय राय डीसीएफ चेयरमैन धन्यजय सिंह, भूपेंद्र पांडे, आमोद सिंह, विनीत शुक्ला, राजवीर दुर्गवंशी, रोहन सिंह, इन्द्रसेन सिंह प्रमोद, अनिल गुप्ता, प्रमोद प्रजापति, भाजयुमो जिला महामंत्री विकास ओझा, शुभम मौर्या आदि कार्यकर्ता उपस्थित रहे। जौनपुर। भाजपा कार्यालय पर सामाजिक दूरी का ख्याल रखते हुये जिलाध्यक्ष श्री पुष्पराज सिंह के अध्यक्षता में बैठक हुई, जिसमें आपातकाल पर चर्चा हुई। जिलाध्यक्ष ने कहा कि 25 जून का दिन एक विवादस्पद फैसले के लिए जाना जाता है यही वह दिन था जब देश में आपातकाल लगाने की घोषणा हुई तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने जनता को बेवजह मुश्किलों के समुंदर में धकेल दिया। 25 जून, 1975 को आपातकाल की घोषणा की गई और 26 जून 1975 से 21-मार्च 1977 तक यानी 21 महीने की अवधि तक आपातकाल जारी रहा। आपातकाल के फैसले को लेकर इंदिरा गांधी द्वारा कई दलीलें दी गईं। देश को गंभीर खतरा बताया गया, लेकिन पर्दे के पीछे की कहानी कुछ और ही थी उन्होंने कहा कि हमारे जिले जौनपुर से भी कई नेता जेल गए जिसमे मुख्य रूप से पूर्व विधायक सुरेन्द्र सिंह अल्प आयु में ही जेल गए कैलाश विश्वकर्मा जी, हरिश्चन्द्र श्रीवास्तव तमाम नेता जेल गये थे। जिलाध्यक्ष ने कहा कि आपातकाल की नींव 12 जून 1975 को ही रख दी गई थी जब इंदिरा गांधी के खिलाफ संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के प्रत्याशी राजनारायण ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक याचिका दाखिल की राजनारायण ने अपनी याचिका में इंदिरा गांधी पर 6 आरोप लगाये थे 12 जून 1975 को राजनारायण की इस याचिका पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया इंदिरा गांधी को चुनाव में सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग का दोषी पाया गया और इंदिरा गांधी के निर्वाचन को रद्द कर दिया और 6 साल तक उनके चुनाव लड़ने पर भी रोक लगा दी। हाईकोर्ट के फैसले के बाद इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री पद छोड़ना पड़ता इसलिए इस लटकती तलवार से बचने के लिए प्रधानमंत्री के आधिकारिक आवास पर आपात बैठक बुलाई गई। इस दौरान कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष डीके बरुआ ने इंदिरा गांधी को सुझाव दिया कि अंतिम फैसला आने तक वो कांग्रेस अध्यक्ष बन जाएं और प्रधानमंत्री की कुर्सी वह खुद संभाल लेंगे लेकिन बरुआ का यह सुझाव इंदिरा गांधी के बेटे संजय गांधी को पसंद नहीं आया संजय की सलाह पर इंदिरा गांधी ने हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ 23 जून को सुप्रीम कोर्ट में अपील की सुप्रीम कोर्ट ने अगले दिन 24 जून 1975 को याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि वो इस फैसले पर पूरी तरह से रोक नहीं लगाएंगे। सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें प्रधानमंत्री बने रहने की अनुमति दे दी, मगर साथ ही कहा कि वो अंतिम फैसला आने तक सांसद के रूप में मतदान नहीं कर सकतीं विपक्ष के नेता सुप्रीम कोर्ट का पूरा फैसला आने तक नैतिक तौर पर इंदिरा गांधी के इस्तीफे पर अड़ गए। एक तरफ इंदिरा गांधी कोर्ट में कानूनी लड़ाई लड़ रहीं थीं, दूसरी तरफ विपक्ष उन्हें घेरने में जुटा हुआ था। गुजरात और बिहार में छात्रों के आंदोलन के बाद विपक्ष कांग्रेस के खिलाफ एकजुट हो गया। लोकनायक कहे जाने वाले जयप्रकाश नारायण (जेपी) की अगुआई में विपक्ष लगातार कांग्रेस सरकार पर हमला कर रहा था। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अगले दिन 25 जून 1975 को दिल्ली के रामलीला मैदान में जेपी ने एक रैली का आयोजन किया जिसमे अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, आचार्य जेबी कृपलानी, मोरारजी देसाई और चंद्रशेखर जैसे तमाम दिग्गज नेता एक साथ एक मंच पर मौजूद थे। विपक्ष के बढ़ते दबाव के बीच इंदिरा गांधी ने 25 जून 1975 की आधी रात को तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद से इमरजेंसी के घोषणा पत्र पर दस्तखत करा लिए जिसके बाद सभी विपक्षी नेता गिरफ्तार कर लिए गए 26 जून 1975 को सुबह 6 बजे कैबिनेट की एक बैठक बुलाई गई इस बैठक के बाद इंदिरा गांधी ने ऑल इंडिया रेडियो के ऑफिस पहुंचकर देश को संबोधित किया उन्होंने कहा कि आपातकाल के पीछे आंतरिक अशांति को वजह बताई लेकिन इसके खिलाफ गहरी साजिश रची गई इसके बाद प्रेस की आजादी छीन ली गई, कई वरिष्ठ पत्रकारों को जेल भेज दिया गया अखबार तो बाद में फिर छपने लगे, लेकिन उनमें क्या छापा जा रहा है। ये पहले सरकार को बताना पड़ता था। इमरजेंसी का विरोध करने वालों को इंदिरा गांधी ने जेल भेज दिया था 21 महीने में 11 लाख लोगों को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया. 21 मार्च 1977 को इमरजेंसी खत्म करने की घोषणा की गई। इंदिरा गांधी और कांग्रेस आपातकाल को संविधान के अनुसार लिए गया फैसला बताते रहे, लेकिन वास्तव में उन्होंने 1975 में संविधान द्वारा दिए गए इस अधिकार का दुरुपयोग किया। कार्यक्रम में मुख्य रूप से शामिल जिला उपाध्यक्ष सुरेंद्र सिंघानियां, अमित श्रीवास्तव, जिला महामंत्री शुशील मिश्रा, पीयूष गुप्ता, जिला मंत्री राजू दादा, अभय राय डीसीएफ चेयरमैन धन्यजय सिंह, भूपेंद्र पांडे, आमोद सिंह, विनीत शुक्ला, राजवीर दुर्गवंशी, रोहन सिंह, इन्द्रसेन सिंह प्रमोद, अनिल गुप्ता, प्रमोद प्रजापति, भाजयुमो जिला महामंत्री विकास ओझा, शुभम मौर्या आदि कार्यकर्ता उपस्थित रहे।

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